सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु
[तहरीर नंबर 21]
23. अज़्मते सहाबा का बयान क़ुरआन में
अल्लाह तआ़ला का इर्शाद है:
مُّحَمَّدٌ رَّسُولُ اللَّهِ ۚ وَالَّذِينَ مَعَهُ أَشِدَّاءُ عَلَى الْكُفَّارِ رُحَمَاءُ بَيْنَهُمْ ۖ تَرَاهُمْ رُكَّعًا سُجَّدًا يَبْتَغُونَ فَضْلًا مِّنَ اللَّهِ وَرِضْوَانًا ۖ سِيمَاهُمْ فِي وُجُوهِهِم مِّنْ أَثَرِ السُّجُودِ ۚ ذَٰلِكَ مَثَلُهُمْ فِي التَّوْرَاةِ ۚ وَمَثَلُهُمْ فِي الْإِنجِيلِ كَزَرْعٍ أَخْرَجَ شَطْأَهُ فَآزَرَهُ فَاسْتَغْلَظَ فَاسْتَوَىٰ عَلَىٰ سُوقِهِ يُعْجِبُ الزُّرَّاعَ لِيَغِيظَ بِهِمُ الْكُفَّارَ ۗ وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ مِنْهُم مَّغْفِرَةً وَأَجْرًا عَظِيمًا
"मुह़म्मद ﷺ अल्लाह के रसूल है और वोह लोग जो उसके साथ हैं काफ़िरों पर बहुत सख़्त हैं, आपस में निहायत रहमदिल हैं, तू उन्हें इस ह़ाल में देखेगा कि रुकूअ़ करने वाले हैं, सज्दे करने वाले हैं, अपने रब का फ़ज़्ल और (उसकी) रज़ा ढूँढ़ते हैं, उनकी शिनाख़्त उनके चेहरों में (मौजूद) है, सज्दे करने के असर है। ये उनका वस्फ़़ तौरात में है और इंजील में उनका वस़्फ़ उस खेती की तरह है जिसने अपनी कौंपल निकाली, फिर उसे मज़बूत किया, फिर वोह मोटी हुई, फिर अपने तने पर सीधी खड़ी हो गई, काश्त करने वालों को ख़ुश करती है, ताकि वोह उनके ज़रिये काफ़िरों को ग़ुस़्स़ा दलाए, अल्लाह ने उन लोगों से जो उनमें से ईमान लाए और उन्होंने नेक आ़माल किये बड़ी बख़्शिश और बहुत बड़े अज्र का वादा किया है।" [सूरह फ़तह़ : 29]
मैंने इस बह़स को मज़्कूरा आयते करीमा के साथ ख़त्म करना इसलिए मुनासिब समझा ताकि खुलफ़ाए राशिदीन और सहाबा किराम में बाहमी मुह़ब्बत, रहमत और तआ़वुन के ताल्लुक़ से मैंने जो कुछ ज़िक्र किया है उसकी सदाक़त की दलील बन सके। पस ये आयते करीमा अल्लाह की तरफ़ से मक़ामे रसूल ﷺ की अज़्मत व सताइश पर मुश्तमिल है, फिर दूसरे दर्जे में अल्लाह तआ़ला ने तमाम अस़्हाबे रसूल ﷺकी तारीफ़ की है और उनकी औसाफ़ को यूँ सराहा है कि वोह आपस में नर्म हैं, और कुफ़्फ़ार के लिये सख़्त हैं। (हो ह़ल्क़ाए याराँ तो बरेशम की तरह़ नर्म रज़्मे ह़क़ बात़िल हो तो फ़ौलाद है मोमिन (मुतर्जिम) उनमें बाहमी रह़मदिली और तआ़रुफ़ का जज़्बा भरा हुआ है, वोह इख़्लासे़ कामिल ओर पूरे यक़ीन के साथ आमाले स़ालेह़ा बजा लाते हैं, उन्हीं आमाले स़ालेह़ा में से नमाज़ है वोह अल्लाह की रज़ा और ख़ुशनुदी के लिये कसरत से नमाज़ें पढ़ते हैं, जिनकी अलामत उनके चेहरे पर नुमायाँ होती है :
سِيمَاهُمْ فِي وُجُوهِهِم مِّنْ أَثَرِ السُّجُودِ
उनकी शनाख़्त उनके चेहरों में (मौजूद) है, सज्दे करने के असर से। [सूरह फ़तह़ : 29]
हसन बस़री रहमतुल्लाह अलैह और सईद बिन जुबैर रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं और इब़्ने अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु की भी रिवायत में इसकी तफ़्सीर ये है कि नमाज़ियो की पेशानी पर सफ़ेद चमक होगी जो क़ियामत के दिन चमकेगी और इब़्ने अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु की दूसरी रिवायत और मुजाहिद से मरवी है कि ये निशान दुनिया ही में नज़र आता है, यानी अच्छी हैइयत व किरदार और मुजाहिद की एक रिवायत में है कि उनके अन्दर ख़ुशूअ़ व ख़ुज़ूअ़ पैदा हो जाती है। [तफ़्सीरुत्त़बरी: 26/110; नीज़ 16/393, 294]
मज़्कूरा अक्क़ाल में कोई इख़्तिलाफ़ नहीं, सिर्फ़ ताबीर व बयान का फ़र्क़ है, ऐसा मुम्किन है तवाज़ोअ़ व ख़ुशुअ़ के नतीजे में दुनिया में अच्छी हैइयत व किरदार के हामिल हों और आख़िरत में उनके पे शानियों पर नूर की चमक हो। [तफ़्सीरे त़बरी : 26/112]
हाफ़िज़ इब्ने कसीर रहमतुल्लाह अलैह फ़र्माते हैं : तमाम सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हु की निय्यतें ख़ालिस थीं, उनके आ़मालो किरदार नेक थे, जिसने भी उन पर निगाह डाली वोह उनके औस़ाफ़ व किरदार से मुतास्सिर हुए बग़ैर न रहा, इमाम मालिक रहमतुल्लाह अलैह फ़र्माते हैं कि मैंने सुना है कि जब मुल्के शाम के नसारा फ़ातेहीने शाम के सहाबा को देखते थे तो कहते थे : वल्लाह जैसा कि हमने सुना था, ये लोग यक़ीनन हमारे नबी के ह़वारियों से कहीं ज़्यादा अच्छे हैं। गुज़िश्ता आसमानी किताबों में इनकी अ़ज़्मत को सराहा गया है, फिर उनमें भी सबसे अज़ीम और अफ़ज़ल वोह लोग हैं जो मुह़म्मद रसूलल्लाह ﷺ के सहाबा हैं। तमाम आसमानी किताबों में और मुतदाविल मज़हबी रिवायात में अल्लाह की तरफ़ से उन लोगों के ह़क़ में ज़िक्रे ख़ैर मिलता है, इसलिए अल्लाह तआ़ला से यहाँ फ़र्माया, (ज़ालिक मिस्लुहुम फ़ित्तौरात) उनकी यही मिसाल तौरात में है, फिर आगे फ़र्माया (व मसलुहुम फ़िल् इंजील, कज़र्अ़न अख़्रज शत़्अहू) और उनकी मिसाल इंजील में है मिस्ल उस खेती के जिसने अपनी कौंपल निकाली, फिर उसे मज़बूत किया, (फ़स्तग़्लज़) और वोह मोटा हो गई (फ़स्तवा अ़ला सूक़िही युअ़जिबुज़्जुर्राअ़) फिर अपने तने पर सीधाः खड़ा हो गया और किसानों को ख़ुश करने लगा (लि यग़ीज़ बिहिमुल् कुफ़्फ़ार) ताकि उनकी वजह से काफ़िरों को चिड़ाए। इमाम मालिक रहमतुल्लाह अलैह एक रिवायत के मुत़ाबिक़ इस आयते करीमा से रवाफ़िज़ की तक्फ़ीर का फ़त्वा मुस्तम्बत़ किया है। फ़र्माते हैं कि काफ़िरों के कुफ़्र की वजह है कि वोह सहाबा को देखकर चिड़ते हैं, लिहाज़ा जो शख़्स़ भी उन सहाबा से चिड़ खाए वोह इस आयत की रोशनी में बहरह़ाल काफ़िर है, उलमा की एक जमाअ़त ने भी इमाम मालिक के इस फ़त्वे की ताईद की है। आगे अल्लाह ने फ़र्माया:
وَعَدَ اللهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَتِ مِنْهُمْ مَّغْفِرَةً وَ اَجْرًا عَظِيمًا
यानी अल्लाह ने ईमान वालों और अ़मले स़ालेह़ वालों से बड़े सवाब और बाइज़्ज़त रोज़ी का वादा किया है। और अल्लाह का वादा ह़क़ और सच है जिसके ख़िलाफ़ हर्गिज़ नहीं हो सकता है, न उसमें तब्दीली मुम्किन है, लिहाज़ा जो शख़्स भी सहाबा के मन्हज व त़र्ज़े ज़िन्दगी को अपनाएगा वोह उन इलाही इन्आ़मात के इस्तिह़क़ाक़ के लिये उन्हीं के हुक्म में है, उन सहाबा को अफ़ज़लियत, अस्बक़ियत और कमाल का वोह मक़ाम मिला है जहाँ तक उनके अलावा इस उम्मत के किसी फ़र्द की रसाई नहीं है, अल्लाह उनसे राज़ी हुआ और फ़िरदौस की जन्नतों को उनका ठिकाना बनाए। [तफ़्सीर इब्ने कसीर : 6/365]
और सहाबा किराम के बारे में अल्लाह का जो ये फर्मान है कि (लि यग़ीज़ बिहिमुल कुफ़्फ़ार) ताकि उनकी वजह से काफ़िरों को चिड़ाए, तो इसमें बहुत ही ख़तरनाक हुक्म पोशीदा है और जो लोग अस्हाबे रसूल को देखकर, या सुनकर ख़ार खाते और चिड़ते हैं उनके लिये सख़्त तरीन वईद व हलाकत आमीज़ धमकी है। मज़्कूरा आयत के इख़्तिताम पर अल्लाह ने :
وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَتِ مِنْهُمْ مَغْفِرَةٌ وَأَجْرًا عَظِيمًا
फ़र्माकर तमाम सहाबा से जन्नत का वादा किया और उम्मते इजाबत मे से जो इन्सान भी ईमान व अ़मले स़ालेह़ की जिन्दगी गुज़ारे उससे भी यही वादा किया। यह हुक्म कियामत तक आने वाले तमाम मोमिनों के लिये है। [अक़ीदतु अहलुस् सुन्नतु मिनस़्स़हा़बति : 1/76]
इस आयते करीमा में 'मिन्हुम' मिन बयान जिन्स के लिये है, यानी तमाम ईमान वालों और अ़मले स़ालेह़ वालों से यही वादा है, 'मिन' तब्ई़ज़ के लिये नहीं है कि जिसका मतलब होगा उनमें से सिर्फ़ बाज़ ईमान वालों और अ़मले स़ालेह़ वालों से ये वादा है।
इमाम इब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैह फ़र्माते हैं: यक़ीनन इस आयत में अस़्हाबे रसूल का तज़्किरा जिन स़िफ़ात के साथ हुआ है, उनकी बहुत बड़ी मदह़ व सताइश है उनके औसाफ़े ह़मीदा ये हैं कि काफ़िरों के लिये सख्त, आपस में रह़मत व मुहब्बत का नमूना हैं। उनके यहाँ रुकूअ़ व सुजूद की कसरत है, अल्लाह के फ़ज़्लो रज़ामंदी की जुस्तजू है, चेहरों पर सज्दों के निशानात हैं, जिस तरह खेती दर्जा बदर्जा अपनी कौंपल निकालती है फिर उसमें मज़बूती आती है, फिर मोटा होती है, फिर तने पर सीधी खड़ी होती है, इसी तरह सहाबा और मोमिनीन भी दर्जा बदर्जा, कमज़ोरी, फिर कमाल कुव्वत, और फिर ऐतिदााल के मरातिब नै करते हैं, ताहम ये वाज़ेह रहे कि सिर्फ़ इन सिफ़ात पर मग़्फ़िरत और अ़ज्रे अज़ीम का दारोमदार नहीं है, बल्कि उनके साथ ईमान और अ़मले स़ालेह़ भी ज़रूरी है, और चूँकि मग़्फ़िरत और अ़ज्रे अज़ीम के वादा की तक्मील के लिये ये दोनों ज़रूरी थे उनको ज़िक्र किया अगरचे तमाम सहाबा इससे मुत्तसिफ़ भी थे फिर भी उसे इसलिए अलग से ज़िक्र किया गया ताकि किसी को ये वहम न हो जाए कि सिर्फ़ मज़्कूरा औसाफ़े हमीदा ही नजात के लिये काफ़ी हैं, शुरू आयात सिर्फ़ औसाफ़, आख़िर में अ़ज्रे अज़ीम के बदले का ज़िक्र हुआ था, लेकिन इस बदले का असली सबब किया था उसका ज़िक्र नहीं हुआ था, पस ईमान और अ़मले स़ालेह़ को ज़िक्र करके उसे इज्माल को वाज़ेहू कर दिया गया, क्योकि उसूली क़ायदे के ऐतिबार से जब कोई हुक्म किसी ऐसे इस्मे मुश्तक़ पर मुंह़स़िर हो जो सियाक़ो सबाक़ के मुनासिब हो तो जिस कलिमे से इस इस्म का इश्तिक़ाक़ हुआ है वही हुक्म का सबब होता है। [मिन्हाजुस्सुन्ना : 1/158]
मैंने सहाबा किराम के दरम्यान मेल मुह़ब्बत और उख़ुव्वत व हमदर्दी, कुफ़्फ़ार के लिये सख़्ती और खुस़ुस़न ख़ुलफ़ाए राशिदीन के आपस में गहरे ताल्लुक़ात और खैरख़्वाही के जज़्बात के ताल्लुक़ से जो कुछ ज़िक्र किया है, वोह मुकम्मल तौर से क़ुरआनी तौज़ीह व बयान के मुताबिक़ हैं, बिला शुब्हा ये खुलफ़ा सहाबा इन्तिहाई मुअज़्ज़ज़ व शरीफ़ थे, पूरी उम्मत के दिमाग़ थे, नबी करीम ﷺ के वफ़ात के बाद उसके बेमिसाल क़ाइद थे, लिहाज़ा बाहौश! ख़बरदार! इन ज़ईफ रिवायात और झूठे क़िस्सों व खुराफ़ात से जिन्हें दुश्मनाने इस्लाम ने इस्लाम की इब्तिदाई रोशन तारीख़ के चेहरे को मस्ख़ करने के लिये गढ़ा है और रिवाज दिया है। क्या हम उन झूठी रिवायात और वाही तबाही क़िस्सों की तस्दीक़ करेंगे, जो खुलफ़ाए राशिदीन में बाहमी चिपक़लिश और अ़दावत का तस़व्वुर पेश करती हैं या अपने रब की किताब क़ुरआन मजीद की तस़्दीक़ करेंगे और अ़ज़्मते सहाबा की शान में हमारे नबी करीम ﷺ ने जो कुछ फ़र्माया है उसे मानेंगे और अहले सुन्नत वल जमाअ़त के सिक़ा व मुस्तनद उलेमा ने क़ुरआनो सुन्नत की रोशनी में उनकी जो तस्वीरकशी की है उसे तस्लीम करेंगे? अल्लाह तआ़ला का इर्शाद है :
وَأَلَّفَ بَيْنَ قُلُوبِهِمْ ۚ لَوْ أَنفَقْتَ مَا فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا مَا أَلَّفْتَ بَيْنَ قُلُوبِهِمْ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ أَلَّفَ بَيْنَهُمْ ۚ إِنَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ
"और उनके दिलों के दरम्यान उल्फ़त डाल दी, अगर तू ज़मीन में जो कुछ है सब ख़र्च कर देता उनके दिलों के दरम्यान उल्फ़त न डालता और लेकिन अल्लाह ने उनके दरम्यान उल्फ़त डाल दी। बेशक वोह सब पर ग़ालिब, कमाल हिक्मत वाला है। [सूरह अन्फ़ाल : 63]
सहाबा किराम की ह़क़ीक़ी बाहमी उल्फ़त व मुहब्बत की ये क़ुरआनी तौज़ीह व तौसीक़ है उस पाक नफ़्स जमाअ़त के लिये ये रब्बानी तोहफ़ा और इलाही इन्आम है, इसमे किसी इन्सान की कोई मुदाख़लत नहीं पस क़ुरआनी तौसीफ़ व बयान के बमौजिब रसूल ﷺ पर भी एक अज़ीम एहसान है, सहाबा किराम की अज़्मत व शाम इम्तियाज़ी की ये क़ुरआनी तश्वीरकशी इन सहीह रिवायात से मुकम्मल तौर पर मेल खाती है जिनमें सहाबा की आपसी मुहब्बत व उल्फ़त को सराहा गया है और इसी साफ़ शफ़्फ़ाफ़ व हक़ीक़ी आइना में वोह दागदार चेहरे नुमायाँ नज़र आते हैं जिन्होंने ख़ुदसाख़्ता रिवायात और बेबुनियाद वाक़ियात का प्रोपेगण्डा किया है। बहरह़ाल ये आयते करीमा उन तमाम लोगों की फ़ज़ीलत व बरतरी पर शाहिद है जो क़ुरआनी तालीमात और सुन्नते नबविया के साँचे में अपनी ज़िन्दगी को ढालते हैं, इब्ने अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़र्माया, रिश्तों की क़राबत कट सकती है और मुह़सिन की एहसान फ़रामोशी हो सकती है, लेकिन हक़ीक़ी बुनियादों पर दिल मिल जाने के बाद मैंने उसे कटते नहीं देखा। [अद्दुर्रुल मंसूर फ़ी तफ़्सीरिल मअसूर : 4/100]
इब्ने अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़र्माया, रिश्तों की क़राबत कट सकती है और मुह़सिन की एहसान फ़रामोशी हो सकती है, लेकिन हक़ीक़ी बुनियादों पर दिल मिल जाने के बाद मैंने उसे कटते नहीं देखा। [अद्दुर्रुल मंसूर फ़ी तफ़्सीरिल मअसूर : 4/100]
सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 21 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन
Team Islamic Theology

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