कैसे पता करें कौनसा “मसलक” सही है?
दर'असल इस सवाल का जवाब बोहोत आसान है, लेकिन लोग ला-इल्मी की वजह से इसी मामले में बोहत ज़्यादा गुमराह हैं!
सबसे पहली बात तो ये है, कि कोई किसी भी बात को सही कहे तो वो अपनी “दलील” पेश करे, क्योंकि दीन-ए-इस्लाम में बिना दलील कोई भी बात “क़ाबिल-ए-क़ुबूल” नहीं मानी जाती।
अल्लाह अज़्ज़वजल क़ुर'आन-ए-करीम में फ़रमाता है:
“अगर तुम सच्चे हो तो दलील पेश करो।” [सूरह अल-बक़रह || आयत 111]
दूसरी जगह हमारा रब फ़रमाता है:
“ऐ ईमान वालो! अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए तो उसकी तहक़ीक़ कर लिया करो।” [सूरह अल-हुजुरात || आयत 6]
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
1. नबी ﷺ ने फ़रमाया “किसी शख़्स के झूटा होने के लिए यही काफ़ी है कि वो हर सुनी हुई बात आगे बयान कर दे।” [सहीह मुस्लिम || हदीस #05]
2. रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया (मफ़हूम) “जिसने मेरी तरफ़ झूठ मंसूब किया, वो जहन्नम में दाख़िल होगा।” [सहीह मुस्लिम || हदीस 04]
इन सब “क़ुरआन और हदीस” की बातों से हमें यही जानने को मिलता है कि किसी भी बात को “आँख बंद” करके नहीं मान लेना चाहिए बल्कि “तहक़ीक़” करनी चाहिए कि आख़िर जो बताया जा रहा है वो सही है या नहीं, इसलिए कोई कुछ बताए तो उससे दलील माँगना ज़रूरी है ताकि “तहक़ीक़” की जा सके
मुसलमानों में “73 फ़िरक़ों” में से कौन सा “सही” होगा अल्लाह के नज़दीक?
1. रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया, मेरी उम्मत में “73 फ़िरक़े” होंगे जिसमें से “एक ही जन्नत” में जाएगा तो सहाबा (रज़ि.) ने अर्ज़ किया कि वो कौन लोग होंगे?
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया, वो जो “मेरे और मेरे सहाबा (Radi'Allahu Anhum)” के तरीक़े पर होंगे।
[अबू दाऊद || हदीस 4597; तिर्मिज़ी || हदीस 2641]
इस हदीस से यही साबित होता है कि “एक” ही गिरोह जन्नत में जाएगा जो रसूलुल्लाह के तरीक़े पर होगा।
2. रसूलुल्लाह ने इन ज़माने (Generations) को अच्छा कहा:
- रसूलुल्लाह का ज़माना।
- उनके बाद का ज़माना (यानी सहाबा का ज़माना)
- फिर उनके बाद का ज़माना (ताबि'ई: सहाबा को जिसने देखा उनका ज़माना)
- फिर उनके बाद का ज़मान (यानी तबा-ताबि'ई: जिन्होंने सहाबा को देखने वालों को देखा उनका ज़माना)
[सहीह बुखारी || हदीस #2652]
ऊपर के इस ज़माने को “सलफ़-ए-सालिहीन” कहा जाता हैं।
अगर कोई कहता है कि ये काम या इबादत दीन का हिस्सा है, तो उसको “उस काम या इबादत” को ये देखना होगा कि ये काम या इबादत उस ज़माने में हुई या नहीं, क्योंकि आगे के ज़माने में बिगाड़ आता गया, और ये पेशंगोई नबी ने पहले ही बता दी थी।
इसलिए कोई इंसान अगर कहता है कि मेरा “मसलक (फ़िरक़ह)” सही है तो वो अपनी दलील “सलफ़-ए-सालिहीन” से साबित करें तभी तो वो बात सच मानी जाएगी (क्यूँकि रसूलुल्लाह ने उस ज़माने को ही सिर्फ़ पूरा सही बताया था। (मतलब दीन में बिगाड़ न होने वाला ज़माना)
अब हम देखते हैं “इमामों” के क्या अक़वाल हैं:
इस्लामी दुनिया में कई सारे इमाम रहे, लेकिन “4 इमाम” ज़्यादा मशहूर हुए और उनकी बातें सारी दुनिया में फैली।
4 इमाम:
- इमाम अबू हनीफ़ा (रह.)
- इमाम मालिक (रह.)
- इमाम शाफ़ई (रह.)
- इमाम अहमद इब्न हंबल (रह.)
लेकिन ऐसा कोई सबूत क़ुरआन और हदीस में नहीं है, जिसमें ये कहा गया हो कि किसी “एक ही इमाम” की बात मानो, हमें चारों इमामों की इज़्ज़त करनी चाहिए, और भी जो इमाम हैं उन सबकी भी इज़्ज़त करनी चाहिए, वो सब महान आलिम थे। अल्लाह उन्हें इसका बदला दे उनकी मेहनत के लिए। (آمين)
चारों इमामों ने कहा:
अगर मेरा फ़तवा क़ुरआन और “सहीह हदीस के ख़िलाफ़” जाए तो मेरे फ़तवे को “छोड़ देना” और क़ुरआन और सहीह हदीस को मान लेना।
- i. इक़ाज़-अल-हिमम अल-फ़ुलानी (इमाम अबू हनीफ़ा रह.)
- ii. अल-मजमू अन-नवावी (1/63) (इमाम शाफ़ई रह.)
- iii. जामी बयान अल-इल्म इब्न अब्दुल बर्र 1/775 (इमाम मालिक रह.)
- iv. इक़ाज़-अल-हिमम (इमाम इब्न हंबल रह.)
जो लोग कहते हैं कि हम तो “इमाम अबू हनीफ़ा” (रह.) को मानते हैं।
क्या आप जानते हैं कि “इमाम अबू हनीफ़ा” (रह.) के कई फ़तवे हैं जो ख़ुद “हनफ़ी हज़रत” नहीं मानते हैं।
1. इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) के नज़दीक है कि शव्वाल के “6 रोज़े” मकरूह है।
लेकिन: हनफ़ी उलमा कहते हैं कि “शव्वाल के 6 रोज़े” रखा जाए, मतलब इस मामले में “हदीस” को मानते हैं, इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) के फ़तवे को छोड़ देते हैं।
(देखें किताब:- लताइफ़ अल-मारिफ़ उल इब्न रजब पेज: 218)
(देखें किताब:- फ़तावा आलमगीरी, जिल्द 2 पेज 71)
2. इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) के नज़दीक है कि दो सजदों के दरमियान दुआ नहीं पढ़नी है!
लेकिन: हनफ़ी उलमा कहते हैं कि “2 सजदों के बीच दुआ पढ़नी है।”
देखें किताब (अल-जामी अस-सग़ीर पेज: 88)
(देखें:- अब्दुल हमीद सवाती की किताब: “नमाज़-ए-मसनून” पेज 349-370)
(शैख़ मुहम्मद इलियास की किताब “नमाज़-ए-पैग़म्बर” पेज: 191)
3. इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) के नज़दीक है कि क़ुरआन पढ़ाने का पैसा लेना जायज़ नहीं।
लेकिन: हनफ़ी उलमा कहते हैं:- “मुफ़्ती तक़ी उस्मानी” ने लिखा है कि क़ुरआन पढ़ाने का पैसा लेना जायज़ है!
(देखें:- (तजल्लीआत-ए-सफ़दर, जिल्द नंबर) 5, पेज नंबर:- 215).
(देखें: किताब “तक़लीद की शरई हैसियत” पेज 141)
4. अरबी के अलावा 4) इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) के नज़दीक है कि दूसरी ज़बान में “तकबीर-ए-तहरीमा” दिया जा सकता है।
लेकिन: हनफ़ी उलमा कहते हैं:- “अब्दुस शकूर फ़ारूक़ी” लिखते हैं कि “तकबीर-ए-तहरीमा” अरबी में ही कहना जायज़ है, दूसरी ज़बान (उर्दू, हिंदी वग़ैरह) में नहीं।
(देखें किताब: इल्मुल फ़िक़ह हिस्सा दो (वॉल्यूम 2) पेज 377)
5. फ़ज्र नमाज़ की (अल-हिदाया 152) 5) इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) के नज़दीक है कि सुन्नत छूट जाए तो उसको बाद में नहीं पढ़ सकते हैं।
लेकिन: हनफ़ी उलमा कहते हैं:- “अनवर ख़ुरशीद देवबंदी” लिखते हैं कि “सुन्नत छूट जाए तो फ़र्ज़ नमाज़ के बाद जब “सूरज निकले” जाए तो पढ़ सकते हैं।
[क़ुरआन: दारुल इफ़्ता (देवबंद) 1129/291/1431]
(देखें किताब:- “हदीस और अहले हदीस” पेज 622)
और भी दिगर फ़तवे हैं जिसमें ख़ुद हनफ़ी उलमाओं ने इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) को छोड़ रखा है।
जब “इमाम अबू हनीफ़ा (रह.)” को मानने की बात करते हैं तो पूरी बात क्यों नहीं मानते हैं?
अब हम देखते हैं “इमामों” के कुछ फ़तवे जो सहीह हदीस से टकराते हैं:
1. इमाम “शाफ़ई” (रहमतुल्लाहि अलैह) फ़रमाते हैं, जब अगर कोई आदमी “औरत” को छू दे तो उसका “वुज़ू” टूट जाता है।
लेकिन: इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) के नज़दीक ऐसा नहीं है।
देखें सहीह हदीस क्या कहती है, रसूल ﷺ ने अपनी बीवी का बोसा लिया और फिर नमाज़ को गए। [अबू दाऊद हदीस नंबर 179]
इस तरह ये बात इमाम शाफ़ई (रह.) की सहीह हदीस से टकराती है लेकिन इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) की बात सहीह हदीस से मिलती है तो हमें यहाँ इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) की बात को मानना चाहिए और इमाम शाफ़ई (रह.) की बात को छोड़ देना चाहिए क्योंकि उन्होंने ख़ुद कहा कि मेरा फ़तवा अगर सहीह हदीस के ख़िलाफ़ जाए तो मेरे फ़तवे को छोड़ देना।
2. इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाहि अलैह फ़रमाते हैं, इमाम के पीछे “आहिस्ता” से आमीन कहो लेकिन इमाम शाफ़ई (रह.) ने कहा ज़ोर से आमीन कहो।
तो देखें सहीह हदीस क्या कहती है,
अल्लाह के रसूल जब (वलद दल्लीन) पढ़ते तो आमीन कहते, और उसके साथ अपनी आवाज़ बुलंद करते थे। (इससे मुतअल्लिक़ और भी अहादीस हैं जिससे ये पता चलता है कि अल्लाह के रसूल ज़ोर से आमीन कहा करते थे। [अबू दाऊद हदीस नंबर 932, 933; बुखारी हदीस नंबर 780, 781, 782]
तो यहाँ पे इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) की बात सहीह हदीस से टकराती है तो यहाँ पे हमें उनकी बात को छोड़ देना चाहिए क्योंकि उन्होंने ख़ुद कहा कि अगर मेरा फ़तवा सहीह हदीस के ख़िलाफ़ जाए तो मेरे फ़तवे को छोड़ देना।
नोट: यहाँ हमने सिर्फ़ दो इमामों के फ़तवे लिए हैं, बाक़ी और भी फ़तवे हैं जो सहीह हदीस के ख़िलाफ़ जाते हैं, तो हमें पढ़ने की ज़रूरत है कि इमामों ने क्या कहा और हम क्या कर रहे हैं?
नमाज़ के बारे में रसूलुल्लाह की बातें:
रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “नमाज़ वैसे पढ़ो जिस तरह तुमने मुझे पढ़ते हुए देखा।” (सहीह अल-बुख़ारी || हदीस #631)
सवाल : यहाँ रसूलुल्लाह ने कहा मेरी तरह नमाज़ पढ़ो, तो जो लोग ये कहते हैं कि सब सहीह (जैसे भी इबादत करो क़ुबूल हो जाएगी बस नियत सहीह होनी चाहिए) वो ज़रा ये सोचें कि क्या नबी ने यूँही कह दिया?
अब ज़रा ये सोचिए अगर बस “नियत” ही काफ़ी थी तो रसूलुल्लाह “अपने जैसे नमाज़ पढ़ने को क्यों कहते?”
अब सहीह “मसलक (फ़िरक़ह)” जानने के लिए “5 सवाल” का जवाब पता करें?
क्यूँकि कुछ इमामों के मानने वाले ये कहते हैं कि, हम भी तो रसूलुल्लाह की हदीसों को ही मानते हैं, सहाबा (Radi'Allahu Anhum) को ही मानते हैं तो उनसे सवाल है कि ये बताएँ किस हदीस में है कि
2. कौन सी हदीस में है कि औरत सीने पर हाथ बाँधे और मर्द नाफ़ के नीचे? (ये अलैहदा (Separate) बात कौनसी हदीस में है?)
3. किस हदीस में है कि “नफ़िल नमाज़” बैठ कर भी पढ़ सकते हैं?
4. किस हदीस में है कि “2 पैर के बीच 4 उंगली” का फ़र्क़ हो जब जमाअत में खड़े हो तो?
5. किस हदीस में है कि “जमाअत में क़दम एक दूसरे का दूर रहे एक दूसरे से”?
इस तरह और भी दिगर चीज़ें हैं जिसका सबूत किसी भी हदीस से नहीं मिलता है, फिर भी कहते हैं कि हम भी हदीसों को ही मानते हैं।
इसलिए जो लोग ये जानना चाहते हैं कि कौन सा “मसलक” सहीह है, तो वो ऊपर के “5 सवाल” अपने आलिम से पूछें और उसकी हदीस माँगे, वो नहीं दे पाएँगे क्योंकि है ही नहीं। फिर भी आप उनसे हदीस माँगे ताकि आपको यक़ीन हो जाए और ध्यान दीजिएगा वो कुछ “मंतिक़” (Logic) देंगे कि ये इस वजह से है, ऐसे वैसे, दिगर आपको समझाने की कोशिश करेंगे, लेकिन आप मंतिक़ (Logic) पर नहीं जाना, बल्कि आप कहना जो भी आप बता रहे हैं वो मुझे हदीस में दिखा दीजिए बस।
अल्लाह ने कहा:
“वो लोग मोमिन नहीं हो सकते जो अपने इख़्तेलाफ़ में रसूलुल्लाह को फ़ैसला करने वाला न मान लें।” (सूरह अन-निसा || आयत 65)
याद रहे अगर हमारी इबादत रसूलुल्लाह की तरह न हुई तो “क़ुबूल ही नहीं होगी” तो कोई फ़ायदा नहीं ऐसी इबादत का।
मुस्लिम में इत्तेहाद लेकिन कैसे?
मुस्लिम में इत्तेहाद “इमामों के इमाम रसूल अल्लाह” (ﷺ) को मानने से होगी ना कि दिगर इमामों को, इसी लिए अपने तरीक़े को “इमामों के इमाम रसूलुल्लाह” की तरफ़ ले चलें, क्यूँकि वही सीधा और सच्चा रास्ता है।
क़ुरआन कहता है:
“आओ हम अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ें और आपस में न बटें।” [अल-क़ुरआन || 3:103]
तो अल्लाह की रस्सी क्या है? अल्लाह की रस्सी क़ुरआन और सहीह हदीस है।
क़ुरआन कहता है:
“अल्लाह की बात मानो और अल्लाह के रसूल की बात मानो।” [अल-क़ुरआन || 4:59]
नोट: ये बात क़ुरआन में “20 से ज़्यादा बार” कही गयी है
क़ुरआन कहता है:
“जिन लोगों ने अपने दीन के टुकड़े टुकड़े कर दिए और ख़ुद गिरोहों में बँट गए, आपका उनसे कोई ताल्लुक़ नहीं। उनका मामला तो बस अल्लाह के हवाले है। फिर वह उन्हें बता देगा जो कुछ वो किया करते थे।” [अल-क़ुरआन || 6:159]
अल्लाह हम सबको रसूलुल्लाह के तरीक़े पर चलने वाला बनाए। (आमीन)
Team Islamic Theology

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