सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु
[तहरीर नंबर 17]
19. 17 रमज़ान-यौमुल फुरक़ान (तारीखे-इस्लाम)
जंग-ए-बद्र के पहले के हालात : मुश्रिकीने मक्का ने जब मुस्लिमों को तरह-तरह से सताना शुरू किया और उन पर जुल्मों-सितम का पहाड़ तोड़े जाने लगे तो मुस्लिमों ने अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ मक्का से हिज़रत शुरू कर दी।लेकिन मुश्रिकीने मक्का ने हिज़रत के वक्त भी मज़लूम मुस्लिमों के खिलाफ़ ऐसी-ऐसी कार्रवाइयाँ की कि उन पर जवाबी हमला कर दिया जाता, लेकिन फिर भी मुस्लिमों ने सब्र का दामन नहीं छोड़ा। मुश्रिकीने मक्का यह देख और भी ज्यादा भड़क गये कि मुसलमान उनकी गिरफ्त से छूट कर जा रहे हैं। और उन्हें मदीना में सुकून की जगह मिल गई है।
चुनांचे उन्होंने मदीना के एक सरदार अब्दुल्लाह बिन उबैय (जो अभी तक खुल्लम खुल्ला मुश्रिक था) को एक धमकी भरा ख़त लिखा कि आप लोगों ने हमारे यहाँ के लोगों को पनाह दे रखी है, इसलिए हम अल्लाह की कसम खाकर कहते है कि या तो आप लोग उनसे लड़ाई कीजिए या फिर उन्हें मदीने से निकाल दीजिए या फिर हम अपने लाव-लश्कर के साथ तुम पर हमला कर देंगे और तुम्हारे जवानों को कत्ल कर देंगे, तुम्हारी औरतों की इज्जत पामाल कर देंगे। मुस्लिमों को भी यह कहला भेजा कि तुम यह मत सोच लेना कि मक्का से साफ़ बचकर निकल आए हो, हम यसरब (मदीना का पुराना नाम) ही पहुँच कर तुम्हारा सत्यानाश कर देंगे।
ऐसे खतरनाक हालात जो मुस्लिमों के लिए चैलेंज बने हुए थे और जिन से ज़ाहिर था कि मुश्रिकीन किसी तरह होश में आने वाले और अपनी शरकशी से बाज़ आने वाले नहीं थे तब अल्लाह तआला ने मुस्लिमों को जंग की इजाजत दे दी और यह आयत नाज़िल फ़रमाई,
"जिन लोगों से ( यानी मुस्लिमों से) जंग की जा रही है, उन्हें भी जंग की इजाज़त दी जाती है क्योंकि वो मज़लूम है और अल्लाह उनकी मदद पर क़ादिर है।"
यह इजाज़त महज़ जंग के लिए नहीं बल्कि उसका मक़सद बातिल का खात्मा और अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह की हुकूमत का क़याम था। चुनाँचे आप ﷺ ने इन हालात में दो मंसूबे इख्तियार किए:
1. जो क़बीले मदीना के आस-पास थे और वो जो मुल्के शाम के रास्ते पड़ते थे उनके साथ दोस्ती और जंग न करने का समझौता किया।
2. उन रास्तों पर जिन से मक्का वाले मुल्के शाम जाते हैं, गश्त करने के लिए छोटे-छोटे फौजी दस्ते भेजने शुरू किए ताकि मुश्रिकीने मक्का को उनकी बेजा दुश्मनी के खतरनाक नतीज़े से डराया जाए। जिससे मुश्िक अपनी अर्थव्यवस्था को खतरे में देख कर सुलह करने को तैयार हो जाए और वो जो मुस्लिमों के घरों में घुस कर उनके खात्मे का इरादा रखते हैं, अल्लाह के रास्ते में रुकावटें खड़ी कर रहे हैं, मक्का के कमज़ोर मुस्लिमों पर जो जुल्मो-सितम ढा रहे हैं उन सब से बाज़ आ जाए और मुसलमान पूरे अरब में अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाने के लिए आज़ाद हो जाएँ ।
चुनाँचे जमादिल ऊला सन 2 हिजरी, नवम्बर 623 ई. में रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने हमराह 200 मुहाजिरीन को लेकर एक फौजी मुहिम में रवाना हुए। आपका मक़सद कुरेश का एक काफ़ला था जो मुल्के शाम जा रहा था। आपको मालूम हुआ था कि यह मक्के से रवाना हो चुका है। आप ﷺ उसकी तलाश में जुल उशैरा तक पहुँचे, लेकिन आप के वहाँ पहुँचने से कई दिन पहले ही वह काफ़ला जा चुका था।
यही काफ़ला जब मुल्के शाम से पलट कर वापस मक्का वापस आने लगा तो आप ﷺ ने तल्वा बिन उबैदुल्लाह (रजि.) और सईद बिन ज़ैद ( रजि.) को उसके हालात का पता लगाने के लिए उत्तर दिशा की ओर रवाना किया। यह दोनों सहाबी मक़ामे हौरां तक तशरीफ़ ले गए और वहीं ठहरे रहे, जब अबू सुफ़्यान वहाँ से काफ़ला लेकर गुजरा तो यह दोनों मदीना की तरफ़ दौड़ पड़े और जाकर रसूलुल्लाह ﷺ को इसकी ख़बर दी। उस काफ़ले में मक्का वालों की बहुत सारी दौलत थी यानी 1000 ऊँट थे जिन पर कम-से-कम 50,000 दीना (262 किलो सोने) कीमत का सामान लदा हुआ था और उसकी हिफ़ाजत के लिए सिर्फ 40 आदमी ही थे। मदीना वालों के लिए यह बहुत ही सुनहरा मौका था, जबकि मक्का वालों के लिए इस माल से महरूमी बड़ी जबरदस्त फौजी, सियासी और माली नुक्सान की हैसियत रखती थी। इसलिए रसूलुल्लाह ﷺ ने ऐलान किया कि यह मक्का वालों का काफ़ला माल और दौलत लिए चला जा रहा है, उसके लिए निकल पड़ो, हो सकता है अल्लाह उसे बतौर ग़नीमत तुम्हारे हवाले कर दे । लेकिन आपने किसी पर भी रवानगी ज़रूरी क़रार नहीं दी बल्कि सबकी इच्छा पर छोड़ दिया क्योंकि उसके ऐलान के वक्त यह उम्मीद नही थी कि काफ़ला के बजाय लश्करे कुरैश के साथ मैदाने बद्र में निहायत पुरजोश टक्कर हो जाएगी। यही वज़ह है कि बहुत से सहाबा किराम मदीना में ही रह गए।
यह आवाज़ सुनकर लोग हर तरफ से दौड़ पड़े।मक्का के रसूख वाले लोग और बड़े-बड़े सरदार खासतौर पर शामिल हुए। तकरीबन एक हज़ार की तादाद में लोग जमा हो गए, जिन के पास एक सौ घोड़े, छ: सौ जिरह (लोहे का कवच) और अनगिनत ऊँट थे। लश्कर का सिपहसालार अबू ज़हल इब्न हिशाम था। यह लोग बड़ी ही तेज रफ़्तार से पश्चिम दिशा की ओर बद्र की तरफ़ बढ़ रहे थे कि अबू सुफ़्यान का एक नया पैग़ाम मिला जिस में कहा गया था कि 'आप लोग हालांकि अपने माल और काफ़ला की हिफ़ाजत के लिए निकले थे, लेकिन अल्लाह ने उन सब को बचा लिया है। लिहाजा आप वापस पलट जाएँ।' यह पैगाम सुनकर लश्कर ने चाहा कि पलट जाएं लेकिन मुश्रिकीन का सबसे बड़ा सरदार और बातिल का सबसे बड़ा अलमबरदार अबू जहल खड़ा हुआ और बड़े ही घमण्ड और गुरूर से बोला, खुदा की कसम! हम वापस नहीं जाएंगे। यहाँ तक कि बद्र जाकर जाकर वहाँ तीन दिन क़याम करेंगे, ऊँट जब्ह करेंगे, लोगों को खिलाएंगे, शराब पिलाएंगे, लौंडियाँ हमारे लिए नाचेंगी-गाएंगी, सारा अरब हमारा हाल सुनेगा और हमारी धाक बैठ जाएगी।'
उधर रसूलुल्लाह ﷺ को काफ़ला और लश्कर दोनों के बारे में खबरें मालूम हुई, आपने उन ख़बरों का गहराई से जायजा लेने के बाद यक़ीन कर लिया कि अब एक जबरदस्त खूनी टकराव का वक्त आ गया है और एक ऐसा ईक़दाम ज़रूरी है जो शुजाअत और बहादुरी, जुरअत और हिम्मत पर टिका हुआ हो। हालात की नज़ाकत और अचानक तब्दीली को देखते हुए रसूलुल्लाह ﷺ ने एक आला फौजी मज़लिसे शुरा बुलाई, जिसमें सूरते हाल का जिक्र करते हुए तमाम कमान्डरो और फौजियों से सलाह-मशवरा किया। मजलिस में हज़रत अबूबक्र सिद्दीक (रज़ि.), हज़रत उमर फारूक ( रज़ि. ) और हज़रत मिक़दाद (रज़ि.) बारी-बारी से उठे और रसूलुल्लाह ﷺ का साथ देने और मैदानें जंग में क़दम जमा कर लड़ने का वादा किया। चूँकि यह तीनों कमांडर मुहाजिरीन में से थे , जिनकी तादाद लश्कर में कम थी। रसूलुल्लाह ﷺ की ख्वाहिश थी कि अंसार की राय मालूम की जाए क्योंकि वहीं लश्कर में ज्यादा संख्या में थे और जंग का असल बोझ उन्हीं के कंधों पर पड़ने वाला था। चुनांचे आपने फिर से कहा, 'ऐ लोगों, मुझे मश्वरा दो।' आपकी बात अंसार के कमांडर और अलमबरदार हज़रत सअद बिन मुआज़ ने भाँप ली। लिहाजा उन्होंने अर्ज़़ किया, या रसूलुल्लाह, हम तो आप पर ईमान लाए हैं, आप की तस्दीक़ की है, आपकी इताअत का पुख्ता वादा किया है, लिहाजा आप का जो इरादा हो उस के लिए आगे बढ़िये। उस ज़ात की कसम! जिसने आपको हक़ के साथ भेजा है, हम कभी भी पीछे नहीं हटेंगे। अगर आप हमें साथ लेकर समंदर में कूदना भी चाहे तो हम भी उस में आपके साथ कूद पडेंगे। हमारा एक आदमी भी पीछे नहीं हटेगा। हम जंग में पा मर्द और लड़ने में जवां मर्द हैं। और मुम्किन है कि अल्लाह तआला आपको हमारा वह जौहर दिखला दे जिससे आपकी आंखें ठण्डी हो जाए। पस आप हमें अपने साथ ले चलें।' ह
ज़रत सअद की यह बात सुनकर रसूलुल्लाह ﷺ के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। आपका चेहरा मुबारक मारे खुशी से दमकने लगा। आपने फ़र्माया, 'चलो और खुशी-खुशी चलो।अल्लाह ने मुझ से दो गिरोहों में से एक का वादा फ़र्माया है। वल्लाह इस वक्त गोया मैं मुश्रिकीन की कत्लगाह देख रहा हूँ।'
इसके बाद रसूलुल्लाह ﷺ आगे बढ़े और बद्र के करीब पहुँच कर पड़ाव डाल दिया। उसी रोज़ शाम को आपने दुश्मन के हालात का पता लगाने के लिए एक जासूसी दस्ता रवाना किया जिसमें हज़रत अली (रज़ि.), हज़रत जुबैर (रज़ि.) और हज़रत सअद बिन अबी वक्कास (रज़ि.) थे। यह लोग सीधे बद्र के चश्मे पर पहुँचे, बहाँ दो गुलाम मक्की लश्कर के लिए पानी भर रहे थे। उन्हें गिरफ़्तार कर लिया और रसूलुल्लाह ﷺ की खिदमत में हाजिर किया। आप ने उन दोनों गुलामों से कुरैश के बारे में पूछताछ की।
उन्होंने कहा कि बहुत सारे हैं लेकिन तादाद हमें मालूम नहीं ।
आपने फ़र्माया, रोज़ाना कितने ऊँट जब्ह होते हैं?'
उन्होंने कहा, 'एक दिन नौ और एक दिन दस।'
आप ﷺ ने फ़र्माया, 'तब तो उनकी तादाद नौ सौ से एक हज़ार के बीच बीच है।'
फिर आपने पूछा, 'उन लोगों में कुरैश के मुअज्जिज लोग कौन-कौन हैं?'
उन्होंने कहा, 'अबुल बख़्तरी बिन हिशाम, हकीम बिन हिजाम, उमैया बिन खलफ, नोफल तुऐमा, जमआ और अबू जहल बिन हिशाम वगैरह।'
रसूलुल्लाह ﷺ ने सहाबा किराम को संबोधित करते हुए फ़र्माया, 'मक्का ने अपने जिगर के टुकड़ों को तुम्हारे पास लाकर डाल दिया है।
बाराने रहमत (रहमत की बारिश): अल्लाह ने उसी रात रहमत की बारिश नाज़िल फ़रमाई जिसकी वज़ह से रेत में सख्ती आ गई और कदम टिकने के लायक हो गए। मौसम खुशगवार हो गया और दिल मज़बूत हो गए। बारिश के थमते ही रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने लश्कर को हरकत दी ताकि मुश्रिकीन से पहले बद्र के कुएँ पर पहुँच जाए और उस पर मुश्रिकीन को मुसल्लत न होने दें। चुनाँचे आप लश्कर समेत कोई आधी रात गये तक दुश्मन के सब से करीब तरीन चश्मे पर पड़ाव डाल दिया। सहाबा किराम ने होज बनाकर पानी भर लिए और आसपास के सारे चश्मों को पाट दिया ताकि दुश्मनों को पानी न मिल सके। इसके बाद रसूलुल्लाह ﷺ ने लश्कर की तरतीब फ़रमाई और मैदाने जंग में तशरीफ़ ले गए वहाँ अपने हाथ से इशारा फ़रमाते गए कि कल यह फलाँ-फलाँ की कत्लगाह है, इन्शाअल्लाह।
(हदीस : मुस्लिम) फिर रसूलुल्लाह ﷺ ने वहीं पेड़ के नीचे रात गुजारी और मुस्लिमों ने भी पूरे सुकून के साथ रात बितायी। उनके दिल पुर-एतमाद थे उन्हें यह उम्मीद थी कि सुबह अपनी आँखों से अपने रब की बशारतें देखेंगे। चुनाँचे अल्लाह का इर्शाद है:
जब अल्लाह तुम पर नींद तारी कर रहा था और तुम पर आसमान से पानी बरसा रहा था ताकि तुम्हें उसके जरिये पाक कर दे और तुम से शैतान की गंदगी दूर कर दे और तुम्हारे दिल मज़बूत कर दे और तुम्हारे क़दम जमा दे। [(सूरह अनफ़ाल : 11)
मुश्रिकीन ने उनसे पूछा, 'तुम कौन हो?'
उन्होंने कहा, 'हम अंसार हैं।'
कुरैशियों ने उनसे कहा, 'हमें आपसे कोई सरोकार नहीं। हम तो अपने चरचेरे भाईयों को चाहते हैं। उनके आवाज़ लगाने वाले ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, मुहम्मद...हमारे पास हमारी कौम के लोगों को भेजो।'
रसूलुल्लाह ﷺ ने हज़रत उबैदह बिन हारिस (रज़ि.), हज़रत हमज़ा (रज़ि.) और हज़रत अली (रज़ि.) को मुकाबले के लिए भेजा। हज़रत उबैदह ने उतबा से, हज़रत हमज़ा ने शैबा से और हज़रत अली ने वलीद से मुकाबला किया। हज़रत हमज़ा और हज़रत अली ने तो अपने - अपने मुकाबिल को झट से मार गिराया लेकिन हज़रत उबैदह और उतबा के दरमियान कांटे का मुकाबला हुआ और दोनों ने एक दूसरेको जख्मी कर दिया। इतने में हज़रत हमज़ा और हज़रत अली अपने-अपने शिकार से फारिंग होकर उतबा पर टूट पड़े और उसका काम तमाम कर दिया। हज़रत उबैदह का पांव कट गया था और उनकी आवाज़ भी बंद हो गई थी जो लगातार बंद ही रहीं और आखिर पांचवें दिन जंग से वापसी में मुकामे सफ़रा में उन का इंतिकाल हो गया। इस मुकाबले का अंजाम मुश्रिकीन के लिए एक बुरा आगाज़ था। वह एक ही जस्त में अपने बेहतरीन कमांडरों से हाथ धो बैठे थे। इसलिए उन्होंने गुस्से में आकर एक ही बार में हमला बोल दिया। दूसरी तरफ़ मुसलमान अपनी- अपनी जगह पर पांव जमाकर मुश्रिकीन के ताबड़तोड़ हमलों को रोक रहे थे और उन्हें खासा नुक्सान भी पहुंचा रहे थे सबकी ज़बान पर कलिमा-ए-तौहिद ज़ारी था और अल्लाह से मदद की दुआ मांग रहे थे।
उधर रसूलुल्लाह ﷺ भी अल्लाह तआला से मदद के लिए दुआ कर रहे थे, 'ऐ अल्लाह... तूने मुझ से जो वादा किया है उसे पूरा फ़रमा दे। ऐ अल्लाह... आज यह छोटी सी जमाअत हलाक हो गई तो तेरी इबादत करने वाला कोई नहीं रहेगा। ऐ अल्लाह क्या तू चाहता है कि आज के बाद तेरी इबादत कभी न की जाए।'
आप ﷺ इतना गिड़गिड़ा कर दुआ मांग रहे थे कि उन्हें देखकर हज़रत अबूबक्र रज़ि. ने अज़्ज़ किया, रसूलुल्लाह ﷺ बस फ़रमाइए। उधर अल्लाह ने फ़रिश्तों को वह्य की कि,मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम ईमान वालों के कदम जमाओ मैं काफ़िरों के दिलों में तुम्हारा रौब डाल दूंगा। (अनफ़ाल : 12) फिर आपने एक मुठ्ठी कंकरी ली और कुरैश की तरफ़ रुख करके फ़र्माया, 'चेहरे बिगड़ जाए' और साथ ही उनके चेहरों की तरफ़ कंकरी वाली मिट्टी फेंक दी। फिर मुश्रिकीन में से कोई भी नहीं बचा जिसकी आंखों, मुंह और नाक में कुछ मिट्टी न गई हो।
उसी के बारे में अल्लाह तआला का इरशाद है,
जब आपने फेंका तो दर हकीकत आपने नहीं फेंका बल्कि अल्लाह ने फेंका। [सूरह अनफ़ाल : 17]
या सहाबा किराम निहायत जवाँमर्दी व बहादुरी से दुश्मनों पर हमला कर रहे थे। उनकी सफ़ों को चीरते, दरहम-दरहम करते और गर्दनें काटते आगे बढ़ते ही जा रहे थे। मुश्कीन की सफ़ें बेतरतीबी से पीछे हटने लगी और लश्कर में नाकामी के आसार नज़र आने लगे। अबू जहल ने अपनी सफ़ों की यह हालत देखी तो उसने अपने लश्कर को ललकाना और हिम्मत दिलाना शुरू किया, 'ऐ जमाअते कुरैश, तुम उतबा, शैबा और वलीद की मौत से घबराओ नहीं, उन्होंने जल्दबाज़ी से काम लिया था , लात व उज्जा की कसम, हम वापस नहीं जाएंगे जब तक कि हम उन्हें रस्सियों में जकड़ न लें। लेकिन उसके गुरूर की हक़ीकत का पता बहुत ज़ल्द ही लग गया क्यों कि थोड़ी ही देर में मुस्लिमों के जवाबी हमले की तेजी के सामने मुश्रिकीन की सफ़ें फटना शुरू हो गई। लेकिन अभी तक अबु ज़हल अपने इर्द- गिर्द फौजियों का घेरा लिए हुए खड़ा था जिसके तमाम फौजी तलवारों और नेज़ों का साया किए हुए थे। लेकिन इस्लामी लश्कर के तूफ़ान ने उसके घेरे को तितर-बितर कर डाला।
अब अबु ज़हल मैदानें जंग में अकेला ही इधर-उधर चक्कर काट रहा था। दूसरी तरफ़ दो अंसारी नौजवान हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ से बारी-बारी से पूछ रहे थे कि चचाजान, मुझे अबू जहल को दिखा दीजिए, मैंने सुना है वह अल्लाह के रसूल ﷺ को गाली देता है। अगर मैंने उसे देख लिया तो या तो उसका वजूद रहेगा या मेरा।' हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ कहते हैं। कि मुझे उनकी बातों से बड़ा ताज्जुब हुआ। इतने में अबू जहल लोगों के बीच चक्कर काटता हुआ नज़र आया तो मैंने कहा, अरे देखो वह रहा तुम्हारा शिकार। इतना सुनते ही दोनों अपनी- अपनी तलवारें लेकर उस पर बाज़ की तरह झपट पड़े। उनमें से एक यानी हज़रत मुआज बिन अम्र बिन जमुह ने ऐसा वार किया कि उसका आधा पांव पिंडली से कटकर अलग हो गया। इतने में अबु ज़हल के बेटे इकरमा ने हज़रत मुआज पर वार कर दिया जिससे उनका एक बाजू कट कर लटकने लगा।
हज़रत मुआज खुद कहते हैं, जब कटा हुआ बाजू चमडी से लटककर लड़ाई करने में तकलीफ़ देने लगा तो मैंने उस पर पांव रखकर जोर से खींच कर अलग कर दिया।' उधर दूसरे अंसारी नौजवान हज़रत मुअव्विज बिन अफरा ने अबू जहल पर ऐसा वार किया कि वह जख्मी होकर वहीं पर ढेर हो गया। मुस्लिमों के सख्त और ताबड़तोड़ हमलों से मुश्रिकीन बौखला गए, उनमें भगदड़ मच गई, उनके सत्तर आदमी मारे गए और सत्तर आदमी कैद किए गए। जो आमतौर पर मक्का के बड़े-बड़े लीडर और सरदार थे। इस जंग में चौदह मुसलमान शहीद हुए।
जब जंग खत्म हो गयी तो रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़र्माया, 'कौन है जो देखे कि अबुज़हल का अंजाम क्या हुआ?'
आप ﷺ ने फ़माया, 'मुझे अबू जहल की लाश दिखाओ।'
सहाबा ने आप ﷺ को ले जाकर उसकी लाश दिखाई। उंसकी लाश देखकर आप ﷺ ने फ़र्माया, 'यह इस उम्मत का फ़िरऔन है।'
इस तरह 17 रमज़ान तमाम मुस्लिमों के लिये एक तारीख़ी यादगार दिन है।
सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 17 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन
Team Islamic Theology

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