लिब्रलिज़्म और इस्लाम असल में है क्या ?
लिब्रलिज़्म और इस्लाम दो अलग अलग नज़रियात है।
दुनिया में इस्लाम वाहिद मज़हब है, जो मुकम्मल रियासती निज़ाम रखता है, बाकी कोई भी मज़हब मुकम्मल रियासती निज़ाम नहीं देता यानी इस्लाम सियाशी, अदालती, माआशी, इक्तसादी, तआलिमी, गर्ज़ हर फिल्ड में कवानिन रखता है, ये कवानिन चौदह सौ साल पहले वाज़ेह किए जा चुका है, और अमलन इन कवानिन का नफाज़ करके एक इस्लामी रियासत कि तशकील कि जा चुकी है, जो एक मुकम्मल फलाही रियासत थी। यहाँ एक बात काबिले ज़िक्र है कि इस्लाम सिर्फ एक मज़हब नहीं है, ये सिर्फ नमाज़, रोज़े, या हज, का दीन नहीं है बल्कि इस्लामी नज़रिया एक मुकम्मल निज़ाम है। नमाज़ रोज़ह और दीगर इबादत इस दीन के ज्ज़वयात है दुनियावी फलाह के लिए मुकम्मल इस्लाम को रियासती निज़ाम के तौर पे नाफिज़ करना नागज़ीर है।
इसी तरह लिब्रलिज़्म भी एक नज़रिया है जो रियासती निज़ाम वाज़ेह करता है। लिब्रलिज़्म का बुनियादी नुक्ता है कि किसी भी मुल्क के निज़ाम में मज़हब का कोई अमल दखल नहीं होगा। रीयासती निज़ाम के कवानिन टोटल इंसानी मुशाहिदा और तजुरबात कि रोशनी में तशकील दिए जाएंगे।
मसलन रियासत अगर अवाम को शराब पीने कि इजाज़त देती है तो किसी मज़हब को इजाज़त नहीं कि उस कानून को चैलेंज कर सके। इन्फिरादी तौरपर हर शख्स को हर किस्म कि अज़ादी होगी, ख़्वाह वो किसी मज़हब पर अमल करे या ना करे मंदिर जाए, चर्च जाए, या मस्जिद जाए, या किसी भी मज़हब पर अमल ना करे।
लिब्रलिज़्म रियासत में ज़िना, सूद, शराब नोसी जायेज़ है, तो मज़हबी तौरपर उस पे कोई सज़ा नहीं होगी ये शख्सी अज़ादी के ज़मंरे में आएगा। मज़हब के मुतैय्यन करदें जराएम का इत्लाक रियासती नीज़ाम में नहीं होगा। आप शराब कि दुकान खोलें, प्रो इंस्टीट्यूट हाउस बनाऐ या पोर्न हाउस, ये कारोबार के ज़मंरे में आएँगे। रियासत में ये कोई गुनाह जुर्म तसव्वुर नहीं होगा।
लिब्रलिज़्म के नुकसानात
लिब्रलिज़्म का सबसे बड़ा नुकसान मआशी तौर पर होता है, यह निज़ाम सर्माया दाराआना निज़ाम को प्रमोट करता है, और सर्माया दार को तहफ़्फ़ुज़ देता है, जिसकी वजह से अमीर, अमीर तर होता जाता है, और गरीब, गरीब तर होता जाता है। अमीर और गरीब का फर्क अवामी तबकात की तफरीक को जन्म देता है, जैसे लिब्रलिज़्म में एल्ट कलास, बिज़नेस क्लास, अपर क्लास, मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास, लोवर क्लास, जैसी टर्म इस्तेमाल की जाती है, यह तबकाती तकसीम एहसास कमतरी अवामी राबता का फकदान और जराएम को जन्म देती है। आप गुगल सर्च करें तो आपको जान कर हैरानी होगी कि तमाम तरक्की याफ्ता लिबरल मोमालिक तमाम जराएम में सर फेहरिस्त हैं। चोरी, डकैती, कत्ल, रेप, बच्चों के रेप, गर्ज़ हर जुर्म में यही लिबरल मोमालिक टॉप पर हैं।
एक भी मुस्लिम मुल्क इस फेहरिस्त में सौवें नमंबर पे नहीं है।
आखिर उसकी वजह क्या है?
हम जिसे तालीम याफ्ता मज़हब मआशरा समझ रहे हैं वहाँ जराएम कि शहर टॉप पर क्यों है?
क्या एक अमीर बन्दा चोरी, डकैती करेगा या कोई पढ़ा लिखा कतल क्यों करेगा?
या मज़हब मआशरे कि औरत किसी जानवर से शादी क्यों करेगीं?
अगर लिब्रलिज़्म मआशरे को मतवाज़िन करता और अवाम को दिमागी सुकून मौहिया करता तो ये जराईम पैदा ही क्यों होते?
सउदी अरब में बादशाहत कायम है, लेकिन वहाँ इस्लामी नीज़ाम नाफिज़ होने की वजह से पुरी दुनिया से कम जराएम होते हैं। हर साल जराएम की रेशियो में कमी होती है। हलांकि पूरी दुनिया में बादशाहत एक नाकाम नीज़ाम के तौर पे खत्म हो चुकी है।
लिब्रलिज़्म के माआशी फलस्फे को समझने के लिए हम पाकिस्तान और इंडिया कि मिसाल सामने रखते हैं, दोनों एक साथ अज़ाद हुए दोनों में लिबरल जमहुरी निज़ाम नाफिज़ है। इंडिया एक मज़बूत माशियत है जबकि पाकिस्तान कमज़ोर माशियत के तौर पर जाना जाता है।
लेकिन सरह गुरबत इंडिया में 60% से ज़्यादा और पाकिस्तान में 49% है क्या आप बता सकते हैं कि ऐसा क्यों है?
मैं पहले बता चुका हूँ कि लिब्रलिज़्म का मआशी निज़ाम इकनोमिक सिस्टम सिर्फ अमीर लोगों को प्रमोट करता है, अमीर, अमीर होता जाता है गरीब, गरीब ही रहता है या मज़ीद गरीब होता जाता है।
इकनोमिक सिस्टम में क्या खराबी है जो ऐसा होता है?
अमीर और गरीब एक जैसा टैक्स अदा करते हैं। अगर एक बंदा एक लाख कमाता है तो वह भी ज़रूरियात ज़िंदगी कि अशिया पर वही टैक्स देता है जो 10000 कमाने वाला देता है। यूं अमीर को टैक्स सिस्टम से फर्क नहीं पड़ता जबकि गरीब को फर्क पड़ता है।
मसलन टेलीकॉम कंपनीज़ 100 रुपए पर 24 रूपय टैक्स काटती है एक जरूरियात ज़िंदगी की अशिया पर जीएसटी 17 फीसद है यानी 100 रुपए की चीज पर 17 रुपय टैक्स है। ऐसे तमाम टेक्सेज़ डायरेक्ट टैक्सेज़ हैं जो अमीर गरीब दोनों अदा करते हैं। इस सिस्टम की वजह से अमीर अपनी आमदनी का कम खर्च करके अपने स्टेट में अज़ाफा करता जाता है।
जबकि गरीब घरेलू जरूरियात ही पूरी कर पाता है और अपना घर तक नहीं खरीद पाता। जब पैसा चंद अमीर के हाथों में सिमटता है जायदादें चंद अमीर हाथों में चली जाती है तो वह लोग अपनी मर्जी की कीमतें सेट करते हैं, नतीजतन प्रॉपर्टी वेल्यू आम आदमी की पहुंच से निकल जाती है और वह एक घर भी नहीं खरीद पाता।
यही वजह है कि इंडिया में पैसा ऊपर के चंद लोगों के पास है गरीब आदमी तक पैसा नहीं पहुंच पा रहा। उल्टा टैक्स सिस्टम की वजह से पैसा ऊपर को फॉलो कर रहा है इसलिए मईसत्य बेहतर होने के फवायेद गरीब आदमी को नहीं मिल रहे सराह ग़ुरबत बढ़ती जाती है।

0 टिप्पणियाँ
कृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।