Chor ki saza aur uski hikmat

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चोर की सज़ा और उसकी हिकमत

चोरी इन्तेहाई क़बीह बदतरीन अमल है जिसकी कोई मज़हब  भी इजाज़त नहीं देता बल्कि दुनिया के हर मज़हब में ये काबिले सज़ा अमल है। ये अलग बात है कि आज कल के यूरोपी क़वानीन जो यूरोप के अलावा उन ममालिक में राइज हैं जहाँ उनकी हुकूमत रही है में इसकी सज़ा क़ैद और जुर्माना है और शरीयते इस्लामिया में इसकी सज़ा हाथ काटना है। 

आज कल के रोशन ख़्याल हज़रात हाथ काटने की सज़ा को  हैवानियत और ज़ालिमाना कहते हैं कि इस तरह मुआशरे में माज़ूर अफ़राद ज़्यादा होंगे और वह मुआशरे और हुकूमत के लिये बोझ बन जायेंगे, हालांकि वह नहीं जानते कि ये ऐसी सज़ा है जो चोरी को मुआशरे से तक़रीबन ख़त्म कर देगी। सिर्फ़ चन्द हाथ काटने से अगर मुआशरा चोरी से पाक हो जाये तो ये घाटे का सौदा नहीं। उन चन्द अफ़राद का बोझ हुकूमत या मुआशरे के लिये उठाना उन करोड़ों अरबों के अख़राजात से बहुत हल्का है जो पोलिस और जेलों पर ख़र्च करने पड़ते हैं जब कि जेलों में छोटे चोर बड़े चोर बन जाते हैं। वहाँ जराइम पेशा अफ़राद इकट्ठे हो जाते हैं जिससे जराइम के मन्सूबे बनते हैं। 

ये समझना कि इस्लामी सज़ा के निज़ाम से हाथ कटे' अफ़राद की कसरत होती है, जहालत है। चन्द हाथ कटने से चोरी ख़त्म हो जायेगी। पुलीस और अदालतों तौसीफ़ की ज़रूरत नहीं रहेगी। शहर में एक आध हाथ कटा' फ़र्द सारे शहर के लिये इबरत बना रहेगा। इससे कहीं ज़्यादा अफ़राद के हाथ हादसात में कट जाते हैं, लिहाज़ा ये सिर्फ प्रोपेगेण्डा है कि इस सज़ा से हाथ कटों' का सैलाब आ जायेगा। 

सऊदी अरब जहाँ इस्लामी सज़ायें सख़्ती से नाफ़िज़ हैं, इस हकीकत की ज़िन्दा मिसाल है। वहाँ कोई फर्द हाथ कटा नज़र नहीं आता मगर चोरी का तसव्वुर तकरीबन ख़त्म हो चुका है। करोड़ों की मालियत का सामान बगैर किसी मुहाफ़िज़ के पड़ा रहता है और लोग दुकानें खुली छोड़ कर नमाज़ पढ़ने चले जाते हैं। जेवरात से लदी फंदी औरतें सहराओं में हज़ारों मीलों का सफ़र करती हैं मगर किसी को नज़रे बद की भी जुअरत नहीं होती, हालांकि इस्लामी सज़ा के निफ़ाज़ से पहले दिन दहाड़े काफ़िले लूट लिये जाते थे। और लोग हाजियों की मौजूदगी में उनका सामान उठा कर भाग जाया करते थे जैसा कि आज कल अमेरिका वगैरह में हाल है, बावजूद इसके कि वहाँ जेलें भरी पड़ी हैं मगर चोरी, डाके रोज़ रोज़ बढ़ रहे हैं। 

इस्लाम ने चोरी की ये सज़ा इसलिये रखी है कि चोरी बढ़ते बढ़ते डाका डालने की आदत डालती है। डाके के दौरान बेदरेग़ (बेरहमी से) क़त्ल किए जाते हैं और जबरन इस्मतें लूटी जाती हैं। गोया चोर आहिस्ता आहिस्ता डाकू, क़ातिल और ज़िना बिल-जबर का मुतर्किब बन जाता है, लिहाज़ा इब्तेदा ही में उसका एक हाथ काट दिया जाये ताकि वह ख़ुद भी पहले क़दम पर ही रुक जाये बल्कि वापस पलट जाये और मुआशरा भी डाकूओं, बेगुनाह क़त्ल और ज़िना बिल जब जैसे ख़ौफ़नाक और क़बीह जराइम से महफूज़ रह सके। 

बताइये! इस सज़ा से चोर और मुआशरे को फायदा हासिल हुआ या नुकसान? जब कि क़ैद और जुर्माने की सज़ा इन जराइम में मज़ीद इज़ाफ़े का ज़रिया बनती है। पहली चोरी का जुर्माना उससे बड़ी चोरी के ज़रिये से अदा किया जाता है और जेल जराइम की तर्बीयत गाह साबित होती है। जराइम तभी ख़त्म होंगे जब उन पर कड़ी और बेलाग इस्लामी सज़ायें नाफ़िज़ की जायेगी क्योंकि वह फ़ितरत के ऐन मुताबिक हैं।


चोरी बहुत बड़ा गुनाहा है:

अबू हुरैरह रज़ि० से रिवायत है कि रसूलल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: जब कोई शख़्स ज़िना करता है तो वह मोमिन नहीं होता। जब कोई शख़्स  चोरी  करता है तो वह साहिबे ईमान नहीं होता। जब कोई शख़्स शराब पीता है तो वह ईमान से ला' ताल्लुक़ हो जाता है। और जब कोई शख़्स ताक़त व कुव्वत के ज़ोर पर ज़बरदस्त डाका ड़ालता है कि लोग बेचारे देखते रह जाते हैं तो वह भी ईमान से ख़ाली होता है। [बुख़ारी: 2475; मुस्लिमः 104,757; सुनन नसाई 4874,4875, 4876; सुनन अल कुब्रा लिन्नसाई: 7354,7355,7356]

अबू हुरैरह रज़ि० से रिवायत है कि रसूलल्लाह ﷺ ने फ़रमाया, ज़िना करने वाला जब ज़िना करता है तो वो मोमिन नहीं रहता, चोर जब चोरी करता है तो वो मोमिन नहीं रहता, शराबी जब शराब पीता है तो वो मोमिन नहीं रहता। फिर उन सब आदमियों के लिये तौबा का दरवाज़ा बहरहाल खुला हुआ है। [बुख़ारी:  6810; मुस्लिमः 104; सुनन नसाई 4875, 4876; सुनन अल कुब्रा लिन्नसाई: 7355,7356]

वज़ाहत: तौबा ये इशारा है कि यहां मुत्लक़न ईमान की नफ़ी मक़स़ूद नहीं बल्कि वक़्ती तौर पर या ईमाने कामिल की नफ़ी मक़स़ूद है क्योंकि ये गुनह हैं, कुफ़्र नहीं बशिर्ते *सच्ची तौबा करे यानी इंसान तौबा करने के बाद दुबारा वो गुनाह ना करे।

अबू हुरैरह रज़ि० से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: अल्लाह तआला चोर पर लानत करे वह अण्डा चुरा लेता है तो उसका हाथ काट दिया जाता है। रस्सी चुरा लेता है तो उसका हाथ काट दिया जाता है। [मुस्लिम: 1687; सुनन नसाई: 4877; सुनन अल कुब्रा लिन्नसाई: 7358]

वज़ाहत: 

i. मामूली चीज़ों के बदले अपना कीमती हाथ जिसका कोई बदल नहीं, कटवा बैठता है। दुनिया में इससे बड़ा नुकसान क्या होगा? हाथ से महरूमी, जिन्दगी भर की बदनामी और रुस्वाई जो मरते दम तक जुदा न होगी और इन सबसे बढ़ कर अल्लाह तआला की नराज़गी, ईमान से महरूमी और लानत क्या होती है? 

किसी शख्स का नाम लेकर उस पर लानत डालना जायज नहीं, चाहे वह काफिर हो, मगर ये कि वह कुफ़्र पर मेरे या उसका कुफ़्र क़तई हो। अलबत्ता किसी कबीरा गुनाह का जिक्र करके उसके फाइल पर बगैर किसी का नाम लिये या किसी को मुअय्यन किये लानत डाली जा सकती है जैसा कि इस हदीस में है। लानत सबसे बड़ी बद दुआ़ है। मुराद अल्लाह तआला की रहमत से महरूमी है, इसी लिये ये किसी मोमिन के बारे में तो हो ही नहीं सकती। काफिर भी मुमकिन है, किसी वक्त मुसलमान हो जाये, लिहाजा उसके लिये भी मुनासिब नहीं। 

ii. अण्डा, रस्सी, कलाम में जोर पैदा करने के लिये फरमाया। मुराद मामूली चीज़ है। जाहिर है दुनिया का माल कितना भी कीमती हो, इन्सानी हाथ और इन्सानी शर्फ़ के मुकाबले में मामूली ही है वरना अण्डा, रस्सी पर हाथ नहीं काटा जा सकता बल्कि हाथ काटने के लिये चोरी की एक हद मुकर्रर की गई है जिसकी तफ्सील आगे आयेगी। इन्शाअल्लाह!


मार पीट कर और क़ैद करके चोरी की छानबीन करना:

अज़हर बिन अब्दुल्लाह हराज़ी से रिवायत है कि क़बीला कलाअ के लोगों का कुछ माल चोरी हो गया। उन्होंने कुछ जुलाहों पर इस का इलज़ाम लगाया; उन लोगों को हज़रत नौमान बिन बशीर रज़ि० रसूलल्लाह ﷺ के सहाबी के पास लाया गया तो उन्होंने उनको कई दिन क़ैद में रखा, फिर छोड़ दिया। माल वाले हज़रत नौमान रज़ि० के पास आए और कहा : आप ने उन लोगों को मारे पीटे और तहक़ीक़ व छानबीन के बग़ैर ही छोड़ दिया है। 

तो हज़रत नौमान रज़ि० ने कहा : तुम क्या चाहते हो? 

अगर चाहो तो मैं उन्हें मारता हूँ अगर तुम्हारा माल मिल गया तो बेहतर, वरना इस का बदला तुम्हारी पीठों से लूँगा। जितना उन को मारा होगा तुम्हें भी मारूँगा। 

उन्होंने कहा : क्या ये आपका फ़ैसला है? 

उन्होंने फ़रमाया : ये अल्लाह का फ़ैसला है और अल्लाह के रसूल ﷺ का फ़ैसला है। 

इमाम अबू- दाऊद रह० कहते हैं कि हज़रत नौमान (रज़ि०) ने कुलाई लोगों को अपनी इस बात से डराया था। और मक़सद ये वाज़ेह करना था कि मुल्ज़िम को ऐतिराफ़ के बाद ही मारना सही है। [अबू दाऊद: 4382; सुनन नसाई: 4878]

वज़ाहत: इस बाब में चोर से मुराद वह शख़्स है जिस पर चोरी का इल्ज़ाम हो मगर कोई गवाह न हो और न माले मसरूका उससे बरामद हुआ हो। ऐसे शख़्स को जिस पर चोर होने के क़राइन हों, तहक़ीक़ की ग़र्ज़ से क़ैद किया जा सकता है। अगर वह तस्लीम कर ले या उससे माले मसरूक़ा बरामद हो जाये तो उसको चोरी की सज़ा लाज़िम है। अगर कुछ भी साबित न हो तो उसे छोड़ दिया जायेगा जैसा कि हज़रत नोमान बिन बशीर रज़ि० के तर्जे अमल से साबित होता है, और उसे मारने की इजाज़त नहीं होगी क्योंकि मार पीट से तो किसी भी बेगुनाह से ऐतराफ़ करवाया जा सकता है। किसी बेगुनाह या मशकूक शख़्स को मारना ज़ुल्म है। हाँ अलबत्ता ये दुरुस्त है कि दानाई और हिकमत से सच उगलवाया जाये या धमकियों वग़ैरह से हक़ीक़त मालूम की जाये


इलज़ाम साबित ना होने पर रिहा करना:

रसूलल्लाह ﷺ ने एक आदमी को तोहमत की बिना पर क़ैद  किया फिर इलज़ाम साबित न होने पर उस को रिहा कर दिया गया। [सुनन तिर्मिज़ी: 1417; अबू दाऊद: 3630; सुनन नसाई: 4879,4880; सुनन अल कुब्रा लिन्नसाई: 7362,7362; स़हीह इब्ने अल जारूद: 1003]

वज़ाहत: पूछताछ के लिये न कि बतौर सज़ा क्योंकि जब तक मुल्ज़िम के ख़िलाफ़ इल्ज़ाम साबित न हो, वह मुजरिम नहीं बनता। और पूछताछ के लिये क़ैद के दौरान में उस पर ज़बरदस्ती नहीं किया जा सकता वरना ज़बरदस्ती करने वाले के ख़िलाफ़ किसास की कार्यवाही की जायेगी।


हाकिम के सामने मुक़द्दमा पेश करने के बाद चोर को माफ़ करना:

हज़रत इब्ने-अब्बास रज़ि० से रिवायत है, उन्होंने फ़रमाया: हज़रत सफ़वान रज़ि० मस्जिद में सोए हुए थे जबकि उनकी चादर उनके सिर के  नीचे थी। वो चुरा ली गई। उनको आँख खुली तो चोर जा चुका था। उन्होंने भागकर उसे पकड़ लिया और नबी ﷺ के पास ले आए। आपने चोर का हाथ काटने का हुक्म दे दिया। 

सफ़वान रज़ि० ने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! मेरी चादर इतनी क़ीमती तो नहीं कि इसकी बिना पर किसी आदमी का हाथ काट दिया जाए? 

आप ﷺ ने फ़रमाया:  ये बात इसको मेरे पास लाने से पहले क्यों न सोची। 

[सुनन नसाई: 4882, 4883, 4884, 4885, 4886, 4887; सुनन दारमी: 2304; सुनन अल कुब्रा लिन्नसाई: 7364, 7365, 7366, 7367, 7368, 7369, 7370; अबू दाऊद: 4893]

वज़ाहत: 

i. इतनी क़ीमती तो थी, यानी चोरी के निसाब को पहुँच जाती थी इसलिये तो रसूलुल्लाह ﷺ ने हाथ काटने का हुक्म दिया मगर उनका ख़्याल था कि हाथ तो बहुत कीमती है। जिसकी क़ीमत पचास ऊँट है। इसे तीस दिरहम की चोरी के बदले में नहीं काटना चाहिए। लेकिन असल बात ये है कि ये हाथ उस वक़्त कीमती है जब बेगुनाह हो । जब उससे चोरी जैसा गुनाह कर लिया गया तो । अब ये क़ीमती न रहा। अब ये चन्द दिरहम के बदले काट दिया जायेगा। चोरी किस कद्र जलील काम है। कि पचास ऊँट की कीमत रखने वाले हाथ को तीन या ज्यादा से ज्यादा 30 दिरहम के बदले में काट दिया जाएगा। 

ii. क़ाबिले हद मसला जब हाकिम के सामने पेश कर दिया जाये तो फिर उसकी माफ़ी नहीं हो सकती। हाँ, अलबत्ता ये हो सकता है कि हाकिम के पास लाने से पहले माफ़ कर दिया जाये, ताहम शरीयत ने जिस चीज़ को मुस्तस्ना (अलग) क़रार दिया उसमें हाकिम के पास लाने के बाद भी माफ़ हो सकता है जैसे, मक़्तूल के वारिसीन क़ातिल को बाद में भी माफ़ कर सकते हैं।


हज़रत अम्र-बिन-शुऐब के परदादा, हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-अम्र रज़ि० से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फ़रमाया:  मुलज़िमों को मेरे पास  लाने से पहले माफ़ कर दिया करो। मेरे पास कोई मुलज़िम का मुक़द्दमा आया तो हद लाज़िमी तौर पर लगेगी। [सुनन नसाई: 4889; अबू दाऊद: 4376; सुनन अल कुब्रा लिन्नसाई: 7372]

वज़ाहत: 

i. ये हदीस स़रीह और वाज़ेह दलील है कि हाकिमे वक़्त और अदालत के सामने पेश होने और मुल्जिम को पेश करने से पहले एक दूसरे को माफ़ करना मुस्तहब और पसन्दीदा अमल है। बिल खुसूस अगर जुर्म करने वाला कोई ऐसा इज्जतदार और मुआशरे का नेक फर्द हो जो न तो आदी मुजरिम हो और न अपने किये पर फ़न का इज़हार करे बल्कि अपनी गलती पर शर्मिन्दा हो तो उसे माफ़ कर देना ही बेहतर और अफ़ज़ल है। 

ii. और मौके के गवाहों के लिये ये क़तअ़न जरूरी नहीं कि वह ज़रूर अदालत में जाकर, जो कुछ उन्होंने देखा है उसकी सच्ची गवाही दें बल्कि एक मुसलमान के ऐब की परदापोशी मुस्तहब और शरअ़न पसन्दीदा अमल हैं। इसके मुताल्लिक बहुत सी अहादीस मौजूद हैं। हाँ, अगर मामला अदालत में या हाकिम के पास चला जाये तो फिर हक सच की गवाही देना जरूरी होता है। इस सूरत में हक की गवाही छुपाना कबीरा गुनाह है। 

iii. हुदूद माफ़ करो' जैसे चोरी को अदालत में पेश किये बगैर छोड़ दो, या ज़ानी के ख़िलाफ़ गवाह अदालत में न जायें या शराबी का केस अदालत में न ले जाया जाये। इन सूरतों में अदालत ज़बरदस्ती कैस अपने हाथ में नहीं लेगी। लेकिन जो केस अदालत में आ गया, मुल्जिम ने ऐतराफ़ कर लिया या गवाहों ने गवाही दे दी, यानी जुर्म साबित हो गया तो फिर अदालत के लिये हद क़ाइम करना लाज़िम होगा। वह माफ़ नहीं कर सकती। अ़दालत में जुर्म के सबूत के बाद मुताल्लिका अशख़ास़ भी माफ़ी नहीं दे सकते। अलबत्ता किसास का मसला इस ज़ाबिते से मुस्तस्ना (अलग) है। कत्ल का मुकद्दमा अदालत में चला जाये, गवाह गवाही हो जायें या मुल्जिम ऐतराफ़ कर ले यहाँ तक कि अदालत सज़ाए मौत भी सुना दे, तब भी मक़्तूल के वारिसीन माफ़ कर सकते हैं यहाँ तक कि फाँसी का फंदा क़ातिल के गले में पड़ा हो, तब भी उसे माफ़ किया जा सकता है। लेकिन अदालत किसी भी मरहले पर या हाकिमे वक़्त किसी भी अपील पर कातिल को माफ़ नहीं कर सकता।


मुजरिम की सिफारिश करना

हज़रत आयशा (रज़ि०) से रिवायत की कि क़ुरैश को एक मख़ज़ूमी औरत, जिसने चोरी की थी, के मामले ने फ़िक्रमन्द कर दिया, उन्होंने कहा : इस के बारे  में रसूलुल्लाह (सल्ल०) से कौन बात करेगा? 

कहने लगे : रसूलुल्लाह (सल्ल०) के प्यारे हज़रत उसामा (रज़ि०) ही इसकी जुरअत कर सकते हैं? 

चुनांचे हज़रत उसामा (रज़ि०) ने आपसे बातचीत की तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया : क्या  तुम हदों अल्लाह  में से एक हद (को ख़त्म करने) के बारे  में सिफ़ारिश कर रहे हो? फिर आप (सल्ल०) उठे, ख़ुतबा दिया और फ़रमाया : ऐ लोगो!  तुम से पहले लोगों को उसी चीज़ ने तबाह कर डाला कि जब उनका कोई अपना आदमी चोरी करता तो उसे छोड़ देते और जब उन  में से कोई कमज़ोर आदमी चोरी करता तो  उस पर हद लागू करते। अल्लाह की क़सम! अगर फ़ातिमा बिन्ते मुहम्मद भी चोरी करती तो मैं  उसका हाथ भी काट देता। [सहीह बुखारी: 733 सुनन निसाई: 4811]

वज़ाहत: 

i. उसामा शायद करें' उन्होंने ये बात इस वजह से कही कि हज़रत उसामा रज़ि० आपके मुतबन्ना हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़ि० के बेटे थे, इसलिये आपको उनसे शदीद मोहब्बत थी लेकिन अल्लाह तआला की मोहब्बत पर ग़ालिब न थी। तभी तो आपने उनकी सिफ़ारिश न मानी। उसामा बिन ज़ैद रज़ि० की अज़ीम क़द्रो मन्ज़िलत पर भी ये अहादीस वाज़ेह दलालत करती हैं कि वह न सिर्फ़ रसूलल्लाह ﷺ के महबूब थे बल्कि लोगों में भी महबूब समझे जाते थे। 

ii. फ़ातिमा बिन्ते मुहम्मद ये आपने कलाम में ज़ोर पैदा करने के लिये फ़रमाया वरना कहाँ ख़ानदाने रसूल और कहाँ चोरी ? अल्लाह की पनाह! मज्कूरा अहादीस से मालूम हुआ कि सय्यदा फ़ातिमा रसूलुल्लाह रज़ि० के यहाँ बहुत ज़्यादा क़द्रो मन्जिलत की हामिल थीं, ताहम ये भी वाज़ेह होता है कि हुदूदुल्लाह के क़ाइम करने में न तो किसी की मोहब्बत को ख़ातिर में लाया जा सकता है और न किसी की सिफ़ारिश ही क़बूल की जा सकती है। वल्लाहु आलम! 

iii. इस अहादीस़े मुबारका से ये मसला भी साबित होता है कि जिस तरह चोरी करने वाले मर्द का हाथ काटा जा सकता है उसी तरह चोरी करने वाली औरत का हाथ भी काटा जा सकता है। कुरअने करीम ने तो मुकम्मल सराहत के साथ चोर मर्द और चोर औरत के हाथ काटने का हुक्म दिया है।

وَالسَّارِقُ وَالسَّارِقَۃُ فَاقۡطَعُوۡۤا اَیۡدِیَہُمَا جَزَآءًۢ بِمَا کَسَبَا نَکَالًا مِّنَ اللّٰہِ ؕ وَاللّٰہُ عَزِیۡزٌحَکِیۡمٌ ﴿۳۸﴾

और जो मर्द चोरी करे और जो अ़ौरत चोरी करे, दोनों के हाथ काट दो, ताकि उनको अपने किये का बदला मिले, और अल्लाह की तरफ़ से इब्रतनाक सज़ा हो। और अल्लाह इक़्तिदार (हुकूमत व इख़्तियार) वाला भी है (और) हिक्मत वाला भी।‌ [अल माइदा: 5/38]


हदक़ाइम करने की तर्ग़ीब

हज़रत अबू हुरैरह  बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह  ने फ़रमाया: 'ज़मीन में एक हद का लगाया जाना ज़मीन पर रहने वालों के लिये इस बात से बेहतर है कि उन पर तीस दिन बारिश बरसे। [सुनन नसाई: 4908, इब्ने माजा: 3538, सुनन अल कुब्रा लिन्नसाई: 7391, इब्ने हिब्बान: 1507]

वज़ाहत: कुछ सज़ाएँ हद कहलाती हैं और कुछ ताज़ीर हद तो वह सज़ा होती है जो अल्लाह तआला की तरफ़ से मुक़र्ररकर्दा हो जबकि ताज़ीर उस सज़ा को कहते हैं जो क़ाज़ी और जज या कोई भी ज़िम्मेदार शख़्स, जुर्म की नोईयत देख कर उसकी मुनासिबत से, उस जुर्म की रोक थाम के लिये अपनी सवाब दीद के मुताबिक दे सकता है। मतलब ये है कि ताज़ीर अल्लाह तआला की तरफ़ से मुक़र्ररकर्दा नहीं होती। यही वजह है कि इसमें कमी बेशी हो सकती है। अलबत्ता हद और ताज़ीर दोनों के निफ़ाज़ का मक़सद लोगों को जराइम से रोकना होता है। ये सजाएँ इसलिए दी जाती हैं कि मुजरिम का हश्र देख कर दूसरे लोग इबरत हासिल करें और जुर्म से इज्तेनाब करें।


खलियान में रखने के बाद अगर फल चुरा लिया जाये तो?

हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-अम्र (रज़ि०) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ से पेड़ पर लगे हुए फल को तोड़ने के बारे में पूछा गया तो आपने फ़रमाया: अगर कोई ज़रूरतमन्द फल तोड़कर खा ले, साथ न ले जाए तो उसे कुछ नहीं कहा जाएगा, और अगर वो फल साथ भी ले जाए तो उससे दुगनी क़ीमत वुसूल की जाएगी और सज़ा भी दी जाएगी, और अगर खलियान में रखने के बाद किसी शख़्स ने कोई फल उठा लिया और उसकी क़ीमत ढाल की क़ीमत के बराबर या ज़्यादा हो तो उसका हाथ काट दिया जाएगा, और अगर ढाल की क़ीमत से कम चुराया तो उससे दुगनी क़ीमत ले ली जाएगी और उसे सज़ा भी मिलेगी। [अबू दाऊद: 1710, 4390; तिर्मिज़ी: 1289; स़हीह इब्ने अल जारूद: 2496; सुनन नसाई 4960,4961]

वज़ाहत: 

i. हाजतमन्द इससे मुराद वह शख़्स है जिसके पास खाने की कोई चीज़ न हो। इतनी रक़म भी न हो कि कुछ ख़रीद सके। भूख भी शदीद हो। उसके लिये फल तोड़ कर खाना जायज़ है क्योंकि जान बचाना ज़रूरी है। अलबत्ता अगर मालिक पास हो तो उससे इजाज़त हासिल करे। वह इजाज़त न दे तो ऐसा लाचार शख़्स बिला इजाज़त भी फल तोड़ कर खा सकता है। लेकिन वह सिर्फ़ भूख दूर करने पर इक्तेफ़ा करे। साथ न ले कर जाये, न कपड़े में डाल कर न हाथ में पकड़ कर। ख़ुब्ना में ये दोनों सूरतें दाखिल हैं।

ii. दुगनी क़ीमत असल कीमत तो ख़रीदने वाले को भी देना पड़ती है। अगर उसको भी असल कीमत ही डालें तो फिर दोनों में फ़र्क़ क्या हुआ?

iii. सज़ा भी यानी जिस्मानी सज़ा और जुर्माना दोनों आ़इद किये जायेंगे, इसलिये कि कुछ लोग जिस्मानी सज़ा से बहुत बचते हैं, जुर्माने की परवाह नहीं करते और कुछ लोग कंजूस। दमड़ी न जाये चाहे चमड़ी जाये' का मिस्दाक़ होते हैं, इसलिये दोनों क़िस्म की सज़ा जारी फ़रमाई गई ताकि हर क़िस्म के लोग इबरत हासिल करें। खलियान से फल उठाना ज़रूरत के लिये भी जायज़ नहीं क्योंकि वह हक़ीक़तन चोरी है। अगर वह मुक़र्ररा हद तक पहुँच गया तो हाथ काट दिया जायेगा। कम होगा तो दुगनी क़ीमत और सज़ा दोनों भुगतनी पड़ेंगी।


चोर का हाथ काटकर उसका पैर काटना

हज़रत हारिस-बिन-हातिब रज़ि० से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ के पास एक चोर लाया गया। 

आपने फ़रमाया: उसे क़त्ल कर दो।  

लोगों ने कहा : अल्लाह के रसूल ﷺ इस ने तो चोरी की है? 

आपने फ़रमाया: उसे क़त्ल कर दो।  

लोगों ने फिर कहा : अल्लाह के रसूल! इसने तो सिर्फ़ चोरी की है? 

आपने फ़रमाया:  इसका हाथ काट दो।   

उसने फिर चोरी कर ली। फिर उसका पाँव काट दिया गया। फिर उसने हज़रत अबू-बक्र रज़ि० के दौर में चोरी कर ली यहाँ तक कि एक-एक करके उसके चारों हाथ-पाँव काट दिये गए। फिर उसने पाँचवीं बार चोरी कर ली। 

हज़रत अबू-बक्र रज़ि० ने फ़रमाया: रसूलुल्लाह ﷺ को इस (की हैसियत का ख़ूब इल्म था। तभी तो आपने (पहली बार ही फ़रमाया था : इसे क़त्ल कर दो।  

फिर हज़रत अबू-बक्र रज़ि० ने उसे कुछ क़ुरैशी नौजवानों के सिपुर्द कर दिया कि उसे क़त्ल कर दें। उन नौजवानों में हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-ज़ुबैर रज़ि०‌ भी शामिल थे। वो हुकूमत के बड़े शौक़ीन थे। वो कहने लगे : तुम मुझे अपना (वक़्ती) अमीर बना लो। उन्होंने उनको अमीर बना लिया। जब वो उसे मारते थे तब दूसरे मारते थे यहाँ तक कि इस तरह उन्होंने  उस चोर को क़त्ल कर दिया। [अल बैहक़ी: 8/272, सुनन नसाई: 4980] 

वज़ाहत: 

i. इसे क़त्ल कर दो' आपका मक़सूद क़त्ल का हुक्म न था बल्कि ये आपकी पेशगोई थी कि उसका अंजाम कार क़त्ल होगा, जो उसके हक़ में पूरी हुई। ये भी मुमकिन है कि आपको बज़रिय-ए-वह्य बता दिया गया हो कि ये शख़्स बाज़ नहीं आयेगा और बिल आख़िर उसे क़त्ल करना पड़ेगा, इसलिये आपने पहली बार ही क़त्ल का हुक्म दिया। सहाब-ए-किराम ने आपके हुक्म की तामील में तरद्दुद इसलिए किया कि आप  ने ख़ुद चोर की सज़ा हाथ काटना बताई थी। वह समझते कि आपको उसके जुर्म का सही अन्दाज़ा नहीं हुआ, इसलिये सहाबा ने जब उसके जुर्म की दोबारा वजाहत की तो आपने उसका हाथ काटने का हुक्म दिया।

ii. पाँव काट दिया गया' कुरअ़न मजीद में चोरी की सज़ा में सिर्फ़ हाथ काटने का ज़िक्र है, इसलिये कुछ लोग चोरी की सज़ा में पाँव काटने के क़ाइल नहीं लेकिन जुम्हूर अहले इल्म पाँव काटने के क़ाइल हैं कि दूसरी चोरी पर बायाँ पाँव काट दिया जाये। फिर चोरी कर ले तो बायाँ हाथ और फिर चोरी करे तो दायाँ पाँव। अगर पाँचवीं दफ़ा चोरी करे तो उसे जेल में डाल दिया जाये। कुछ पाँचवीं दफ़ा चोरी पर क़त्ल के क़ाइल हैं जैसा कि इस हदीस में है। कुछ अहले इल्म एक हाथ और एक पाँव के बाद क़तअ के क़ाइल नहीं क्योंकि इस तरह वह बिल्कुल अपाहिज हो जायेगा और अपने कामकाज के काबिल भी नहीं रहेगा। न खा पी सकेगा, न इस्तिन्जा कर सकेगा और न दूसरे काम ही कर सकेगा। आख़िर ये काम कौन करेगा? जुम्हूर अहले इल्म की दलील आयते मुहारबा भी है। इसमें फ़सादी लोगों के लिये हाथ पाँव काटने का सरीह जिक्र है। 

अल माइदाः 33 में हाथ पाँव का हुक्म एक है, लिहाज़ा जुम्हूर का मस्लक ही सही है।


कितनी मालियत की चीज़ चुराने पर हाथ काटा जायेगा?

रसूलुल्लाह ﷺ ने एक ढाल पर हाथ काटा था जिसकी क़ीमत तीन दिरहम थी। [सहीह बुखारी: 6794,6795,6795]

हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-उमर रज़ि० बयान करते हैं कि नबी ﷺ ने एक चोर का हाथ काट दिया था जिसने औरतों वाले छप्पर से एक ढाल चुराई थी जिसकी क़ीमत तीन दिरहम थी। [सुनन नसाई: 4913]

वज़ाहत: दीगर सही रिवायात में ढाल की क़ीमत तीन दिरहम बयान की गई है। जबकि कुछ अहदीस पाँच दिरहम की भी है लेकिन वो अहदीस सख़्त ज़ाईफ  हैं। अगरचे डाल की क़ीमत मुख्तलिफ़ हो सकती है वैसे अगर दोनों रिवायात सही हों तब भी कोई फर्क न पड़ता क्योंकि तीन दिरहम या उससे ज्यादा में हाथ काटा जाता है। अगर कोई चीज़ सौ दिरहम की हो तो उसमें भी काटा जायेगा, अगर लाख दिरहम की हो तब भी, लिहाज़ा पाँच दिरहम में हाथ काटने से तीन दिरहम में हाथ काटने की नफ़ी नहीं होती। अलबत्ता तीन दिरहम से कम में हाथ काटने का कहीं ज़िक्र नहीं।


By Team Islamic Theology

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