Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 30)

Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu

सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु

[तहरीर नंबर 30]


अमीरुल मोमिनीन अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु की फ़क़ाहत - 5


VI. ह़ज्ज के अह़काम

i. मुह़रिम का अपनी औ़रत को बोसा देना: अमीरुल मोमिनीन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु फ़र्माते हैं: जो शख़्स़ ह़ालते इह़राम में अपनी बीवी को बोसा दे, उसे चाहिए कि एक दम दे (यानी कुर्बानी करे।) [फ़त्हुल अ़ज़ीज़ शरह़ल वजीज़/अर्रफ़ाई, बि रिह़ाशियतुल मज्मूअ़: 7/480]


ii. मुह़रिम का ह़मलावर जानवर को क़त्ल करना: मुजाहिद, अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत बयान करते हैं कि आपने फ़र्माया: बिज्जू अगर मुह़रिम पर ह़मलावर हो तो वो उसे क़त्ल कर दे, लेकिन अगर उसके ह़मला करने से पहले क़त्ल कर दिया तो उसे एक बकरी का दम देना पड़ेगा। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा: 4/6] इसकी दलील अल्लाह तआ़ला का ये इर्शाद है:

فَمَنِ اضْطُرَّ غَيْرَ بَاءٍ وَلَا عَادٍ

फिर जो मजबूर कर दिया जाए, उस ह़ाल में कि न बग़ावत करने वाला हो और न ह़द से गुज़रने वाला तो उस पर कोई गुनाह नहीं। [सूरह बक़रह: 173]

वजहे इस्तिदलाल ये है कि मुह़रिम ने बज़ाते ख़ुद बिज्जू के क़त्ल का इक़्दाम नहीं किया, बल्कि उसके ह़मलावर होने की स़ूरत में क़त्ल के लिये मजबूर हुआ और ऐसी ह़ालत में बिज्जू का हुक्म एक ख़तरनाक मूज़ी जानवर का हुक्म हो गया जिसे क़त्ल करने की शरअ़न इजाज़त है। [फ़िक़्हुल इमाम अ़ली बिन अबी त़ालिब: 1/403]


iii. कौओ को क़त्ल करना: सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के नज़दीक मुह़रिम के लिये कौआ को क़त्ल करना जाइज़ है। आपने फ़र्माया: मुह़रिम कौआ को क़त्ल कर सकता है। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा: 4/94] और इसकी दलील

नबी करीम ﷺ का ये फर्मान है: पाँच जानवर फ़ासिक़ हैं जो ह़रम में भी क़त्ल किये जाएँगे, चूहिया, बिच्छू, कौआ, चील, काटने वाला कुत्ता। [सुनन तिर्मिज़ी: 166; हसन सहीह]


iv. त़वाफ़ में शक वाक़ेअ हुआ: अमीरुल मोमिनीन अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु फ़र्माते हैं: जब तुम त़वाफ़ करो और तुम्हें शक वाक़े हो जाए कि क्या तुम्हारा त़वाफ़ पूरा हुआ या नहीं तो उसे कमी पर मह़मूल करके पूरा कर लो, इसलिए कि अल्लाह तआ़ला ज़्यादती पर अज़ाब नहीं देगा। [मुसत्रफ़ इब्ने अबी शैवा: 4/96]


v. त़वाफ़ में भूल जाना: अगर कोई शख़्स भूलकर त़वाफ़ में मस्नून से ज़ाइद चक्कर लगा ले तो अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु फ़र्माते हैं कि उसे मज़ीद चक्कर लगाकर दो त़वाफ़ पूरे कर लेने चाहिए, आपने फ़र्माया कि मस्लन किसी ने त़वाफ़ के आठ चक्कर लगा लिये तो मज़ीद छः चक्कर लगाए ताकि दो त़वाफ़ मुकम्मल हो जाएँ और फिर वो त़वाफ़ की चार रकअ़त नमाज़ अदा करें। [मुसत्रफ़ अ़ब्दुर्रज़्ज़ाक़: 9814] ये आपका इज्तिहाद है, बशर्ते़कि सनद साबित हो। 


vi. हज्ज में नियाबत: अल्लामा इब्ने ह़ज़म वग़ैरह ने लिखा है कि अगर किसी शख़्स़ के पास हज्ज करने की माली इस्तिताअ़त हो लेकिन बुढ़ापे या किसी और वज़ह से मअ़ज़ूर हो तो अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के नज़दीक ऐसे शख़्स किसी को अपना नाइब बना दे। [अल्मुह़ला: 7/61, अल्मुग़्नी: 3/220] आपने बहुत बूढ़े शख़्स़ के बारे में फ़र्माया कि वो अपने ख़र्च पर किसी को ह़ज्ज के लिये भेजे जो उसकी तरफ़ से हज्ज करे। [अल्मुह़ल्ला: 7/61,  अल्मुग़्नी: 3/228] इस फ़त्वे की दलील इब्ने अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु की वो हदीस है जिसमें क़बीलए ख़सइम की एक औ़रत ने कहा था: ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ ! मेरे बाप बहुत ही बूढ़े हैं और उन पर ह़ज्ज का फ़रीज़ा आ़इद होता है, लेकिन वो अपनी सवारी पर सवार होने की ताक़त नहीं रखते। उनका क्या हुक्म है? आप ﷺ ने फ़र्माया: उनकी तरफ़ से तुम ह़ज्ज करो। [सुनन बैहक़ी: 5/149 सनद सहीह]

इस हदीस से मालूम होता है कि सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु और दीगर उ़लमा के नज़दीक वजूबे ह़ज्ज के लिये माल की इस्तिताअ़त काफ़ी है और जिस्मानी इस्तिताअ़त अगर है तो बेहतर वरना दूसरे से ह़ज्जे बदल करवाए। 


v. जमरात की रमी में शक वाक़ेअ़ होना: अगर ह़ाजी रमी जमरात की तादाद में शक वाक़ेअ़ हो जाए तो अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के नज़दीक मश्कूक अ़दद का एआ़दा करे, चुनाँचे अबू मिज्लज़ से रिवायत है कि एक आदमी ने इब़्ने उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु से पूछा: मैंने रमी जिमार की है, लेकिन नहीं जानता कि छः मर्तबा रमी की या सात मर्तबा, उन्होंने जवाब दिया : ये मसला लेकर अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के पास जाओ, वो आया और पूछा। आपने फ़र्माया  अगर मेरी नमाज़ में ऐसी सूरत पेश आती तो मैं नमाज़ का एआ़दा करता, फिर वो आदमी लौटकर इब़्ने उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु के पास आया, और आपके जवाब की इत्तिला दी, इब़्ने उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़र्माया: उन्हों ने सच कहा। या फ़र्माया: बहुत ही उम्दा जवाब दिया। शैख़ फ़र्माते हैं: गोया कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के इस क़ौल से मुराद ये है कि मश्कूक फ़ीह का एआ़दा करता, इसी तरह रमी में भी मश्कूक फ़ीह का एआधदा किया जाएगा। [सुनन बैहक़ी: 5/149] सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के क़ौल की यही तौज़ीह सही है, क्यों कि यही तालीमाते नबवी के मुताबिक़ है, चुनाँचे अबू सई़द ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़र्माया, जब तुममें से किसी को नमाज़ में शक हो और उसको पता न चल सके कि कितनी रकअ़तें पढ़ी हैं? तीन या चार तो वो शक को छोड़कर यक़ीन पर अमल करे फिर सलाम से पहले दो सज्दे करे, अगर उसने पाँच पढ़ ली हैं ये उसको जुफ़्त (छ) बना देगा और अगर उससे चार की तक्मील होती है तो फिर शैत़ान के लिये रुस्वाई होगी।


सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 30 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। 

जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन


Team Islamic Theology

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