Na-Mehram Se Baat Karna In Islam

इस्लाम में ना-महरम से बात करना 

Na Mehram Se Baat Karna In Islam


  • इस्लाम में ना-महरम से बात करना या किसी ना महरम को देखना कैसा है?
  • ना मेहरम कौन?
  • इस्लाम किन लोगों को न महरम करार देता है?

ना मेहरम हर वो शख्स है जिस से क़ुरान पर्दे का हुक्म देता है आइए देखते हैं क़ुरान से अल्लाह ताला फरमाते है:

"और ऐ नबी, ईमानवाली औरतों से कह दो कि अपनी नज़रें बचाकर रखें, और अपनी शर्मगाहों कि हिफ़ाज़त करें, और अपना बनाव-सिंगार न दिखाएँ सिवाय उसके जो ख़ुद ज़ाहिर हो जाए, और अपने सीनों पर अपनी ओढ़नियों के आँचल डाले रहें। वो अपना बनाव-सिंगार न ज़ाहिर करें मगर इन लोगों के सामने - शौहर, बाप, शौहरों के बाप, अपने बेटे, शौहरों के बेटे, भाई, भाइयों के बेटे, बहनों के बेटे, अपने मेल-जोल कि औरतें, अपनी मिलकियत में रहनेवाले (लौंडी-ग़ुलाम), वो मातहत मर्द जो किसी और तरह की ग़रज़ न रखते हों, और वो बच्चे जो औरतों कि छिपी बातों को अभी जानते न हों। वो अपने पाँव ज़मीन पर मारती हुई न चला करें कि अपनी जो ज़ीनत उन्होंने छिपा रखी हो, उसका लोगों को पता चल जाए। ऐ ईमानवालो, तुम सब मिलकर अल्लाह से तौबा करो, उम्मीद है कि कामयाबी पाओगे।"  [क़ुरान 24: 31]

इस्लाम में बेहयाई को रोकने की बहुत ज्यादा ताकीद की गई है और समाज में बेहयाई की शुरुआत नजरों से ही होती है। इस्लाम ने नजरों की हिफाजत का हुक्म दे कर गोया बेहयाई की जड़ काट दी। जब एक ईमान वाला नामहरम से नजरें ही नहीं मिला सकता तो इससे आगे की बुराइयां तो वैसे ही खत्म हो जाती है। क़ुरआन में नजरों की हिफाजत का साफ साफ हुक्म इन अल्फाज में आया है: 

"(ऐ नबी सल्ल.) मोमिन मर्दों से कहो कि अपनी नज़रों को नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें यही उनके लिये ज्यादा पाकीजा तरीका है, वो लोग जो कुछ करते हैं ख़ुदा उससे यक़ीनन ख़ूब वाक़िफ है।"

"और (ऐ नबी सल्ल.) मोमिन औरतों से भी कह दो कि वह भी अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें और अपने बनाव सिंगार को (किसी पर) ज़ाहिर न होने दें मगर जो खुद ब खुद ज़ाहिर हो जाता हो (उसका गुनाह नही) और अपनी सीनों पर ओढ़नियों के आँचल डाले रहे……" [सूरह नूर 24:30-31]


जब जरीर बिन अब्दुल्लाह (رَضِيَ ٱللَّٰهُ عَنْهُ) ने (गैर औरत पर) अचानक पड़ने वाली नज़र के बारे में रसूलल्लाह (ﷺ) से मसला पूछा तो आप (ﷺ) ने हुक्म फरमाया कि “तुम अपनी नज़र फेर लिया करो।” [सहीह मुस्लिम 2159/45]


कयामत के दिन जब अल्लाह के अर्श के साये के सिवा कोई और साया न होगा, तो उस दिन अल्लाह 7 तरह के खुशनसीब लोगों को अपने अर्श के साये में जगह देगा। जिनमें से एक शख्श वो होगा जिसे किसी खूबसूरत और खानदानी औरत ने जिना की तरफ बुलाया और उसने कहा कि “मैं अल्लाह से डरता हूँ।” [सहीह बुखारी 6474]


नबी (ﷺ) ने एक सच्चा वाकिया बयान किया जिसमें 3 आदमी एक गार (गुफा) में फंस गये और तीनों ने अपने नेक आमाल का वसीला दे कर अल्लाह से मदद माँगी तो अल्लाह ने उन्हें उस गार में मरने से बचा लिया।
उनमें से एक शख्श वो भी था जिसने अल्लाह से डर कर अपनी शर्मगाह की हिफाजत की और जिना से रुक गया। [सहीह बुखारी 2215,2272,2333,3465,5974]




सहीह बुखारी की हदीस 5066 के मुताबिक निकाह, शर्मगाह की हिफाजत का जरिया है। सबसे पहले खुद को नज़र को दुरुस्त करें उसके साथ ही सही उम्र में निकाह ताक़ीद की गई है। हमारे मुआशरे में ट्रेंड सा हो गया है के जब तक लड़का-लड़की हाई डिग्रीज नहीं ले लेते या जॉब नहीं करने लग जाते उनकी शादी नहीं होती और बहुत से परिवारों में ये नियम लागू कर दिया जाता है के लड़का कुछ साल कमा ले फिर शादी करेंगे। और शादी करते करते लड़का 30 -35 की उम्र को पहुँच जाता है। इस उम्र में शादी होना बहुत सरे मसलों की वजह बनता है। ऐसे लड़के नाजायज़ रिश्तों की तरफ मायल होते है और लडकियां भी गुमराह हो जाती हैं जिससे हमारी इज्ज़त दांव पर लगा देती है और समाज में ये बदनामी का सबब बनती है।

निकाह में देरी एक नहीं कई गुनाहों की वजह बनती है  तरफ इसका सबसे बड़ा फायदा ये है के इंसान नामहरम की मोहब्बत में पड़ने वाले गुनाह से बच जाता है। गौर करने की बात ये है कि 90 प्रतिशत मुस्लिम घरों में इस्लामिक माहौल नहीं है। भले ही उन घरों के मर्द पंच वक़्ता नमाज़ी हैं मगर औरतें दीन से दूर हो रही हैं। नौजावां नस्ल कम कीमत में 2 जीबी डेटा का का फायदा उठाते हुए सोशल मीडिया पर मुजरा और बेहयाई के गर्त में खोता जा रहा है, और ये गुनाह है इस गुनाह से कैसे बचा जाय? कौम के नौजवान बच्चे और बच्चियां ना मेहरम की झूठी मुहब्बत में गिरफ्तार हो रहे हैं, क्या इसे मुहब्बत कहा जा सकता है?

मुहब्बत सुकुन देने का नाम है जो आप के रूह को तर कर दे और वो मुहब्बत तो निकाह के बाद ही होती है आज की मुहब्बत को आप देखें क्या ये सुकुन देती है? बिल्कुल नहीं। लोग सोशल मीडिया पर लगे हुए हैं एक साथ 8 से 10 लडकियों से चैटिंग कर रहे हैं ये मुहब्बत नहीं attraction है बातों का जिसमें कोई लज्जत मिलती हो मगर ये सख़्त गुनाह है। अल्लाह ताला के नज़दीक ये जिनाह की कैटगरी में आता है।

आज मुआशरे में बुराई और बेहयाई बहुत आम हो चुकी है, नौजवान नस्ल गुनाह कर के भी उसे गुनाह नहीं समझ रहे हैं। अक्सर शादियो में आप को देखने मिल जाऐगा की दुल्हे के दोस्त दुल्हन के साथ सेल्फी ले रहे है, देवर भाभी हँसी मजाक की हदे पार कर रहे है, स्कूल कॉलेज की छुट्टी होने का नौजवान लड़के इन्तजार करते हैं ताकि लड़कियो को देख सके और आज की लड़कियां भी ऐसी ही होती जा रही है चुस्त और आधे अधूरे लिबास पहन कर लड़कों को अपनी तरफ अट्रैक्ट करने की कोशिश करती है। आखिर क्यों?
हर गली और नुक्कड़ पर दो चार मनचले मिल जायेगे जो लड़कियों को अपने नजरों से ही नंगा कर दें और इन जाहिलो को अपनी इन हरकतो पर जरा भी अफसोस नहीं है। अफसोस कहा जा रही उम्मत, जो लोग गैर महरम औरतों को देखना उनसे बाते करना पसंद करते है वो जरा गौर करे। फरमान ए इलाही,

ऐ नबी मोमिन मर्दो से कह दो की वह अपनी नजरे बचाकर रखे। [क़ुरान 24: 29]

नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया: "ऐ अली, अजनबी औरत पर एक मर्तबा नजर पड़ जाने के बाद दोबारा मत देखो क्योकी पहली नजर तो माफ है जबकी दूसरी नजर की तुझे इजाजत नहीं।" [अबू दाऊद-2148]

पहली नज़र का मतलब अगर अचानक नजर पड़ जाए तो फौरन हटाने झुकाने का हुक्म है न की जान बुझ कर पहली ही नज़र डालना और जी भर के देख लेना।


याद रखें, ना-महरम की मुहब्बत को शैतान हमेशा मज़ीन करके पेश करता है, बहुत दिल चाहता है कि ना-महरम से मुहब्बत वाली बाते की जाये, उसकी मुहब्बत और उससे मुहब्बत का ऐतराफ़ किया जाये।  लेकिन, यह फ़ितना होता है, आज़माइश होती है, अल्लाह तआला भी देखना चाहता है कि यह मेरा फ़रमाबरदार बन्दा कितनी मेरी फ़रमाबरदारी करता है, मुझे राज़ी रखते हुए ना-महरम की मुहब्बत से दूर होगा या फ़िर मुझे नाराज़ करके ना-महरम के क़रीब जायेगा। 

बाज़ अल्लाह से सच्ची मुहब्बत करने वाले लोग अल्लाह के लिए ना-महरम की सच्ची मुहब्बत को छोड़ देते हैं, उन्हें वक़्ती तौर पर तकलीफ़ होती है लेकिन फ़िर अल्लाह तआला उन्हें हलावत इमानी नसीब फ़रमाता है।  यह हलावत ईमानी दुनिया की सब से बड़ी नेंअमत है। 

बाज़ कमज़ोर ईमान वाले लोग अल्लाह की नाफ़रमानी करके ना-महरम के क़रीब हो जाते हैं, उन्हें वक़्ती तौर पर ख़ुशी होती है, क्योंकि गुनाह में अल्लाह तआला ने भी लज़्ज़त रखी है, यह उस गुनाह वाली लज़्ज़त को सकूंन और राहत समझते हैं, लेकिन यह अंदर ही अंदर ख़ुद को ही सकूंन वाली कैफ़ियत में पाते हैं लेकिन ये सुकून शायद वक्ति होता है जो इंसान को अंदर ही अंदर खोखला बना देता है। यह एक फितना होता है और यह फ़ितना हर इंसान के साथ पेश आता है, शैतान अपनी चाल बखूबी चलता है और हम उसकी गिरफ्त में आ जाते हैं हमे हर हाल में ऐसे फितने से बचना चाहिए और अल्लाह के तरफ़ रूजू करना चाहिए ताकि हम गुनाहों से बच सकें। 

मैंने हक़ीक़त आपके सामने रख दी है, अगर आप समझदार होंगी तो कभी भी ग़लत क़दम नही उठायेंगी खौफे खुदा अपने सीने में रख कर अल्लाह ताला की फर्माबरदारी करेंगे और खाश कर बच्चियों से मेरी इल्तजा है कि,

  • अपने मां बाप का गुरूर हमेशा कायम रखेंगी 
  • कोई ऐसा काम कभी न करें जिसे से आप के वालिद कर सर कभी किसी के सामने झुके, इसका खयाल रखेंगी 
  • आप उनका मान हैं इस मान को कभी टूटने नहीं देंगी 

अल्लाह हर मुस्लमान मर्द औरत को ऐसे गुनाह से बचाए और नेक अमल करने की तौफिक अता फरमाए 
आमीन 
जज़ाक अल्लाह ख़ैर 



मुसन्निफ़ा (लेखिका): फ़िरोज़ा खान



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