सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु
[तहरीर नंबर 32]
अमीरुल मोमिनीन अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु की फ़क़ाहत - 7
VIII. बालों और खिज़ाब के अह़काम
बुढ़ापे के सफ़ेद बाल को रँगने से परहेज़ करना: इब्ने ह़जर वग़ैरह लिखते हैं कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के नज़दीक बुढ़ापे के सफ़ेद बालों को अपनी हालत पर छोड़ देना और उसे मेहन्दी वग़ैरह से न रंगना जाइज़ है। [अल्मुन्तक़ा: 7/270] लेकिन सफ़ेद बालों को मेहन्दी और कुसुम वग़ैरह से रंगना मुस्तह़ब है, रसूलुल्लाह ﷺ का इर्शाद है यहूदो नस़ारा बालों को नहीं रंगते हैं तुम उनकी मुख़ालिफ़त करो। [बुख़ारी: 5899, मुस्लिम: 2103] नीज़ आपने फ़र्माया, सबसे बेहतर जिससे तुम सफ़ेद बालों को रंगो मेहन्दी और कुतुम है। [तिर्मिज़ी: 1573, नसाई: 8/139; इब्ने माजा: 3622, सनद सहीह]
अल्बत्ता काला करना जाइज़ नहीं क्योंकि रसूलुल्लाह ﷺ का इर्शाद है, आख़िरी दौर में कुछ लोग होंगे जो कबूतर के पोटों की तरह बालों को काला करेंगे उनको जन्नत की ख़ुश्बू नहीं मिलेगी। [अबूदाऊद: 4212] शअ़बी का बयान है कि मैंने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की दाढ़ी और सर के बालों को बिलकुल सफ़ेद देखा, उन बालों से दोनों कँधों का दरम्यानी हिस्सा भरा हुआ था। [फ़िक़्हुल इमाम अ़ली: 1/495]
अबू इस्हाक़ से रिवायत है कि मैंने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु को देखा कि आप अस्लअ़ थे और दाढ़ी के बाल सफ़ेद थे। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा: 9/427] अस्लअ़: जिसके सिर के अगले हिस्से पर बाल न हों।
और इब्नुल इनफ़िया से रिवायत है कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने एक मर्तबा मेहन्दी का ख़िज़ाब लगाया फिर छोड़ दिया। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा: 9/427]
IX. नर्द/चौसर और शतरंज के अह़काम
चौसर और शतरंज खेलना: अमीरुल मोमिनीन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के नज़दीक नर्द (चौसर) खेलना हराम है। आप फ़र्माते हैं: आग के दो अँगारों का उलटना, पलटना मेरे नज़दीक इस बात से बेहतर है कि मैं चौसर की दो गोटियों को उलटू पलदूँ। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा: 9/738] इसकी ह़ुर्मत की दलील नबी करीम ﷺ का ये फ़र्मान है कि: जो नर्द खेलता है वो गोया अपना हाथ ख़िंज़ीर के गोश्त और ख़ून में रँगता है। [सहीह मुस्लिम: 2260]
इब्ने क़ुदामा रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के नज़दीक इसी जैसा खेल शतरंज भी हराम है। [अल्मुग़्नी: 10/212]
मैसरा बिन ह़बीब से रिवायत है कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु एक मर्तबा ऐसे लोगों के पास से गुज़रे जो शत़रंज खेल रहे थे, आपने फ़र्माया: ये कैसी मूर्तियाँ हैं जिनके तुम मुजावर बने बैठे हो? आग के एक अंगारे को बुझ जाने तक हाथ में लिये रहना इस बात से बेहतर है कि इन गोटियों को छूआ जाए। [अल्मुग़्नी: 9/17]
और अ़म्मार बिन अबी अ़म्मार से रिवायत है कि एक मर्तबा अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु तैमुल्लाह की एक मज्लिस से गुज़रे, वो सब शत़रंज खेल रहे थे, आप वहाँ ठहर गए और कहा: यक़ीनन तुम्हें अल्लाह ने इसकाम के लिये नहीं पैदा किया है, अल्लाह की क़सम ! अगर हदीस में चेहरे पर मारने की मुमानिअत न होती तो इन ही गोटियों को तुम्हारे चेहरों पर मारता। [सुननुल बैहक़ी बहूवाला फ़िक़्हुल इमाम अली: 1/502]
मज़्कूस दोनों खेलों की ह़ुर्मत की इल्लत ये है कि दोनों ही जूआ की क़बील से हैं, जो कि क़ुरआन की सराह़त से हराम है और इसी पर इन दोनों का क़यास किया गया है।
X. निकाह के अह़काम
i. निकाहे़ मुत्आ़: अमीरुल मोमिनीन अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़र्माया: रमज़ान के रोज़े ने हर रोज़े को संसूख कर दिया और तलाक़, इद्दत और मीरास ने निकाहे मुत्आ़ को मंसूख कर दिया। [मुसन्निफ़ अ़ब्दुर्रज़्ज़ाक़: 18653] निकाहे मुत्आ़ की ह़ुर्मत के सिलसिले में अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की दलील ख़ुद आपसे मरवी ये हदीस है कि नबी करीम ﷺ ने फ़तहे़ ख़ैबर के मौक़े पर निकाहे मुत्आ़ और पालतू गधों का गोश्त खाने से मना कर दिया। [सहीह मुस्लिम/अन् निकाहू: 1407]
ii. बग़ैर वली के निकाह: अबू कै़स अल्ऊदी से रिवायत है कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु फ़र्माते थे: अगर किसी ने वली की इजाज़त के बग़ैर निकाह कर लिया और मंकूह़ा से दुख़ूल हो गया तो दोनों में जुदाई नहीं कराई जाएगी और अगर दुख़ूल नहीं हुआ तो जुदाई करा दी जाएगी। [मुसन्नफ़ अ़ब्दुर्रज़्ज़ाक़: 6/196] वली की इजाज़त के बग़ैर निकाहू दुरुस्त नहीं, रसूलुल्लाह ﷺ का इर्शाद है वली के बग़ैर निकाह नहीं। [अबूदाऊद: 2085, तिर्मिज़ी: 1101, इब्ने माजा: 1907, 1908,] नीज़ आप ﷺ ने फ़र्माया, जो ख़ातून बग़ैर वली की इजाज़त से निकाह करे उसका निकाह बातिल है। [अबूदाऊद: 2083, तिर्मिज़ी: 1102, इब्ने माजा: 1906]
iii. ला इल्मी में दो हक़ीक़ी बहनों से निकाह़: अगर किसी शख़्स़ ने एक औ़रत से शादी की फिर एक दूसरी औ़रत से शादी की और बाद में मालूम हुआ कि दोनों हक़ीक़ी बहनें हैं, तो अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का मस्लक है कि जिसकी शादी बाद में हुई है उसे जुदा करा दिया जाए, चुनाँचे इब्ने जुरैज से रिवायत है कि मुझे अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में बताया गया कि आपने ऐसे शख़्स के बारे में फ़त्वा दिया जिसने किसी औ़रत से शादी की और उससे दुख़ूल किया, फिर दूसरे शहर में गया और वहाँ भी एक औ़रत से शादी की और उससे दुख़ूल किया, फिर बाद में मालूम हुआ कि दूसरी औ़रत पहली औ़रत की बहन है। आपने फ़ैसला दिया कि वो दूसरी को जुदा कर दे और पहली बाक़ी रखे। अल्बत्ता पहली को उस वक्त तक न लौटाए जब तक कि ये इद्दत पूरी न कर ले। [मुसन्नफ़ अ़ब्दुर्रज़्ज़ाक़ हदीस: 10517] जुम्हूर फ़ुक़्हा का यही क़ौल है। [अल्मदूना: 2/280, अल्मुग़्नी: 6/2581] और सबकी दलील ये है कि पहली औ़रत का निकाह सही हुआ है जबकि दूसरी का निकाह बातिल था, इसलिए इसका शुमार न किया गया।
सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 32 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन
Team Islamic Theology

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