पारा (25) इलैहि युरददो
इसमें कुल पांच हिस्से हैं-
(2) सूरह अश शूरा मुकम्मल
(3) सूरह अज़ ज़ुखरूफ़ मुकम्मल
(4) सूरह अद दुख़ान मुकम्मल
(5) सूरह अल जासिया मुकम्मल
(1) सूरह (041) फ़ुस्सिलत (हाम मीम अस सज्दा) बाक़ी हिस्सा
इसका बयान पारा 24 में इसी सूरह के तहत गुज़र चुका है।
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(2) सूरह (042) अश शूरा मुकम्मल
(i) शिर्क बड़ा ही घोर पाप है
किसी मख़लूक़ का सम्बंध अल्लाह से जोड़कर उसको अपना हिमायती और मददगार समझना इतना बड़ा जुर्म है कि क़रीब है कि आसमान उनके ऊपर फट पड़े और फ़रिश्ते शर्म के कारण कान पर हाथ रखकर यह सोचने लगते हैं कि जिसे अल्लाह ने अपनी इबादत के लिए पैदा किया था उस मख़लूक़ ने अल्लाह की धरती पर क्या कोहराम मचा रखा है? भला किसकी हैसियत है कि संसार के पालनहार की ख़ुदाई में किसी प्रकार भी शरीक हो सके। (5)
(ii) तमाम ख़ज़ानों का मालिक अल्लाह ही है
لَهُۥ مَقَالِيدُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ يَبۡسُطُ ٱلرِّزۡقَ لِمَن يَشَآءُ وَيَقۡدِرُۚ
आसमानों और ज़मीन के ख़ज़ानों की कुंजियाँ अल्लाह के पास हैं वह जिसे चाहता है छप्पर फाड़ कर देता है और जिसे चाहता है नपा तुला देता है। (12)
(iii) दीन को क़ायम करने और फ़िरक़ों में तक़सीम न होने की नसीहत
अल्लाह ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के लिए वही तरीक़ा (दीन इस्लाम) मुक़र्रर किया है जिसका हुक्म नूह, इब्राहीम, मूसा और ईसा को इस ताकीद के साथ दिया जा चुका है कि أَقِيمُواْ ٱلدِّينَ وَلَا تَتَفَرَّقُواْ فِيهِۚ दीन को क़ायम करो और फ़िरक़ों में तक़सीम न हो। (13)
(iv) अल्लाह की क़ुदरत
◆ बारिश का नाज़िल होना,
◆ रिज़्क़ का इंतेज़ाम,
◆ आसमान और ज़मीन की तख़लीक़,
◆ जानवरों की पैदाइश,
◆ जानवरों को एक जगह अनेक परिस्थितियों में इकट्ठा कर देना,
◆ समुद्र में हवा के सहारे कश्ती का चलना, हर चीज़ के जोड़े जोड़े,
(11, 27, 28, 29, 32, 33)
(v) मोमिन का काम
◆ अल्लाह के दीन की दावत,
◆ इस्तेक़ामत (दीन पर मज़बूती से क़ायम रहना)
◆ स्वार्थी इच्छाओं से ख़ुद को बचाये रखना,
◆ अल्लाह की नाज़िल की हुई तमाम किताबों पर ईमान,
◆ अदल व इंसाफ़ क़ायम करना,
◆ अल्लाह की ज़ात पर ही भरोसा रखना,
◆ गुनाहे कबीरा (बड़े गुनाह) और गंदे कामों से बचना,
◆ ग़ुस्से को पी जाना,
◆ किसी भी मामले को आपस में मशविरे से तय करना,
◆ नमाज़ क़ायम करना,
◆ अल्लाह के रास्ते मे ख़र्च करना
(आयत 13, 15, 36,37,38)
(vi) औलाद देना सिर्फ़ अल्लाह के इख़्तियार में है
आसमान व ज़मीन की हुकूमत ख़ास अल्लाह ही की है जो चाहता है पैदा करता है। जिसे चाहता है केवल बेटियाँ देता है और जिसे चाहता है सिर्फ़ बेटा अता करता है। जिसे चाहता है बेटे बेटियाँ दोनों इनायत करता है और जिसे चाहता है बांझ बना देता है बेशक वह बड़ा वाकिफ़कार (असली पहचान रखने वाला) और क़ादिर है। (49, 50)
(vii) कलामे इलाही की तीन सूरतें
وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُكَلِّمَهُ اللَّهُ إِلَّا وَحْيًا أَوْ مِن وَرَاءِ حِجَابٍ أَوْ يُرْسِلَ رَسُولًا فَيُوحِيَ بِإِذْنِهِ مَا يَشَاءُ ۚ إِنَّهُ عَلِيٌّ حَكِيمٌ
किसी आदमी के लिए ये मुमकिन नहीं कि अल्लाह उससे बात करे मगर वही (وحی) के ज़रिए या परदे के पीछे से या कोई फ़रिश्ता भेज दे। ग़रज़ वह अपने इख़्तियार से जो चाहता है पैग़ाम भेज देता है बेशक वह आलीशान हिकमत वाला है। (आयत 51)
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(3) सूरह (043) अज़ ज़ुख़रूफ़ मुकम्मल
(i) उम्मुल किताब क्या है?
वास्तविक किताब, वह किताब जिसमें तमाम अंबिया पर नाज़िल होने वाली किताबें मुकम्मल तौर पर महफ़ूज़ हैं, इसे सूरह 56 अल वाक़िआ में "किताबे मकनून" (छुपी हुई और सुरक्षित) और सूरह 85 अल बुरूज में "लौहे महफ़ूज़" (सुरक्षित तख़्ती) कहा गया है। जिसमें लिखी हुई बातें किसी भी प्रकार मिट नहीं सकतीं, वह हर प्रकार से सुरक्षित है। (4)
(ii) अल्लाह की क़ुदरत
◆ आसमान और ज़मीन की तख़लीक़, ◆ ज़मीन को इंसान की गोद, ◆ ज़मीन और उसमें मुख़्तलिफ़ रास्ते, ◆ आसमान से एक मिक़दार में बारिश, ◆ मुर्दा ज़मीन को दोबारा ज़िंदगी देना, ◆ तमाम मख़लूक़ के जोड़े, ◆ कश्ती, ◆ सवारी के जानवर वग़ैरह (09 से 12)
(iii) सफ़र की दुआ
سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَـٰذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ وَإِنَّا إِلَىٰ رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ
पाक है वह जिसने इसको हमारे कंट्रोल में किया जबकि उस पर क़ाबू पाना हमारे बस में न था। और हमको तो यक़ीनन अपने रब की तरफ़ ही पलट कर जाना है। (13,14) (सही, मुस्लिम हदीस नंबर 1342/ किताबुल हज्ज)
(iv) लड़कियों को अपने लिए ज़िल्लत समझना
कुफ़्फ़ारे मक्का को जब लड़की की पैदाइश की ख़ुशख़बरी सुनाई जाती है तो उनके चेहरे काले पड़ जाते हैं और वह ग़म से पागल होने लगता है। हालांकि यही फ़रिश्तों पर ख़ुदा की बेटी होने का इल्ज़ाम लगाते हैं। (16 से 20)
(भारत में भी लड़की के जन्म को अपने हक़ में ज़िल्लत समझा जाता है यही वजह है कि गर्भपात का अनुपात दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है)
(v) बाप दादा और बुज़ुर्गों की अंधी तक़लीद
कुफ़्फ़ारे मक्का नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दावत का इंकार यही कहते हुए करते थे और जितनी क़ौमें पहले गुज़र चुकी हैं वह भी यही कहती थीं कि إِنَّا وَجَدۡنَآ ءَابَآءَنَا عَلَىٰٓ أُمَّةٖ وَإِنَّا عَلَىٰٓ ءَاثَٰرِهِم مُّقۡتَدُونَ
"हमने बाप दादा को इसी रास्ते पर पाया है। हम तो उन्हीं के नक़्श क़दम पर चलेंगे"(23)
(v) कुफ़्फ़ार की आपत्तियां
यह जादूगर है, क्या क़ुरआन के नुज़ूल के लिए यह यतीम ही मिला था, क्यों न दो बड़े शहरों (मक्का और तायफ़) के दो बड़े बड़े आदमियों पर यह कलाम नाज़िल हुआ। (30, 31)
(vi) काफ़िरों का ऐश व आराम देख कर मोमिन को दुनिया तलब नही करना चाहिए
"अगर यह बात न होती कि सब लोग एक ही तरीक़े के हो जाएँगे तो हम कुफ़्फ़ार के घरों की छतें, सीढ़ियाँ, दरवाज़े और गाऊ तकिया तक सोने चांदी का बना देते। नेक लोगों के लिए तो आख़िरत में उनके रब के पास ऐश व आराम होगा। (33 से 35)
(vii) जिगरी दोस्त भी एक दूसरे के दुश्मन
दुनिया में एक दूसरे से कितना ही घनिष्ठ मित्रता क्यों न हो परन्तु क़यामत के दिन शत्रु नज़र आएंगे
الْأَخِلَّاءُ يَوْمَئِذٍ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ إِلَّا الْمُتَّقِينَ
जिगरी दोस्त क़यामत के दिन एक दूसरे के दुशमन होगें अलबत्ता नेक लोगों के दोस्त आपस में दोस्त रहेंगे। (आयत 67)
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(4) सूरह ( 044) अद दुख़ान मुकम्मल
(i) क़ुरआन के नुज़ूल शबे क़द्र में हुआ
◆ क़ुरआन वाज़ेह (स्पष्ट) किताब है,
◆ यह मुबारक रात यानी शबे क़द्र में नाज़िल किया गया,
◆ शबे क़द्र में तमाम मज़बूत मामलों का फ़ैसला किया जाता है। (3 से 5)
(ii) हिकमत और रहमत का तक़ाज़ा
एक किताब देकर एक रसूल भेजना न केवल हिकमत का तक़ाज़ा था बल्कि अल्लाह की रहमत का तक़ाज़ा भी था। क्योंकि इंसान के पालन पोषण के साथ उसके लिए हिदायत भी अत्यंत ज़रूरी थी। (5, 6)
(iii) आसमान धुआं हो जाएगा
आसमान अपने वजूद से पहले भी धुंआ था और जब क़यामत क़ायम होगी तब भी आसमान धुंआ हो जाएगा। (10)
(iv) अहले मक्का की हठधर्मी
नबूवत की निशानी देखने बाद भी अहले मक्का अपने कुफ़्र पर अड़े रहे और रसूल के बारे में कहा कि यह तो ट्रेनिंग लिया हुआ पागल है। (14)
(v) कोई वस्तु बे मक़सद नहीं
काएनात की कोई वस्तु खिलवाड़ के लिए नहीं बनाई गई हैं बल्कि अल्लाह ने उन्हें हक़ के साथ बनाया है। (39)
(vi) ज़क़्क़ूम का दरख़्त जहन्नमियों की खोराक ख़ोराक
إِنَّ شَجَرَتَ الزَّقُّومِ طَعَامُ الْأَثِيمِ كَالْمُهْلِ يَغْلِي فِي الْبُطُونِ كَغَلْيِ الْحَمِيمِ
बेशक थोहड़ (ज़क़्क़ूम) का दरख़्त गुनहगारों का खाना होगा पिघले हुए तांबे की तरह जो पेटों में इस तरह उबाल खाएगा जैसे तेल की तलछट की तरह खौलता हुआ पानी। (आयत 43 से 46)
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(5) सूरह (045) अल जासिया मुकम्मल
(i) अल्लाह की निशानियां
◆ मानव और अन्य जानवरों की पैदाइश,
◆ रात और दिन का एक दूसरे के पीछे आना,
◆ आसमान से रिज़्क़,
◆ मुर्दा ज़मीन की दोबारा ज़िंदगी,
◆ हवाओं का उलट फेर,
◆ व्यापार में कश्ती का महत्व,
◆ समुद्र और आसमान व ज़मीन के दरमियान की तमाम चीज़ों पर कंट्रोल,
(2 से 6, 12, 13, 22)
(ii) तबाही व बर्बादी है
◆ जो अल्लाह की आयत के मुक़ाबले में घमंड करते हैं,
◆ अल्लाह की आयात का मज़ाक बनाते हैं,
◆ शिर्क करते हैं,
◆ आयात और आख़िरत का इंकार करते हैं।
(8 से 11 और 24, 32)
(iii) अपनी ख़्वाहिशात के पीछे चलने वालों का अंजाम
भला तुमने उस शख़्श के हाल पर ग़ौर किया जिसने अपनी नफ़सानी ख़्वाहिशात को ख़ुदा बना लिया और अल्लाह ने उसे इल्म के बावजूद गुमराही में फेंक दिया और उसके कान और दिल पर मुहर लगा दी, ऑंखों पर पर्दा डाल दिया। अब अल्लाह के इलावा कौन है जो उसे हिदायत दे?। (आयत 23)
(iv) हर गिरोह घुटनों के बल खड़ा होगा
क़यामत के दिन हर गिरोह घुटनों के बल खड़ा होगा। उसको पुकारा जाएगा कि अपना आमाल नामा (कर्मपत्र) देखे, आज सब को उनके कर्म का बदला दिया जाएगा। और कहा जायेगा "यह हमारा तैयार कराया हुआ आमाल नामा है जो तुम्हारे बारे में बिल्कुल सटीक गवाही दे रहा है। जो कुछ भी तुम दुनिया में करते थे हम उसे लिखवाते जा रहे थे। (आयत 28, 29)
(v) अल्लाह की आयात का मज़ाक़ उड़ाने वालों का अंजाम
क़यामत के दिन अल्लाह की आयात का मज़ाक़ उड़ाने वाले उसी तरह भुला दिए जाएंगे जैसे उन्होंने क़यामत के दिन को भुला रखा था। उनका ठिकाना जहन्नम होगा और कोई उनकी मदद करने वाला नहीं होगा। (34)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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