Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 29)

Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu


सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु

[तहरीर नंबर 29]


अमीरुल मोमिनीन अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु की फ़क़ाहत - 4


V. रोजे के अह़काम


i. एक आ़दिल मुसलमान की रूयत हिलाल से रमज़ान के रोज़े का सबूत: अमीरुल मोमिनीन अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु के नज़दीक तन्हा एक आदिल मुसलमान की ख़बर से रूयत हिलाल साबित हो जाती है और लोगो पर रोज़ा रखना फ़र्ज़ हो जाता है। फ़ातिमा बिन्ते ह़ुसैन का बयान है कि एक आदमी ने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के पास रमज़ान के रूयत हिलाल की गवाही दी तो आपने रोज़ा रखा और मेरा ख़्याल है कि आपने दूसरों को भी रोज़ा रखने का हुक्म दिया था। *अल्मज्मूअ़: 6/315; अल्मुग़्नी: 3/90* आपका ये हुक्म इस हदीसे नबवी ﷺ पर मब्नी है :

चाँद देखकर रोज़ा रखो और चाँद देखकर रोज़ा छोड़ दो, पस अगर बादल छा जाएँ तो शअ़बान के तीस दिन पूरे करो। [सहीह मुस्लिम:59]

अल्लामा नववी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: यहाँ चंद एक मुसलमानों की रूयत मुराद है, हर फ़र्द की रूयत शर्त है बल्कि अगर दो आदिल या सही मस्लक के मुताबिक़ एक आदिल मुसलमान रूयत हिलाल की शहादत दे तो तमाम मुसलमानों के लिये रोज़ा रखना वाजिब हो जाता है। रहा रोज़ा तोड़ने का मसला, तो इस सिलसिले में अबू सौर के अ़लावा बक़िया तमाम उ़लमा इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि इसके लिये एक आदिल की गवाही काफ़ी नहीं होगी, बल्कि हिलाल शव्वाल के लिये दो आदिल मुसलमानों की गवाही ज़रूरी है, अल्बत्ता अबू सूर एक आदिल की गवाही पर भी इसे जाइज़ मानते हैं। [शरह़ सहीह मुस्लिम: 7/190]


ii. जुन्बी का रोज़ा: सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के नज़दीक जुन्बी आदमी के लिये रोज़ा रखना जाइज़ है, जुन्बी के रोज़ा रखने का मतलब है कि वो ग़ुस्ले जनाबत को सुबह़ होने तक मुअख़्ख़र कर सकता है। अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में ह़ारिस का बयान है कि आपने फ़र्माया: अगर आदमी हालते जनाबत में सुबह करे और रोज़ा रखना चाहे तो रोज़ा रख सकता है। *मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा: 3/81, अल्मुग़्नी: 1/137* इसकी दलील आ़इशा और उम्मे स़लमा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस है कि रसूलुल्लाह ﷺ ह़ालते जनाबत में होते और फ़ज़्र का वक्त हो जाता, फिर आप ग़ुस्ल करते और रोज़ा रखते। *सहीह बुख़ारी: 253,1923*


iii. इन्तिहाई ज़ईफ़ रोज़ा तोड़ सकता है: अमीरुल मोमिनीन अली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु अल्लाह के फ़र्मान,

وَعَلَى الَّذِينَ يُطِيقُونَهُ فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِينٍ

की तफ़्सीर में फ़र्माते हैं कि इस आयत में जिस शख़्स को एक रोज़ा के बदले एक मिस्कीन को खाना खिलाने की रुख़्सत दी गई है उससे बहुत बूढ़ा शख़्स मुराद है जो रोज़ा रखने की ताक़त नहीं रखता। [तफ़्सीरे त़बरी: 2/81]


iv. ऐतिकाफ़ की जगह: अबू अ़ब्दुर्रह़मान अस्सुलमी अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि आपने फ़र्माया : जामेअ़ मस्जिद के अ़लावा दूसरी जगह ऐतिकाफ़ करना दुरुस्त नहीं है। [मुसन्नफ़ अब्दुर्रज़्ज़ाक़: 8009] और दूसरी रिवायत में मिस्ऱ जामेअ़ का ज़िक्र है। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा: 3/91] शायद आप इससे ये मुराद लेना चाहते हैं कि सिर्फ़ शहर की जामे मस्जिद में ऐतिकाफ़ दुरुस्त है। 


v. मुअ़तकिफ़ के लिये जाइज़ काम: सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु फ़र्माते हैं कि जब आदमी मुअ़तकिफ़ हो तो वो जुम्आ़ जनाज़ा और मरीज़ की ए़यादत में शरीक हो सकता है, नीज़ अपने घरवालों के पास जाकर खड़े खड़े अपनी ज़रूरियात का उनसे मुतालबा कर सकता है। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा: 3/87; जमउ़ल जवामिउ़: 2/140], उम्मुल मोमिनीन आइशा रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत है: मुअ़तकिफ़ के लिये सुन्नत ये है कि वो मरीज़ की ए़यादत न करे, न जनाज़ा में शिर्कत करे, न ही औरत को हाथ लगाए और न ही उससे मुबाशिरत करे, बाहर न निकले इल्ला ये कि जिस ज़रूरत के लिये निकले बगैर चारा न हो। बगैर रोज़ा के ऐतिकाफ़ नहीं। बगैर जामेअ़ मस्जिद के एतिकाफ़ नहीं। [रवाहु अबूदाऊद: 2473, वल् बैहक़ी: 4/315]


सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 29 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। 

जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन


Team Islamic Theology

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