सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु
[तहरीर नंबर 22]
23. सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ख़िलाफ़त के सबसे ज़्यादा मुस्तह़िक़ और मौज़ूँ थे
बिलाशुब्हा अबूबक्र, उ़मर और उ़स़्मान रज़ियल्लाहु अन्हुमा के बाद अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ही ख़िलाफ़त के सबसे ज़्यादा मुस्तह़िक़ थे, अहले सुन्नत वल जमाअ़त का यही अ़क़ीदा है और ख़िलाफ़ते राशिदा की तर्तीब शुमार करते हुए तमाम मुसलमानों को यही अक़ीदा रखना चाहिए, और अल्लाह से सवाब की उम्मीद लगानी चाहिए। ऐसे बहुत से शरई नुस़ूस़ हैं जिनमें अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त के लिये सबसे ज़्यादा मुस्तह़िक़ मौज़ूॅं होने का इशारा मिलता है, उनमें से चंद हैं :
1. अल्लाह तआ़ला का इर्शाद है :
وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنْكُمْ وَعَمِلُوا الصَّلِحَتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ فِي الْأَرْضِ كَمَا اسْتَخْلَفَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُمْ دِينَهُمُ الَّذِي ارْتَضَى لَهُمْ وَلَيُبَدِّلَنَّهُمْ مِنْ بَعْدِ خَوْفِهِمْ اَمْنًا يَعْبُدُونَنِي لَا يُشْرِكُونَ بِي شَيْئًا وَمَنْ كَفَرَ بَعْدَ ذَلِكَ فَأُولَئِكَ هُمُ الْفَسِقُونَ
अल्लाह ने उन लोगों से जो तुममें से ईमान लाए और उन्होंने नेक आ़माल किये, वादा किया है कि वोह उन्हें ज़मीन में ज़रूर ही जानशीन बनाएगा, जिस तरह उन लोगों को जानशीन बनाया जो इनसे पहले थे और इनके लिये इनके उस दीन को ज़रूर ही इक्तिदार देगा जिसे उसने इनके लिये पसन्द किया है और हर स़ूरत इन्हें इनके ख़ौफ़ के बाद बदलकर अम्न देगा। [सूरह नूर : 55]
इस आयते करीमा से अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के इस्तिह़क़ाक़े ख़िलाफ़त पर इस तरह इस्तिदलाला किया गया है कि आप मंस़बे ख़िलाफ़त सम्भालने के बाद उन ख़ुलफ़ा में से एक साबित हुए जिनके लिये अल्लाह तआ़ला ने उनके दीन को ग़ालिब किया। .
2. रसूले अकरम ﷺ का इर्शाद है :
तुम लोग मेरी सुन्नत और मेरे बाद हिदायतयाफ़्ता ख़ुलफ़ाए राशिदीन के त़रीके़ को लाज़िम पकड़ो, उसे मज़बूती से थाम लो, और दाढ़ के दाँतों से जकड़ लो। [सुनन अबूदाऊद: 4/201, सुनन तिर्मिज़ी: 5/44; हसन सही]
इस हदीस में ख़िलाफ़ते अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के इस्तिहक़ाक़ की दलील ये है कि आप उन हिदायत याफ़्ता ख़ुलफ़ाए राशिदीन में से एक साबित हुए जिन्होंने अम्र बिल्मारूफ़ और नही अ़निल मुंकर का पूरा पूरा एहतिमाम किया। अल्लाह के ह़ुदूद की हिफ़ाज़त की, नमाज़ व ज़कात के निज़ाम को क़ायम किया और अ़दलो ह़क़ की बरतरी व क़याम के लिये सीरते रसूल ﷺ को नमूना बनाया।
3. नबी ﷺ का इर्शाद है :
ख़िलाफ़त अ़ला मिन्हाजिन नुबुव्वत की मुद्दत तीस साल है फिर अल्लाह तआ़ला जिसे चाहेगा बादशाहत देगा। [सहीह इब्ने हिब्बान: 6657; अल्मुअ़जमुल अल्कबीर/अत्तब्रानी : 6442; अस्सिलसिलातुस़्स़हीहा : 1/742-749]
इस हदीस में भी अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के इस्तिह़क़ाक़े ख़िलाफ़त की तरफ इशारा मिलता है, क्यों कि ख़िलाफ़त अला मिन्हाजन् नुबुव्व की जो मुद्दत नबी करीम ﷺ ने मुकर्रर की है इस ऐतिबार से हिजरते नबवी की तीसरी दहाई के अख़ीर में आपकी ख़िलाफ़त मुनअ़क़िद हुई। अहले इल्म का क़ौल इस ह़दीस के मुताबिक़ है। [अ़क़ीदतु अहलिस्सुन्नतु वल जमाअ़त: 2/686]
चुनाँचे इमाम अहमद बिन हंबल रहमतुल्लाह अलैह ने फ़र्माया: ख़िलाफ़त अला मिन्हाजन् नुबुव्वह् के बारे में सफ़ीना रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी हदीस सही है, और खुलफ़ा की मुद्दते ख़िलाफ़त के बारे में मेरा इसी तरफ़ रुझान है। [अस्सुत्रा/अब्दुल्लाह इब्ने हंबल, पेज 235]
अब्दुल्लाह बिन अहमद का क़ौल है कि मैंने अपने बाप से कहा कि कुछ लोग अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु को ख़लीफ़ा नहीं मानते? इमाम अहमद बिन हंबल ने जवाब दिया : ये बहुत बुरी और घटिया बात है, रसूल ﷺ के सहाबा उनको ऐ अमीरुल मोमिनीन! कहकर पुकारते थे, क्या हम उन तमाम सहाबा को झुठला दें, जबकि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने हज्ज की इमारत की, चोर का हाथ काटा और शादीशुदा ज़ानी को रजम किया, ये सब ख़लीफ़ा ही के फ़राइज़ हैं, आम आदमियों के नहीं। [अस्सुन्ना/अब्दुल्लाह बिन अहमद बिन हंबल पेज 235]
इमाम इब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैह सफ़ीना की इस हदीस के बारे में लिखते हैं: ह़म्माद बिन सलमा, अ़ब्दुल वारिस बिन सईद' और अ़व्वाम बिन हौ़शब की रिवायत से ये हदीस मशहूर है। उन सबने इस हदीस को सईद बिन जहमान के वास्ते़ से रसूलुल्लाह ﷺ के गुलाम सफ़ीना रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है और अबू दाऊद वग़ैरह इसकी रिवायत की है और चारों खुलफ़ाए राशिदीन की ख़िलाफ़त के इस्बात में इमाम अहमद वग़ैरह ने इस हदीस पर ऐतिमाद किया है और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की शख़्सि़यत के सिलसिले में लोगों के इख़्तिलाफ़ की वजह से उनकी ख़िलाफ़त तस्लीम न करने वालों के ख़िलाफ़ इस हदीस से ह़ुज्जत क़ायम की है और कहा है कि जो शख़्स अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु को चौथा ख़लीफ़ा न माने वोह अपने घर के गधे से भी ज़्यादा गुमराह है, और आपने ऐसे शख़्स से निकाह़ो मुनाकिह़त से मना किया है। (ये किताबचा इमाम साहब के हाथों का मसौदा है जो फ़िल्हाल मक्तबा ज़ाहिरिया में मौजूद है। [बह़वाला अक़ीदतु अहलिस्सुन्नतु वल जमाअ़त : 2/286; नीज़ देखिए : अस्सहीहतु लिल्अल्बानी : 1/744; मुतर्जिम]
इमाम अबू जाफ़र अन्त़ह़ावी ह़नफ़ी की किताब 'अल्अ़क़ीदतुत्त़ह़ाविया' के शारेह़ लिखते हैं: उ़स़्मान रज़ियल्लाहु अन्हुमा के बाद हम अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त साबित करते हैं, क्योंकि जब उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु शहीद कर दिये गए और लोगों ने आपके हाथों पर बैअ़ते ख़िलाफ़त कर ली, तो आप यक़ीनन शरई इमाम मुंतख़ब हो गए, और आपकी इताअ़त वाजिब हो गई, आप भी बहैसियत ख़लीफ़ा ख़िलाफ़त अला मिन्हाजन् नुबुव्व की एक कड़ी थे, जैसे कि सफ़ीना की हदीस में है कि नबी करीम ﷺ ने फ़र्माया : ख़िलाफ़त अ़ला मिन्हाजन् नुबुव्वह् की मुद्दत तीस साल है, फिर अल्लाह तआ़ला जिसे चाहेगा बादशाहत देगा।" [अस् सिलसिलतुम् सहीहा: 742, 749]
4. इक्रिमा का बयान है कि इब़्ने अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने मुझसे और साहबज़ादे अ़ली से फ़र्माया तुम दोनों अबू सईद के पास जाओ और उनकी अ़हादीस सुनो, चुनाँचे हम दोनों उनके पास गए, देखा तो वोह अपने बाग़ में काम कर रहे थे, हमें देखकर उन्होंने अपनी चादर सम्भाली और गोट मारकर बैठ गए, फिर हमसे हदीस बयान करने लगे, जब मस्जिदे नबवी की तामीर का तज़्किरा हुआ, वोह कहने लगे : हम लोग एक एक ईंट उठा रहे थे और अम्मार दो दो ईंटें उठा रहे थे, नबी करीम ﷺ ने उनको देखा तो उनके जिस्म से धूल मिट्टी झाड़ने लगे और फ़र्माया: “अफ़सोस! अम्मार को एक बाग़ी जमाअ़त क़त्ल करेगी, जिसे अम्मार जन्नत की दावत देंगे और वोह जमाअ़त अम्मार को जहन्नम की दावत दे रही होगी।" (वैह़ : कलिमए तरह़म है, अगर कोई शख़्स बिला वजह हलाकत का शिकार हो जाए तो वहाँ बतौर दुआ़ए रहमत उसके लिये ये कलिमा बोला जाता है। [देखिए ग़रीबुल ह़दीस/इब्नुल जौज़ी : 2/486, लत़ाइफ़फ़ी ग़रीबिल हूदीस: 4/85; अन् निहाया : 5/235]
अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु ने बयान किया कि अम्मार रज़ियल्लाहु अन्हु कह रहे थे कि “अउ़ज़ुबिल्लाहि मिनल फ़ित्न' में फ़ित्नों से अल्लाह की पनाह माँगता हूँ।" [सहीह बुखारी: 447]
और सही मुस्लिम की रिवायत में अबू सईद खुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि जिस वक्त ख़ंदक़ खोद रहे थे और आप ﷺ उनके सर से मिट्टी झाड़ रहे थे और फ़र्मा रहे थे : “ऐ सुमय्या के बेटे! अफ़सोस तुम्हारी ख़स्ता हालत और मज़्लूमियत पर कि तुम्हें एक बाग़ी जमाअ़त क़त्ल करेगी।" [सहीह मुस्लिम: 2235]
इमाम इब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैह नबी करीम ﷺ की पेशीनगोई 'तक्तुल अ़म्मारन अल् फ़िअ़तुल बाग़िया' [सहीह मुस्लिम: 2235]
ज़िक्र करने के बाद फ़र्माते हैं: नबी करीम ﷺ का ये फ़र्माने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की इमामत की दुरुस्तगी और उनकी इत़ाअ़त के वुजूब की दलील है, जो शख़्स आपकी इत़ाअ़त की तरफ़ बुलाए, वोह जन्नत की तरफ़ बुला रहा है और जो शख़्स किसी को उनसे क़िताल पर उभारे, वोह जहन्नम की तरफ़ बुला रहा है। ख़्वाह वोह उसका इर्तिकाब किसी तावील के नतीजे में करे या बग़ैर तावील बग़ावत के त़ौर पर करे। हमारे अस़्ह़ाब व अस्लाफ़ के दो अक्क़ाल में सही तरीन क़ौल यही है कि जिन लोगों ने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से क़िताल किया उन्हें ग़लत़ी का मुर्तकिब क़रार दिया जाए यही उन अइम्मए फ़िक़्ह का भी मस्लक है जिन्होंने इसी वाक़िया को बुनियाद बनाकर ये मसला मुस्तम्बत़ किया है कि जो लोग तावील के नतीजे में हुक्काम व अइम्मतुल मुस्लिमीन से बग़ावत करें उनसे क़िताल करना जाइज़ हे। यही वज़ह है कि जब इमाम शाफेई रहमतुल्लाह अलैह ने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के त़र्ज़े अ़मल को बुनियाद बनाकर तावील के नतीजे में अइम्मतुल मुस्लिमीन से बग़ावत करने वालों से क़िताल करने का फ़त्वा दिया
तो यह़या बिन मईन ने इन पर ऐतिराज़ किया, और कहा: क्या त़लहा और ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु भी बागियों के ह़ुक्म में होंगे? लेकिन इमाम अहमद बिन हंबल रहमतुल्लाह अलैह ने यह़या बिन मईन के इस इश्काल की तर्दीद की और कहा : आप पर है़रत है! इस मक़ाम पर अगर इमाम शाफेई अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के मौक़िफ़ और उनके तूर्ज़े अमल की इक्तिदा न करते तो इसका ह़ल कहाँ ढूँढ़ते बिल्ख़ुस़ूस जबकि बाग़ियो से क़िताल के सिलसिले में उनके सामने ख़ुलफ़ाए राशिदीन में से और किसी की कोई सुन्नत मौजूद थी। फिर आगे चलकर इमाम इब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैह फ़र्माते हैं कि हालाँकि इमाम अहमद और अइम्मए सुन्नत में से किसी को इस बात में कोई तरद्दुद नहीं। [मज्मूउ़ल फ़्तावा : 4/437, 438]
हाँ अगर कोई ऐतिराज़ करे कि अ़म्मार रज़ियल्लाहु अन्हा की शहादत मअ़रकए स़िफ़्फ़ीन में हुई और वोह उस वक्त अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ थे जबकि उनके मुक़ाबले में मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु की जमाअ़त थी, जिसें सहाबा किराम भी शरीक थे, लिहाज़ा उनके बारे में ये कैसे कहा जा सकता है कि ये लोग जहन्नम की तरफ़ बुला रहे थे?
इसका जवाब ये है कि ये लोग अपने इल्म और इज्तिहाद के मुताबिक़ ये समझ रहे थे कि वोह फ़रीक़ मुख़ालिफ़ को जन्नत ही की तरफ़ बुला रहे हैं। अपने इल्मो इज्तिहाद के मुताबिक़ अ़मल पैरा होने में वोह क़ाबिले मलामत हर्गिज़ नहीं हो सकते और जन्नत की तरफ़ बुलाने से मुराद ये है कि वोह इस अमल की तरफ़ दावत दे रहे थे जो दुख़ूले जन्नत का सबब था यानी इमाम की इताअ़त। अ़म्मार रज़ियल्लाहु अन्हु अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की इताअ़त की तरफ़ बुला रहे थे क्योंकि वही उस वक्त मुसलमानों के इमाम थे जिनकी इताअ़त वाजिब थी जबकि फ़रीके मुख़ालिफ़ का मामला इसके बरअ़क्स था, लेकिन चूँकि ये लोग अपने इज्तिहादे तावील की बिना पर ऐसा कर रहे थे इसलिए माज़ूर समझे जाएँगे उन पर कोई मलामत नहीं। [फ़त्हुल बारी: 1/542]
5. अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़र्माया: "जब मुसलमानों में पड़ जाने के वक्त एक फ़िर्का निकलेगा उसे दोनों में से जो हक़ से ज़्यादा क़रीब होगा वही क़त्ल करेगा।"
दूसरी रिवायत के अल्फ़ाज़ इस तरह हैं: “मेरी उम्मत में दो गिरोह हो जाएँगे और उनमें से एक फ़िर्का निकलेगा, उसे वोह गिरोह क़त्ल करेगा जो हक़ से क़रीबतर होगा।" [सहीह मुस्लिम: 151]
तीसरी रिवायत के अल्फ़ाज़ हैं: “जब लोगों में फूट हो जाएगी तो एक फ़िर्क़ा निकलेगा, उसे दोनों गिरोहों में जो हक़ से क़रीबतर होगा वही क़त्ल करेगा।"
चौथी रिवायत के अल्फ़ाज़ ये हैं: "वोह इख़्तिलाफ़ के वक्त निकलेंगे, उन्हें वोह जमाअ़त क़त्ल करेगी जो दोनों में से हक़ से ज़्यादा क़रीब होगी।" [सहीह मुस्लिम/अज़्ज़कात/बांब 47 1064), 150-153]
इन रिवायात के अन्दर औलत्तइफ़तैनि मिनल ह़क़्क़ि (उन दोनों गिरोहों में से जो हक़ से क़रीबतर होगा) जिससे वाज़ेह है कि यहाँ एक को हक़ दूसरे को बातिल नहीं कहा गया है इसलिए त़रफ़ैन में से किसी को हदफ़े मलामत नहीं बनाया जा सकता है, सिर्फ़ अक़्रब व क़रीब का फ़र्क़ है। मुतर्जिम)
इन तमाम अहादीस में नबी करीम ﷺ ने मुसललमानों की जमाअ़त से ख़ुरूज करने वाले फ़िर्क़े के ज़ुहूर का वक्त ये बताया कि उस वक्त मुसलमानों में इख़्तिलाफ़ रूनुमा होगा और उस इख़्तिलाफ़ से मुराद अ़ली व मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के दरम्यान वाक़ेअ होने वाला इख़्तिलाफ़ है। [शरहून् नववी अला सहीहुन मुस्लिम: 7/166] और जो फ़िर्क़ उस जमाअ़त से सबसे पहले अलग हुआ वोह अहले नहरवान का था जो कि मअ़रकए सिफ़्फ़ीन के जंग में अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के लश्कर में शामि थे, लेकिन जब 'हकमैन' को फैसल मानने के लिये अ़ली और मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु बाहम मुत्तफ़िक़ हो गए तो अहले नहरवान ने ये कहते हुए बग़ावत का ऐलान कर दिया कि अ़ली और मुआविया दोनों ने ही कुफ़्र की तरफ़ सब्क़त की है, मुआ़विया का कुफ़्र ये है कि उन्होंने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से क़िताल किया, और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का कुफ़्र ये है कि तह़कीम को क़ुबूल कर लिया, और फिर उन्हों ने त़लहा और ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु की भी तक्फ़ीर की, चुनाँचे उन ख़वारिज से अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने जंग की और कैफ़रे किरदार तक पहुँचाया पस नबवी पेशीनगोई की रोशनी में ख़वारिज से जंग करने वाली अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की जमाअत ही हक़ से क़रीब तरीन थी, गोया अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु और आपके साथियों के बरहक़ होने की ये नबवी शहादत है और ये आपका मौजिज़ा रहा क्योंकि आपकी पेशीनगोई के मुताबिक़ ह़र्फ़ ब ह़र्फ़ वाक़िया इसी तरह पेश आया। पस तमाम क़राइन व दलाइल इस बात की वज़ाह़त करते हैं कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त सही थी और उनकी मुखालिफ़त करने वाले ग़लती पर थे। [अक़ीदतु अहलिस्सुन्नतु वल जमाअ़त : 2/683]
यहाँ ये हक़ीक़त वाज़ेह रहे कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की खिलाफ़त पर किसी को ऐतिराज़ नहीं था, मुआ़विया, ज़ुबैर, त़लहा और उम्मुल मोमिनीन आ़इशा रज़ियल्लाहु अन्हा आपकी ख़िलाफ़त के मुखालिफ़ न थे, बल्कि वोह इख़्तिलाफ़ जो रूनुमा हुआ वोह क़ातिलीने उ़स्मान से क़िसास लेने का मसला था ये हज़रात ख़लीफ़ए वक्त से क़ातिलीने उ़स़्मान पर निफ़ाज़ो क़िसास का मुतालबा कर रहे थे और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु उसके फ़ौरी निफ़ाज़ को सूरतेहाल के पेशेनज़र मस्लिह़त के ख़िलाफ़ समझ रहे थे। क़ातिलीने उ़स़्मान आपके परचम तले जमा थे और उम्मते इस्लामिया का शीराज़ा मुंतशिर करने में लगे थे। सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु सूरतेहाल से बखूबी वाक़िफ़ थे और आपको निफ़ाज़ क़िसास का इम्कान नज़र न आ रहा था। और ये क़ातिलीने उ़स़्मान ही थे जिन्हों ने अपने बचाव के लिये दोनों जमाअतों को आपस में टकरा दिया वरना दोनों का दावा एक ही था। रसूलुल्लाह ﷺ का इर्शाद है: "क़ियामत उस वक्त तक क़ायम न होगी जब तक मुसलमानों की दो अज़ीम जमाअ़तें क़िताल न करें, दोनों के माबैन अज़ीम जंग होगी और उन दोनों का दावा एक होगा।" [मुस्लिम फ़िल् फ़ित्न: 157]
सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 22 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन
Team Islamic Theology

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