Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 23)

Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu

सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु

[तहरीर नंबर 23]


24. ख़िलाफ़ते अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु पर इज्माअ़ उम्मत के नाक़िलीन

1. इमाम मुहम्मद बिन सअ़द ने मुहाजिरीन व अंस़ार के साथ साथ मदीना में सकूनत करने वाले, दीगर बुज़ुर्ग व मुमताज़ अस़्ह़ाबे रसूल ﷺ का ख़िलाफ़ते अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु पर इज्माअ़ नक़्ल किया है। 

आप फ़र्माते हैं, "उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत के दूसरे दिन मदीना में अ़ली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु के हाथ पर बैश्यते ख़िलाफ़त हुई। त़लहा, ज़ुबैर, सअ़द बिन अबी वक़्क़ास, सईद बिन ज़ैद बिन अ़म्र बिन नुफैल, अ़म्मार बिन यासर, ओसामा बिन ज़ैद, सहल बिन हनीफ़, अबू अय्यूब अंसारी, मुहम्मद बिन मस्लमा, ज़ैद बिन साबित, ख़ुज़ैमा बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हुमा अज्मइन और उन तमाम सहाबा वग़ैरह ने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त पर बैअ़त की जो उस वक्त मदीना में मौजूद थे।" [अत्त़ब्क़ातुल् कुब्रा/इब्ने सअ़द: 3/31]


2. इब्ने कुदामा रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: "इमाम अहमद बिन हंबल ने अपनी सनद से अ़ब्दुर्रज़्ज़ाक़ से, उन्होंने मुहम्मद बिन राशिद से और उन्होंने औफ़ से रिवायत किया है कि उनका बयान है कि मैं ह़सन की मज्लिस में बैठा था, मैंने देखा कि एक आदमी अबू मूसा अशअ़री रज़ियल्लाहु अन्हु  पर मुअ़तरिज़ था कि उन्होंने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का इत्तिबाअ़ क्यूँ किया? 

हसन रज़ियल्लाहु अन्हु ये सुनकर गुस्सा हो गए, और कहा : सुब्हानल्लाह! 

जब अमीरुल मोमिनीन उ़स़्मान रज़ियल्लाहु अन्हा शहीद कर दिये गए और वहाँ मौजूद लोगों ने अपने सबसे बेहतर आदमी पर इत्तिफ़ाक़ करके उसकी ख़िलाफ़त पर बैअ़त कर ली तो क्या बुरा किया? क्या अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की इत्तिबाअ़ की वजह से अबू मूसा रज़ियल्लाहु अन्हु मलामत किये जाएँगे?" 

[अक़ीदतु अहलिस्सुन्नतु फ़िस़्स़हाबति : 2/689]


3. अबुल हूसन अल्अ़शअरी रहमतुल्लाह अलैह‌ फर्माते हैं: "उ़स़्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के बाद अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की इमामत व ख़िलाफ़त को अहले ह़ल व अ़क़्द सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा कि वह अपने आप को रोक नहीं पाया था बाद में अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा कि वह अपने आप को रोक नहीं पाया था बाद में उन्होंने अ़ली बिन अबी अन्हा को अन्हु के इज्माअ़ के पेशेनज़र हम सही मानते हैं, इसलिए कि उस वक्त अस़्ह़ाबे शूरा का कोई फ़र्द आपके सिवा उसे क़ुबूल करने के लिये तैयार नहीं हुआ, बल्कि सब आप ही के फ़ज़्लो अ़दल के मुअ़तरिफ़ रहे, नीज़ अपने पेशरू ख़ुलफ़ा के अहद में खुद अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की इस मंसब से दस्तबरदारी अपनी जगह बिलकुल दुरुस्त थी, इसलिए कि आपको मालूम था कि ये वक्त उन्हीं हज़रात का हे। चुनाँचे जब ख़िलाफ़त आपके हाथों में मुंतक़िल हुई तो आपने हक़गोई और बेबाकी का मुज़ाहिरा किया और अपने पेशरू ख़ुलफ़ा व अइम्मए अ़दल की तरह राहे रास्त पर चलने और चलाने में ज़र्रा बराबर कोताही नहीं की। ये तमाम ख़ुलफ़ाए राशिदीन किताबे इलाही और सुन्नते नबी करीम ﷺ के पाबन्द रहे। इन चारों के अदलो फ़ज़्ल पर पूरी उम्मत का इज्माअ़ है। [मक़ालातुल इस्लामीन : 1/346]


4. अबू नुऐ़म अस़्फ़हानी फ़र्माते हैं: जब सहाबा में इख़्तिलाफ़ हुआ तो उसे सुलझाने की ज़िम्मेदारी उन लोगों पर आ़इद हो गई जिन्हें हिज्रत, कारे ख़ैर, दीनी गै़रत और इस्लामी ह़मिय्यत में सब्क़त थी, और जिन्हें दीनो दुनिया में अफ़ज़ल व बरतर होने की वजह से पूरी उम्मते मुस्लिमा अपनी ज़ात पर तर्जीह़ देने के लिये हमावक्त़ तैयार रहती थी। उम्मत का कोई फ़र्द उनसे मुआ़रज़ा न करता था। मज़ीद बराँ अगर किसी मामले का ताल्लुक़ उस मुक़द्दस जमाअ़त से हो गया जिसे नबी अकरम ﷺ ने दुनिया ही में जन्नत की बशारत दी थी, और आप ﷺ अपनी पूरी ज़िन्दगी उनसे राज़ी रहे, अशरए मुबश्शरा में से जो लोग उस वक्त बाह़यात थे उन्होंने इख़्तिलाफ़ को ख़त्म करते हुए ख़िलाफ़त की ज़िम्मेदारी अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु को सौंप दी और चूँकि इल्म, फ़ज़्ल और इस्लाम में आपको सब्क़त व तक़द्दुम हासिल था, हक़ो बातिल की मअ़रका आराइयों में शरीक हुए थे, वोह अल्लाह और उसके रसूल के महबूब बन्दे थे और अल्लाह और उसके रसूल उनके नज़दीक महबूब थे। मुनाफ़िक़ीन की निगाहों में ख़ार, लेकिन मोमिनों के मंज़ूरे नज़र थे, इसलिए इस बात की भी कोई गुंजाइश न थी कि उम्मत में आपकी नेकनामी और क़द्रो मंज़िलत की बरतरी का कोई इंकार करता। आपसे पहले खुलफ़ाए राशिदीन को इस मंसबे ख़िलाफ़त के लिये अपने ऊपर मुक़द्दम करने से आपकी क़द्रो मंज़िलत में कोई कमी वाक़ेअ नहीं हुई, बल्कि इससे आपकी मंज़िलत दोबाला हुई कि आपको उन हज़रात की फ़ज़ीलत व बरतरी की मारिफ़त हासिल थी जिनको आपने अपने ऊपर तर्जीह दी। ये कोई नई बात न थी बल्कि ये सुन्नत गुज़िश्ता अम्बिया व रसूलों में चली आ रही थी। अल्लाह तआ़ला का इर्शाद है :

 تِلْكَ الرُّسُلُ فَضَّلْنَا بَعْضَهُمْ عَلَى بَعْضٍ مِنْهُمْ مَّنْ كَلَّمَ اللَّهُ وَرَفَعَ بَعْضَهُمْ دَرَجَتٍ وَ أتَيْنَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ الْبَيِّنَتِ وَأَيَّدُنَهُ بِرُوحِ الْقُدُسِ وَ لَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا اقْتَتَلَ الَّذِينَ مِنْ بَعْدِهِمْ مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَتْهُمُ الْبَيِّنَتُ وَلَكِنِ اخْتَلَفُوا فَمِنْهُمْ مَّنْ أَمَنَ وَ مِنْهُمْ مَّنْ كَفَرَ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا اقْتَتَلُوا وَلَكِنَّ اللَّهَ يَفْعَلُ مَا يُرِيدُ

ये रसूल, हमने इनके बाज़ को बाज़ पर फ़ज़ीलत दी, इनमें से कुछ वो हैं जिनसे अल्लाह ने कलाम किया और इनके बाज़ को उसने दर्जों में बुलन्द किया और हमने ईसा बिन मरियम को वाज़ेह निशानियाँ दीं और उसे पाक रूह़ के साथ क़ुव्वत बख़्शी और अगर अल्लाह चाहता तो जो लोग उनके बाद थे आपस में न लड़ते, उसके बाद कि उनके पास वाज़ेह निशानियाँ आ चुकीं और लेकिन उन्होंने इख़्तिलाफ़ किया तो उनमें से कोई तो वोह था जो ईमान लाया और उनसे कोई वोह था जिसने कुफ़्र किया और अगर अल्लाह चाहता तो वोह आपस में न लड़ते और लेकिन अल्लाह करता है जो चाहता है। [सूरह बक़रह : 253]

पस एक रसूल को दूसरे पर फ़ज़ीलत देने का ये मफ़्हूम हर्गिज़ नहीं है कि एक दूसरे के मुक़ाबिल में हैच और कमतर है, तमाम अम्बिया व रसूल, अल्लाह तआ़ला के चुनिन्दा और उसकी मख़्लूक़ में सबसे बेहतर हैं।

खुलासा ये है कि सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने बइज्माअ़ सहाबा मंसबे ख़िलाफ़त सम्भालने के बाद मुसलमानों के मामलात को निहायत अदलो इंसाफ़ और जुहदो तक़ा से निभाया, पूरी ज़िन्दगी रसूलुल्लाह ﷺ और सहाबा किराम की सीरतो अमल के पाबन्द रहे, ख़ुद हिदायत याफ़्ता रहे और लोगों को हिदायत की दावत देते रहे, लोगों को रोशन शाहिरा और सिराने मुस्तकीम पर लेकर चले और शहादत की मौत से सरफ़राज़ हुए। 


5. अबू मंस़ूर बग़दादी फ़र्माते हैं: तमाम अहले ह़क़ व अस़्ह़ाबे अ़दल इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि उ़स़्मान रज़ियल्लाहु अन्हुमा की शहादत के बाद अली रज़ियल्लाहु अन्हु का इमाम व ख़लीफ़ा बनाया जाना अपनी जगह बिलकुल दुरुस्त है।" [किताब उस़ूलुद्दीन, पेज 286, 287]


6. इमाम ज़ौहरी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने उ़स़्मान रज़ियल्लाहु अन्हुमा के साथ उनकी ज़िन्दगी के आख़िरी लम्हात तक वफ़ादारी का सुबूत दिया, उनकी शहादत के बाद सहाबा में आप ही सबसे अफ़ज़ल और ख़िलाफ़त के हक़दार थे, लेकिन मंसबे ख़िलाफ़त पर ज़बरदस्ती क़ाबिज़ नहीं हुए, बल्कि जब बशमूले अस़्ह़ाबे शूरा तमाम लोगों ने आप पर बैअ़ते आ़म्मा कर लिया तब आपने उसे क़ुबूल किया। [अल्ऐतिक़ाद, पेज 193]


7. अ़ब्दुल मलिक अल्जूनी फ़र्माते हैं: "यहाँ तक उ़मर, उ़स्माना और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की इमामत के त़रीकए इस्बात और इमामत के लिये ज़रूरी शराइत पर उनके इज्माअ़ की बात है, तो मालूम होना चाहिए कि उनकी इमामत के इस्बात का वही तरीक़ा रहा जो अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु की इमामत के इस्बात के लिये मअ़हूद था, और इमामत के मसले में भी फ़ैसलाकुन बात के लिये ख़बर मुतवातिर, या इज्माअ़ ही दलील बन सकती है, हमें उन लोगों की बात बिलकुल परवाह नहीं करनी चाहिए जो कहते हैं कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की इमामत पर इज्माअ़ नहीं हुआ था, इसलिए कि उनकी इमामत तस्लीम करने से किसी को इंकार न था, उस वक्त फ़ित्नों की जो आग लगी उसके अस्बाब व अ़वामिल दूसरे थे। [अल्इर्शादु इला क़वातिउल अदलतु फ़ी उसूलिल् ऐतिक़ाद, पेज 362, 363]


8. अबू अ़ब्दुल्लाह बिन बत्त़ा फ़र्माते हैं: सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की बैअ़त मुत्तफ़िक़ा और बाइसे रहमत बैअ़त थी, आप ख़ुद इसके दावेदार न हुए और न ही तलवार की नोक पर लोगों को अपनी बैअ़त के लिये मजबूर किया, न ही अपने ख़ानदान को लेकर उन पर चढ़ दौड़े, बल्कि मंसबे ख़िलाफ़त को सम्भालकर खुद ख़िलाफ़त को शर्फ़ का ताज पहनाया और अपने अ़दलो इंसाफ़ के ज़रिये से उसे चमकदार मोतियों का जोड़ा पहनाया, अपनी क़द्रो मंज़िलत के ज़रिये से ख़िलाफ़त को अज़्मत का चाँद लगाया, आपने उसे लेने से इंकार कर दिया, लेकिन लोगों ने इस पर मजबूर किया, आप उससे पीछे हटते रहे, लेकिन लोग आप पर दबाव डालते रहे। [लवामिउ़ल अनवारुल बहिय्यतु/अस्सफ़ारीनी: 2/346; अक़ीदतु अहलिस्सुन्ना : 2/692]


9. अबू ह़ामिद ग़ज़ाली फ़र्माते हैं: तमाम सहाबा का अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु को ख़लीफ़ए अव्वल मानने पर इज्माअ़ रहा, फिर अबूबक्र ने उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु को नामज़द किया, उनके बाद उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त पर सबका इज्माअ़ हुआ, फिर अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त पर इज्माअ़ हुआ। उन सहाबा के बारे में हर्गिज़ हर्गिज़ ये गुमान नहीं किया जा सकता कि उन्होंने किसी ज़ाती मंफ़अत की ख़ातिर अल्लाह के दीन में ख़यानत की होगी। उम्मत की ख़िलाफ़त के लिये बित्तर्तीब उनका ये इज्माअ़ इस बात की सबसे अच्छी दलील है कि फ़ज़ाइल व मनाकिब में भी वोह उन्हीं दरजात के हामिल थे, इसी वजह से अहले सुन्नत उनके फ़ज़्लो शर्फ़ का दर्जा मुतअय्यन करते वक्त इसी तर्तीब का अ़क़ीदा रखते हैं। अहले सुन्नत ने इस पर बस नहीं किया बल्कि इस सिलसिले में अख़बार व रिवायात की तलाश जारी रखी और बिल्आख़िर ऐसी रिवायात उन्हें मिलीं जो इस तर्तीब की ताईद में सहाबा और अहले इज्माअ़ की मुस्तनद दलीलें रही हैं।" [अल् इक्तिसादु फ़िल् ऐतिक़ाद, पेज 154]


10. अबूबक्र बिन अल्अ़रबी फ़र्माते हैं: जब अल्लाह तआ़ला ने अपनी तक़दीर और फ़ैसले को नाफ़िज़ कर दिया (यानी उस़्मान शहीद कर दिये गए) तो ये बात वाज़ेहू हो गई कि अल्लाह तआ़ला पूरी उम्मत को यूँ ही ज़ाया नहीं कर देगा, बल्कि उ़स़्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के बाद लोगों को एक ऐसे ख़लीफ़ा की बहरहाल ज़रूरत थी जो उनके मामलात को देखे, लेकिन चूँकि तीनों पेशरू खुलफ़ा के बाद चौथी ऐसी कोई शख़्सियत नज़र नहीं आ रही थी जो मक़ामो मर्तबे, इल्मो तक़ा और दीन में अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के बराबर हो, इसलिए बैअ़ते ख़िलाफ़त आप पर ही तमाम हुई और अगर ये कार्रवाई अंजाम देने में जल्दी न की जाती तो मदीना में मौजूद बलवाई अपनी ख़बासत के ज़रिये से उम्मते मुस्लिमा के पर्दाए इत्तिहाद को इस तरह चाक कर देते जिसे दोबारा जोड़ना मुश्किल हो जाता लेकिन मुहाजिरीन व अंसार ने अज़्मो हिम्मत का मुज़ाहिरा किया और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के लिये उस ज़िम्मेदारी को फ़र्ज़ समझा और बिल्आख़िर आपने भी उसे तस्लीम कर लिया। [अल्अ़वास़िमु मिनल् क़वासिम, पेज 142]


11. इमाम इब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु के बाद तमाम सहाबा किराम उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु की बैअ़त पर मुत्तफ़िक़ हो गए और नबी करीम ﷺ का इर्शाद है कि, 'तुम अपने ऊपर मेरी सुन्नत और मेरे बाद हिदायत याफ़्ता खुलफ़ाए राशिदीन की सुन्नत को लाज़िम कर लो, उसे मज़बूती से थाम लो और दाढ़ों के साथ उसे जकड़ लो और दीन में ईजादकर्दा नई नई बातों से ख़ुद को बचाओ, इसलिए कि हर बिद्अत गुमराही है। [सुनन अबी दाऊद: 4/201 तिर्मिज़ी: 5/44]

अ़ली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु हिदायत याफ्ता खुलफ़ाए राशिदीन में से आख़िरी ख़लीफ़ा थे, अहले सुन्नत के तमाम उलमा, अत्क़िया, ह़ुक्काम और फ़ौजी सरबराहान ह़त्ताकि उनके अ़वामुन्नास भी इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि ख़िलाफ़त की तर्तीब में पहले अबूबक्र, फिर उ़मर, फिर उ़स्मान, फिर अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु हैं। [अल् वस़िय्यतुल कुब्रा, पेज 32]


12. हाफ़िज़ इब्ने ह़जर रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: उ़स़्मान रज़ियल्लाहु अन्हुमा की शहादत के बाद शुरू जुल् हिज्जा 35 हिजरी में अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के हाथ पर बैअ़ते ख़िलाफ़त मुनअक़िद हुई, मुहाजिरीन व अंसार और मदीना के तमाम हाज़िरीन ने बैअ़त की, फिर उस बैअ़त से इस्लामी सल्तनत के तमाम इलाक़ों को आगाह किया गया और मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु और अहले शाम के अलावा सब आपके मुत़ीअ़ हो गए, फिर उनके दरम्यान जो हुआ हुआ। [फ़त्हुल बारी: 7/72]

बहरह़ाल नाक़िलीने इज्माअ़ की मज़्कूरा इबारतों को नक़्ल करके मैं सिर्फ़ ये बात साबित करना चाहता हूँ कि ख़िलाफ़त के उस ज़माने में इस बात पर इज्माअ़ हो चुका था कि शहादते उ़स्मान के बाद अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ही इसके ज़्यादा मुस्तहिक़ हैं और उनकी ख़िलाफ़त सही है। इसलिए कि उस वक्त रूए ज़मीन पर आपसे ज़्यादा ख़िलाफ़त का कोई हक़दार नज़र नहीं आ रहा था, पस ये ख़िलाफ़त आपके शायाने शान रही, नीज़ मुनासिब वक्त पर और बरेंमह़ल अमल में आई। [अक़ीदतु अहलिस्सुन्नतु वल जमाअतु फ़िस़्स़हाबति : 2/639]


सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 23 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। 

जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन


Team Islamic Theology

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