आज़माईश और मुसलमान (पार्ट -3)
अक्सर मुसलमानों को यह शिकायत रहती है कि अल्लाह को हम अपना रब हम मानते हैं, उसके आदेश का पालन हम करते हैं, उसके बताए हुए रास्ते पर हम चलते हैं, नमाज़ हम पढ़ते हैं, रोज़ा हम रखते हैं, ज़कात हम देते हैं, हज्ज व उमरा हम करते हैं, दान सदक़ा हम देते हैं फिर भी हम पर ही मुसीबत क्यों आती है? परेशानियां हमारा पीछा क्यों नहीं छोड़तीं? दुनिया में हमारा सम्मान क्यों नहीं होता? हमीं हर वस्तु से महरूम क्यों रहते हैं ? इक़बाल ने मुसलमानों को इस शिकायत को यूं बयान किया हैं,
बर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों पर।
इसके विपरीत वह लोग जो अल्लाह के आदेश की अवहेलना करते हैं, उसका शुक्र अदा नहीं करते, उसकी पूजा नहीं करते बल्कि उसका इनकार करते हैं या उसके साथ शरीक करते हैं वह संसार में मज़े से हैं हर वस्तु उनके पास है, वह सुकून से यहां रहते हैं उनके यहां किसी वस्तु की कमी नहीं है।
ऐसी सोच रखने वाले हक़ीक़त में क़ुरआन नहीं पढ़ते या अगर पढ़ते भी हैं तो उसका अर्थ नहीं समझते बल्कि उसे समझना ही नहीं चाहते यहांतक कि जो क़ुरआन के हाफ़िज़ होते हैं वह भी क़ुरआन को पढ़ते हैं उनकी आवाज़ बहुत अच्छी और दिलकश होती हैं लेकिन उनमें कभी यह जानने की जिज्ञासा नहीं होती इस क़ुरआन में क्या है? वरना यह जान लेते कि जो व्यक्ति अल्लाह से जितना क़रीब होता है उसकी आज़माइश उतनी ही सख़्त होती है।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : सबसे ज़्यादा आज़माइश अंबिया और रसूलों पर आती है। फिर जो उनके बाद मर्तबे में हैं, फिर जो उनके बाद हैं, बन्दे की आज़माइश उसके दीन के मुताबिक़ होती है। अगर बन्दा अपने दीन में सख़्त है तो उसकी मुसीबत भी सख़्त होती है और अगर वह अपने दीन में नर्म होता है तो उसके दीन के मुताबिक़ मुसीबत भी होती है। फिर मुसीबत बन्दे के साथ हमेशा रहती है। यहाँतक कि बन्दा ज़मीन पर इस हाल में चलता है कि उस पर कोई गुनाह बाक़ी नहीं रह जाता। (जामे तिर्मिज़ी 2398)
अंबिया से ज़्यादा अल्लाह से क़रीब कौन हो सकता है क़ुरआन मजीद में मुख़्तलिफ़ अंबिया के वाक़िआत बयान हुए हैं यदि क़ुरआन मजीद को समझकर पढ़ा जाय तो भली भांति स्पष्ट हो जाएगा कि जो व्यक्ति अल्लाह से जितना क़रीब होता है। इसको आज़माइश उतनी ही सख़्त होती है।
इब्राहीम अलैहिस्सलाम अल्लाह के एसे सच्चे नबी थे जिन्हें अल्लाह ने अपना ख़लील (दोस्त) क़रार दिया है। जब उन्होंने अपने ईमान का इज़हार किया तो उन्हें पहले क़ौम की गालियां सुननी पड़ीं ख़ुद उनके पिता ने घर से निकालने की धमकी दी। जब उनके ईमान की सूचना राजा नमरूद को पहुंची और और वह इब्राहीम अलैहिस्सलाम के सवाल से "मेरा रब तो वह है जो सूरज को पूरब से निकलता है तुझे अगर ख़ुदाई का दावा है तो उसे ज़रा पश्चिम से निकाल कर दिखा दे।" [सूरह अल बक़रह (02) आयत 258] वह लाजवाब हो गया तो आग की चिता जलाई जब आग के शोले आसमान से बात करने लगे तो इब्राहीम अलैहिस्सलाम को उसी आग में फेंक दिया गया, लेकिन अल्लाह के हुक्म से आग से उन्हें कोई नुक़सान नहीं पहुंचा।
आग कर सकती है अंदाज़े गुलिस्तां पैदा।
अब वतन में रहने के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी जिस ज़मीन पर आंख खोली थी मासूम बचपन गुज़रा था वह ज़मीन उनके के लिए तंग हो गई चुनांचे वतन घर बार छोड़ना पड़ा उन्होंने ने ख़ुशी ख़ुशी यह दुख भी सहन किया। वह अपनी पत्नी सारा और भतीजे लूत के साथ घर छोड़कर निकले, रास्ते में लूत अलेहिस्सलाम को वर्तमान जार्डन में क़ौम सदूम की तरफ़ नबी बनाकर भेज दिया गया। अब यह पति पत्नी ही रह गये अभी तक इब्राहीम अलैहिस्सलाम के कोई औलाद न थी रास्ते में मिस्र देश पड़ता था उन्हें मिस्र से होकर ही गुज़रना था जहां फ़िरऔन की हुकूमत थी फ़िरऔन ने उनकी ख़िदमत के लिए एक लड़की गिफ़्ट की जिससे इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने विवाह कर लिया। इब्राहीम की इस बीवी का नाम हाजिरा था, जब हाजिरा की गोद में एक बच्चे का जन्म हुआ का जन्म हुआ तो मां और बेटे को उस स्थान पर छोड़ने का आदेश हुआ जहां न चारा था न पानी था जहां अपने जीवन को बाक़ी रखने के लिए कोई जीविका नहीं थी। जबकि पहली पत्नी सारा को सीरिया छोड़ने के लिए का हुक्म दिया गया। गौर करने की बात यह है कि एक पत्नी और बच्चा मक्का में और दूसरी पत्नी सीरिया में। इब्राहीम अलैहिस्सलाम कभी सीरिया में होते और कभी मक्का में यह उस समय की बात है जब सवारी का कोई प्रबंध नहीं था सड़क आज की जैसी नहीं थी सफर इतना सरल न था, रास्ते में खाने-पीने का सामान मिलना आसान न था, जंगल थे जहां दरिंदों का बसेरा था, ऊंचे ऊंचे पहाड़ थे, टेढ़े मेढ़े रास्ते थे, हर क़दम पर ख़तरा ही ख़तरा था।
इब्राहीम अलैहिस्सलाम की आयु जब 80 वर्ष से अधिक थी तो इस्माईल की शक्ल में उनके यहां बच्चे का जन्म हुआ।उस बच्चे से कितना प्यार करते होंगे इब्राहीम अलैहिस्सलाम परंतु जब वह बच्चा बड़ा हुआ इब्राहीम अलैहिस्सलाम को ख़्वाब ब में आदेश दिया गया कि वह अपने इकलौते बच्चे को अल्लाह की राह में क़ुर्बान कर दें। इब्राहीम तो अल्लाह की आज्ञाकारी थे अल्लाह की ख़ुशी के सिवा जीवन का कोई और मक़सद न था उन्होंने तत्काल सर झुका दिया सीरिया से मक्का पहुंचे और बच्चे से अपना ख़्वाब बयान किया तथा उससे मशविरा तलब किया। बच्चा भी किसका सुपुत्र था फ़ौरन बोल उठा ऐ अब्बा जान अगर आदेश अल्लाह का है तो फिर सोच विचार क्या की क्या आवश्यकता है। हे पिता! आप इसी समय उस आज्ञा का पालन करें। इब्राहीम ने मिना की पहाड़ी पर अपने प्यारे बेटे इस्माईल को लेटाकर छुरी चला दी लेकिन अल्लाह को तो केवल आज़माइश मक़सूद थी जैसे ही इस्माईल पर छुरी चली फरिश्ते ने फ़ौरन एक मेंढा इस्माईल की जगह पर ला कर रख दिया।
क्या किसी को फिर किसी का इम्तिहां मक़सूद है।
युसूफ अलैहिस्सलाम की आज़माइश का सिलसिला तो बचपन से ही शुरू हो गया था उन्हें बचपन में उनके सौतेले भाइयों ने अंधे कुएं में डाल दिया, कुएं से निकले तो मिस्र के बाज़ार में बिके अज़ीज़ मिस्र उन्हें ख़रीद कर घर लाया तो वहां अज़ीज़ ए मिस्र की पत्नी के द्वारा नई आज़माइश से गुज़ारा गया उनका पूरा किरदार ही दाव पर था। अज़ीज़ ए मिस्र की पत्नी के जाल से वह बच तो गए परंतु एक ऐसा व्यक्ति जिसकी बेगुनाही साबित हो चुकी थी उसे ही जेल की सलाख़ों के पीछे धकेल दिया गया जहां वह कई वर्ष पड़े रहे जिसके बाद उन्हें वित्त और खाद्य मंत्री बनाकर उनका सम्मान किया गया।
यहां केवल यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की आज़माइश नहीं हुई बल्कि उनके पिता याक़ूब भी ख़ूब आज़माए गए उनका बेटा यूसुफ़ जिनके भविष्य के बारे में उन्हें बड़ी उम्मीदें थी वह ग़ायब हो गया उसके ग़म में रोते रहे रोते रहे यहांतक कि दूसरा बेटा बिन्यामीन भी चोरी के इल्ज़ाम में भी मिस्र में रोक लिया गया और तीसरे बेटे ने घर वापस लौटने से इनकार कर दिया कि हमने अपने पिता से बिन्यामीन की हिफ़ाज़त तथा उसे अपने साथ वापस ले जाने की क़सम खाई इसलिए वह भी रुक गया कि वह ख़ुद को अपने पिता को मुंह दिखाने के क़ाबिल नहीं समझता था। तीन-तीन बेटों का ग़म याक़ूब को झेलना पड़ा परंतु वह अल्लाह से बराबर दुआ करते रहे और आज़माइश का यह सिलसिला समाप्त होकर विशाल ख़ुशी में तब्दील हो गया।
अल्लाह तआला ने अय्यूब अलैहिस्सलाम को चौपाये, मवेशी, खेत और हर चीज़ अता किया था उसके साथ साथ उन्हें ख़ुश रखने वाली औलाद से भी नवाज़ा था। चुनांचे उनको इन तमाम चीज़ों में आज़माया गया यहांतक कि आख़िरी चीज़ भी हाथ से निकल गई फिर उनके शरीर को (किसी बीमारी में डाल कर) आज़माया गया। उनके पास दिल और ज़बान के इलावा कुछ भी बाक़ी नहीं रहा। उनके साथी उनका साथ छोड़ गए और वह एक कोने में अकेले और तन्हा रह गए। उनकी पत्नी (जो उनकी ख़िदमत करती थीं) के इलावा लोगों में से कोई भी बाक़ी नहीं रहा जो उनसे मुहब्बत से पेश आता, पत्नी भी मुहताज हो गईं उन्हें अपने गुज़ारे के लिए लोगों के घरों में काम करना पड़ा। वह बनी इस्राईल की इबादतगाह में पड़े रहे और चौपाये उनके जिस्म के पास से गुज़रते रहे।
तमाम मुसीबत और परिशानियों के बावजूद अय्यूब अलैहिस्सलाम ने सब्र किया और बराबर शुक्र अदा करते रहे। उनकी ज़बान पर हमेशा अल्लाह का ज़िक्र होता और शुक्र अदा करते रहते, कभी शिकायत नहीं करते, न उकताहट महसूस करते, न तंगी का रोना रोते और न ग़ुस्सा आता। इसी हालत में कई वर्ष मुसलसल बीत गए। फिर उन्होंने दुआ की
اَیُّوْبَ اِذْ نَادٰى رَبَّهٗۤ اَنِّیْ مَسَّنِیَ الضُّرُّ وَ اَنْتَ اَرْحَمُ الرّٰحِمِیْنَ
"मेरे रब मुझे बीमारी लग गई है और तू रहम करने वालों में सबसे बढ़कर रहम करने वाला है।"
(सुरह 21 अल अंबिया आयत 83)
अल्लाह ने उनकी दुआ क़ुबूल की और उनके जिस्म को पहले जैसा ठीक कर दिया और उन्हें तथा उनके घर वालो को सुकून दिया, उनकी तमाम दौलत उन्हें लौटा दिया बल्कि हर चीज़ में बरकत अता की कि पहले से भी कई गुना बढ़ोतरी हो गई।
जारी है.....
आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही
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