पारा (26) हाम मीम
इस पारे में छः हिस्से है-
(1) सूरह अल अहक़ाफ़ मुकम्मल
(2) सूरह मुहम्मद मुकम्मल
(3) सूरह अल फ़तह मुकम्मल
(4) सूरह अल हुजरात मुकम्मल
(5) सूरह क़ाफ़ मुकम्मल
(6) सूरह अज़ ज़ारियात इब्तेदाई हिस्सा
(1) सूरह (046) अल अहक़ाफ़ मुकम्मल
(i) कायनात की तख़लीक़ बे मक़सद नहीं
अल्लाह ने कायनात को बेमक़सद (खिलौना) नहीं बनाया है बल्कि यह एक बामक़सद हकीमाना निज़ाम है जिसमें अवश्य नेक व बद और ज़ालिम व मज़लूम का फ़ैसला इंसाफ़ के साथ होना है और कायनात का यह मौजूदा निज़ाम हमेशा हमेश के लिए नहीं है बल्कि उसकी एक उमर मुक़र्रर है जिसकी समाप्ति पर उसे दरहम बरहम हो जाना है और अल्लाह की अदालत में भी एक वक़्त तय है जिसके आने पर वह ज़रूर क़ायम होगी। (03)
(ii) ज़्यादा गुमराह कौन?
जो अल्लाह को छोड़कर उन्हें पुकारे जो क़यामत तक जवाब नही दे सकते बल्कि वह पुकार ही कब सुनते हैं? उन्होंने ज़मीन व आसमान में पैदा ही क्या किया है? यह शरीक तो क़यामत के दिन उनके दुश्मन हो जाएंगे। (4, 5)
(iii) रसूल को इल्म ग़ैब नहीं होता
“मैं कोई निराला रसूल तो नहीं हूँ, मैं नहीं जानता कि कल तुम्हारे साथ क्या होना है और मेरे साथ क्या, मैं तो सिर्फ़ उस वही (ईश्वरीय आदेश) की पैरवी करता हूँ जो मेरे पास भेजी जाती है और मैं एक साफ़-साफ़ ख़बरदार करनेवाले के सिवा और कुछ नहीं हूँ।” (09)
(iv) जन्नत के हक़दार कौन?
जिन्होंने ने यह ऐलान किया कि हमारा रब अल्लाह है और फिर उसपर जमे रहे। क़यामत के दिन न उन्हें कोई ख़ौफ़ होगा और न कोई तकलीफ़। (13)
(v) हमल (गर्भ) और दूध पिलाने की उम्र
हमल और दूध पिलाने की मुद्दत तीस महीने यानी ढाई वर्ष है, इसमें दूध पिलाने की अधिकतम मुद्दत दो वर्ष और गर्भ की न्यूनतम मुद्दत छः महीने रखी गई है यानी अगर किसी के यहां शादी के छः महीने बाद औलाद होती है तो उसका नसब पिता से ही होगा। औरत पर इसकी वजह से इल्ज़ाम नहीं लगाया जा सकता। (15)
नोट:- अलबत्ता आजकल के वैज्ञानिक अविष्कार ने इस समस्या का बहुत हद तक समाधान कर दिया है, यदि किसी को शक हो तो वह सोनोग्राफ़ी के ज़रिए पता लगा सकता है।
(vi) जिन्नात के क़ुरआन सुनने का बयान
यह वाक़िआ वादी (घाटी) नख़ला में पेश आया था जहां नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तायफ़ से मक्का वापस होते हुए रास्ते में ठहरे थे। वहां इशा, फ़ज्र, या तहज्जुद की नमाज़ में आप क़ुरआन की तिलावत फ़रमा रहे थे कि जिन्नात के एक गिरोह का उधर से गुज़र हुआ, वह आप की क़िरअत सुनने के लिए ठहर गया। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जिन्नों की आमद से बेख़बर थे। बाद में अल्लाह ने वही وحی के ज़रिए आप को ख़बर दी। जिन्न ईमान लाये और अपनी क़ौम में जाकर उन्होंने तीन बातें रखीं
◆ हमने मूसा के बाद ऐसा कलाम सुना है जो उसकी तस्दीक़ भी करता है और सिराते मुस्तक़ीम की तरफ़ रहनुमाई भी।
◆ अल्लाह की तरफ़ बुलाने वाले की दावत क़ुबूल कर लो, ईमान लाओ, अल्लाह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा।
◆ जो ईमान न लाए वह और उसके बनाये हुए देवी देवता अल्लाह को हर्गिज़ आजिज़ नहीं कर सकते (29, से 31)
(vii) अल्लाह को थकान नहीं लगती
यहूदी कहते थे कि अल्लाह ने छह दिनों में कायनात बनाई और सातवें दिन आराम किया। उसका जवाब देते हुए कहा गया कि अल्लाह ने कायनात बनाई और कोई थकावट नहीं आई। (33)
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(2) सूरह (047) मुहम्मद मुकम्मल
(i) नेक अमल कब बर्बाद हो जाते हैं?
◆ जब इंसान कुफ़्र करे और अल्लाह के रास्ते से लोगों को रोके,
◆ अल्लाह की नाज़िल की हुई चीज़ से नफ़रत (घृणा), करे
◆ वह काम करे जो अल्लाह को नापसंद हों या उसको नाराज़ करने वाले हों,
◆ जब अपनी मनमानी की जाय,
◆जब रसूल के फ़ैसले को क़ुबूल न किया जाय
(1, 9, 16 28, 32)
(ii) मुसलमानों को तसल्ली
अल्लाह की मदद और रहनुमाई का यक़ीन, अल्लाह के रास्ते में क़ुरबानी देने पर बेहतरीन बदले की उम्मीद, और हक़ के रास्ते में की गई कोशिशों का दुनिया से आख़िरत तक अच्छा नतीजा और इनआम, जन्नत का वादा। (7, 12,
(iii) जन्नत की मिसाल
जन्नत में ऐसी नहरें हैं जिसका पानी भूरा (गदला) नहीं होता, दूध की नहर जिसका मज़ा (test) तब्दील नहीं होता, शराब की नहर जो पीने में बहुत ही स्वादिष्ट, ख़ालिस शहद की नहर और तमाम क़िस्म के फल और मेवे और सबसे बढ़ कर रब की बख़्शिश। (15)
(iv) क़ुरआन ग़ौर व फ़िक्र की दावत देता है
मौजूदा दौर में क़ुरआन एक ऐसी मज़लूम किताब हो कर रह गई है कि सबसे ज़्यादा पढ़ी जाती है ख़ास तौर से भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में जहाँ क़ुरआन को महज़ सवाब की ख़ातिर पढ़ने से ज़्यादा अहमियत नहीं दी जाती। लोग रमज़ान में 5, 5 और 6, 6 बार मुकम्मल पढ़ जाते हैं लेकिन उसके असल मक़सद से नावाक़िफ़ हैं। अफ़सोस तो इसपर है कि समाज में यह मशहूर कर दिया गया है क़ुरआन पढोगे तो गुमराह हो जाओगे। अमेरिका, लंदन और दूसरे देशों में तो non muslim क़ुरआन को समझ कर इस्लाम क़ुबूल कर रहे हैं और यह उम्मत जो इस क़ुरआन की तरफ़ बुलाने वाली और बेहतरीन उम्मत है वह क़ुरआन समझ के गुमराह हो जाएगी। दूसरी तरफ़ अल्लाह क़ुरआन को किताबे हिदायत, ھُدًی لِّلنَّاسِ और وَبَیِّنٰتٍ مِّنَ الْھُدًی وَالْفُرْقَان कहता है और यहां आयत 24 में
أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ أَمْ عَلَىٰ قُلُوبٍ أَقْفَالُهَا
तो क्या लोग क़ुरआन में (ज़रा भी) ग़ौर नहीं करते या उनके दिलों पर ताले लगे हुए हैं। (24)
(v) आमाल की बर्बादी
अल्लाह और उसके रसुल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुख़ालिफ़त हक़ीक़त में अपने आमाल की बर्बादी है। (25 से 28, 33)
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(3) सूरह (048) अल फ़तह मुकम्मल
(i) फ़तह ए मुबीन
जिसको फ़तह ए मुबीन क़रार दिया गया है उससे मुराद सुलह हुदैबिया है। इसमें कुफ़्फ़ार की तरफ़ से जितनी भी शर्तें रखी गई थीं सभी अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मंज़ूर कर लीं। बज़ाहिर ऐसा महसूस हो रहा था कि मुसलमानों को बहुत ज़्यादा दबाया गया है बल्कि इन शर्तों को मानने के लिए वह दिल से तैयार न थे लेकिन इताअते रसुल के आगे बेबस थे वह चार शर्तें यह थीं
◆ दस साल तक जंग बंद रहेगी, एक दूसरे के ख़िलाफ़ खुली छुपी कोई कार्यवाही नहीं होगी।
◆ क़ुरैश का जो भी आदमी भागकर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास जाएगा उसे वापस कर दिया जाएगा लेकिन आप के साथियों में से जो क़ुरैश के पास चला जायेगा उसे वापस नहीं किया जायेगा।
◆ अरब के क़बीलों में से जो क़बीला भी किसी एक का सहयोगी बन कर इस संधि में शामिल होना चाहेगा उसे इख़्तियार होगा।
◆ अगले साल उमरे के लिए आकर तीन दिन मक्के में इस शर्त पर ठहरेंगे कि परतलों में सिर्फ़ एक तलवार हो, वापसी में किसी को भी अपने साथ न ले जा सकेंगे।
ज़ाहिर सी बात है ऐसी शर्तों पर कौन ख़ुश हो सकता था लेकिन अल्लाह ने इसे फ़तहे मुबीन क़रार दिया और हालात ऐसे पैदा कर दिए कि सिर्फ़ दो साल बाद मक्का मुसलमानों के क़ब्ज़े में था और कुफ़्फ़ारे मक्का उनके रहम व करम पर थे। (आयत 01)
(ii) मोमिन के चार काम
◆ अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान
◆ उनका साथ देना।
◆ अल्लाह की बड़ाई और रसूल की इज़्ज़त करना।
◆ तस्बीह बयान करना। (8, 9)
(iii) बैअते रिज़वां
हुदैबिया पर पड़ाव डालकर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उस्मान रज़ी अल्लाहु अन्हु को मक्का में अपना दूत बनाकर भेजा ताकि क़ुरैश के सरदारों को पैग़ाम दें कि हम जंग के लिए नहीं बल्कि उमरे के मक़सद से क़ुरबानी के जानवरों के साथ आये हैं, मगर वह लोग न माने और उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु को रोक लिया। इसी बीच उनके क़त्ल की ख़बर उड़ गई और उनके वापस न आने से मुसलमानों को यक़ीन हो गया तो तमाम 1400 मुसलमानों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हाथ पर बैअत की कि "हम उस्मान के ख़ून का बदला लेंगे या फिर यहीं जामे शहादत नोश करेंगे"। अल्लाह तआला को यह बात बहुत पसंद आई और सभी को अपनी रज़ा की सर्टिफ़िकेट इनायत कर दिया: "जिस वक़्त मोमिनीन तुमसे दरख़्त के नीचे की बैअत कर रहे थे तो अल्लाह उनसे इस बात पर ज़रूर ख़ुश हुआ ग़रज़ जो कुछ उनके दिलों में था अल्लाह ने उसे देख लिया फिर उन पर तस्सली नाज़िल फ़रमाई और उन्हें उसके बदले में बहुत जल्द फ़तह इनायत की। (आयत18)
(iv) सहाबा की तारीफ़
◆ आपस मे रहीम और कुफ़्फ़ार पर सख़्त।
◆ रुकूअ, सज्दा, और अल्लाह के फ़ज़ल व रज़ा की ख़्वाहिश,
◆ पेशानी पर सज्दों के निशान उनकी पहचान (29)
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(4) सूरह (049) अल हुजरात मुकम्मल
(i) अल्लाह और उसके रसूल का अदब
अल्लाह और उसके रसूल (क़ुरआन व हदीस) से आगे न बढ़ें, न अपनी आवाज़ को उनकी आवाज़ से बुलंद की जाय, रसूलुल्लाह के पास अपनी आवाज़ को पस्त रखो (क़ुरआन व हदीस की कोई बात आए तो उस के भी सामने आवाज़ पस्त रखा जाय, सिर्फ़ उसी को तस्लीम किया जाय और उसके मुक़ाबले में हर बात को ठुकरा दिया जाय) (1, 2)
(ii) तहक़ीक़ ज़रूरी है
अगर कोई फ़ासिक़ ख़बर लाये तो कोई क़दम उठाने से पहले उसकी तहक़ीक़ ज़रूर की जाए वरना कहीं ऐसा नुक़सान हो सकता है कि शर्मिंदगी उठानी पड़े। (6)
(iii) सुलह कराना
जब मुसलमानों के दो गिरोह लड़ पड़ें तो उनके दरमियान सुलह की कोशिश की जाय लेकिन अगर बाग़ी गिरोह न माने तो उसके ख़िलाफ़ जंग की जाए यहाँ तक कि वह अल्लाह के हुक्म की तरफ़ पलट आए, सुलह कराते समय अदल व इंसाफ़ का पूरा ख़्याल रहे। (9)
(iv) वह बुराइयां जो इंसान की निजी और इज्तेमाई (सामुहिक) ज़िंदगी में बिगाड़ को जन्म देती हैं
◆ एक दूसरे का मज़ाक़ उड़ाना,
◆ किसी पर ऐब लगाना,
◆ बुरे नामों से पुकारना,
◆ किसी के बारे में बुरा गुमान,
◆ किसी की जासूसी (टोह में लगना), ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई), ग़ीबत करना अपने मरे हुए भाई के मांस खाने के समान है। (11, 12)
(v) फ़ज़ीलत का मानक केवल तक़वा है
अल्लाह ने इंसान की तख़लीक़ एक मर्द और एक औरत से की और फिर पहचान की ख़ातिर क़ौमें और बिरादरियां बना दीं वरना अल्लाह के नज़दीक सबसे बेहतर (श्रेष्ठतम) वह है जो सबसे ज़्यादा अल्लाह से मुहब्बत करने वाले हो। (13)
(vi) ईमान और इस्लाम मे फ़र्क़
अगरचे इस्लाम और ईमान एक दूसरे के पर्यायवाची हैं परंतु कहीं जब इस्लाम बोला जाता है तो उसका संबंध इंसान के ज़ाहिरी अमल से होता है, दुनिया में यही मानक बनता है जबकि ईमान का संबंध इंसान के बातिनी (अंतरात्मा) से होता है। आख़िरत में फ़ैसला ईमान की ही बुनियाद पर होगा। (14)
(vii) ईमान लाना अल्लाह पर एहसान नहीं
ईमान लाकर कोई अल्लाह पर एहसान नहीं करता बल्कि यह तो अल्लाह का एहसान है कि उसने हिदायत से नवाज़ा। (16, 17)
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(5) सूरह (050) क़ाफ़ मकम्मल
(i) सूरह का मौज़ूअ (शीर्षक) आख़िरत है
कुफ़्फ़ार को सबसे ज़्यादा हैरत इसी बात पर थी कि जब इंसान मर कर मिट्टी में मिल जाएगा, हड्डियां पुरानी हो जाएंगी तो क्या वह दोबारा उठाया जाएगा उसका जवाब देते हुए छोटी छोटी आयतों में आख़िरत को खोल खोल कर बयान किया गया है और मुख़्तलिफ़ निशानियों के ज़रिए सवाल का मुस्कित (ख़ामोश कर देने वाला) जवाब दिया गया है। (1 से 3)
(ii) अल्लाह की क़ुदरत की करिश्मे
बग़ैर किसी सूराख़ के आसमान की बनावट और सजावट, ज़मीन को फैलाना और उसमें सुंदर सुंदर पेड़ पौधे, आसमान से रहमत की बारिश, बारिश द्वारा बाग़ और खेतों की हरियाली, खुजूर के पेड़, इंसानों के लिए भिन्न भिन्न प्रकार के रिज़्क़, मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन का पुनः उपजाऊ हो जाना। (06 से 11)
(iii) आठ क़ौमों का ज़िक्र
क़ौमे नूह, क़ौमे समूद,असहाबुर रस, क़ौमे आद, फ़िरऔन और क़ौमे लूत, असहाबुल ऐका, और क़ौमे तुब्बा,जिन्होंने अल्लाह की आयात और क़यामत को झुठलाया और दुनिया से उनका नाम व निशान मिट गया। (12,13)
(असहाबुर रस से मुराद कुछ लोगों ने "मोहन जोदड़ो" भी लिया है क्योंकि यहां कुंएं अत्यधिक थे और खेती बाड़ी का प्रबंध उसी से चलता था)
(iv) नबी को नसीहत
सब्र करें, तस्बीह बयान करें, सूरज निकलने से पहले तथा सूरज डूबने के बाद (फ़ज्र और मग़रिब) अल्लाह की हम्द बयान करें, आप का काम लोगों पर ज़बरदस्ती करना नहीं है बल्कि केवल क़ुरआन सुना कर लोगों को नसीहत करना है। (39, 40, 45)
(iv) कुछ अहम बातें
◆ अल्लाह इंसान की गरदन की नस (Aorta) से भी क़रीब है।
◆ जो कुछ इंसान की ज़बान से निकलता है उसे फ़रिश्ता लिख लेता है।
◆ अल्लाह बन्दों पर ज़ुल्म नहीं करता बल्कि इंसान ख़ुद अपने ऊपर ज़ुल्म करता है।
◆ आसमान ज़मीन और उनके दरमियान की तमाम चीज़ों को अल्लाह तआला में 6 दिनों में बग़ैर किसी थकान के बनाया है।
(16, 18, 29, 38)
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(6) सूरह (051) अज़ ज़ारियात (इब्तेदाई हिस्सा)
(i) आख़िरत
क़यामत क़ायम होगी, हिसाब किताब हो कर रहेगा, उस से कोई भाग नहीं सकेगा। जो लोग अल्लाह और आख़िरत के मुनकिर हैं उन्हें आग पर तपाया जाएगा जबकि नेक लोग जन्नत में ऐश कर रहे होंगे।(5, 6 और 11 से 16)
(ii) नेक लोगों की सिफ़ात
◆ रात को कम ही सोते हैं,
◆ सहर के वक़्त तहज्जुद में माफ़ी मांगते हैं,
◆ अपने माल में मांगने वालों और ग़रीब मजबूर का हिस्सा रखते हैं। (17 से 19)
(iii) इब्राहीम अलैहिस्सलाम और मेहमान
इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास कुछ फ़रिश्ते इंसानों की शक्ल में आए, उन्होंने ने उनके लिए एक भुना हुआ बछड़ा पेश किया जब फ़रिश्तों ने हाथ नहीं लगाया तो इब्राहीम अलैहिस्सलाम को डर लगा फ़रिश्तों ने कहा डरो नहीं हम तुम्हे एक बच्चे की ख़ुशख़बरी देने आए हैं यह सुन कर उनकी बीवी सारा ने हैरत से अपना चेहरा पीट लिया और कहा मैं तो बुढ़िया भी हूं और बांझ भी, फ़रिश्तों ने कहा यह तो तेरे रब का फ़ैसला है जो हकीम भी है और अलीम भी। (24 से 30)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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