सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु
[तहरीर नंबर 31]
अमीरुल मोमिनीन अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु की फ़क़ाहत - 6
VII. इबादात से मुल्ह़क़ बाज़ अह़काम
i. माकूल अल् लह़म जानवर को मरने से कुछ ही पहले ज़िब्ह़ कर देना: सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के नज़दीक अगर जानवर मरने के क़रीब हो और मरने से कुछ ही पहले उसे ज़िब्ह़ कर दिया जाए तो उसे खाना जाइज़ है, अल्बत्ता ज़िब्ह से पहले उसकी ज़िन्दगी की अ़लामत ये है कि जानवर के किसी उ़ज़ू में हरकत पाई जाए। आप फ़र्माते है: अगर ज़र्बशुदा या ऊँची जगह से गिरा हुआ या किसी की सींग का मारा हुआ, या दरिन्दों का फाड़ खाया हुआ कोई जानवर इस हाल में मिले कि उसके हाथ या पैर में ह़रकत हो तो उसे ज़िब्ह कर लो और खाओ। [अल्मुह़ल्ला: 7/458] इसकी दलील ये है कि अल्लाह तआ़ला ने इर्शाद फ़र्माया:
حُرِّمَتْ عَلَيْكُمُ الْمَيْتَةُ وَ الدَّمُ وَلَحْمُ الْخِنْزِيْرِ وَ مَا أُهِلَّ لِغَيْرِ اللَّهِ بِهِ وَ الْمُنْخَنِقَةُ وَالْمَوْقُوذَةُ وَالْمُتَرَدِّيَةُ وَالنَّطِيحَةُ وَمَا أَكَلَ السَّبُعُ إِلَّا مَا ذَكَّيْتُمْ
तुम पर मुरदार ह़राम किया गया है और ख़ून और ख़िंज़ीर का गोश्त और वो जिस पर ग़ैरुल्लाह का नाम पुकारा जाए और गला घुटने वाला जानवर और जिसे चोट लगी हो और गिरने वाला और जिसे सींग लगा हो और जिसे दरिन्दे ने खाया हो, मगर जो तुम ज़िब्ह कर लो। [सूरह माइदा: 3]
इल्ला मा ज़क्कैतुम कहकर मज़्कूरा ह़राम जानवरों से उन जानवरों को मुस्तस्ना क़रार दे दिया गया है जो शरई तौ़र से ज़िब्ह कर लिये जाएँ लिहाज़ा उनका खाना हलाल होगा।
ii. अ़रब के नस़ारा का ज़बीह़ा: तब्री वग़ैरह ने सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का ये मस्लक नक़्ल किया है कि आ़म नस़ारा को छोड़कर अ़रब के नस़ारा का ज़बीहा खाना हलाल नहीं है। [तफ़्सीरे तब्री: 6/56, तफ़्सीरे क़ुर्तुबी: 6/78] उ़बैदा अस्सलमानी फ़र्माते हैं कि अ़रब के नस़ारा का ज़बीहा नहीं खाया जाएगा इसलिए कि वो शराबनोशी के अ़लावा नस्ऱानियत को जानते ही नहीं। [मुसन्नफ़ अ़ब्दुर्रज़्ज़ाक़: 10035, तफ़्सीरे तब्री: 6/65] और
एक रिवायत में है: बनू तुग़्लब के नस़ारा का ज़बीहा न खाओ इसलिए कि शराबनोशी के अ़लावा उन्होंने नसरानियत के किसी हुक्म पर अ़मल नहीं किया। [मुसत्रफ़ अ़ब्दुर्रज़्ज़ाक़: 10034, कंजुल उ़म्माल : 15651]
नस़ारा अ़रब के बारे में ये हुक्म इसलिए लगाया गया कि उन्होंने ह़लाल को ह़लाल और ह़राम को ह़राम जानने में नस्ऱानियत की तालीमात का इल्तिज़ाम नहीं किया और इसी वजह से उनका शुमार भी आम नस़ारा में नहीं होगा। लेकिन अल्लाह तआ़ला ने जिस वक्त नस़ारा के ज़बीहों को हलाल किया था उस वक्त वो लोग दीने नसरानियत के अक़ीदा व अह़काम केबुनियादी उसूलों से मुंहरिफ़ फिरभी उनके ज़बीह़ो को हलाल किया गया था, लिहाज़ा आज भी हलाल रहेगा। यही जम्हूर सह़ाबा और फ़ुक़्हा का मस्लक है। [तफ़्सीरे तब्री: 5/65, बिदायतुल मुज्तहिद: 1/465]
iii. फ़ख़ो इज़्हारे बरतरी का ज़बीह़ा: जो जानवर फ़ख़्रो नुमाइश और इज़्हारे बरतरी के लिये ज़िब्ह़ किया जाए, सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के नज़दीक उसका खाना ह़राम है। जारूद बिन अबी सबुरा का बयान है कि बनू रियाह़ का एक शख़्स इब्ने वशील जो सख़ीम के नाम से मशहूर था, गल्बा पसन्द और फ़ख़्र जताने वाला शायर था, एक मर्तबा उसके और अबू फ़रज़दक़ शायर के दरम्यान बाज़ी लग गई कि बालाई कूफ़ा के फ़लाँ घाट पर हर एक अपने सौ सौ ऊँट ज़िब्ह करेंगे, चुनाँचे जब दोनों के एक एक सौ ऊँट घाट पर पहुँच गए तो वो दोनों अपने अपने ऊँटों की कूँचें अपनी तलवारों से काटने लगे, कूफ़ा के लोग अपनी सवारियों से गोश्त लेने के लिये वहाँ पहुँचे। अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु कूफ़ा में थे। आप भी अल्लाह के रसूल ﷺ के ख़च्चर पर सवार होकर निकले, आप लोगों को आवाज़ दे रहे थे कि ऐ लोगो ! उन ऊँटों का गोश्त न खाओ, इसलिए कि वो गै़रुल्लाह के नाम पर ज़िब्ह़ किये गए हैं।
इब्ने हज़म फ़र्माते हैं: इस मसले में अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का कोई मुख़ालिफ़ नहीं मिलता और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी करीम ﷺ ने फ़र्माया: अल्लाह की लअ़नत हो उस शख़्स पर जिसने ग़ैरुल्लाह के लिये ज़िब्ह़ किया। [सहीह मुस्लिम:156]
वजहे इस्तिदलाल ये है कि इज़्हारे बरतरी और फ़ख़्र की निय्यत से जानवर ज़िब्ह़ करना गै़रुल्लाह के हुक्म में शामिल है। [फ़िक़्हुल इमाम अ़ली बिन अबी त़ालिब: 1/468]
iv. मुरदार मुर्ग़ी का अण्डा नजिस है: इब्ने कुदामा ने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का मस्लक नक़्ल किया है कि मुरदार मुर्ग़ी के पेट में जो अण्डा होगा वो नजिस है उसका खाना ह़लाल नहीं है, ख़्वाह उसका छिल्का सख़्त हो गया हो या न सख़्त हुआ हो। [अल्मुग़्नी: 1/75, अल्मज्मुअ़: 1/245]
v. मजूसियो और मुशिकों का खाना: अगर मुश्रिकीन और मजूसियों के खाने में उनका ज़बीहा न हो तो उसे खाने में कोई ह़र्ज नहीं, इसलिए कि तह़रीमे ज़बायेह़ के साथ ख़ास़ है, चुनाँचे अमीरुल मोमिनीन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़र्माया : मजूरी का खाना खाने में कोई ह़र्ज नहीं, मुमानिअ़त उनके ज़बायेह़ से है। [कंजुल उ़म्माल: 2576, फ़िक़्हुल इमाम अ़ली बिन अ़बी तालिब: 1/476] और एक रिवायत में है कि मजूसी की रोटी खाने में कोई ह़र्ज नहीं, हाँ उनका ज़बीह़ा खाने से रोका गया है। [अल्मुग़्नी: 4/296] यही जम्हूर फ़ुक़्हा का क़ौल है।
सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 31 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन
Team Islamic Theology

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