Sunnat tariqe se nikah

Sunnat tariqe se nikah


सुन्‍नत तरीक़े से निकाह


इस्‍लाम में सुन्‍नत के मुताबिक निकाह:

इस्लाम में निकाह एक पवित्र और मुबारक अमल है जो इंसानी जिंदगी की बुनियादी जरूरत और ईमान का हिस्सा है। निकाह को सुन्‍नत के मुताबिक अंजाम देना बहुत अहमियत रखता है। सुन्‍नत के मुताबिक निकाह के कुछ बुनियादी उसूल हैं:


निकाह के छह शरई अमल:

निकाह को सुन्‍नत के मुताबिक करना बहुत जरूरी है ताकि इसमें बरकत और अल्लाह की रज़ा हासिल हो सके। निकाह के छह शरई अमल ये हैं:


दो फराइज़ (जरूरी)

1. इजाब और कबूल (प्रस्ताव और स्वीकृति): इजाब और कबूल निकाह का सबसे अहम हिस्सा है जिसमें दूल्हा और दुल्हन स्पष्ट रूप से शादी की पेशकश को स्वीकार करते हैं। यह दोनों की रज़ामंदी का इज़हार होता है और इसे साफ अल्फाज में किया जाता है ताकि कोई शक न रहे। बिना इजाब और कबूल के निकाह जायज़ नहीं होता।

2. दो गवाह (दो गवाह): निकाह की शरई हैसियत के लिए कम से कम दो मुसलमान गवाहों का मौजूद होना जरूरी है। ये गवाह दोनों पक्षों की रज़ामंदी की तस्दीक करते हैं। गवाह के बगैर निकाह शरई तौर पर मुकम्मल नहीं होता।


एक वाजिब (लाज़मी)

1. मेहर (दहेज): मेहर वह रकम है जो दूल्हा, दुल्हन को निकाह के वक्त या बाद में देता है। यह दुल्हन का हक है और इसे देना लाजमी है। मेहर की रकम दोनों पक्षों की रज़ामंदी से तय होती है और यह दुल्हन की हिफाजत और इज्जत का निशान होती है।


तीन सुन्‍नतें (पसंदीदा)

1. खुतबा-ए-निकाह (निकाह का उपदेश): निकाह के मौके पर खुतबा किया जाता है जिसमें कुरान की आयतें और हदीसें शामिल होती हैं। यह निकाह की अहमियत और इसके इस्लामी मुआहिदा को समझाने का जरिया होता है। खुतबा निकाह की दीनी और रूहानी क़ीमतों को उजागर करता है।

2. तकसीम-ए-चुआरा (खजूरों का वितरण): निकाह के मौके पर खजूर (चुआरा) बांटना सुन्‍नत है। यह पैगंबर मोहम्मद (स.अ.व.) की रवायत है और खुशी के इस मौके पर मिठास बांटने का निशान है। तकसीम-ए-चुआरा रिश्तेदारों और हाजिरीन के साथ खुशी और बरकत को शेयर करने का तरीका है।

3. वलीमा (विवाह भोज): निकाह के बाद दूल्हा की तरफ से वलीमा का इंतजाम करना सुन्‍नत है। यह दूल्हा और दुल्हन के रिश्ते को आम तौर पर मंजूर करने और खुशी का इज़हार करने का तरीका है। वलीमा में दोस्तों, रिश्तेदारों और जरूरतमंदों को दावत दी जाती है। यह इस्लाम के सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों को प्रमोट करता है।


नतीजा:

निकाह के ये छह शरई अमल इस्लाम के अहम हिस्सों में से हैं जो शादी को दीनी और सामाजिक तौर पर जायज़ और मक़बूल बनाते हैं। इन्हें सही तरीके से अंजाम देना न सिर्फ एक दीनी फर्ज़ है बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और आपस में इज्जत को भी बढ़ावा देता है। हमें इन क़वायद और रिवायतों का एहतमाम करते हुए अपनी शादियों को सुन्‍नत के मुताबिक और सादगी से अंजाम देना चाहिए ताकि अल्लाह की बरकत और रज़ा हासिल हो सके।


सुन्‍नत तरीके के फायदे निकाह के लिए:

1. बरकत: सुन्‍नत के मुताबिक निकाह से अल्लाह की रहमत और बरकत मिलती है।

2. सादगी: आसान और सादा निकाह से गरीब तबकों के लिए आसानी होती है और इसमें इसराफ नहीं होता।

3. गुनाहों से बचाव: शरई और हलाल तरीके से शादी इंसान को हराम और गुनाह के रास्ते से बचाती है।

4. सामाजिक स्थिरता: सुन्‍नत के मुताबिक निकाह से समाज में मोहब्बत, भाईचारा और तहफ्फुज बरकरार रहता है।


सुन्‍नत तरीके का खात्मा कब शुरू हुआ?

सुन्‍नत के मुताबिक निकाह का खात्मा या कमी उन दिनों से शुरू हुई जब लोगों ने अपने मआशी हालात और रिवायतों को शरियत पर तरजीह देना शुरू किया। यह बात खास तौर पर अकल और इर्तिका के जमाने में बढ़ गई जहां शादियों में गैर शरई रस्म और रिवाज आम होने लगे।


गैर शरई तरीके और रस्मो रिवाज:

आज के दौर में शादियों में बहुत से गैर शरई तरीके और रस्म रिवाज आम हैं, जिनमें से कुछ ये हैं:

1. फिजूल खर्ची वाली खुशियाँ: मेहंदी, ढोलकी, और बारात जैसे फंक्शंस में फिजूलखर्ची और इसराफ।

2. दहेज (जहेज़): दुल्हन के घरवालों से मांगना जो इस्लाम में बिलकुल गैर शरई है।

3. अनावश्यक रिवाज: रस्मों का बढ़ावा जैसे रस्म-ए-हिना, सगाई, और वलीमा में फिजूल खर्ची।

4. मिश्रित सभाएँ: मर्द और औरतों का गैर जरूरी मिलना और गैर महफूज़ समाज बनाना।


सुन्‍नत तरीके के निकाह को फिर से आम कैसे करें?

1. शिक्षा और जागरूकता: कुरान और हदीस की तालीमात को आम करना और लोगों को असली शरियत और सुन्‍नत के मुताबिक निकाह के बारे में आगाह करना।

2. समुदायिक पहल: मस्जिदों और इस्लामिक सेंटर्स में वर्कशॉप्स और सेमिनार्स आयोजित करना।

3. रोल मॉडल्स: ऐसे लोगों को सामने लाना जो सुन्‍नत के मुताबिक शादियां कर रहे हैं।

4. सोशल मीडिया: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सुन्‍नत निकाह के फायदे और उसके तरीके बताना।

5. सपोर्ट सिस्टम्स: ऐसे प्रोग्राम्स का आगाज़ जो गरीब और जरूरतमंद लोगों की शादी को आसान और सुन्‍नत के मुताबिक करने में मदद करें।


निष्कर्ष:

सुन्‍नत के मुताबिक निकाह को फिर से आम करना हम सब का फर्ज है। इसमें कुरान और हदीस की रोशनी में निकाह के असली मकसद और उसकी बरकत को समझना जरूरी है। हर शख्स को चाहिए कि वह अपनी और अपनी आने वाली नस्ल के लिए सुन्‍नत के मुताबिक शादियों को फरोग दे और इस पाक रिश्ते को अल्लाह की रज़ा के लिए अंजाम दे।


आपकी दीनी बहन 
रोनक जहां

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