Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 18)

Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu

सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु

[तहरीर नंबर 18]


20. उम्मे कुलसूम बिन्ते अ़ली से उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु का निकाह

सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु उ़मर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़्वाहिश पर फ़ातिमा बिन्ते रसूलुल्लाह ﷺ के बत़न से पैदाशुदा अपनी बेटी उम्मे कुलसूम का निकाह उनसे कर दिया और मह़ज़ उन पर ऐतिमादे कामिल, उनकी अज़्मतो शराफ़त और बेह़तरीन किरदारो सुलूक नीज़ आपस के गहरे और अच्छे ताल्लुक़ात और मुस्तह़कम व बाबरकत क़राबतदारियों की वजह से किया था और आज यही चीज़ मुअज़्ज़ज़ उम्मते मुस्लिमा के ह़ासिदों व दुश्मनों के दिलों को जला रही है और ये बात स़ख़्त नागवार गुज़र रही है।  

उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु के दिल में अहले बैत के लिये ऐसी ख़ुस़ूस़ी अक़ीदत व मुहब्बत थी जो दूसरों के लिये न थी, क्यों कि ये लोग रसूल ﷺ के क़राबतदार थे, और इसलिए भी कि आप ﷺ ने इनकी इज़्ज़तो तौक़ीर करने और इनके ह़ुकूक़ की देखभाल करने का हुक्म दिया था और यही वोह बुनियादी जज़्बा था जिसकी वजह से उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़ातिमा व अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की लख़्ते जिगर उम्मे कुलसूम को पैग़ामे निकाह दिया था और ये कहते हुए अपनी अक़ीदत का इज़्हार किया था "अल्लाह की क़सम ! उम्मे कुलसूम की ह़ुस्न स़ोह़बत का जितना मैं मुंतज़िर हूँ रूए ज़मीन पर कोई इस तरह मुंतज़िर नहीं है।" 

अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़र्माया: ठीक है मैंने उनका निकाह आपसे कर दिया, उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु खुशियों से झूमते हुए मुह़ाजिरीन के पास आए और कहा: मुझे शादी की मुबारकबाद दो! फिर कहने लगे कि उम्मे कुलसूम से मेरी शादी का असल सबब नबी करीम ﷺ की उस बशारत की तक्मील "क़ियामत के दिन कोई सबब और कोई नसब काम न आएगा, मगर वोह जिसका ताल्लुक़ नसब या सबब के ऐतिबार से मुझसे हो। मेरी दिली ख़्वाहिश थी कि मेरे और रसूल ﷺ के दरम्यान कोई सबबे ताल्लुक़ पैदा हो।" [इसकी सनद हसन है]

अल्मुस्तदरक हाकिम: 3/142; इमाम ज़हबी ने हाकिम का तआकुब करते हुए कहा है कि ये रिवायत मुन्क़त़अ़ है। हैशमी ने मज्मउ़ज़्ज़वाइद 9/173 में इस रिवायत को ज़िक्र किया है और कहा कि इसे त़ब्रानी ने म़ुअजम कबीर और मुअजम औसत में इख़्तिसार से रिवायत किया है। 

हसन बिन सहल के अलावा लक़बीह रावी सही बुखारी के रावी हैं, हसन भी तक़ा हैं लेकिन कुछ लोगों ने इन्हें ज़ईफ़ भी कहा है।) इस रिश्ते को तमाम मुअरिख़ीन और मुअल्लिफ़ीन अन्साब ने ह़त्ता कि शिया हज़रात के तमाम मुहद्दिसीन, फुक़्हा, मुनाज़िरीन और अइम्मए मासूमीन ने सच माना है। 

अ़ल्लामा एह़सान इलाही ज़हीर ने अपनी किताब 'अश्शीअ़तु वस्सुन्ना' में इस ताल्लुक़ से कई रिवायात नक़्ल की हैं। इसी तरह सुन्नी मुअर्रिखीन में से त़बरी तारीख़े त़बरी: 5/28, इब्ने कसीर अल बिदाया वन निहाया: 5/220,  ज़हबी तारीख़ुल् इस्लाम/अ़हदिल खुलफ़ाउर्राशिदीन/ज़हबी, पेज 166, इब्नुल जौज़ी अल्मुंतज़िम: 4/131, दय्यारे बकरी (तारीख़ुल ख़मीस बहवाला: ज़वाज उमर मिन उम्मे कुलसूम/अबू मआज़, पेज : 19, और क़ुतुबे तराजिम, अल्असाबा/इब्ने ह़जर पेज 276; अल्कुना व अस्माउन् निसाअ, के मुअल्लिफ़ीन में से इब्ने ह़जर (अल्असाबा/इब्ने हजर पेज 276; अल्कुना व अस्माउन् निसाअ) और इब्ने सअ़द (असदुल ग़ाबा: 7/425) वगैरह ने भी इस अक़्दे निकाह को ज़िक्र किया है।

बहरहाल उम्मे कुलसूम बिन्ते अली के बतन से उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु से एक बेटी जिसका नाम रुक़य्या और एक बेटा, जिसका नाम ज़ैद है पैदा हुए। क़ुतुबे सुनन में इनके मुताल्लिक़ रिवायत मिलती है कि एक मर्तबा रात में बनू अ़दी बिन कअ़ब का किसी से झगड़ा हो गया। ज़ैद बिन उ़मर उनमें सुलह कराने की ख़ातिर उनके पास गए, इत्तिफ़ाक़ से आपको भी उसमें गहरी चोट आ गई जिससे सर फट गया, और फ़ौरन आपकी वफ़ात हो गई, हादसे को देखकर आपकी माँ इस क़द्र रंजीदा हुईं कि बेहोश हो गईं और उसी आलम में उनकी भी वफ़ात हो गई, फिर उम्मे कुलसूम और उनके बेटे एक ही वक्त में दफ़न किये गए। अब्दुल्लाह बिन उ़मर बिन ख़ताब रज़ियल्लाहु अन्हु ने उनकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई, ह़सन बिन अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु ने उनको जनाज़ा पढ़ाने के लिये आगे बढ़ाया था और ख़ुद उनके मुक्तदी थे। [असदुल ग़ाबा: 7/425]


सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 18 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। 

जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन


Team Islamic Theology

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