सूरह यासीन से मुतअल्लिक़ रिवायात का इल्मी जायज़ा
तहरीर: शैख़ ज़ुबैर अली ज़ई रहिमहुल्लाह
माख़ूज़: फ़तावा इल्मिय्या (1/493–497)
सवाल: “जो शख़्स हर सुबह सूरह यासीन पढ़ता है, उसके दिन की तमाम ज़रूरतें पूरी कर दी जाती हैं?”
जवाब: ये रिवायत सुनन अद-दारिमी (2/457, हदीस: 3421) में इस सनद के साथ मौजूद है:
अता बिन अबी रबाह (ताबिई) ने कहा: मुझे ये बात पहुँची है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया…”
मुसन्निफ़-ए-मिश्कातुल-मसाबीह (हदीस: 2177) ने भी इसे इमाम दारिमी से रिवायत किया है।
ये रिवायत मुरसल होने की वजह से ज़ईफ़ है, और जिस शख़्स ने अता बिन अबी रबाह को ये बात बताई, वो भी मज़हूल है।
सूरह यासीन के फ़ज़ाइल में मरवी मज़ीद मरफ़ूअ रिवायात भी ज़ईफ़ और मर्दूद हैं:
1. “बेशक हर चीज़ का एक दिल है, और क़ुरआन का दिल यासीन है। जो शख़्स यासीन पढ़ेगा, अल्लाह तआला उसके लिए क़ुरआन पढ़ने का दस गुना अज्र लिख देगा।”
(जामिअ अत-तिर्मिज़ी: 2887, अनस रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस, तब्लीग़ी निसाब, सफ़्हा 292; फ़ज़ाइलुल-क़ुरआन, सफ़्हा 58)
इमाम तिर्मिज़ी रहिमहुल्लाह ने इस हदीस के एक रावी के बारे में फ़रमाया: “हारून अबू मुहम्मद एक मज़हूल शैख़ हैं।”
हारून के मज़हूल होने की वजह से ये रिवायत ज़ईफ़ है। शैख़ अल्बानी रहिमहुल्लाह ने इसे मौज़ूअ (मनगढ़त) क़रार दिया है। (सिलसिलतुल अहादीस अद-ज़ईफ़ा, 1/202, हदीस: 169)
इमाम अबू हातिम अर-राज़ी रहिमहुल्लाह का कहना है कि इस हदीस का रावी अस्ल में मुक़ातिल बिन सुलैमान है, जो झूठा है। (इललुल-हदीस, 2/56, हदीस: 1652)
जबकि सुनन अत-तिर्मिज़ी, सुनन अद-दारिमी (2/456, हदीस: 3419) और तारीख़ बग़दाद (4/267) में रावी का नाम मुक़ातिल बिन हय्यान है, जो सच्चा रावी है। अल्लाह ही बेहतर जानता है।
2. इसी बाब में सय्यिदुना अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी इसी हदीस के बारे में इमाम तिर्मिज़ी रहिमहुल्लाह ने फ़रमाया: “ये अपनी पहली सनद से ज़्यादा सहीह नहीं है, और इसकी सनद ज़ईफ़ है।” (जामिअ अत-तिर्मिज़ी, हदीस: 2887)
3. “बेशक हर चीज़ का एक दिल है, और क़ुरआन का दिल यासीन है।” (कश्फ़ुल-अस्तार अन ज़वाइदिल-बज़्ज़ार, 3/87, हदीस: 2304, अता बिन अबी रबाह की रिवायत)
शैख़ अल्बानी रहिमहुल्लाह ने इस हदीस के बारे में लिखा: “...और ये हुमैद रावी मज़हूल है, जैसा कि हाफ़िज़ ने अत-तक़रीब में कहा है। मैं बज़्ज़ार के शैख़ अब्दुर्रहमान बिन अल-फ़ज़्ल को भी नहीं जानता।” (सिलसिलतुल अहादीस अद-ज़ईफ़ा, 1/204)
इसका मतलब ये है कि यहाँ हुमैद अल-मक्की, मौला आले अलक़मा, मज़हूल है। (तफ़्सीर इब्न कसीर, 3/570)
जैसा कि हाफ़िज़ इब्न हजर रहिमहुल्लाह ने तक़रीबुत-तहज़ीब में कहा है, हुमैद मज़हूल है। इसी तरह शैख़ अल्बानी रहिमहुल्लाह बज़्ज़ार के शैख़ अब्दुर्रहमान बिन अल-फ़ज़्ल को भी नहीं जानते।
इस तरह समझ आता है कि इस रिवायत की सनद में दो मज़हूल रावी हैं, इसलिए ये रिवायत ज़ईफ़ है।
4. “जो शख़्स रात को यासीन पढ़ेगा, सुबह उसकी मग़फ़िरत कर दी जाएगी।” (मुस्नद अबी यअला, 11/93–94, हदीस: 4324)
और दूसरे मुहद्दिसीन ने भी इसे हिशाम बिन ज़ियाद के तरीक़ से रिवायत किया है। हिशाम ने हसन अल-बसरी से और उन्होंने कहा: मैंने अबू हुरैरह से सुना... इस सनद में शदीद ज़ोफ़ है। हिशाम बिन ज़ियाद मत्रूक रावी है। (अत-तक़रीब, सफ़्हा 364, हदीस: 7292)
5. “जो शख़्स रात को अल्लाह तआला की रज़ा के लिए यासीन पढ़ेगा, उसकी उसी रात मग़फ़िरत कर दी जाएगी।” (सुनन अद-दारिमी, हदीस: 3420 और दूसरी किताबें)
ये सनद मुनक़तिअ होने की वजह से ज़ईफ़ है। ये साबित नहीं कि हसन अल-बसरी की अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से मुलाक़ात हुई थी। मज़ीद ये कि हसन मुदल्लिस थे और यहाँ अन से रिवायत कर रहे हैं।
6. “जो शख़्स रात को अल्लाह तआला की रज़ा के लिए यासीन पढ़ेगा, उसकी मग़फ़िरत कर दी जाएगी।” (सहीह इब्न हिब्बान, मवारिदुज़-ज़मआन, हदीस: 665 और दूसरी किताबें; हसन अल-बसरी से, वो जुंदुब से रिवायत करते हैं)
ये सनद इंक़िताअ की वजह से ज़ईफ़ है। अबू हातिम अर-राज़ी रहिमहुल्लाह ने फ़रमाया: “ये सहीह नहीं कि हसन ने जुंदुब से सुना हो।” (अल-मरासिल, सफ़्हा 42)
पिछली हदीस भी देख लें।
7. “जो शख़्स रात को अल्लाह तआला की रज़ा के लिए यासीन पढ़ेगा, उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे। पस अपने मुर्दों पर इसे पढ़ो।” (अल-बैहक़ी, शुअबुल-ईमान, हदीस: 2458; मअक़िल बिन यसार रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस)
इस सनद में दो मज़हूल रावियों की वजह से ज़ोफ़ है: अबू उस्मान और उनके वालिद, दोनों मज़हूल हैं।
ये हदीस मुख़्तसर अल्फ़ाज़ में मुस्नद इमाम अहमद (5/26–27), मुस्तदरक अल-हाकिम (1/565), सहीह इब्न हिब्बान (अल-इहसान, 7/269, हदीस: 2991), सुनन अबी दाऊद (हदीस: 3121) और सुनन इब्न माजा (हदीस: 1448) में भी मौजूद है।
इमाम दारक़ुत्नी रहिमहुल्लाह ने इस हदीस को ज़ईफ़ क़रार दिया है। मुस्नद इमाम अहमद (4/105) में इसकी एक ज़ईफ़ मुताबिअत भी है।
8. “जो शख़्स रात को यासीन पढ़ेगा, सुबह उसकी मग़फ़िरत कर दी जाएगी।” (हिल्यतुल-औलिया, 4/130, सय्यिदुना अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत)
ये रिवायत रावी अबू मरयम अब्दुल-ग़फ़्फ़ार बिन अल-क़ासिम अल-कूफ़ी की वजह से मनगढ़त क़रार दी गई है। वो झूठा और हदीस गढ़ने वाला था। (लिसानुल-मिज़ान, 4/50–51)
9. “जो शख़्स यासीन पढ़ेगा, गोया उसने बीस हज किए। और जो इसे लिखकर पिएगा, उसके दिल में एक हज़ार यक़ीन और एक हज़ार रहमतें दाख़िल होंगी, और उसके दिल से बुग़्ज़ और बीमारी दूर कर दी जाएगी।” (हिल्यतुल-अौलिया, 7/136, अल-हारिस अल-आवर की अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत)
ये रिवायत अल-हारिस अल-आवर की वजह से शदीद ज़ईफ़ है। मज़ीद ये कि अबू इस्हाक़ की तदलीस भी है।
10. “मेरी तमन्ना है कि ये (यासीन) मेरी उम्मत के हर शख़्स के दिल में हो।” (कश्फ़ुल-अस्तार, 3/87, हदीस: 2305, इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा की रिवायत)
इस हदीस का रावी इब्राहीम बिन अल-हकीम बिन अबान ज़ईफ़ है। (अत-तक़रीब, हदीस: 166)
11. “जो शख़्स सूरह यासीन पढ़े, जब वो मौत की सख़्तियों में मुब्तला हो या मौत के क़रीब हो, तो जन्नत का ख़ज़ांची उसके पास जन्नत के मशरूबात में से एक मशरूब लेकर आएगा और उसे उसके बिस्तर पर पिलाएगा। वो उसे पी लेगा, फिर उसकी वफ़ात हो जाएगी, और उसे अंबिया के हौज़ में से किसी हौज़ की ज़रूरत नहीं होगी।” (अल-वासित लिल-वाहिती, 3/509)
ये रिवायत मनगढ़त है। यूसुफ़ बिन अतिय्या मत्रूक रावी है। (अत-तक़रीबुत-तहज़ीब, हदीस: 7872)
और हारून बिन कसीर मज़हूल है। (लिसानुल-मिज़ान, 6/218)
12. “जो शख़्स यासीन पढ़ेगा, गोया उसने पूरा क़ुरआन दस मर्तबा पढ़ा।”
ये रिवायत हय्यान बिन अतिय्या की वजह से मुरसल है।
13. “सूरह यासीन को तौरात में अल-मुनीअह कहा जाता है...” (शुअबुल-ईमान लिल-बैहक़ी, हदीस: 2465; अद-दुअफ़ा लिल-उक़ैली, 1/347; तब्लीग़ी निसाब, सफ़्हा 292–293; फ़ज़ाइलुल-क़ुरआन, सफ़्हा 58–59)
ये रिवायत मौज़ूअ (मनगढ़त) है। इसका रावी अब्दुर्रहमान बिन अबी बक्र अल-जद्द हदीस में मत्रूक है और एक दूसरा रावी मज़हूल है।
इमाम बैहक़ी रहिमहुल्लाह ने इस हदीस के बारे में फ़रमाया: “ये मर्दूद है।”
इमाम उक़ैली रहिमहुल्लाह ने भी इस रिवायत को मर्दूद क़रार दिया है।
ये हदीस तारीख़ बग़दाद और इब्नुल-जौज़ी की अल-मौज़ूआत में दूसरी सनद से भी आती है। इस सनद का रावी मुहम्मद बिन अब्द बिन आमिर अस-समरक़न्दी झूठा और मत्रूक है।
14. “बेशक मैंने अपनी उम्मत पर हर रात यासीन की तिलावत को वाजिब कर दिया है। जो शख़्स हर रात इसकी तिलावत पर पाबंदी करेगा, फिर उसकी मौत आ जाएगी, तो वो शहीद की मौत मरेगा।” (अल-इमाम अश-शजरी, 1/118)
ये रिवायत मनगढ़त है। इसके रावियों में से कोई भी मारूफ़ नहीं। मिसाल के तौर पर उमर बिन सअद अल-वक़्क़ास, अबू हफ़्स बिन उमर बिन हफ़्स और अबू आमिर बिन अब्दुर्रहीम।
ख़ुलासा:
सूरह यासीन के फ़ज़ाइल के बारे में तमाम मरफ़ूअ रिवायात ज़ईफ़ और मर्दूद हैं।
सय्यिदुना इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा का क़ौल इमाम दारिमी रहिमहुल्लाह ने रिवायत किया:
उमर बिन ज़ुरारह ने मुझसे बयान किया, उन्होंने कहा: अब्दुल-वह्हाब ने हमें बयान किया, उन्होंने कहा: राशिद अबू मुहम्मद अल-हमानी ने शहर बिन हौशब से रिवायत की, उन्होंने कहा: इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने फ़रमाया: ‘जो शख़्स सुबह यासीन पढ़ेगा, उसे शाम तक आसानी वाला दिन दिया जाएगा, और जो शख़्स रात के दरमियान इसे पढ़ेगा, उसे सुबह तक आसानी वाली रात दी जाएगी।’ (सुनन अद-दारिमी, 1/257, हदीस: 3422)
इसकी सनद हसन है।
इस सनद के रावियों का मुख़्तसर तआरुफ़
1. उमर बिन ज़ुरारह: सिक़ह हैं। (अत-तक़रीबुत-तहज़ीब, हदीस: 5032)
2. अब्दुल-वह्हाब अस-सक़फ़ी: सिक़ह हैं। अपनी वफ़ात से पहले तीन साल तक उन्हें रिवायत में इख़्तिलात हुआ था। लेकिन इससे उनकी रिवायात को नुक़सान नहीं पहुँचता, क्योंकि उन्होंने इस मुद्दत में हदीस रिवायत नहीं की।(अत-तक़रीबुत-तहज़ीब, हदीस: 4261)
3. राशिद बिन नुजैह अल-हमानी: सच्चे रावी हैं और मुमकिन है कि उनसे कुछ ग़लतियाँ हुई हों। (अत-तक़रीबुत-तहज़ीब, हदीस: 1857) वो हसनुल-हदीस रावी थे।
4. शहर बिन हौशब: मुहद्दिसीन ने उनके बारे में इख़्तिलाफ़ किया है, लेकिन मुहद्दिसीन की अक्सरियत ने उन्हें सिक़ह क़रार दिया है। (जैसा कि मैंने अपनी किताब तख़रीज अन-निहाया फ़िल-फ़ितन वल-मलाहिम, सफ़्हा 119–120 में तहक़ीक़ की है।)
हाफ़िज़ इब्न कसीर रहिमहुल्लाह ने उनकी एक रिवायत को हसन क़रार दिया है। (मुस्नद अल-फ़ारूक़, 1/228)
मेरी तहक़ीक़ के मुताबिक़, ये रावी हसनुल-हदीस है।
अल-हासिल: इस तहक़ीक़ का ख़ुलासा ये है कि इस सनद का दर्जा हसन है। अल्लाह ही बेहतर जानता है।
हवाशी
1. मुरसल हदीस:
(टीएन) मुरसल रिवायत वो होती है जिसे ताबिई, सहाबी का ज़िक्र किए बग़ैर सीधे रसूलुल्लाह ﷺ से बयान करे।
शैख़ ज़ुबैर अली ज़ई रहिमहुल्लाह ने फ़रमाया: “मुहद्दिसीन की अक्सरियत का मौक़िफ़ ये है कि ताबिई की मुरसल रिवायत मर्दूद है।” (फ़तावा इल्मिय्या, 2/290)
2. मरफ़ूअ हदीस:
(टीएन) हाफ़िज़ इब्न कसीर रहिमहुल्लाह ने मरफ़ूअ की तशरीह में लिखा: “वो रिवायत जो नबी ﷺ की तरफ़ मंसूब हो, चाहे वो क़ौल हो या फ़ेल...” (इख़्तिसार उलूमुल-हदीस, शैख़ ज़ुबैर अली ज़ई के हवाशी के साथ, सफ़्हा 33)
3. तदलीस:
(टीएन) शैख़ ज़ुबैर अली ज़ई रहिमहुल्लाह ने लिखा: “उलूमुल-हदीस के उसूलों में ये मशहूर और मारूफ़ मसला है कि मुदल्लिस की ‘अन’ से मरवी रिवायत क़बूल नहीं की जाती और हुज्जत नहीं होती, यानी वो ज़ईफ़ होती है।”
उन्होंने इमाम शाफ़िई रहिमहुल्लाह का ये क़ौल भी नक़्ल किया: “हम किसी मुदल्लिस की हदीस उस वक़्त तक क़बूल नहीं करते जब तक वो ‘हद्दसनी’ (फ़ुलाँ ने मुझसे बयान किया) या ‘समिअतु’ (मैंने सीधे सुना) न कहे।” (अर-रिसाला, तहक़ीक़ अहमद शाकिर, हदीस: 1035)
मज़ीद देखें: मक़ालात शैख़ ज़ुबैर अली ज़ई, जिल्द 4, सफ़्हा 151।
ख़ुलासा ये है कि तदलीस सनद में पोशीदा ज़ोफ़ है। इसमें रावी उस शख़्स को छुपाता है जिससे उसने अस्ल में हदीस सुनी होती है, और ‘अन’ जैसे मुबहम अल्फ़ाज़ इस्तेमाल करता है।
शैख़ ज़ुबैर अली ज़ई रहिमहुल्लाह वाज़ेह करते हैं: “उलूमुल-हदीस के उसूलों में ये मशहूर और मारूफ़ मसला है कि मुदल्लिस की ‘अन’ से मरवी रिवायत क़बूल नहीं की जाती और हुज्जत नहीं होती, यानी वो ज़ईफ़ होती है।”
Team Islamic Theology

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