Eid-ul-Fitr ka paigham

Eid-ul-Fitr ka paigham

ईदुल फ़ित्र का पैग़ाम

आज ईदुल फ़ित्र का दिन है, यह ख़ुशी का दिन है, सुरूर का दिन है, लेकिन ताली और थाली बजाने, बैंड पीटने, और फ़िल्में देखने का दिन नहीं है बल्कि शुक्राने का दिन है, अल्लाह की तारीफ़ का दिन है, उसकी बड़ाई बयान करने का दिन है, उसकी अज़मत का गुणगान करने का दिन है।

अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर, ला इलाहा इल्लल्लाह,

वल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर, व लिल्लाहिल हम्द

अल्लाह ही बड़ा है, अल्लाह ही बड़ा है, अल्लाह के अलावा कोई इबादत के लायक़ नहीं, अल्लाह बड़ा है,
वास्तव में अल्लाह ही बड़ा है और तमाम तारीफ़, बड़ाई और प्रशंसा उसी के लिए है।

यह ईदुल फ़ित्र, जिसके ज़रिए हम और आप एक जगह इकट्ठे हुए हैं, यह दुनिया के लिए एक पैग़ाम है कि हम सब मुसलमान हैं और सिर्फ़ मुसलमान हैं, जो कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। हममें कोई भेदभाव नहीं, किसी नस्ल, ज़ात, बरादरी, या क़बीले की बुनियाद पर कोई फ़र्क़ नहीं। हम सब आपस में भाई-भाई हैं। हमारा रब एक है, हमारा क़ुरआन एक है, हमारा रसूल एक है। हम सब अल्लाह के फ़रमांबरदार बन्दे हैं। तौहीद हमारा बुनियादी अक़ीदा है, जिसे सार्वजनिक करना हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है। आज शैतान शिर्क के तमाम हथियारों के साथ घात लगाए हुए है और उसका मक़सद साफ़ है कि वह अहल-ए-तौहीद को अपने धोखे में फँसाना चाहता है।

यह ईद रमज़ान के लगातार 30 रोज़ों के बाद आई है। यह महीना एक मुक़द्दस महीना था जो बहुत जल्द रुख़्सत हो गया। इसके बारे में हदीस-ए-क़ुदसी में आता है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है: "रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला दूँगा, क्योंकि मेरा बंदा सिर्फ मेरे लिए खाना, पीना और अपनी ख़्वाहिशात को छोड़ देता है।" (सही बुख़ारी 1761)

रोज़े के आदाब में सब्र और शुक्र करना है, बुराइयों से ख़ुद भी बचना है और दूसरों को भी रोकना है, फ़हश और बेहयाई के कामों से दूर रहना है, अल्लाह से रिश्ता मज़बूत करना है और अपने अंदर तक़वा पैदा करना है।

इसका एक अदब रसूलुल्लाह ﷺ ने यह भी बताया है कि: "अगर कोई लड़ाई करना चाहे और गाली-गलौज करे तो उससे कह दो कि मैं रोज़े से हूँ।"  (सही बुख़ारी 1894)

झूठ बोलना गुनाह है, रिश्वत लेना जुर्म है, ग़ीबत करना अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाने के बराबर है, सूद अपनी मां से निकाह करने से घिनौना काम और अल्लाह और उसके रसूल से खुली जंग है। गाली देना मुनाफ़िक़ की पहचान है लड़ाई-झगड़ा नापसंदीदा काम है, टोह लगाना और जासूसी करना बुरा अमल है। किसी का दिल तोड़ने वाला मज़ाक बदनसीबी है, रिश्तेदारों से रिश्ता तोड़ना दुराचार है, पड़ोसी का ख्याल न रखना एक बड़ा गुनाह है। किसी की इज़्ज़त उछालना, धोखा देना, किसी का माल हड़पना, क़र्ज़ लेकर वापस न करना, वरासत का माल हड़प कर जाना भयानक जुर्म हैं।

अगर रमज़ान में भी ये बुरे काम होते रहें और हम बेकार बातों से न रुकें, तो समझ लेना चाहिए कि रोज़े का असल मक़सद (तक़वा) हासिल नहीं हो रहा। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "जिसने झूठ और बुरे काम नहीं छोड़े, तो अल्लाह को इसकी कोई ज़रूरत नहीं कि वह अपना खाना-पीना छोड़ दे।"  (सही बुख़ारी 1903)

अल्लाहु अकबर कबीरा, वलहम्दु लिल्लाहि कसीरा, व सुब्हानल्लाहि बुक्रतन व असीला

रमज़ान का कुरआन से बहुत घनिष्ट रिश्ता है। इसी महीने में कुरआन नाज़िल हुआ और उसी में एक रात है जो हज़ार महीनों (83 साल 4 महीने) से बेहतर है, जिसे लैलतुल क़द्र कहा जाता है। जिब्रील अलैहिस्सलाम हर रमज़ान में एक बार मुकम्मल कुरआन सुनाते थे, और जिस साल नबी ﷺ की वफ़ात हुई, उस साल दो बार दौर हुआ।

कुरआन अल्लाह की आख़िरी किताब है, इसमें कोई बदलाव नहीं हो सकता, और मुहम्मद ﷺ अल्लाह के आख़िरी नबी और आख़िरी रसूल हैं।


इन बिंदुओं पर  ख़ास तवज्जुह की ज़रूरत है

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और क़ुरआन के बारे में कुछ बातें ज़हन में रखना ज़रूरी है:

1. मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इमामुल अंबिया ख़ातिमून नबीयीन (अंतिम नबी) हैं।

2. क़ुरआन आसमानी किताबों का सबसे आख़िरी संस्करण है।

3. क़ुरआन सबसे पवित्र महीने, रमज़ान में नाज़िल हुआ।

4. क़ुरआन सबसे अफ़ज़ल और सबसे अंतिम पर नाज़िल हुआ।

5. क़ुरआन को नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के क़ल्ब पर नाज़िल करने वाले फ़रिश्तों के सरदार जिब्रील अलैहिस्सलाम थे। 

6. क़ुरआन और रोज़ा, क़यामत के दिन अल्लाह के सामने सिफ़ारिश करेंगे। 


इसलिए हमें चाहिए कि हम कुरआन को पढ़ें, समझें और उस पर अमल करें, ख़ुद भी जिहालत के अंधकार से निकलकर अल्लाह को रोशनी में आएँ और दूसरों को भी बन्दों की बन्दगी से निकाल कर अल्लाह की बंदगी की तरफ़ बुलाएँ।

रमज़ान में क़ियामुल-लैल (तरावीह) की बड़ी अहमियत है। इसका मक़सद यह है कि दिन में रोज़े से सब्र व ज़ब्त सीखा जाए और रात में अल्लाह से तअल्लुक़ को मज़बूत किया जाए, अल्लाह की किताब को पढ़ा जाए, उसके चमत्कार को लोगों के सामने पेश किया जाय उसके एहसानात पर शुक्र अदा किया जाए और गुनाहों से तौबा की जाए।

अगर कोई रोज़ा रखकर और रात में क़याम करके भी गुनाहों से न बचे, तो होशियार रहना चाहिए। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "कितने रोज़ेदार ऐसे हैं जिन्हें अपने रोज़े से सिवाय भूख प्यास के कुछ नहीं मिलता, और कितने रात में इबादत (क़याम) करने वाले ऐसे हैं जिन्हें रात में नींद ख़राब करने के इलावा कुछ हासिल नहीं होता।" (तिर्मिज़ी 1380)

अगर कोई व्यक्ति किसी कंपनी में मुलाज़िम हो किसी स्कूल में टीचर हो या किसी यूनिवर्सिटी का प्रोफ़ेसर हो और उस अपने विभाग से संबंधित ट्रेंनिंग दी जाए दी गई हो जिसमें कुछ टिप्स दी गई हों, कुछ निर्देश दिये गए हों, कुछ नियम समझाए गए हों लेकिन वो ट्रेंनिंग से वापस आकर उनपर अमल न करें तो क्या उस ट्रेनिंग का कोई मतलब हसिल हो सकेगा क्या क्या वह बेहतरीन मुलाज़िम या बेहतरीन प्रोफ़ेसर हो सकता है ऐसे ही रमज़ान तरबियत का महीना

इसमें जो कुछ भी ट्रेंनिंग ली है अगर रमज़ान के अलावा दिनों में भी उसे अप्लाई न किया जाए तो क्या ट्रेंनिंग का कोई मक़सद हसिल हो सकेगा। रमज़ान के बाद भी सब्र व ज़ब्त रक्त का वाही माहौल होना चाहिए जो रमज़ान में था रमज़ान में जिस  जिस चुस्ती के साथ नमाज़ हो रही थी रमज़ान के बाद भी मसाजिद ख़ाली न हो जाएं रमज़ान के बाद कहीं दाढ़ियां क्लीन शेव न बदल जाएं, झूठ और दूसरी बुराईयों से वैसे ही दुर रहा जाए जैसा रमज़ान में रहते थे दुश्मानी किना कपट दोबरा पैदा ना हो माहौल ख़ुशगवार हो आपस में लड़ना झगड़ाना बंद करें और जिस तरह कंधे से कंधा मिलाकर आज खड़े हैं ऐसे ही हमेशा खड़े रहें।

अपने अंदर से ऊंच नीच छूत छात और तकब्बुर व घमण्ड को नोच कर फेंक दें इंसाफ़ और न्याय के के समर्थक बनकर खड़े हो और दुनिया के सामने ऐसा आदर्श प्रस्तुत करें कि दुनिया देखकर पुकार उठे कि "ऐसे होते हैं अल्लाह के बन्दे"

एक हदीस के अनुसार तीन ऐसे बदनसीब लोग हैं जिन पर अल्लाह, उसके फ़रिश्ते जिब्राइल और उसके आख़िरी पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने लानत की है। ये तीन लोग हैं:

1. वह व्यक्ति जिसके सामने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का नाम आये, और उनपर दरूद नहीं भेजे।

2. वह व्यक्ति जिसने अपने बूढ़े माता-पिता दोनों या उनमें से किसी एक को पाए और उनकी सेवा करके जन्नत का हक़दार न बन सके।

3. वह व्यक्ति जिसने रमज़ान का महीना पाया, लेकिन इसे अपनी मग़फ़िरत (माफ़ी) का ज़रिया बनाकर जन्नत हासिल नहीं कर सका।


अल्लाह तआला से दुआ है कि रमज़ान के महीने में हमने जो कुछ भी सीखा है, जिस चीज़ की हमने ट्रेनिंग ली है, और जो कुछ भी टूटी फूटी इबादत की है अल्लाह तआला उन सबको क़ुबूल फ़रमाए। बेशक, हम उन कामों को उस तरह से अंजाम नहीं दे सके जिस तरह हक़ बनता था। लेकिन ऐ अल्लाह! आप तो रहमान व रहीम है, ग़फ़ूर व ग़फ़्फ़ार हैं, सत्तार व वदूद हैं आप हमारे गुनाहों को बख़्श दें, हमारी ग़लतियों को माफ़ करदे और एक नए हौसले के साथ मोमिन बनकर जीने का हौसला अता फ़रमाएं। 

आमीन

رَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا وَهَبْ لَنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةً ۚ إِنَّكَ أَنتَ الْوَهَّابُ رَبَّنَا إِنَّكَ جَامِعُ النَّاسِ لِيَوْمٍ لَّا رَيْبَ فِيهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُخْلِفُ الْمِيعَادَ


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही

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