खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (009) अत तौबा
सूरह (009) अत तौबा
(i) मुशरिकीन और अहले किताब के साथ जिहाद
उन मुशरिकीन से बरअत का एलान है जिन्होंने हज्जे बैतुल्लाह से मना कर दिया। अहले किताब के साथ जंग की इजाज़त दी गई। अलबत्ता उनके साथ मुआहिदे को पूरा करने का आदेश दिया गया जिन्होंने ख़िलाफ़ वर्ज़ी नहीं की। (4 से 6)
(ii) मुसलमान और मुनाफिक़ीन के दरमियान फ़र्क़
मुसलमान और मुनाफिक़ीन में फ़र्क़ करने वाली बुनियादी चीज़, ग़ज़वा ए तबूक बना। रूमियों के साथ मुक़ाबला जो उस समय सुपर पॉवर थे। सख़्त गर्मी, ग़रीबी और भूखमरी के मौक़ा पर जबकि फ़सल भी बिल्कुल तैयार थी। कुछ मुसलमानों को छोड़कर तमाम मुसलमान चले गए, जबकि मुनाफिक़ीन ने बहाने तराशने शुरू कर दिए। पारे के अंत तक मुनाफिक़ीन की मुज़म्मत है। क़ुदरत के बावजूद मैदाने जंग से भागे और झूठे बहाने तराशे, वह मुसलमानों से दिल में बुग़ज़ व जलन रखते, मुसलमानों की ख़ुशी व क़ामयाबी पर ग़मगीन और मुसलमानों के नुक़सान पर ख़ुश होते। दूसरी तरफ़ क़समें खा खा कर मुसलमानों को यक़ीन दिलाते, हमेशा दौलत के लालच में रहते, कंजूसी उनकी घुटटी में पड़ी थी। हमेशा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए अपशब्द बकते रहते, उनके लिए फ़रमाया गया कि
اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِن تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً فَلَن يَغْفِرَ اللَّهُ لَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ۗ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ
"(ऐ रसूल) ख्वाह तुम उन (मुनाफिक़ों) के लिए मग़फिरत की दुआ मॉगों या न मॉगों (उनके लिए बराबर है) तुम उनके लिए सत्तर बार भी बख्शिस की दुआ मांगोगे तो भी अल्लाह उनको हरगिज़ न बख़्शेगा। यह (सज़ा) इस वजह से है कि उन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और अल्लाह बदकार लोगों को हिदायत नहीं दिया करता" (आयत 80)
और
وَلَا تُصَلِّ عَلَىٰ أَحَدٍ مِّنْهُم مَّاتَ أَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلَىٰ قَبْرِهِ ۖ إِنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَمَاتُوا وَهُمْ فَاسِقُونَ
"और (ऐ रसूल) उन मुनाफिक़ीन में से जो मर जाए तो कभी न किसी पर नमाज़े ज़नाज़ा पढ़ना और न उसकी क़ब्र पर (जाकर) खड़े होना इन लोगों ने यक़ीनन अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और बदकारी की हालत में मर (भी) गए। (आयत 84)
(iii) पीछे रह जाने वालों के तीन गिरोह
(2) मुख़्लिस मगर मजबूर लोग जिनके पास सवारियां और रास्ते का ख़र्च न था। उनके दिल न जाने से बहुत दुखी थे।
(3) मुख़्लिस और मोमिन तो थे लेकिन केवल अपनी सुस्ती की वजह से पीछे रह गए थे।
(iv) सदक़ा व ज़कात के हक़दार
◆ मिस्कीन,
◆ ज़कात वसूल करने वाले,
◆ किसी के दिल को नरम करने के लिए,
◆ क़ैदी को छुड़ाने के लिए,
◆ कर्ज़दार जिन में क़र्ज़ अदा करने की वास्तव में सकत न हो,
◆ अल्लाह के रास्ते में,
◆ मुसाफ़िर
(60)
(v) उलेमा को ख़ुदा की जगह न दी जाय
जिस तरह यहूदियों और ईसाइयों ने अपने उलेमा को ख़ुदा का दर्जा दे दिया था, वह अल्लाह की किताब को छोड़ कर अंधाधुंध उनकी बात मानते और अमल करते थे और उन उलेमा ने अवाम का तअल्लुक़ अल्लाह की किताब से तोड़ कर रख दिया बल्कि किताबों को बदल कर रख दिया था। लोगों के माल को हराम तरीक़े से खाते थे और सोना चांदी जमा कर के रखते थे, और अल्लाह के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बन गए थे। (31, 34)
उलेमा की बात उसी वक़्त तक तस्लीम की जाय जब तक उसका तअल्लुक़ अल्लाह की किताब और रसूल की सुन्नत के मुताबिक़ हो।
(vi) अल्लाह और उसके रसूल से ज़्यादा कोई चीज़ महबूब नहीं
ऐ नबी ! कह दो कि अगर तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे तुम्हारे भाई, तुम्हारी बीवियाँ, तुम्हारे रिश्ते-नातेदार, तुम्हारे वह माल जो तुमने कमाए हैं, तुम्हारे वह कारोबार जिनके ठंडे पड़ जाने का तुमको डर है और तुम्हारे वह घर जो तुमको बहुत पसन्द हैं, तुमको अल्लाह और उसके रसूल और उसकी राह में संघर्ष से ज़्यादा प्यारे हैं तो इन्तेज़ार करो, यहां तक कि अल्लाह अपना फ़ैसला तुम्हारे सामने ले आए। (आयत 24)
(vii) माल जमा कर के रखने और ख़र्च न करने वालों का अंजाम
जो लोग सोना चांदी जमा करके रखते हैं और उसमें से अल्लाह के रास्ते में ख़र्च नहीं करते क़्यामत के दिन उसी सोने-चाँदी पर जहन्नम की आग दहकाई जाएगी और फिर इसी से उन लोगों की पेशानियों, बग़ल और पीठ को दाग़ा जाएगा (यह कहते हुए कि) यही है वह ख़ज़ाना जो तुमने अपने लिए जमा किया था, लो अब अपनी समेटी हुई दौलत का मज़ा चखो। (आयत 34, 35)
(viii) मुनाफिक़ीन की मुज़म्मत
गज़वा ए तबूक में शरीक न होने वाले मुनाफिक़ीन के झूठे बहाने की ख़बर अल्लाह तआला ने अपने नबी को पहले ही दे दी। मुनाफिक़ीन ने मुसलमानों को तंग करने के लिए मस्जिदे ज़रार बनाई थी अल्लाह ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को उस में खड़े होने से मना फ़रमाया, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हुक्म से इस मस्जिद को जला दिया गया। क्योंकि मस्जिद की बुनियाद तक़वा पर रखी जाती है न कि कुफ़्र करने और अल्लाह के रसूल के ख़िलाफ़ साज़िश करने के लिए। (108)
(ix) मोमिनीन की 9 सिफ़ात (विशेषताएं)
2, इबादत करने वाले
3, हम्द (तारीफ़ बयान) करने वाले
4, रोज़ा रखने वाले
5, रुकूअ करने वाले
6, सज्दा करने वाले
7, नेकी का हुक्म देने वाले
8, ब्रुराई से रोकने वाले
9, अल्लाह की मुक़र्रर की हुई हदों की हिफ़ाज़त करने वाले
(112)
(x) किसी काफ़िर के हक़ में मग़फ़िरत की दुआ क़ुबूल नहीं होती
مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَن يَسۡتَغۡفِرُواْ لِلۡمُشۡرِكِينَ وَلَوۡ كَانُوٓاْ أُوْلِي قُرۡبَىٰ مِنۢ بَعۡدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمۡ أَنَّهُمۡ أَصۡحَٰبُ ٱلۡجَحِيمِ
किसी नबी या मोमिन के लिए जाएज़ नहीं कि वज़ाहत कर देने के बाद भी वह मुशरिकों के लिए मग़फ़िरत तलब करे चाहे वह उसका कितना ही क़रीबी क्यों न हो। मुशरिकों का ठिकाना जहन्नम है। (113)
(xi) ग़ज़वा ए तबूक में शिरकत न करने वाले 3 मुख़लिस सहाबा
2.हिलाल बिन उमय्या रज़ियल्लाहु अन्हु
3. मुरारह बिन रबीअ रज़ियल्लाहु अन्हु
इन तीनों का 50 दिन तक सोशल बॉयकॉट किया गया फिर उनकी तौबा की कुबूलियत का ऐलान इस वही के ज़रिए हुआ।
وَعَلَى ٱلثَّلَٰثَةِ ٱلَّذِينَ خُلِّفُواْ حَتَّىٰٓ إِذَا ضَاقَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلۡأَرۡضُ بِمَا رَحُبَتۡ وَضَاقَتۡ عَلَيۡهِمۡ أَنفُسُهُمۡ وَظَنُّوٓاْ أَن لَّا مَلۡجَأَ مِنَ ٱللَّهِ إِلَّآ إِلَيۡهِ ثُمَّ تَابَ عَلَيۡهِمۡ لِيَتُوبُوٓاْۚ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ
और उन तीनों पर जो (जिहाद से) पीछे रह गए थे जब ज़मीन अपनी वुसअत (फैलाव) के बावजुद उन पर तंग हो गई और उनकी जानें (तक) उन पर बोझ मालूम होने लगीं और उन लोगों ने समझ लिया कि अल्लाह के सिवा और कहीं पनाह की जगह नहीं। फिर अल्लाह ने उनको तौबा की तौफ़ीक़ दी ताकि वह (अल्लाह की तरफ़) रूजू करें, बेशक अल्लाह बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान है। (118, सही बुखारी 4418)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही

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