सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु
[तहरीर नंबर 19]
21. अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का झगड़ा और उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु का फैसला :
मालिक बिन औस का बयान है कि मैं ठीक दोपहर के वक्त अपने घरवालो के साथ बैठा था, उस वक्त उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु का फ़रिस्तादा आया और कहा कि आपको अमीरुल मोमिनीन ने बुलाया है, मैं उसके साथ चलकर उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु के पास आया, देखा तो आप चारपाई के सरहाने बैठे हुए थे उस पर कोई बिस्तर वग़ैरह न था, चमड़े की तकिया पर टेक लगाए थे, मैं सलाम करके आपके पास बैठ गया,
आपने कहा : ऐ मालिक! मेरे पास तुम्हारे घराने के लोग आए हैं, मैंने उन्हें कुछ माल देने के लिये कहा है, लिहाज़ा तुम माल लेकर उनमें तक़्सीम कर दो,
मैंने कहा : ऐ अमीरुल मोमिनीन! अगर मेरी जगह दूसरे को इस काम के लिये मुकल्लफ़ कर दें तो बेहतर होगा,
आपने कहा : ऐ अल्लाह के बन्दे इसे लो और तक़्सीम करो। इतने में आपका दरबान 'यरफ़ा' आ पहुँचा और कहा कि उ़स्मान, अब्दुर्रहमान बिन औ़फ़, ज़ुबैर और सअ़द बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हुमा आपसे मिलना चाहते हैं, क्या उन्हें इजाज़त देते हैं?
आपने फ़र्माया, हाँ आने दो,
सब अन्दर आए, सलाम किया और बैठ गए, यरफ़ा भी थोड़ी देर बैठा, फिर कहने लगा कि! अ़ली और अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु भी मिलना चाहते हैं, क्या उन्हें भी इजाज़त है?
आपने फ़र्माया : हाँ! आने दो, वोह दोनों अन्दर आए, सलाम किया और बैठ गए,
अ़ब्बास ने कहा : ऐ अमीरुल मोमिनीन! मेरे और उन अ़ली के दरम्यान फ़ैसला कर दीजिए, दरअसल उन दोनों का झगड़ा उस माले फ़ै के लिये था जो रसूलुल्लाह ﷺ को बनू नज़ीर से मिला था,
चुनाँचे उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ जो लोग आए थे उन्हों ने कहा : ऐ अमीरुल मोमिनीन! उन दोनों का फ़ैसला करके मामला ख़त्म कर दीजिए,
सय्यदना उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़र्माया : आप लोग इत्मिनान रखें, मैं तुमसे अल्लाह वाहिद का वास्ता देकर पूछता हूँ जिसके हुक्म से ज़मीनो आसमान क़ायम हैं, क्या तुम्हें अल्लाह के रसूल ﷺ का ये फर्मान याद है : (ला नुअरसु मा तरक्नाहु सदक़तुन) "हम अम्बिया का कोई वारिस नहीं होता, हम जो कुछ छोड़कर जाते हैं, वोह सदक़ा है।" आप ﷺ ख़ुद को मुराद ले रहे थे उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु की पूरी जमाअ़त ने इक़रार किया कि हाँ यक़ीनन आप ﷺ ने ये बात फर्माई है।
उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु ने फर्माया : अब मैं तुम्हें इस सिलसिले में फ़ैसला सुनाता हूँ, अल्लाह ने इस माले फ़ै का कुछ हिस्सा अपने रसूल ﷺ के लिये ख़ास कर दिया है, इसमें आपके अलावा किसी का हक़ नहीं बताया।
इर्शाद फ़र्माया :
وَمَا أَفَاءَ اللهُ عَلى رَسُولِهِ مِنْهُمْ فَمَا أَوْجَفْتُمْ عَلَيْهِ مِنْ خَيْلٍ وَلَا رِكَابٍ وَلَكِنَّ اللَّهَ يُسَلِّطُ رُسُلَهُ عَلَى مَنْ يَشَاءُ وَاللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
"और जो (माल) अल्लाह ने उनसे अपने रसूल पर लौटाया तो तुमने उस पर न कोई घोड़े दौड़ाए और न ऊँट और लेकिन अल्लाह अपने रसूलों को मुसल्लत़ कर देता है जिस पर चाहता है और अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है।" [सूरह ह़श्र : 6]
पस ये माल ख़ास रसूलुल्लाह ﷺ का हक़ था, वल्लाह आप ﷺ ने ये माल तुम्हारे अलावा दूसरों को नहीं दिया, न तुम पर दूसरों को तर्जीह़ दी, तुम्हीं को दिया, और तुम्हें मैं आम किया, यहाँ तक कि उसमें से इतना माल बच गया। और इस बाक़ी बचे माल से अल्लाह के रसूल अपने घराने का सालाना ख़र्च लेते थे, और इससे जो ज़ाइद़ होता था, अल्लाह के रास्ते में वक़्फ़ कर देते थे। अल्लाह के रसूल ﷺ ने पूरी ज़िन्दगी इसी पर अमल किया। मैं अल्लाह का वास्ता देकर आप लोगों से फिर पूछता हूँ, क्या आप लोगों को ये सब कुछ मालूम नहीं?
उन्होंने कहा : हाँ मालूम है, फिर अ़ली और अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से मुखातब होकर आपने यही बात कही कि तुम दोनों से अल्लाह का वास्ता देकर पूछता हूँ, क्या ये सब तुम जानते हो?
उन दोनों ने कहा : हाँ हम जानते हैं, उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु ने फिर फ़र्माया कि इसके बाद अल्लाह तआ़ला ने अपने नबी ﷺ को वफ़ात दे दिया।
फिर अबूबक्र ख़लीफ़ा हुए तो उन्होंने कहा : मैं रसूलुल्लाह ﷺ का ख़लीफ़ा हूँ, वल्लाह ! अबूबक्र ने उसे अपने क़ब्ज़े में रखा और उसमें जो कुछ रसूलुल्लाह ﷺ करते थे, उन्होंने भी वही किया, अल्लाह खूब जानता है कि अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु अपने अमल में सच्चे, नेक और हिदायतयाब और ह़क़ के ताबेअ़ थे, फिर अल्लाह ने अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु को भी वफ़ात दे दी और मैं अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु का ख़लीफ़ा हुआ, अपनी ख़िलाफ़त के इब्तिदाई दो साल तक मैं ने उसे अपने क़ब्ज़े में रखा और उसमें वही करता रहा जो रसूलुल्लाह ﷺ और अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने किया था। अल्लाह तआ़ला जानता है कि मैं सच्चा हूँ, हिदायत पर हूँ और ह़क़ के ताबेअ़ हूँ फिर तुम दोनों मेरे पास अपनी बात लेकर आए और दोनों का एक ही मामला और एक ही मुतालबा था। ऐ अ़ब्बास! मुझसे अपने भतीजे का ह़क़ माँगने आए और ये यानी अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु अपने ख़ुसर के माल से बीवी का हिस्सा लेने आए और मैंने तुम दोनों को बता दिया कि रसूल ﷺ ने फ़र्माया है : (ला नुअरसु मा तरक्नाहु सदक़तुन) “हम अम्बिया का कोई वारिस नहीं होता, हम जो कुछ छोड़कर जाते हैं, वोह सदक़ा है।"
फिर मैंने ये मुनासिब समझा कि इसे तुम्हारे हवाले कर दूँ तो मैंने तुमसे कहा: अगर तुम दोनों कहो तो इसे तुम्हें दे दूँ बशर्तेंकि तुम अल्लाह से ये अ़हदो पैमान करो कि इसमें वैसा ही तस़र्रुफ़ करोगे जिस तरह रसूले अकरम ﷺ, अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने और फिर मैंने अपनी दौरे ख़िलाफ़त में किया है, तुमने कहा कि वोह माल हमें दे दो, मैंने वोह माल तुम्हें इस शर्त पर दे दिया, मैं आप लोगों से ह़लफ़िया पूछना चाहता हूँ कि क्या मैंने वोह माल उन दोनों को दे दिया या नहीं?
सब लोगों ने कहा : हाँ,
फिर आप अ़ली और अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु की तरफ़ मुतवज्जा हुए और ह़ल्फ़िया इक़रार करवाया कि बताओ वोह माल मैंने तुम दोनों को दे दिया या नहीं?
उन दोनों ने कहा : हाँ।
आपने पूछा : तो क्या फिर मुझसे इसके अलावा फ़ैसला करवाना चाहते हो, अगर तुमसे उस माल का बन्दोबस्त नहीं हो सकता तो मुझको फिर दे दो, मैं तुम दोनों की तरफ़ से उसके लिये काफ़ी हूँ। [सहीह बुखारी : 3094; सहीह मुस्लिम : 1757]
सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 19 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन
Team Islamic Theology

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