Anbiya ke waqyaat Bachchon ke liye (Part-4): Hud alaihissalam

Anbiya ke waqyaat Bachchon ke liye (Part-4): Hud alaihissalam


अंबिया के वाक़िआत बच्चों के लिए (पार्ट-4)

सैयदना सय्यदना हूद अलैहिस्सलाम का वाक़्या (बच्चों के लिए)

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1- नूह के बाद

अल्लाह ने नूह की नस्ल में बरकत दी, वह ज़मीन में फैल गई। उन्हीं में एक उम्मत थी जिसे आद कहा जाता था।

वह बड़े ताक़तवर लोग थे ऐसे लगता था जैसे उनका शरीर लोहे से बना हो वह हर चीज़ पर ग़ालिब आ जाते थे और उन पर कोई चीज़ ग़ालिब नहीं आती थी, वह किसी से डरते नहीं थे बल्कि उनसे हर कोई डरता था।

अल्लाह ने आद की हर चीज़ में बरकत दी थी, उनके ऊंट और भेड़ बकरियों से घाटियां भर गई थीं, उनके घोड़ों से मैदान पटे पड़े थे और आद की औलाद से घर भर गया था। जब आद के ऊंट, और उनकी भेड़ बकरियां चरागाह की तरफ़ निकलते तो उनके लिए बड़ा ख़ूबसूरत दृश्य होता और जब बच्चे सुबह में खेलने के लिए निकलते तो भी बड़ा ख़ूबसूरत मंज़र होता। आद की ज़मीन ख़ूब हरी भरी रहती थी और उसमें बहुत से बाग़ और चश्मे भी थे।

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2- आद का कुफ़्र

लेकिन आद ने इतनी बहुत सी नेअमतें पाने पर भी अल्लाह का शुक्र अदा नहीं किया। आद उस तूफ़ान के वाक़िआ को भूल गए जिसे उन्होंने अपने बाप दादा से सुना था। उन्होंने उस के निशान ज़मीन पर देखा था। वह भूल गए कि अल्लाह ने नूह की उम्मत पर कैसा तूफ़ान भेजा था। वह मूर्तिपूजा करने लगे जैसे कि इससे पहले नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम मूर्तिपूजा करती थी। वह अपने हाथों से पत्थरों की मूर्तियां तराशते फिर उसको सज्दा करते, उसकी पूजा करते, उससे अपनी ज़रूरत तलब करते, उसे पुकारते और उसके लिए जानवर ज़बह करते थे। यह पूरी तरह नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम के पीछे चल पड़े थे, उनकी नाफ़रमानियां उन्हें मूर्तिपूजा से नहीं रोकती थीं और उनकी नाफ़रमानियां उन्हें हिदायत पर नहीं आने देती थीं। वह दुनिया के लिहाज़ से अक़्लमंद थे लेकिन दीन के मामले में बड़े बेवक़ूफ़ लोग थे।

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3- आद का ज़ुल्म

आद की ताक़त ही उनके और लोगों के लिए मुसीबत बन गई क्योंकि वह न अल्लाह पर ईमान रखते थे और न आख़िरत पर ईमान रखते थे।

फिर उन्हें ज़ुल्म से कौन रोकता और वह सरकशी से कैसे रुकते। भला कैसे वह लोगों पर ज़ुल्म नहीं करते क्योंकि वह तो वह तो ख़ुद से बढ़ कर किसी को समझते ही नहीं थे और हिसाब व अंजाम का उन्हें कोई ख़ौफ़ न था।

वह जंगली जानवरों जैसे थे जिनका बड़ा छोटों पर ज़ुल्म करता है और ताक़तवर कमज़ोर को खा जाता है।

उनका ग़ुस्सा मस्त हाथी जैसा था वह क़त्ल कर के ही छोड़ते थे।

जब वह जंग करते तो खेतियां और नस्लों को तबाह व बर्बाद कर देते।

जब किसी बस्ती में दाख़िल होते तो फ़साद फैलाते और सम्मानित लोगों और उनके घर वालों का अपमान करते।

कमज़ोर लोग उनकी बदतमीज़ियों से डरते और उनके ज़ुल्म से भागते थे।

उनकी ताक़त उनके और लोगों के लिए यूं मुसीबत बन गई कि वह अल्लाह से डरते नहीं थे और आख़िरत पर ईमान नहीं रखते थे।

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4- आद के महल

आद के पास सिवाए खाने-पीने और खेल तमाशा करने के कोई काम नहीं था।

उनमें से कुछ लोग दूसरों पर घमंड करते थे, बुलंद महल बनाते और बड़े बड़े घर तामीर करते थे, पानी में, मिट्टी में, और पत्थरों में उनकी दौलत बर्बाद होती थी वह जब भी किसी ज़मीन या ऊंचे स्थान को ख़ाली देखते तो उस पर ऊंचे महल बना देते थे। वह घर ऐसे बनाते थे जैसे कि उसी में हमेशा रहेंगे और उन्हें कभी मौत नहीं आएगी।

वह महल बिना ज़रूरत बनाते थे जबकि लोगों के पास पेट भरने के लिए खाना और शरीर छुपाने के लिए कपड़ा न था, उनमें ऐसे फ़क़ीर भी थे जिनके पास रहने के लिए घर नहीं थे। और मालदारों के घर थे मगर उसमें कोई रहने वाला नहीं था। जो उन्हें और उनके महल को देखता तो वह यही समझता कि आख़िरत पर इनका बिल्कुल ईमान नहीं है।

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5- रसूल हूद

अल्लाह ने इरादा किया कि आद की जानिब एक रसूल भेजे। बेशक अल्लाह अपने बंदों के कुफ़्र से ख़ुश नहीं होता और ज़मीन में फ़साद को पसंद नहीं करता। आद अपनी अक़्ल का इस्तेमाल केवल खाने पीने, खेल, तमाशे और इमारतें बनाने में करते थे, उनकी अक़्लों में बिगाड़ आ गया था क्योंकि वह उसका इस्तेमाल दीन के मामले में नहीं करते थे। आद दुनिया के मामले तो में अकलमंद थे लेकिन दीन के मामले में इन्तेहाई बेवक़ूफ़ थे, वह पत्थर पूजते थे और समझते नहीं थे चुनांचे अल्लाह ने इरादा किया कि उनकी जानिब एक रसूल भेजे जो उनको हिदायत का रास्ता दिखाए।

और यह भी इरादा किया कि वह रसूल ख़ुद उन्हीं में से हो जिसको यह जानते हों और जिसकी बातें समझते हों। हूद ऐसे ही रसूल थे, वह आद के एक शरीफ़ ख़ानदान में पैदा हुए और अच्छे माहौल में पले बढ़े थे।

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6- हूद की दावत

हूद अपनी कौम में दावत देना शुरू किया और कहां, 'ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की इबादत करो और उसके इलावा किसी की इबादत न करो" (1) हूद ने कहा तुम कैसे पत्थरों की इबादत करते हो और उसकी इबादत नहीं करते जिसने तुमको पैदा किया है। मेरी क़ौम के लोगो! यही पत्थर जिसे तुमने कल तराशा था कैसे तुम आज उसकी इबादत करने लगे। बेशक अल्लाह ने तुम्हें पैदा किया है, तुमको रिज़्क़ दिया और तुम्हारे माल, औलाद, खेती और नस्ल में बरकत दी, तुम्हें नूह के बाद ज़मीन पर ख़लीफ़ा (वारिस) बनाया और तुम्हें जिस्म के लिहाज़ से भी बेहतर बनाया है। इस नेअमत का हक़ तो यह है कि तुम अल्लाह की इबादत करो और उसके इलावा किसी की इबादत न करो बेशक वह कुत्ता जिसे तुम हड्डी फेंकते हो वह तुम्हारा साथ छोड़ कर नहीं जाता और साये की तरह तुम्हारे साथ रहता है।

क्या तुमने कुत्ते को देखा है कि वह अपने मालिक को छोड़ देता हो और दूसरे के पास चला जाता हो? क्या तुमने किसी भी जानवर को पत्थर पूजते हुए देखा है? क्या तुमने किसी जानवर को मूर्तिपूजा करते हुए देखा है?

क्या इंसान जानवर से ज़्यादा बदतर है या उस से ज़्यादा इज़्ज़त वाला है।

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1. सूरह 07 अल आराफ़ आयत 65

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7- क़ौम का जवाब

क़ौम खाने-पीने और खेल तमाशे में मशग़ूल रही। लोग दुनिया की ज़िन्दगी पर ख़ुश और मुतमईन रहे उनके दिल हूद की बातों से घुटने लगे। वह एक दूसरे से कहते कि हूद आख़िर कहता क्या है? वह चाहता क्या है? हमें उसकी बात समझ मे नहीं आती। उन्होंने कहा यह बेवक़ूफ़ है या फिर पागल है!

फिर जब हूद ने उनको दूसरी बार दावत दी। उनकी क़ौम के सरदारों ने कहा "तुम तो हमें बेवक़ूफ़ नज़र आते हो और हम तो तुम्हें झूठा समझते हैं। हूद ने कहा ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं बेवक़ूफ़ नहीं हूं, मैं तो तमाम संसार के स्वामी अल्लाह का भेजा हुआ रसूल हूं, मैं तो तुम्हें अपने रब का पैग़ाम पहुंचाने वाला हूं और तुम्हारा ऐसा ख़ैर- ख़्वाह हूं जिसपर भरोसा किया जा सकता है" (2)

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2. सूरह 07 अल आराफ़ आयत 66 से 68

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8- हुद की हिक्मत

हूद बराबर अपनी क़ौम को नसीहत करते रहे और उनको हिकमत और नरमी से दावत देते रहे। हूद ने कहा, ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अभी कल तक मैं तुम्हारा भाई और तुम्हारा दोस्त था क्या तुम मुझे पहचानते नहीं हो?  

ऐ मेरे भाइयो! तुम मुझसे डरते क्यों हो और भागते क्यों हो मैं तुम्हारे माल में कुछ भी कम नहीं करूंगा। " ऐ मेरी क़ौम! मैं तुमसे कोई माल नहीं मांगता मेरा अज्र तो अल्लाह के ज़िम्मे है" (3)

ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम्हें किस चीज़ का डर कि अगर तुम अल्लाह पर ईमान लाओगे ..... क़सम अल्लाह की जब तुम ईमान लाओगे तो तुम्हारी दौलत में कोई कमी नहीं होगी बल्कि अल्लाह तुम्हारे रिज़्क़ में बरकत देगा और तुम्हारी ताक़त में इज़ाफ़ा करेगा। 

ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या मेरी रिसालत पर तुम्हें हैरत है। बेशक अल्लाह एक एक व्यक्ति से बात नहीं करता बल्कि अल्लाह प्रत्येक व्यक्ति को डायरेक्ट संबोधित नहीं करता। वह तो कहता है इस तरह हो जा इस तरह हो जा।

बेशक अल्लाह हर क़ौम में उन्हीं में एक व्यक्ति को रसूल बना कर भेजता रहा जो उनसे बातें करता था और उनको नसीहत करता था। और मुझे तुम्हारी तरफ़ रसूल बनाकर भेजा है कि मैं तुमसे बातें करूं और तुम्हें नसीहत करूं, "क्या तुम्हें इस बात पर तअज्जुब है कि तुम्हारे पास ख़ुद तुम्हारी अपनी क़ौम के एक आदमी के ज़रिए से तुम्हारे रब की याददिहानी आई ताकि तुम्हें ख़बरदार करे" (4)

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3. सूरह 11 हूद 29

4. सूरह 07 अल आराफ़ आयत 63

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9- हुद का ईमान

आद के पास जवाब नहीं था और जब उन्हें मालूम ही नहीं था तो वह हूद का जवाब भला कैसे देते! आख़िर उन्होंने थक हार कर कहा, तुम पर हमारे माबूद ग़ुस्सा हैं जल्द ही तेरी अक़्ल को कोई बीमारी लगेगी! और तुमको माबूदों का वबाल पड़ कर रहेगा।

हूद ने कहा, यह मूर्तियां पत्थर की है जो न किसी को लाभ पहुंचाती है ना नुक़सान।

यह पत्थर की मूर्तियां न तो बात करती हैं न सुनती हैं। न यह मूर्तियां अच्छे और बुरे की मालिक हैं न किसी फ़ायदे और नुक़सान पर इनका कोई इख़्तियार है। और तुम भी किसी अच्छाई और बुराई के मालिक नहीं हो और न तुम मुझे कोई फ़ायदा और नुक़सान पंहुचा सकते हो। मैं तुम्हारे माबूदों को मानने वाला नहीं और न मुझे उनसे कोई डर है। बल्कि "जो शिर्क तुम करते हो मेरा इस से कोई तअल्लुक़ नहीं" (5) और मैं तुम से भी नहीं डरता "तुम सभी इकट्ठे होकर चाल चलो मैंने तो अल्लाह पर भरोसा किया है जो मेरा रब भी है और तुम्हारा रब भी" (6) हर वस्तु उसके हाथ के नीचे है कोई पत्ता भी उसकी इच्छा के बगैर नहीं गिरता।

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5. सूरह 11 हूद 54

6. सूरह 11 हूद 55, 56

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10- आद की दुश्मनी

आद ने सब कुछ सुना लेकिन ईमान नहीं लाए। उन पर हूद की नसीहतें बेकार गईं और हूद की हिकमत से भरी बातों का कोई प्रभाव न पड़ा।

उन्होंने कहा, ऐ हुद! तुम्हारे पास क्या दलील और क्या सुबूत है?

ऐ हूद हम तेरी इस नई बात की वजह से अपने पुराने माबूदों को नहीं छोड़ेंगे। क्या हम एक आदमी के कहने पर उन माबूदों को छोड़ दें जिनकी इबादत हमारे बाप दादा करते थे? कभी नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता। 

ऐ हूद तुम हमारे माबूदों को नहीं मानते और उन से नहीं डरते तो हम भी तुम्हारे माबूद पर ईमान नहीं लाते उसके अज़ाब से नहीं डरते। हम तुमसे अज़ाब के बारे में बहुत सुन चुके हैं। ऐ हुद कहां है वह अज़ाब और वह कब आएगा? 

हूद ने कहा, "उसका इल्म तो केवल अल्लाह के पास है मैं तो बस खुला हुआ डराने वाला हूं" (7)

आद ने कहा, हम उस अज़ाब का इंतेज़ार करते हैं और हमें इस बात का शौक है हम उसको ज़रूर देखें।

हूद को उनकी इस ढिटाई पर तअज्जुब और उनकी बेवक़ूफ़ी पर बहुत अफ़सोस भी हुआ।

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7. सूरह 67 अल मुल्क 26

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11- अज़ाब

आद प्रतिदिन बारिश का इंतेज़ार करते थे, वह आसमान की तरफ़ देखते, उन्हें बादल का कोई टुकड़ा नज़र नहीं आता। उन्हें बारिश की सख़्त ज़रूरत थी वह बारिश के बहुत ख़्वाहिशमंद थे। एक दिन उन्हें बादल नज़र आ गया जो उनकी तरफ़ आ रहा था यह देखकर वह बहुत प्रसन्न हुए। वह शोर मचाने लगे यह बारिश का बादल है यह बारिश का बादल है! 

लोग ख़ुशी से नाचने लगे। वह एक दूसरे से कहने लगे यह बारिश का बादल है यह बारिश का बादल है! 

लेकिन हूद समझ गए कि अज़ाब आ गया है। चुनांचे उन्होंने क़ौम से कहा "यह रहमत का बादल नहीं है बल्कि इसमें दर्दनाक अज़ाब की महक आ रही है । इस तरह तेज़ हवा चली कि वैसी हवा न लोगों ने देखा था और न सुना था।

आंधी आई, उसने दरख़्तों को उखाड़ फेंका, घर गिरने लगे, जानवरों को उठाया और उन्हें बहुत दूर फेंक दिया, रेगिस्तान की रेत उड़ने लगी और दुनिया में हर तरफ़ अंधेरा छा गया कि इंसान को कुछ दिखाई न देता था। लोग डर के कारण घरों में घुस गए और दरवाज़ा बंद कर लिया।

बच्चे माओं की गोद से चिमट गए और लोग दीवारों से और अपने अपने कमरों में जा बैठे।

बच्चे रोते थे , माएं चीख़ती चिल्लाती थीं, और लोग मदद मदद पुकार रहे थे। उन्हें ऐसा लगता था जैसे कोई कह रहा हो "आज कोई चीज़ अल्लाह के अज़ाब से बचाने वाली नहीं है" (8)

सात रात और आठ दिन ऐसा ही रहा। सभी ख़त्म हो गए वह ऐसे हो गए जैसे कि ख़ुजूर के दरख़्त ज़मीन पर पड़े हुए हों। बड़ा अजीब व ग़रीब दृश्य (मंज़र) था लोगों की लाशें पड़ी थीं जिनको परिंदे नोच रहे थे, गिरे पड़े घर थे जिनपर उल्लूओं का बसेरा था।

हूद और ईमान वाले अपने ईमान के कारण बच गए और आद अपने कुफ़्र और दुश्मनी के कारण तबाह हुए।

"आद ने अपने रब का इनकार किया। सुनो ! दूर फेंक दिए गए आद यानी हूद की क़ौम के लोग" (9)

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8. सूरह 11 हूद आयत 43

9. सूरह 11 हूद आयत 60

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किताब: कसास उन नबीयीन
मुसन्निफ़: सैयद अबुल हसन नदवी रहमतुल्लाहि अलैहि 
अनुवाद: आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही 

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