Allah se dhokha aur bagawat (part-5) | 5. Quran ka inkar

Allah se dhokha aur bagawat (part-5) | 5. Quran ka inkar


अल्लाह से धोका और बगावत (मुसलमान ज़िम्मेदार)

5. सुन्नत ए नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से हटकर इमामो की अंधाधुन तकलीद 

5.5. तकलीद इंसान को कहाँ तक ले जाती है की वो कुरान हदीस का भी इंकार कर देता हैं 


एक बार की बात है में एक मुकल्लिद जो की अबू हनीफा की तकलीद करता था उससे मुनाजरा (debate) कर रहा था टॉपिक था नमाज में सूरेह फातिहा पढ़ना कैसा? 

इस पर मैंने उसे एक हदीस बताई, मैंने कहा हमारा ये मानना है नमाज में सूरह फातिहा पढ़ना वाजिब है जिसने नमाज में सुरेः फातिहा न पढ़ी उसकी नमाज़ नही होती इस बात पर मैंने नबी करीम की हदीस दी,  नबी करीम ने फरमाया,

لَا صَلَاةَ لِمَنْ لَمْ يَقْرَأْ بِفَاتِحَةِ الْکِتَابِ

"जिसने नमाज में सूरेह फातिहा नही पढ़ी उसकी नमाज़ नहीं हुई।" [बुख़ारी किताबुल अज़ान 756]

इसके तहत मैंने उससे कहा की इस हदीस से रसूल से साबित होता है कि नमाज में सूरेह फातिहा लाज़िम है अब चाहिए तो ये था की वो हदीस ए रसूल आ जाने के बाद अपनी तमाम इख्तेलाफ को छोड़ कर हदीस अपना ले लेकिन उसका जवाब ये था कि देखें हदीस तो ठीक है अपनी जगह लेकिन क्योंकि फिक्ह ए हंफी में नमाज़ में सूरेह फातिहा पढ़ना नमाज़ी के लिए जायेज़ नहीं बल्कि इमाम के लिए जायेज़ है। 

इस पर मैंने उससे कहा पर हदीस में तो न इमाम का जिक्र है ना नमाज़ी का बल्कि साफ लफ्जो में कहा गया है कि जिसने नमाज़ में सूरेह फातिहा न पढ़ी उसकी नमाज़ नहीं न इसमें इमाम का जिक्र है ना नमाज़ी का तो आपने हदीस को अपने अल्फाज़ क्यों पहना दिए?

वो बोला भाई तमाम दलाइल को जमा किया जाता हैं तब जाकर मसला समझ आता है।  

मैनें कहा कौनसी ऐसी दलील हैं जो हदीस के खिलाफ है?

उसने कुरान से एक आयत पेश की, 

अल्लाह फरमाता है,

"जब कुरान पढ़ा जाए तुम ख़ामोश रहो और कान लगा कर सुनो ताकि तुम पर रहम किया जाए।" [सूरह आराफ 204]

इसके बाद उसने कहा देखो इस आयत में साबित हो रहा है कि जब कुरान पढ़ा जाए खामोश हो जाओ यही हम करते हैं जब इमाम कुरान पढ़ता है तो हम खामोश रहते कुछ बोलते नहीं इस आयत से साबित होता है की  इमाम के पीछे कुछ नहीं पढ़ा जाएगा खामोश रहा जाएगा इसीलिए हम मुकल्लिद सूरेह फातिहा नहीं पढ़ते। 

तो ये था उस मुकल्लिद का जवाब हदीस ए रसूल को ठुकराने के लिए कैसे कैसे मंतिक लगा दिया आइए देखते हैं उसके इस सुवाल का क्या जवाब है?

मैंने तीन तरह से जवाब देने की कोशिश की आपके सामने तीनो रखता हूँ :


पहला जवाब :

मैंने उससे कहा अगर इमाम कुरान पढ़ रहा होता हैं और आप कुछ बोल नहीं सकते खामोश रहेंगे तो मुझे दो बात का जवाब दें:

मान लो आप नमाज में देर से आए और इमाम कुरान की तिलावत शुरू कर दिया अब आपको नमाज़ में शामिल होना है तो कैसे शामिल होंगे? 

वो बोला अल्लाहु अकबर कहकर। 

मैंने कहा जब आपको खामोश रहने का हुक्म है तो अल्लाहु अकबर कैसे कहेंगे? क्योंकि इमाम कुरान पढ़ रहा है और आपको खामोश रहना है नमाज में शामिल होने के लिए अगर अल्लाहु अकबर कहेंगे तो आपके उसूल के मुताबिक़ आप खामोश नहीं रहेंगे अब वो ला जवाब हो गया और सोचने पर मजबूर हो गया फिर उसके गुस्से में आकर कहा अरे भाई! हम बुलंद आवाज से अल्लाहु अकबर थोड़ी ना कहते धीमी आवाज से कहते हैं इससे कुरान की मुखालिफत नहीं होगी मैंने कहा सुभान अल्लाह आपने मेरी बात कह दी। 

हम भी सूरेह फातिहा इमाम के पीछे बुलंद आवाज से नहीं पढ़ते धीमी आवाज से पढ़ते हैं इससे हदीस पर भी अमल हो जाएगा और कुरान की आयत पर भी अब वो पूरा ला जवाब हो गया था। 


दूसरा सुवाल :

आप मुकल्लिद का ये उसूल है कि जब इमाम फज्र की नमाज पढ़ा रहा हो और नमाज़ी लेट हो जाए तो पहले आप सुन्नत पढ़ते हैं बाद में इमाम के साथ नमाज में दाखिल होते हैं तो अब आप बताए मान लो आप की एक रकअत इमाम के साथ रह गई और आप फज्र की सुन्नत पहले पढ़ते हैं अब इमाम मस्जिद में कुरान पढा रहा होता है और आप सुन्नत अलग से पढ़ते हो तो आप नमाज को ख़ामोश रहकर कैसे पढ़ते हो?

इसका भी उसने वही जवाब दिए जो ऊपर दिया गया है धीमी आवाज से पढ़ते हैं।  

हालांकि नबी करीम की हदीस है की जब फर्ज़ नमाज की इकामत कह दी जाए तो उसके अलावा कोई नमाज न पढ़ो। 


दूसरा जवाब :

सूरेह आराफ की आयत जिसमे खामोश रहने का हुक्म दिया है वो आम आयत है और सूरेह फातिहा खास है और ये उसूल है की आम पर खास भारी होता है इसको मिसाल से समझते हैं। 

कुरान में अल्लाह ने फरमाया हर मुरदार तुम्हारे लिए हराम है यानि हर मुरदार हमारे लिए हराम है ये कुरान का आम (General) हुक्म है लेकिन हदीस में आता है मुरदार मछली और टिड्डी हमारे लिए हलाल है पता ये चला कुरान की आयत आम थी हर मुर्दा जानवर हराम है लेकिन हदीस से दो मुर्दार हलाल हो गए मछली और टिड्डी तो पता चला हदीस जिसमे मछली और टिड्डी हलाल हुई है भले ही मुर्दार हो वो खास दलील है और कुरान जिसमे मुरदार जानवर हराम हुए वो आम दलील है इसमें मछली और टिड्डी खास है। 

ठीक उसी तरह से कुरान पढ़ा जाए खामोश रहो का हुक्म कुरान में हुआ है वो आम है और सूरेह फातिहा खास है और आम पर खास भारी होता है। 

दूसरी बात ये है सूरेह आराफ़ आयत 204 ये मक्की सूरः है और जमात से नमाज़ जो फर्ज हुई वो मदीना में हुई थी तो सवाल ही पैदा नहीं होता की ये आयत इमाम के पीछे खामोश रहने पर दलालत करती है। 

असल बात ये है जब नबी करीम कुरान को पढ़ा करते थे तो काफिर यानी मक्का के मुशरिक कहते थे शोर मचाओ क्योंकि मुहम्मद कुरान पढ़ रहा है इसलिए अल्लाह ने आयत नाजिल की के जब मेरा नबी कुरान पढ़े तुम खामोश रहो ताकि तुम पर रहम हो ये बात मुशरिको के रद में थी मुकल्लिद ने इसको अपने मकसद के तहत ले लिया।  सुभान अल्लाह 


तीसरा सुवाल :

तीसरी बात ये है की जुहर और असर में तो इमाम कुरान बुलंद आवाज से नही पढ़ता तो क्या मुकल्लिद हजरात असर और जोहर में इमाम के पीछे सूरेह फातिहा पढ़ते हैं?

अगर वो कहेगा हां तो बताओ कौनसी दलील है आपके पास कि जुहर और असर में धीमी आवाज से इमाम के पीछे फातिहा पढ़ो तो कहेंगे वही हदीस है जिसमे नबी करीम ने कहा उसकी नमाज़ नहीं जिसने सुरह फातिहा नहीं पढ़ी 

मैंने उससे कहा भाई कुछ देर पहले आप कह रहे थे ये सिर्फ इमाम के लिए हदीस है अब नमाज़ी के लिए भी हो गई? मुकल्लिद बाज़ न आया ला जवाब हो गया।  

फिर मैने जाते जाते एक हदीस पेश की जो मेरा तीसरा जवाब था,

रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़ज्र पढ़ी  आप पर क़िरअत दुश्वार हो गई। नमाज़ से फ़ारिग़ होने के बाद आप ने फ़रमाया : मुझे लग रहा है कि तुम लोग अपने इमाम के पीछे क़िरअत करते हो? हम ने कहा : जी हाँ  अल्लाह की क़सम हम क़िरअत करते हैं। आप ने फ़रमाया : तुम ऐसा न  किया करो सिवाए सूरा फ़ातिहा के; इस लिये कि जो उसे नहीं पढ़ता  उसकी नमाज़ नहीं होती है। [तिर्मिज़ी 311]

इस में साफ है नबी करीम बेहतर जानते थे कुरान पढ़ते वक्त लोगो को खामोश रहना है लेकिन नबी करीम ने फिर भी कहा की सूरेह फातिहा पढ़ा करो।  

अब बताए क्या नबी करीम कुरान नहीं जानते थे? क्या नबी करीम को नहीं पता था के इमाम के पीछे फातिहा पढ़ने से कुरान ने मना किया लेकिन उसके बा वजूद भी नबी मना नहीं कर रहे। 

इसी तरह से लोगो को तक्दलीद के नाम पर धोका दिया जाता है और कुरान हदीस से दूर किया जाता है अभी भी वक्त है दोस्तो और मेरे मुकल्लिद भाईयो कुरान और हदीस को समझे तकलीद न करें कयामत के दिन अल्लाह दोबारा नहीं भेजेगा की आप दोबारा अमल करो।  

बने रहे तकलीद की वजाहत करते रहेंगे। 


आपका दीनी भाई
मुहम्मद रज़ा

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