सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु
[तहरीर नंबर 33]
अमीरुल मोमिनीन अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु की फ़क़ाहत - 8
XI. जिमा और मुआशरत के अह़काम
बीवी के दुबुर (पिछली शर्मगाह) में वत़ी करने की मुमानिअ़त: इब्ने क़ुदामा, अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में लिखते हैं कि आपके नज़दीक औ़रत के दुबुर में वत़ी करना ह़राम है। [अल्मुग़्नी: 7/12] चुनाँचे अबुल मुअ़तमिर का बयान है कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने मिम्बर से ऐलान किया, मुझसे कुछ पूछो? एक आदमी ने सवाल किया कि क्या बीवी के दुबुर में वत़ी करना जाइज़ है आपने फ़र्माया: तूने बहुत ख़सीस और कमीनी ह़रकत की, अल्लाह तुझे पस्त करे, क्या तूने अल्लाह का कलाम नहीं देखाः
إِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ الْفَاحِشَةَ مَا سَبَقَكُمْ بِهَا مِنْ أَحَدٍ مِّنَ الْعَلَمِينَ
बेशक तुम यक़ीनन इस बेह़याई का इर्तिकाब करते हो जो तुमसे पहले जहानों में से किसी ने नहीं की। [अ़न्कबूत: 28 , अल्मुग़्नी: 7/22, अल्मुह़ल्ला: 7/69, तफ़्सीरे क़ुर्तुबी: 3/93]
सहाबा में से अब्दुल्लाह बिन अ़ब्बास, अब्दुल्लाह बिन अ़म्र, अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु और ताबेईन में से सई़द बिन अल् मुसय्यिब, अबूबक्र बिन अ़ब्दुर्रहमान, मुजाहिद और इक्रिमा और अइम्मा में से अबू हनीफ़ा, शाफ़ेई, अहमद, मालिकिया और ज़ाहिरिया का यही मस्लक है। नीज़ ह़ुर्मत की दलील नबी करीम ﷺ का ये फ़र्मान भी है कि: जो शख़्स अपनी औ़रत के दुबुर में आए (वत़ी करे) वो मल्ऊ़न है। [सुनन अबी दाऊद: 2162, अल्जामिउ़स़्स़गीर: 2/539, सहीहुल जामेअ़ : 5889]
हदीस से वजहे इस्तिदलाल ये है कि किसी चीज़ से मुमानिअ़त और उसकी ख़िलाफ़वर्जी पर लअ़नत की तोबीख़ इस चीज़ की ह़ुर्मत की दलील है।
XI. इद्दत के अह़काम
हामिला औ़रत की इद्दत, जिसका शौहर वफ़ात पा गया हो: इब्ने रुश्द वग़ैरह सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में लिखते हैं कि आपके नज़दीक ऐसी ह़ामिला औ़रत जिसका शौहर वफ़ात पा गया हो और वफ़ात की इद्दत गुज़रने से पहले उसकी विलादत हो जाए तो वो ह़मल और वफ़ात की दोनों इद्दतों में से लम्बी इद्दत गुज़ारेगी, यानी अगर इद्दते वफ़ात गुज़रने से पहले विलादत नहीं हुई तो वज़अ़ॆ ह़मल की इद्दत गुज़ारेगी और अगर इद्दते वफ़ात गुज़रने से पहले विलादत हो गई तो शौहर के वफ़ात की इद्दत यानी चार महीने दस दिन गुज़ारेगी। [बिदायतुल मुज्तहिद: 2/95, नीलुल औत़ार: 8/77]
अ़ब्दुर्रहमान बिन मअ़क़िल का बयान है कि एक मर्तबा मैं अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के पास था, एक आदमी ने आपसे ऐसी औ़रत के बारे में फ़त्वा पूछा जो ह़मल से हो और उसका शौहर वफ़ात पा जाए? तो आपने फ़र्माया: दोनों इद्दतों में जो लम्बी हो उसका इंतिज़ार करे। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा: 4/300]
और शअ़बी से रिवायत है कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु फ़र्माते थे हर ह़ामिला की इद्दत आख़िरुल अजलैन है। [मुसत्रफ़ इब्ने अबी शैबा: 4/298] दरअस़ल अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने ये मस्लक इख़्तियार करके दो आयात में तत़्बीक़ पैदा की है। एक अल्लाह का इर्शाद है:
وَأُولَاتُ الْأَحْمَالِ أَجَلُهُنَّ أَنْ يَضَعْنَ حَمْلَهُنَّ
और जो ह़मल वाली हैं उनकी इद्दत ये है कि वो अपना ह़मल वज़अ कर दें। [सूरह त़लाक़: 4]
और दूसरी जगह इर्शाद है:
وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنْفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَ عَشْرًا
और जो लोग तुममें से फ़ौत किये जाएँ और बीवियाँ छोड़ जाएँ वो (बीवियाँ) अपने आपको चार महीने और दस रातें इंतिज़ार में रखीं। [बक़रह: 234]
दोनों आयतों में उ़मूमों ख़ुस़ूस़ की निस्बत है, इसलिए किसी एक पर अ़मल को तर्जीह़ देना और दूसरे को छोड़ना दुरुस्त नहीं है, लिहाज़ा ज़न्नी पहलू को छोड़कर यक़ीनी पहलू को राजेह़ क़रार देने और तआरुज़ से बचने के लिये दोनों पर अ़मल किया जाएगा। [देखिए: सबलुल इस्लाम/स़िन्आ़नी: 3/198]
लेकिन राजेह़ और सहीह बात ये है कि मज़्कूरा दोनों हालतों में ह़ामिला की इद्दते वजओ़ ह़मल है। अ़ब्दुल्लाह बिन उ़त्बा से रिवायत है कि सबीआ़ बिन्ते ह़ारिस ने उन्हें ख़बर दी कि वो सअ़द बिन ख़ौला की ज़ौजियत में थीं। वो बद्री सहाबा में से थे, ह़ज्जतुल वदाअ़ के मौके पर उनकी वफ़ात हो गई और ये ह़मल से थीं, उनकी वफ़ात के कुछ ही देर बाद उन्हें बच्चा पैदा हुआ, फिर जब अय्यामे निफ़ास से फ़ारिग हुईं तो पैग़ामे निकाह देने वालों के लिये बनाव सिंगार किया, उनके पास अबुस्सनाबिल बिन बअ़कक आए और कहा: क्या बात है मैं देख रहा हूँ कि तुम बनाव सिंगार किये हो? शायद तुम निकाह की ख़्वाहिश रखती हो? लेकिन जान लो कि तुम चार महीने दस दिन गुज़रने से पहले निकाह नहीं कर सकती हो। सबीआ़ कहती हैं: उनकी ये बात सुनकर मैने शाम को अपने कपड़ों को इकट्ठा किया और अल्लाह के रसूल ﷺ के पास जाकर इस मसले के बारे में फ़त्वा पूछा: आप ﷺ ने मुझे फ़त्वा दिया कि जब मेरे बच्चा पैदा हो गया तब मैं ह़लाल हो गई और आपने मुझसे कहा कि अगर तुम ज़रूरत महसूस करती हो तो निकाह कर लो। [सहीह बुख़ारी: 5318, सहीह मुस्लिम: 1484]
जम्हूर उ़लमा का यही मस्लक है और बाज़ लोगों का कहना है कि इस हदीस को सुनने के बाद इस मसले पर इज्माअ़ हो गया। [अल्मुग़्नी: : 7/473] इमाम शअ़बी रहमतुल्लाह अलैह फ़र्माते हैं: मैं इस बात की तस्दीक़ नहीं करता कि अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु मुतवफ़्फ़ा, अन्हा ज़ौजहा (ऐसी औ़रत जिसका शौहर वफ़ात पा जाए) के लिये आख़िरुल अजलैन की इद्दत के क़ाइल रहे होंगे। [सुबुलुस्सलाम: 3/198 3/198] और अगर आपसे ये बात मंकूल है तो ये उस वक्त की बात होगी जब आपको सबीआ़ की हदीस का इल्म नहीं रहा होगा। वरना आप नबी करीम ﷺ से साबितशुदा सही हदीस की मुख़ालिफ़त हर्गिज़ नहीं कर सकते।
सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 33 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन
Team Islamic Theology

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