Itaat e Rasool (PBUH) | Nabi ﷺ ki Pairwi

itaat-e-rasool


इताअत-ए-रसूल ﷺ


बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान, बहुत रहम करने वाला है।

सब तारीफ़ें अल्लाह तआला के लिए हैं, जो सारे जहान का पालनहार है। हम उसी से मदद और माफ़ी चाहते हैं। अल्लाह तआला की बेशुमार सलामती, रहमतें और बरकतें मुहम्मद ﷺ पर, आपकी आल व औलाद और असहाब पर नाज़िल हों।


रसूल ﷺ पर ईमान

किसी शख़्स के मुसलमान होने के लिए जिस तरह इस बात पर ईमान लाना ज़रूरी है कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, उसी तरह यह यक़ीन रखना और ईमान लाना भी ज़रूरी है कि मुहम्मद ﷺ अल्लाह के बंदे और रसूल हैं।

आप ﷺ की रिसालत पर ईमान लाए बिना कोई शख़्स मुसलमान नहीं हो सकता, ख़्वाह वह कितना ही तौहीद-परस्त और इबादतगुज़ार क्यों न हो। आप ﷺ पर ईमान लाने का मतलब यह है कि आपको अल्लाह का सच्चा और आख़िरी रसूल माना जाए और आपकी लाई हुई शरीअत को आख़िरी और कामिल शरीअत मानकर उस पर अमल किया जाए।

अल्लाह तआला का इरशाद है:

مُّحَمَّدٌ رَّسُولُ اللَّهِ

"मुहम्मद ﷺ अल्लाह के रसूल हैं।"【सूरह अल-फ़त्ह: 29】

एक और जगह इरशाद फ़रमाया:

فَآمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ

"पस अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ।"【सूरह अल-हदीद: 7】

अल्लाह तआला ने फ़रमाया:

قُلْ يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنِّي رَسُولُ اللَّهِ إِلَيْكُمْ جَمِيعًا

"ऐ नबी ﷺ! कह दीजिए कि ऐ लोगो! मैं तुम सबकी तरफ़ अल्लाह का भेजा हुआ रसूल हूँ, जिसके लिए आसमानों और ज़मीन की बादशाही है।"【सूरह अल-आराफ़: 158】

अल्लाह के रसूल ﷺ पर ईमान लाने और आपसे गहरी अकीदत व मुहब्बत रखने के बाद असल चीज़ आपकी इताअत है। आपकी इताअत सिर्फ़ आपकी पैरवी नहीं, बल्कि उस पैग़ाम की इताअत है जो अल्लाह की तरफ़ से आप ﷺ पर उतारा गया।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

مَنْ يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ

"जिसने रसूल की इताअत की, उसने दरअसल अल्लाह की इताअत की।"【सूरह अन-निसा: 80】


इताअत-ए-रसूल ﷺ के मुख़्तलिफ़ दर्जे

रसूल ﷺ की इताअत और पैरवी उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए मजमूई तौर पर फ़र्ज़ है। अलबत्ता कुछ मामलों में आप ﷺ के अमल का दर्जा मुस्तहब या मुबाह होता है। कुछ सूरतें ऐसी भी हैं जिनमें आप ﷺ का कोई अमल सिर्फ़ आप ही के लिए ख़ास था और उम्मत को उस मामले में आपकी पैरवी करने से रोका गया

इस लिहाज़ से आप ﷺ की अमली ज़िंदगी की चार सूरतें हमारे सामने आती हैं:

① फ़र्ज़ (वाजिब)

② मुस्तहब (सुन्नत)

③ मुबाह (जायज़)

④ हराम (ममनूअ)

मुस्तहब: ऐसा अमल जिसे करने पर सवाब मिले और न करने पर गुनाह न हो, जैसे तहज्जुद की नमाज़ और नवाफ़िल वग़ैरह।

यहाँ याद रहे कि फ़िक़्ही इस्तिलाह में सुन्नत, नफ़्ल, मुस्तहब, मंदूब, ततव्वुअ, अहसन और फ़ज़ीलत जैसे अल्फ़ाज़ कई बार मिलते-जुलते मानी में इस्तेमाल होते हैं, जबकि मुहद्दिसीन की इस्तिलाह में सुन्नत से मुराद वह क़ौल या अमल भी होता है जो आप ﷺ से मंक़ूल हो या आपकी मौजूदगी में किया गया हो और आप ﷺ ने उससे मना न फ़रमाया हो।

मुबाह: उस काम को कहते हैं जिसके करने पर अपने आप में सवाब न हो और न करने पर गुनाह भी न हो। अलबत्ता अगर किसी नेक नियत, जैसे मुहब्बत-ए-रसूल ﷺ या दीन की ख़िदमत के जज़्बे से कोई मुबाह काम किया जाए तो उस नियत की वजह से सवाब मिल सकता है।


दुनियावी मामलों में रसूल ﷺ की रहनुमाई

रसूलुल्लाह  ﷺ जब हिजरत करके मदीना तशरीफ़ लाए तो आपने वहाँ के लोगों को खजूर के पेड़ों में नर खजूर का शोफ़ा मादा खजूर पर डालते देखा, ताकि पैदावार बढ़ जाए। आपने फ़रमाया कि मेरा ख़याल है कि इस तरह करने का कोई फ़ायदा नहीं।

मदीना वालों ने ऐसा करना छोड़ दिया, मगर उस साल फ़सल कम हुई। लोगों ने आप ﷺ से इसका ज़िक्र किया तो आपने फ़रमाया कि अगर तुम्हारे उस अमल से तुम्हें फ़ायदा पहुँचता है तो ज़रूर फ़ायदा उठाओ। मैंने तो अपने ख़याल से एक बात कही थी। लिहाज़ा मेरे गुमान पर मबनी बातों को ज़रूरी न समझो। हाँ, जब मैं अल्लाह की तरफ़ से कुछ बयान करूँ तो उसे मज़बूती से पकड़ो, क्योंकि मैं अल्लाह की तरफ़ झूठ कभी मंसूब नहीं कर सकता।【सहीह मुस्लिम: 2361】

एक दूसरी रिवायत के अल्फ़ाज़ हैं: "मैं भी तुम्हारी तरह एक इंसान हूँ। जब मैं तुम्हें तुम्हारे दीन के बारे में कोई हुक्म दूँ तो उसे अपना लो, और जब मैं अपनी राय से कोई बात कहूँ तो मैं भी तुम्हारी तरह एक इंसान हूँ। तुम अपने दुनियावी मामलों को ज़्यादा बेहतर जानते हो।"【सहीह मुस्लिम: 2362】


रसूल ﷺ के ख़ास अहकाम

कुछ काम ऐसे भी हैं जो आप ﷺ के साथ ख़ास थे। उन मामलों में उम्मत को आपकी पैरवी की इजाज़त नहीं थी।

मिसाल के तौर पर आप ﷺ के लिए चार से ज़्यादा बीवियाँ रखने का हुक्म ख़ास था, जबकि उम्मत के लिए यह आम इजाज़त नहीं। इसी तरह कुछ दूसरे निकाह के अहकाम भी आप ﷺ के साथ ख़ास थे।【सूरह अल-अहज़ाब: 50】


क़ुरआन में इताअत-ए-रसूल ﷺ का हुक्म

① अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करो

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَا تَوَلَّوْا عَنْهُ وَأَنْتُمْ تَسْمَعُونَ

"ऐ ईमान वालो! अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करो और सुन लेने के बाद उनसे मुँह न मोड़ो।"

【सूरह अल-अनफ़ाल: 20】


② अल्लाह और उसके रसूल की इताअत अल्लाह को महबूब है,

قُلْ أَطِيعُوا اللَّهَ وَالرَّسُولَ فَإِنْ تَوَلَّوْا فَإِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْكَافِرِينَ

"कह दीजिए कि अल्लाह और रसूल की इताअत करो। फिर अगर वे मुँह मोड़ें तो अल्लाह काफ़िरों को पसंद नहीं करता।"【सूरह आले-इमरान: 32】


③ रसूल ﷺ जो दें उसे ले लो और जिससे रोकें उससे रुक जाओ

وَمَا آتَاكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانْتَهُوا

"रसूल तुम्हें जो कुछ दें, उसे ले लो और जिस चीज़ से रोकें, उससे रुक जाओ।"【सूरह अल-हश्र: 7】


④ अपने आमाल बर्बाद न करो

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَلَا تُبْطِلُوا أَعْمَالَكُمْ

"ऐ ईमान वालो! अल्लाह की इताअत करो और रसूल की इताअत करो और अपने आमाल बर्बाद न करो।"【सूरह मुहम्मद: 33】


⑤ रसूल ﷺ की इताअत अल्लाह की इताअत है

مَنْ يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ

"जिसने रसूल की इताअत की, उसने अल्लाह की इताअत की।"【सूरह अन-निसा: 80】


⑥ नमाज़ क़ायम करो, ज़कात दो और रसूल की इताअत करो

وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ

"नमाज़ क़ायम करो, ज़कात दो और रसूल की इताअत करो, ताकि तुम पर रहम किया जाए।"【सूरह अन-नूर: 56】


⑦ इख़्तिलाफ़ होने पर अल्लाह और रसूल की तरफ़ लौटाओ

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ مِنْكُمْ فَإِنْ تَنَازَعْتُمْ فِي شَيْءٍ فَرُدُّوهُ إِلَى اللَّهِ وَالرَّسُولِ

"ऐ ईमान वालो! अल्लाह की इताअत करो, रसूल की इताअत करो और तुममें से हुक्मरानों की भी। फिर अगर किसी मामले में तुम्हारे बीच इख़्तिलाफ़ हो जाए तो उसे अल्लाह और रसूल की तरफ़ लौटा दो।"【सूरह अन-निसा: 59】


जान-बूझकर इताअत-ए-रसूल ﷺ से मुँह मोड़ने का अंजाम

① रसूल ﷺ के हुक्म की मुख़ालफ़त करने वालों को डरना चाहिए

فَلْيَحْذَرِ الَّذِينَ يُخَالِفُونَ عَنْ أَمْرِهِ أَنْ تُصِيبَهُمْ فِتْنَةٌ أَوْ يُصِيبَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ

"जो लोग रसूल के हुक्म की मुख़ालफ़त करते हैं, उन्हें डरना चाहिए कि कहीं वे किसी फ़ितने में न पड़ जाएँ या उन पर दर्दनाक अज़ाब न आ जाए।"【सूरह अन-नूर: 63】


② रसूल ﷺ को अपने इख़्तिलाफ़ात में हाकिम मानना

فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ حَتَّىٰ يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ لَا يَجِدُوا فِي أَنْفُسِهِمْ حَرَجًا مِمَّا قَضَيْتَ وَيُسَلِّمُوا تَسْلِيمًا

"नहीं, तुम्हारे रब की क़सम! वे उस वक़्त तक मोमिन नहीं हो सकते जब तक अपने आपसी इख़्तिलाफ़ात में आपको हाकिम न मान लें, फिर आपके फ़ैसले से अपने दिलों में कोई तंगी महसूस न करें और पूरी तरह फ़रमाँबरदारी के साथ उसे मान लें।"【सूरह अन-निसा: 65】


③ मुनाफ़िक़ों का रवैया

जब उनसे कहा जाता है कि अल्लाह की नाज़िल की हुई किताब और रसूल ﷺ की तरफ़ आओ तो मुनाफ़िक़ मुँह मोड़ लेते हैं।【सूरह अन-निसा: 61】

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि मुनाफ़िक़ जहन्नम के सबसे निचले दर्जे में होंगे।【सूरह अन-निसा: 145】


इताअत-ए-रसूल ﷺ और मोमिनों का रवैया

الَّذِينَ إِذَا دُعُوا إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ إِذَا فَرِيقٌ مِنْهُمْ مُعْرِضُونَ

"और जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ बुलाया जाता है ताकि रसूल उनके मामलों का फ़ैसला करें, तो उनमें से एक गिरोह मुँह मोड़ लेता है।"

मोमिनों का रवैया इसके उलट होता है। जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ बुलाया जाता है तो वे कहते हैं:

سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا

"हमने सुना और इताअत की। ऐसे ही लोग कामयाब होने वाले हैं।【सूरह अन-नूर: 48, 51】


इताअत-ए-रसूल ﷺ का बदला दुनिया और आख़िरत में

① कामयाबी इताअत करने वालों के लिए है

وَمَنْ يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَخْشَ اللَّهَ وَيَتَّقْهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَائِزُونَ

"जो अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करे, अल्लाह से डरे और उसके अज़ाब से बचे, वही कामयाब होने वाले हैं।"【सूरह अन-नूर: 52】


② अल्लाह और उसके रसूल की इताअत बड़ी कामयाबी है

وَمَنْ يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ فَازَ فَوْزًا عَظِيمًا

"जिसने अल्लाह और उसके रसूल की इताअत की, उसने बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की।"【सूरह अल-अहज़ाब: 71】


③ अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करो ताकि तुम पर रहम किया जाए

وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَالرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ

"अल्लाह और रसूल की इताअत करो, ताकि तुम पर रहम किया जाए।"【सूरह आले-इमरान: 132】


④ इताअत करने वाले नेक लोगों के साथ होंगे

وَمَنْ يُطِعِ اللَّهَ وَالرَّسُولَ فَأُولَٰئِكَ مَعَ الَّذِينَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ مِنَ النَّبِيِّينَ وَالصِّدِّيقِينَ وَالشُّهَدَاءِ وَالصَّالِحِينَ

"जो अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करेगा, वह उन लोगों के साथ होगा जिन पर अल्लाह ने इनाम किया, यानी अंबिया, सिद्दीक़ीन, शुहदा और नेक लोग।"【सूरह अन-निसा: 69】


⑤ इताअत करने वालों के लिए जन्नत है

وَمَنْ يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ يُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا

"जो अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करेगा, अल्लाह उसे ऐसी जन्नतों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। वे उनमें हमेशा रहेंगे।"【सूरह अन-निसा: 13】


अहादीस की रोशनी में इताअत-ए-रसूल ﷺ

① रसूल ﷺ की इताअत अल्लाह की इताअत है

रसूल ﷺ ने फ़रमाया:

مَنْ أَطَاعَنِي فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ، وَمَنْ عَصَانِي فَقَدْ عَصَى اللَّهَ

"जिसने मेरी इताअत की, उसने अल्लाह की इताअत की और जिसने मेरी नाफ़रमानी की, उसने अल्लाह की नाफ़रमानी की।"【सहीह मुस्लिम: 1835, सहीह अल-बुख़ारी: 7137】


② रसूल ﷺ की इताअत जन्नत में दाख़िले का ज़रिया है

रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "मेरी उम्मत के तमाम लोग जन्नत में दाख़िल होंगे, सिवाय उसके जिसने इनकार किया।"

सहाबा ने अर्ज़ किया, "ऐ अल्लाह के रसूल! जन्नत में दाख़िल होने से कौन इनकार करेगा?"

आप ﷺ ने फ़रमाया: "जिसने मेरी इताअत की, वह जन्नत में दाख़िल होगा और जिसने मेरी नाफ़रमानी की, उसने गोया जन्नत में दाख़िल होने से इनकार किया।"【सहीह अल-बुख़ारी: 7280】


हिदायत का मयार सिर्फ़ क़ुरआन और सुन्नत है

रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "मैं तुम्हारे बीच दो चीज़ें छोड़कर जा रहा हूँ। जब तक तुम उन्हें मज़बूती से पकड़े रहोगे, हरगिज़ गुमराह नहीं होगे: अल्लाह की किताब और उसकी नबी की सुन्नत।"【मुवत्ता इमाम मालिक: 1594】


क़ुरआन के साथ हदीस की इताअत भी ज़रूरी है

रसूल ﷺ ने ख़बरदार किया कि एक वक़्त ऐसा आएगा जब कोई शख़्स अपने आराम की जगह पर बैठकर कहेगा कि हमारे लिए क़ुरआन काफ़ी है। जो कुछ उसमें हलाल है, वही हलाल है और जो उसमें हराम है, वही हराम है।

आप ﷺ ने बताया कि रसूल ﷺ के हराम ठहराए हुए अहकाम भी अल्लाह के हुक्म की तरह मानना ज़रूरी हैं।【सुनन अबू दाऊद: 4604, सुनन अद-दारिमी: 604】

रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "जिस चीज़ को रसूल हराम क़रार दें, वह भी उसी तरह हराम है जैसे अल्लाह की हराम की हुई चीज़।"【सुनन इब्न माजा: 12, जामेअ अत-तिर्मिज़ी: 2664】


इख़्तिलाफ़ के ज़माने में सुन्नत को मज़बूती से पकड़ना

रसूल ﷺ ने फ़रमाया कि जो लोग आपके बाद ज़िंदा रहेंगे, वे बहुत ज़्यादा इख़्तिलाफ़ देखेंगे। ऐसे हालात में आपकी और हिदायत याफ़्ता ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन की सुन्नत को मज़बूती से पकड़ना और दीन में नई-नई बातें पैदा करने से बचना।

आप ﷺ ने बताया कि दीन में हर नई पैदा की गई बात बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है।【सुनन अबू दाऊद: 4607, सुनन इब्न माजा: 42】


रसूल ﷺ की तरफ़ झूठ मंसूब करने की सख़्त वईद

① जान-बूझकर रसूल ﷺ पर झूठ बाँधना

रसूल ﷺ ने फ़रमाया:

مَنْ كَذَبَ عَلَيَّ مُتَعَمِّدًا فَلْيَتَبَوَّأْ مَقْعَدَهُ مِنَ النَّارِ

"जिसने जान-बूझकर मेरी तरफ़ झूठ मंसूब किया, वह अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले।"【सहीह अल-बुख़ारी: 110, सहीह मुस्लिम: 3】


② रसूल ﷺ के नाम से ऐसी बात बयान करना जो आपने नहीं कही

रसूल ﷺ ने फ़रमाया कि जो शख़्स आपके नाम से ऐसी बात बयान करे जो आपने नहीं कही, वह अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले।【सहीह अल-बुख़ारी: 109】


③ झूठी अहादीस से सावधान रहना

रसूल ﷺ ने ख़बरदार किया कि आख़िरी ज़माने में दज्जाल और कज़्ज़ाब किस्म के लोग ऐसी अहादीस बयान करेंगे जिन्हें लोगों ने पहले नहीं सुना होगा। ऐसे लोगों से बचकर रहना चाहिए, कहीं वे तुम्हें गुमराह न कर दें।【सहीह मुस्लिम: मुक़द्दिमा】

यह सख़्त वईद इसलिए है कि जो शख़्स किसी झूठी बात को रसूल ﷺ की हदीस समझकर उस पर अमल करेगा, वह उसे दीन समझकर अपनाएगा। हदीस-ए-रसूल दीन का हिस्सा है, इसलिए रसूल ﷺ के नाम पर झूठ बाँधना बहुत बड़ा जुर्म है।


हदीस-ए-रसूल ﷺ के होते हुए किसी की बात हुज्जत नहीं

एक रिवायत में आता है कि सय्यिदुना उमर رضي الله عنه ने रसूल ﷺ से अर्ज़ किया कि हम यहूदियों से उनके दीन की कुछ बातें सुनते हैं जो हमें अच्छी लगती हैं। क्या हम उन्हें लिख लिया करें?

आप ﷺ ने फ़रमाया कि क्या तुम अपने दीन के मामले में उसी तरह की लापरवाही करना चाहते हो जिस तरह यहूद और नसारा ने की थी? मैं तुम्हारे पास एक साफ़-सुथरी शरीअत लेकर आया हूँ। अगर मूसा عَلَيْهِ السَّلَام भी ज़िंदा होते तो उन्हें भी मेरी पैरवी करना ज़रूरी होता।【मुस्नद अहमद: 15156, सुनन अद-दारिमी: 435】

इससे मालूम होता है कि रसूल ﷺ की शरीअत के मुक़ाबले में किसी दूसरे का क़ौल दीन की हुज्जत नहीं बन सकता। किसी आलिम, मुफ़्ती, पीर या मुर्शिद की बात अगर क़ुरआन और सहीह हदीस के ख़िलाफ़ हो तो उसे दलील के बग़ैर क़बूल नहीं किया जा सकता।


हलाल और हराम ठहराने का हक़

सय्यिदुना अदी बिन हातिम رضي الله عنه ने जब इस आयत के बारे में पूछा:

اتَّخَذُوا أَحْبَارَهُمْ وَرُهْبَانَهُمْ أَرْبَابًا مِنْ دُونِ اللَّهِ

"उन्होंने अपने उलमा और दरवेशों को अल्लाह के सिवा रब बना लिया।"【सूरह अत-तौबा: 31】

तो रसूल ﷺ ने समझाया कि जब उनके उलमा किसी चीज़ को हलाल कहते तो वे उसे हलाल मान लेते और जब हराम कहते तो उसे हराम मान लेते थे।【जामेअ अत-तिर्मिज़ी: 3095】

इससे मालूम होता है कि हलाल और हराम के मामले में अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के हुक्म को मानना ज़रूरी है। किसी आलिम की बात को क़ुरआन और सहीह सुन्नत से ऊपर नहीं रखा जा सकता


सुन्नत-ए-रसूल ﷺ से आगे बढ़ना गुमराही है

तीन सहाबा ने उम्मुल-मोमिनीन से रसूलullah ﷺ की इबादत के बारे में पूछा। जब उन्हें आप ﷺ की इबादत का बताया गया तो उन्होंने अपने अमल को कम समझा। उनमें से एक ने कहा कि मैं हमेशा रात भर नमाज़ पढ़ूँगा, दूसरे ने कहा कि मैं हमेशा रोज़े रखूँगा और तीसरे ने कहा कि मैं औरतों से अलग रहूँगा और कभी निकाह नहीं करूँगा

जब रसूल ﷺ को इसकी ख़बर मिली तो आपने फ़रमाया: "अल्लाह की क़सम! मैं तुम सबसे ज़्यादा अल्लाह से डरने वाला और उससे तक़वा रखने वाला हूँ। लेकिन मैं रोज़े रखता भी हूँ और छोड़ता भी हूँ, नमाज़ पढ़ता भी हूँ और सोता भी हूँ, और औरतों से निकाह भी करता हूँ। लिहाज़ा जिसने मेरी सुन्नत से मुँह मोड़ा, उसका मुझसे कोई ताल्लुक़ नहीं।"【सहीह अल-बुख़ारी: 5063, सहीह मुस्लिम: 1401】

इससे मालूम हुआ कि इबादत में भी रसूल ﷺ के तरीक़े की पैरवी ज़रूरी है। सिर्फ़ नेक नियत काफ़ी नहीं, बल्कि अमल का सुन्नत के मुताबिक़ होना भी ज़रूरी है।


सुन्नत-ए-रसूल ﷺ से मुँह मोड़ने की वईद

रसूल ﷺ ने फ़रमाया कि आप उम्मत को एक ऐसे रोशन रास्ते पर छोड़कर जा रहे हैं जिसकी रात भी दिन की तरह रोशन है। जो इस रास्ते से मुँह मोड़ेगा, वह हलाक हो जाएगा।【सुनन इब्न माजा: 43】


आख़िरी पैग़ाम

अल्लाह के रसूल ﷺ की इताअत ईमान का तक़ाज़ा है। क़ुरआन और सहीह सुन्नत ही दीन की बुनियादी दलीलें हैं। किसी की बात को क़ुरआन और सहीह सुन्नत से ऊपर नहीं रखा जा सकता। रसूल ﷺ की सुन्नत को सीखना, उस पर अमल करना और झूठी अहादीस से बचना हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है।

अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हम सबको अपने रसूल ﷺ की बात सुनने, मानने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए, हमारी ख़ताओं से दरगुज़र फ़रमाए और हमें अपने दीन के सीधे रास्ते पर चलाए।

आमीन या रब्बल आलमीन


Team Islamic Theology

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