Gunahon se kaise bache?

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गुनाहों से कैसे बचें?

इस दुनिया में हर इंसान अल्लाह तआला की तरफ़ से एक इम्तिहान में है। हमारे सामने हर वक़्त दो रास्ते होते हैं, 

  • एक नेकियों का, 
  • दूसरा गुनाहों का। 

हमारी कामयाबी इसी में है कि हम गुनाहों से बचें, और अल्लाह के बताये रास्ते पर चलने की कोशिश करें।

गुनाह एक ऐसी चीज़ है जो धीरे-धीरे इंसान के दिल को सख्त कर देता है, उसकी ज़िन्दगी से बरकतें कम कर देता है, और आखिरत को ख़तरे में डाल देता है।


1. गुनाह होता क्या है?

गुनाह हर वो काम है जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की नाफरमानी में आता है। जैसे:

  • झूठ बोलना
  • नमाज़ छोड़ना
  • गाली देना
  • चोरी करना
  • किसी का दिल दुखाना
  • नजर की हिफाज़त न करना
  • रिश्वत, गीबत, हसद वग़ैरह

2. लोग गुनाह क्यों करते हैं?

i. दीन का इल्म न होना: जब इंसान को सही-गलत का इल्म नहीं होता, तो वो गुनाह को गुनाह ही नहीं समझता।

ii. नफ़्स और शैतान का धोखा: अपनी ख्वाहिशों पर काबू न रखना। दिल की ख्वाहिशें और शैतान मिलकर इंसान को बहकाते हैं।

iii. बुरे माहौल का असरअगर हम बुरे लोगों की सोहबत में हैं, तो गुनाहों की आदतें अपनाना आसान हो जाता है।

iv. गुनाहों को हल्का समझना: "बस इतना सा ही तो किया है" सोचकर बार-बार गलती करना। लोग कहते हैं – "थोड़ा झूठ ही तो बोला", "सब करते हैं", ये सोच बहुत ख़तरनाक होती है।

v. दीन से दूरी: ना नमाज़, ना कुरान, ना तौबा… फिर गुनाह आम बात लगती है।


3. गुनाहों से कैसे बचें?

i. नमाज़ की पाबंदी करें: जब हम नमाज़ पढ़ते हैं तो अल्लाह से जुड़ते हैं, और इससे दिल में गुनाह की नफ़रत पैदा होती है। यानी, जब इंसान अल्लाह से जुड़ता है, तो वो खुद को बुरे कामों से बचाना चाहता है। नमाज़ दिल की सफाई करती है।

अल्लाह तआला का इरशाद है, "नमाज़ इंसान को बुराई और बेहयाई से रोकती है।" [सूरह अल-ʿअन्कबूत (29:45)]

ii. अच्छे दोस्तों का साथ चुनें: अच्छे दोस्त और अच्छी सोहबत, जैसा माहौल होगा, वैसा असर पड़ेगा। अगर दोस्त नमाज़ी, परहेज़गार और शरीफ हैं तो गुनाह से बचना आसान होगा।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया, “इंसान अपने दोस्त के दीन पर होता है” [सुनन अबू दाऊद 4833; जामे तिर्मिज़ी 2378]

अगर आपके दोस्त नमाज़ी हैं, कुरान पढ़ते हैं, अच्छे अख़लाक़ वाले हैं, तो वो आपको भी बुराई से रोकेंगे। लेकिन अगर दोस्त गुनाह में डूबे हुए हैं, तो बचना मुश्किल है।

iii. अकेलेपन और फुर्सत से बचें: अकेलापन कभी-कभी गुनाहों का दरवाज़ा खोलता है। जब इंसान तन्हा होता है, तो शैतान उसे बहकाता है। इसलिए मशरूफ़ रहो, दीन के कामों में, घर के कामों में, नेकियों में। बेवजह मोबाइल, इंटरनेट या ग़लत तन्हाई में मत रहो।

iv. कुरान और हदीस पढ़ें और समझें: गुनाह से बचने की सबसे बड़ी ताक़त है इल्म। रोज़ थोड़ा-थोड़ा कुरान पढ़ो और समझो। जब हमें इल्म होगा कि कौन सा काम अल्लाह को पसंद है और कौन सा नहीं, तो हम गुनाह से डरने लगेंगे।

v. तौबा को आदत बनाएं: रोज़ाना दिल से तौबा करें, चाहे गुनाह छोटा हो या बड़ा।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया, "ऐ लोगो! अल्लाह से तौबा करो, बेशक मैं ख़ुद रोज़ाना सौ (100) बार तौबा करता हूँ।" [सहीह मुस्लिम 2702]

"हर इंसान ग़लती करता है, लेकिन सबसे अच्छा वो है जो तौबा करता है।" [सुन्नन तिर्मिज़ी 2499; इब्न माजह 4251]

vi. आख़िरत को याद रखें: जब हमें याद रहेगा कि एक दिन हमें अल्लाह के सामने हिसाब देना है, तो हम अपने कदम संभाल कर रखेंगे। क़ब्र, क़यामत, जन्नत, जहन्नम का इल्म दिल को गुनाहों से दूर रखता है।

vii. नज़र और दिल की हिफाज़त करें: गुनाह की शुरुआत अक्सर नज़र से होती है। हराम चीज़ें देखने से बचें, गलत चीज़ें ना सोचें। आजकल मोबाइल, इंटरनेट, टीवी पर बहुत कुछ देखने को मिलता है जो दिल को गंदा कर देता है। अपने नज़र की हिफाज़त करो, क्योंकि जहाँ नज़र जाती है, दिल भी वहीं चला जाता है।


4. अगर गुनाह हो ही जाए तो?

इंसान से गलती होना फितरत का हिस्सा है। कोई भी इंसान ऐसा नहीं जो ज़िन्दगी में कभी गुनाह ना करे। लेकिन समझदारी इसी में है कि हम गुनाहों से बचने की कोशिश करें और अगर गुनाह हो जाए तो तौबा करें। इस्लाम हमें सिखाता है कि गुनाहों से बचना ही असल कामयाबी है। अगर गुनाह हो भी जाए, तो 

i. तौबा करें: सच्चे दिल से अल्लाह से माफ़ी मांगो।

ii. गुनाह दोहराने से बचें: गुनाह दोबारा न करने का इरादा करो।

iii. नेक काम करें: अच्छे अमल पुराने गुनाहों को मिटा सकते हैं इसलिए अच्छे काम करो ।                                  

गुनाह से बचना मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन नहीं। अगर हम सच्चे दिल से कोशिश करें, अच्छे लोगों के साथ रहें, अल्लाह से जुड़ें, तो अल्लाह हमारी मदद जरूर करता है।


अल्लाह से दुआ है कि हमें हर किस्म के गुनाहों से महफूज़ रखे और नेक रास्ते पर चलाए।  हर ज़ाहिरी और बातिनी गुनाह से बचा, और हमेशा हिदायत पर कायम रख। 

आमीन।


By Islamic Theology

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