इस्लाम में सास-बहू का रिश्ता
एक मोहब्बत या तनाव?
घर की बुनियाद मोहब्बत, रहमत और आपसी ताल्लुक़ात पर क़ायम होती है। हर रिश्ते का अपना एक मक़ाम और अहमियत है। जिस तरह माँ-बाप, औलाद और शौहर-बीवी के हुक़ूक़ बयान किए गए हैं, उसी तरह शादी के बाद बनने वाले रिश्ते जैसे "सास और बहू" भी इस्लाम में अहमियत रखते हैं।
आजकल अक्सर हम सुनते हैं कि सास-बहू का रिश्ता ठीक नहीं रहता। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े, गलतफहमियाँ, और कभी-कभी तो नफरत तक पैदा हो जाती है। लेकिन क्या यही इस्लाम सिखाता है?
चलिए जानते हैं कि इस्लाम सास और बहू के रिश्ते को कैसे देखता है, और आज के दौर में इस रिश्ते में कहाँ गलती हो रही है।
1. इस्लाम क्या कहता है?
इस्लाम में रिश्तों को बहुत अहमियत दी गई है। सास हो या बहू दोनों औरतें हैं, दोनों किसी की माँ, बेटी, बहन हैं। अल्लाह तआला ने हर इंसान को इज़्ज़त देने का हुक्म दिया है।
कुरआन में है:
"अपने घर वालों से अच्छा सुलूक करो" [सूरह अन-निसा 4:36]
और रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"बेहतरीन इंसान वो है जो अपने घर वालों के साथ अच्छा बर्ताव करता है।" [इब्न माजह 1977]
इसमें सास और बहू दोनों शामिल हैं।
2. सास का किरदार इस्लाम की नज़र में
सास का रिश्ता दरअसल माँ जैसा है, और बहू उसके घर में आने वाली बेटी की तरह है। अगर दोनों अपने किरदार को इस्लामी उसूलों के मुताबिक निभाएँ तो घर जन्नत का नमूना बन सकता है।
ii. घर की रहनुमाई (Guidance): सास अपने तजुर्बे और हिकमत से घर को सँभालने और रिश्तों को मज़बूत बनाने में अहम किरदार निभाती हैं। लेकिन इस्लाम ये भी तालीम देता है कि सास हिकमत और नर्मी से बहू के साथ पेश आए, जबरदस्ती या सख्ती से नहीं।
iii. मोहब्बत और रहमत: सास का असल किरदार ये है कि बहू को बेटी की तरह अपनाएँ, उस पर रहमत करें और उसकी गलतियों को माफ़ करने वाली बनें।
iv. फ़ितना से बचाव: सास को चाहिए कि बहू और बेटे के बीच फ़साद या तकरार की वजह न बने, बल्कि सुलह और मोहब्बत का ज़रिया बने।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया कि "मुमिन वो है, जिससे लोग ख़ैर की उम्मीद रखें और जिसके हाथ और ज़ुबान से लोग महफ़ूज़ रहें।" [तिर्मिज़ी 2557]
v. अख़लाक़ी मिसाल: सास अपने अच्छे अख़लाक़ और इंसाफ़ से पूरे घर को मोहब्बत और सक़ून की जन्नत बना सकती हैं। उनका किरदार एक माँ और एक बुज़ुर्ग की हैसियत से पूरे खानदान की इस्लाही रहनुमाई का होना चाहिए।
3. बहू का किरदार इस्लाम की नज़र में
बहू को भी चाहिए कि वो सास को इज़्ज़त दे, उनकी उम्र का लिहाज़ करे और जैसे अपनी माँ के साथ पेश आती है वैसे ही सास के साथ भी।
इसका लागू होना घर के रिश्तों पर भी है कि बहू सास को कभी तकलीफ़ न दे।
ii. खिदमत और मदद करना: अगर सास बुज़ुर्ग हों या काम में मदद चाहें तो बहू का हुस्न-ए-अख़लाक़ यह है कि वो ख़ुशी से खिदमत करे।
सास दरअसल शौहर की माँ है, तो उनके साथ एहसान करना भी इसी में शामिल है।
iii. नर्मी और मोहब्बत से पेश आना: बहू का असल किरदार यह है कि वो सास के साथ तल्ख़ी या बदज़बानी न करे, बल्कि मोहब्बत और नर्मी से पेश आए।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: “अल्लाह नर्मदिल और बर्दाश्त करने वाले शख़्स को पसंद करता है।” [मुस्लिम: 2593]
iv. फ़साद से बचना: बहू को चाहिए कि वो सास और शौहर के रिश्ते में दख़ल या फ़साद पैदा करने वाली न बने। बल्के सास और शौहर के हक़ूक़ का एहतराम करे और घर को मोहब्बत और सुकून की जगह बनाए।
v. दुआ और शुक्रगुज़ारी: बहू अगर अपनी सास को रहमत और तजुर्बे का ज़रिया समझकर उनकी दुआएँ ले, तो घर में बरकत आती है।
4. आजकल के दौर में क्या हो रहा है?
आज के दौर में:
- TV ड्रामे, सोशल मीडिया और पड़ोस की बातें रिश्तों में ज़हर घोल रही हैं।
- बहू को लगता है सास उसे कंट्रोल करना चाहती है।
- सास को लगता है बहू उसकी बात नहीं मानती।
- दोनों तरफ़ से एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश होती है।
5. हल क्या है?
इस्लाम के उसूल अपनाएं:
- नीयत साफ रखें: नीयत अच्छी होगी तो रिश्ता खुद-ब-खुद अच्छा रहेगा।
- तहज़ीब से बात करें: जो बात आप चीखकर कहती हैं, वही बात प्यार से कहेंगी तो असर ज़्यादा होगा।
- दूसरे की बात भी सुनें: एक-दूसरे को समझें, सिर्फ अपनी बात न मनवाएं।
- शुक्रगुजार बनें: छोटी-छोटी चीज़ों के लिए भी "शुक्रिया" कहना रिश्ते को मज़बूत बनाता है।
- दीन को जिंदगी में लाएं: नमाज़, सब्र, और अच्छे अख़्लाक़ से रिश्ते सँवर जाते हैं।
सास-बहू का रिश्ता अगर समझदारी और मोहब्बत से निभाया जाए, तो ये घर के लिए जन्नत बन सकता है। लेकिन अगर अहंकार, ताने और शक के साथ निभाया जाए, तो यही रिश्ता जहन्नम का माहौल भी बना सकता है।
इस्लाम हमें सिखाता है, “दूसरों के लिए भी वही पसंद करो जो तुम अपने लिए पसंद करते हो।”
तो क्यों न हम अपने घर की औरतों को दुश्मन ना बनाएं, बल्कि एक-दूसरे का सहारा बनाएं?
By Islamic Theology

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