Muharram-Gumraahi aur shirk

Muharram-Gumraahi aur shirk


गुमराही और शिर्क 


मुहर्रम का महीना शुरू होते ही शीर्क की इंतेहा हद से आगे गुजर जाती है,  जहां भी ताजिया रखी जाती है वहां शिर्क के अड्डे लगते हैं। जहां तक मैंने देखा है, एक पत्थर का चौक बना होता है उसकी रंगाई पुताई होती उसको सजाया जाता है, झंडे लगाए जाते हैं, मनहूस किस्म की रस्में की जाती हैं। औरतें शाम होते ही वहां मेला लगा लेती हैं दिया और अगरबत्ती लेकर, फिर "या इमाम साहेब मुझे औलाद दे दो" और भी बहुत सारी मुरादे जो जिसकी जैसी हाजत होती है वगैरह वगैरह दुआएं करती हैं। अस्तग़्फ़िरुल्लाह 

ये बहुत बड़ा शिर्क है और अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के यहां शिर्क की कोई माफ़ी नहीं है। 

अल्लाह तआला फ़रमाता है :

"जो भी अल्लाह के साथ शिर्क करे, अल्लाह ने उस पर जन्नत को हराम कर दिया है और उसका ठिकाना आग है और इन ज़लिमो के लिए कोई मददगार नहीं।" [सूरह अल माहिदा आयत 72]

शिर्क का सबसे बड़ा नुक़सान ये है कि शिर्क करने वाले पर जन्नत हराम है। 

रसूलअल्लाह ﷺ ने फ़रमाया, “जो कोई इस हाल में मारे की वो अल्लाह के सिवा किसी और को पुकारता हो तो वो जहन्नम में दाख़िल होगा।" [बुख़ारी 4497, मुस्लिम 92]

याद रखें, रोज़ी देने वाला औलाद देने वाला पानी बरसाने वाला, जिन्दगी और मौत देने वाला और सिफा देने वाला सिर्फ़ अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त है न की कोई वली या नबी या फिर इमाम (हसन हुसैन रदी अल्लाहु अन्हुमा)। हर नफा नुकसान का मालिक सिर्फ़ अल्लाह ही है।

इरशादे बारी त'आला है,

"आसमानों और ज़मीन की बादशाही अल्लाह ही के लिए है वो जो चाहता है पैदा करता है जिसे को चाहता है बेटियाँ देता है और जिसे चाहता है बेटे देता है, या दोनो मिलाकर देता है। बेटे भी और बेटियाँ भी और जिसे चाहे बांझ कर देता है वो बड़े इल्म वाला और कमाल कूदरत वाला है। [क़ुरान सूरह शूरा 42/49-50]

मेरे दीनी भाइयों और बहनों आप सब से गुज़ारिश है कि पीर-फ़कीर-दरवेशो बुज़ुर्गों से हटाकर सिर्फ़ एक अल्लाह की तरफ़ आयें, एक अल्लाह की इबादत करें, नमाज़ अदा करें, रोज़ा रखें, सदकात और जकात अदा करें। एक दुसरे का इज़्ज़त वा एहतराम करें गुनाहों से तौबा अस्तगफार करें। 

अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है इसलिए सभी मुस्लिमों की हाजत, मुश्किल, परेशानी ग़म को दूर करने वाली ज़ात सिर्फ़ अल्लाह रब्बुल आलमीन की है किसी पीर, बुज़ुर्ग की नही। और ना ही तावीज़, गंडे, जादुई पत्थर किसी को कुछ नफ़ा नुक़सान पहुँचा सकते हैं। 

इसलिए उम्मतियों को अल्लाह के दर का फ़क़ीर होना चाहिए किसी दूसरे के दर का नही।

रही बात हसन, हुसैन (रदी अल्लाहु अन्हुमा) से मुहब्बत की तो हदीस पर गौर करें,

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया, “हसन और हुसैन ये दोनो मेरी दुनिया के फूल है।” [तिर्मिज़ी : 3770]

नबी करीम ﷺ ने फरमाया, "जिसने हसन और हुसैन से मुहब्बत की उसने मुझसे मुहब्बत की, और जिसने इन दोनों से दुश्मनी (बुग़्ज़) की उसने मुझसे दुश्मनी की।" [इब्ने माजा 143]

याद रखें हसन और हुसैन (रदी अल्लाहु अन्हुमा) से मुहब्बत का ये मतलब नहीं की ढोल और ताशे बजाया जाय या मातम और नौहा किया जाय। ये सब उनका तरीका नहीं है बल्कि उनके नक्शे कदम पर चलना असल मुहब्बत है। नमाज़ की पाबंदी, रोज़ा, जकात, और किसी को तकलीफ़ न देना, हालात चाहे जैसे भी हों सब्र का दामन थाम कर अल्लाह का शुक्र अदा करना हुसैनियत है।

गली-गली या हुसैन या हुसैन का नारा लगाने से या घरों पर झंडे लगाने से हुसैन (रदी अल्लाहु अन्हु) से मुहब्बत साबित नहीं होती। अल्लाह के सामने इसका भी हिसाब देना है। 


आपकी दीनी बहन 
फ़िरोज़ा 

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