सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु
[तहरीर नंबर 24]
25. लफ़्ज़े इमाम, ख़लीफ़ा और अमीरुल मोमिनीन का तरादुफ़
अ़ल्लामा नववी रहमतुल्लाह अलैह फ़र्माते हैं: इमामुल मुस्लिमीन को ख़लीफ़ा, इमाम और अमीरुल मोमिनीन कहना जाइज़ है। [रौज़तुत़् ता त़ालिबीन:10/94]
इब्ने ख़ल्दून रहमतुल्लाह अलैह फ़र्माते हैं: चूँकि मैंने इस मंस़ब की हक़ीक़त को वाज़ेह़ कर दिया और बता दिया कि सियासते दुनिया व हिफ़ाज़ते दीन के लिये साहिबे शरीअत की नियाबत को ख़िलाफ़त व इमामत कहा जाता है, इसलिए इस मंस़ब के सम्भालने वाले को ख़लीफ़ा और इमाम कहा जाएगा। [मुक़द्दमतु इब्ने ख़ल्दून, पेज 190]
इब्ने मंज़ूर ने ख़िलाफ़त की तारीफ़ इमारत से की है। [लिसानुल अ़रब: 9/83]
मुताख़िरीन में से अबू ज़ौहरा ने ख़िलाफ़त और इमामत कुब्रा दोनों अल्फ़ाज़ में तरादुफ़ की नोइयत की तफ़्सीर इस तरह की है: ख़िलाफ़त को ख़िलाफ़त इसलिए कहा जाता है कि जो शख़्स इस मंस़ब को सम्भालता है, और मुसलमानों का सबसे बड़ा हाकिम होता है, वो लोगों के मामलात की तदबीर व तंज़ीम में रसूलुल्लाह ﷺ का ख़लीफ़ा होता है, उसी का नाम 'इमामत' भी है, इसलिए कि 'ख़लीफ़ा' ही को 'इमाम' कहा जाता था और उसकी इताअ़त वाजिब होती थी, लोग उसके ताबेअ़ होते थे जैसे कि नमाज़ पढ़ाने वाले इमाम के ताबेअ़ होते थे। [तारीख़ुल मज़ाहिब/अबू ज़ौहरा, पेज 2]
इस्लाम के अव्वलीन हुक़्मरान जिस तरह ख़ुलफ़ा कहे जाते थे, अइम्मा भी कहे जाते थे। उ़मर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु के अ़हदे ख़िलाफ़त में मुसलमानों ने ख़लीफ़ा के लिये अमीरुल मोमिनीन का लक़ब इस्तेमाल किया।
"इमाम" का लफ़्ज़ क़ुरआन मजीद में मुतअ़द्दद मक़ामात पर क़ाइद, सरदार, या रहनुमा के मअ़ना में इस्तेमाल हुआ है। अल्लाह तआ़ला का इर्शाद है :
إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ اِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّلِمِينَ
बेशक मैं तुझे लोगों का इमाम बनाने वाला हूँ। कहा और मेरी औलाद में से भी? फ़र्माया मेरा अ़हद ज़ालिमों को नहीं पहुँचता। [सूरह बक़रह: 124]
यानी आइडियल पेशवा बना दूँगा जिसकी लोग इक्तिदा करेंगे और फ़र्माया:
وَاجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا
और हमें परहेज़गारों का इमाम बना। [सूरह फ़ुरक़ान: 74]
यानी ताकि लोग दीन के बारे में हमारी इक्तिदा करें। और फ़र्माया :
يَوْمَ نَدْعُوا كُلَّ أُنَاسٍ بِاِمَامِهِمْ
जिस दिन हम सब लोगों को उनके इमाम के साथ बुलाएँगे। [सूरह बनी इस्राईल: 71]
यानी नबी या दीनी पेशवा के साथ जिसकी उसने इक्तिदा होगी। एक मफ़्हूम ये भी बताया गया है कि हर जमाअ़त अपने आमालनामे के साथ बुलाई जाएगी।
अहादीसे नबविया में भी कई मक़ामात पर इन्हीं मअ़ना में 'इमाम' का लफ़्ज़ वारिद हुआ है। मस्लन नबी करीम ﷺ का इर्शाद हैं: जिस शख्स ने किसी इमाम (हाकिमे वक्त) से बेअ़त की, उसके हाथ में अपना हाथ दिया, और उससे अ़हदो इक़रार किया तो उसे चाहिए कि जहाँ तक हो सके वो उसकी इताअ़त करे, और अगर कोई दूसरा उस इमामत को उससे छीनने आए तो उस दूसरे की गर्दन मार दो। [सहीह मुस्लिम शरहन्नववी: 12/233, सुनन अबी दाऊद: 4248]
आप ﷺ का फर्मान है: मुसलमानों की जमाअ़त और उनके इमाम (हाकिमे वक्त) के साथ रहो। [सहीह मुस्लिम शरहून्नववी: 12/237]
और फ़र्माया: सात क़िस्म के लोगों को अल्लाह तआ़ला अपना साया उस दिन देगा कि जिस दिन उसके साये के अलावा कोई साया न होगा। इमाम (हाकिम) आदिल... [फ़त्हुल बारी: 3/293; मुत्तफ़क़ अलैहि]
यहाँ पर एक बात ये क़ाबिले तवज्जोह है कि अहले सुन्नत वल जमाअ़त के नज़दीक लफ़्ज़ "इमामत" का ज़्यादातर इस्तेमाल ऐतिक़ादी और फ़िक़्ही मसाइल में होता है और लफ़्ज़ "ख़िलाफ़त" का ज़्यादातर इस्तेमाल उनकी तारीख़ी किताबों में होता है।
ग़ालिबन इस तफ़्रीक़ की वजह ये है कि ये मबाह़िस ख़ुस़ुस़न जिनका ताल्लुक़ अ़क़ीदे से है, इमामत और ख़िलाफ़त के बाब में शिया, रवाफ़िज़ और ख़वारिज जैसे गुमराह फ़िक़ों की तर्दीद में लिखे गए हैं। इसलिए कि रवाफ़िज़ शिया लफ़्ज़े 'इमाम' को ख़िलाफ़त के मअ़ना में नहीं मानते, बल्कि उसे अपने ईमान का एक रुक्न मानते हैं, उनके न ज़दीक इमामत और ख़िलाफ़त दो अलग अलग चीजें हैं। इमामत से मुराद दीन की सयादत है, जबकि ख़िलाफ़त से मुराद मुल्क की सयादत है। इस तफ़्रीक़ के पसे पर्दा वो ये बात साबित करना चाहते हैं कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु अपने तीनों पेशरू खुलफ़ा के ज़माने में इमाम थे।
इब्ने ख़ल्दून फ़र्माते हैं: शिया हज़रात लफ़्ज़ "इमाम" अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के लिये ख़ास मानते हैं, ताकि आपको ख़िलाफ़त की बहन इमामत से मुत्तसिफ़ करें, साथ ही अपने उस मज़हब की तरफ इशारा करना मक़्सूद है कि वफ़ाते नबवी के वक्त अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु से ज़्यादा नमाज़ की इमामत के मुस्तहिक थे। [निज़ामुल ह़कम/आरिफ़ खलील पेज 81]
बहरह़ाल सही बात ये है कि ख़लीफ़ा, इमाम, या अमीरुल मोमिनीन जैसे अल्क़ाब का ताल्लुक़ उमूरे इबादत से नहीं है, बल्कि ये सब रसूलुल्लाह ﷺ की वफ़ात के बाद की इस्तिलाहात हैं, जिन्हें लोगों ने इस्तेमाल किया है और उस पर मुत्तफ़िक़ रहे हैं। बाद के अदवार में मुसलमानों ने इस मंस़ब के लिये इनके अलावा दीगर अल्क़ाब को भी इस्तेमाल किया है जैसे कि उन्दुलुस में ह़ाकिम को "अमीर" का लक़ब दिया जाता था। इसी तरह कहीं कहीं 'सुल्तान' का भी लक़ब दिया गया, और अब भी बाज़ इस्लामी ममालिक में ह़ुक्काम को मज़्कूरा अल्क़ाब में से कोई लक़ब दिया जाता है क्योंकि इस मसले में वुस्अ़त है। इस बाब में बुनियादी तौर पर सिर्फ़ ये मत्लूब है कि मुस्लिम रिआ़या और उसका हाकिमे आला दोनों ही अक़ीदा व शरीअ़त के लिहाज़ से इस्लामी क़वानीन के पाबन्द हों, अल्क़ाब का मसला इतना अहम नहीं है उसे ख़लीफ़ा कहा जाए, अमीरुल मोमिनीन कहा जाए, सद्रे मम्लिकत कहा जाए, या सद्रे जम्हूरिया कहा जाए, कोई भी लक़ब दिया जा सकता है। ये चीज़ अवाम के उर्फ़ व आदत पर मुन्द्रसिर है, ताहम इतना ज़रूर है कि मुस्लिम हाकिमे आला के लिये मज़्कूरा इस्लामी अल्क़ाब में से किसी लक़ब का इख़्तियार करना ही अफ़ज़ल है क्योंकि उन इस्लामी अल्क़ाब का सियासी मफ़्हूम, दीगर क़ौमों के नज़दीक उनके मुख्तलिफ़ मफ़ाहीम से बिलकुल जुदागाना है और इसलिए भी कि तारीख़ के सफ़्हात में उनके जो मअ़ना मअ़हूद हैं वो इस्लामी तहज़ीब व सकाफ़त की शनाख़्त रही हैं।
सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 24 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन
Team Islamic Theology

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