पारा (21) उतलु मा ऊहिय
इस पारे में पांच हिस्से हैं-
(2) सूरह अर रूम मुकम्मल
(3) सूरह लुक़मान मुकम्मल
(4) सूरह अस सज्दा मकम्मल
(5) सूरह अल अहज़ाब इब्तेदाई हिस्सा
(1) सूरह (029) अल अंकबूत बाक़ी हिस्सा
(i) नमाज़ बेहयाई और बुरे कामों से रोकती है
यानी अगर एक इंसान नमाज़ भी पाबंदी से पढ़ता है और बुरे व गन्दे कामों में भी पड़ा हुआ है तो इसका मतलब यह कि वह नमाज़ सही ढंग से अदा नहीं करता। वह सिर्फ़ दुनिया वालों की नज़र में नमाज़ी है। उसे अपने पेट में गए लुक़मे से कपड़े व दीगर चीज़ों का जायज़ा लेना चाहिए। (45)
(ii) नबी के उम्मी होने (लिखना पढ़ना न जानने) की दलील
(ऐ नबी) तुम इस क़ुरआन से पहले कोई किताब नहीं पढ़ते थे और न कुछ अपने हाथ से लिख सकते थे। अगर ऐसा होता तो असत्य को पूजने वाले लोग सन्देह में पड़ सकते थे। (48)
(iii) हर जान को मौत का मज़ा चखना है
मौत से बच कर कोई भाग नहीं सकता। और यह भी तय है कि मौत के बाद भी दूसरी ज़िन्दगी (परलोक) है जहां इस दुनिया में किये गए कामों का हिसाब देना है। (57)
(iv) कुफ़्फ़ार की हठधर्मी
कुफ़्फ़ार को इस बात का ख़ूब ख़ूब यक़ीन है कि दुनिया और दुनिया की हर छोटी बड़ी चीज़ को अल्लाह ने ही बनाया है। यही वजह है कि जब उनसे पूछा जाता है "आसमान और ज़मीन को पैदा करने वाला, सूरज व चांद को कंट्रोल वाला, आसमान से बारिश बरसाने वाला, और मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन को हरा भरा करने वाला कौन है? और जब कश्तियाँ भंवर में फंस कर हचकोले खाने लगती हैं तो तुम किसे पुकारते हो तो वह फ़ौरन जवाब देते है "अल्लाह" लेकिन इसके बावजूद ईमान नहीं लाते। (61 से 63)
(v) दुनिया की ज़िंदगी तो बस खेल तमाशा है
असल जिंदगी तो आख़िरत की है इसलिए उसकी तैयारी हर वक़्त करते रहना चाहिए।(64)
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(2) सूरह (030) अर रूम
(i) दो भविष्यवाणीयां
615 ईसवी में ईरान के बादशाह ख़ुसरो परवेज़ ने रोम की ईंट से ईंट बजा दी और एक बड़ी सल्तनत का तक़रीबन ख़ात्मा कर दिया, क़ैसर को भाग कर कर्ताजिन्ना Carthage (जो अब तूनिस Tunisia देश है) में पनाह लेनी पड़ी। यही वह साल था जब हिजरत हब्शा हुई। चूंकि रूमी अहले किताब थे इसलिए मुसलमानों की उम्मीदें उनके साथ थीं दूसरी तरफ़ कुफ़्फ़ारे मक्का ईरान की जीत सुनकर मुसलमानों को यह धमकी दे रहे थे कि जिस तरह ईरानियों ने रूमियों का ख़ात्मा कर दिया है उसी तरह हम भी तुम्हें मिटा देंगे। इन हालात में सूरह रूम नाज़िल हुई जिसमें एक के बजाय दो भविष्यवाणी थी। "अगरचा रूमी परास्त हो गए हैं लेकिन चंद वर्षों के अंदर वह ग़ालिब हो जाएंगे और उस दिन मुसलमान भी खुशियां मना रहे होंगे। (आयत 02 से 05) चुनाँचे 624 ईसवी में जब क़ैसर ने आज़रबाईजान में घुसकर ज़रतुस्त (Zoroaster) के मुक़ाम पैदाइश अरमिया (Clorumia) को तबाह कर दिया। यही वह साल है जिसमें मुसलमानों को बद्र के मुक़ाम पर ज़बरदस्त फ़तह नसीब हुई। और जब क़ैसर ने पूरे ईरान पर क़ब्ज़ा कर लिया और ख़ुसरो परवेज़ अपने ही घर में अपने बेटों के हाथ क़त्ल हुआ उसी साल मक्का फ़तह हुआ।
(ii) तौहीद के संदर्भ में अल्लाह की अज़मत की दस निशानियां
● अल्लाह ही ज़िन्दा को मुर्दा से और मुर्दे को ज़िन्दा से निकालता है, मुर्दा ज़मीन को ज़िन्दा करता है और आख़िरत के दिन इस ज़मीन से तुम्हें निकाल खड़ा करेगा। (19)
● उस की निशानियों में ये भी है कि उसने तुमको मिट्टी से पैदा किया फिर तुम आदमी बनकर चलने फिरने लगे। (20)
● उस की निशानियों में से एक यह है कि उसने तुम्हारे वास्ते तुम्हारी ही जिन्स की बीवियाँ पैदा की ताकि तुम उनके साथ रहकर चैन करो और तुम लोगों के दरमियान प्यार और उलफ़त पैदा कर दी। (21)
● उस की निशानियों में आसमानों और ज़मीन का पैदा करना और तुम्हारी ज़बानों और रंगों का एख़तेलाफ़ भी है। (22)
● रात को तुम्हारे लिए नींद और दिन को अपने फ़ज़ल व करम (रोज़ी) की तलाश के लिए बनाया। (23)
● उस की निशानियों में से यह भी है कि वह तुमको डराने और उम्मीद दिलाने के वास्ते बिजली दिखाता है और आसमान से पानी बरसाता है और उसके ज़रिए से ज़मीन को उसके परती (मुर्दा) होने के बाद आबाद करता है। (24)
● उस की निशानियों में से एक यह भी है कि आसमान और ज़मीन उसके हुक्म से क़ायम हैं फिर (मरने के बाद) जिस वक़्त तुमको एक बार बुलाएगा तो तुम सबके सब ज़मीन से (ज़िन्दा हो होकर) निकल पड़ोगे। (25)
● अल्लाह ही है जिसका रिज़्क़ चाहता है बढ़ा देता है और जिसका चाहता है तंग कर देता है। (37)
● उसकी निशानियों में से एक यह भी है कि वह हवाओं को (बारिश) की ख़ुशख़बरी के वास्ते भेज दिया करता है ताकि तुम्हें अपनी रहमत की लज्ज़त चखाये और इसलिए भी कि कश्तियां उसके हुक्म से चल खड़ी हों ताकि तुम उसके फज़ल व करम से (अपनी रोज़ी) की तलाश करो। (आयत 46)
● अल्लाह ही है जिसने तुमको कमज़ोर (दुर्बल) पैदा किया फिर ताक़त बख़्शी। और फिर ताक़त के बाद दुर्बल और बुढ़ापे की हालत में पहुंका देता है। वह जो चाहता है पैदा करता है। (54)
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(3) सूरह (031) लुक़मान मकम्मल
(i) तैहीद (अल्लाह की क़ुदरत के दलाएल)
● बग़ैर pillers का आसमान
● मज़बूत और भारी भरकम पहाड़।
● चौपाए और रेंगने वाले कीड़े
● आसमान से बारिश और ज़मीन पर हर तरह के हसीन जोड़े
(ii) लुक़मान हकीम की बेटे को वसीयत
● शिर्क कभी मत करना
● अगर राई के दाने के बराबर भी कुछ हो और फिर वह किसी सख़्त पत्थर के अन्दर या आसमान में या ज़मीन में (छुपी हुई) हो तो भी अल्लाह उसे (आख़िरत के दिन) हाज़िर कर देगा।
● नमाज़ क़ायम करो, भलाई का हुक्म दो, बुराई से रोको और इस रास्ते में जो भी तकलीफ़ पहुंचे उसपर सब्र करो।
● लोगों से मुंह बिगाड़ कर बात न कर और न ज़मीन पर अकड़ कर चलो।
● अपनी चाल दरमियानी और अपनी आवाज़ को पस्त रखो, क्योंकि नापसंदीदा आवाज़ गधे की आवाज़ है।
लुक़मान की नसीहत के साथ अल्लाह ने वालिदैन की इताअत को और शामिल किया है कि अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी के इलावा तमाम मामलात में उनकी इताअत ज़रूरी है। (13 से 19)
(iii) अल्लाह के एहसान अनगिनत हैं
धरती में जो पेड़ हैं अगर वह सब कलम बन जायें और समुद्र, सात अन्य समुद्रों के साथ स्याही बन जायें, तब भी अल्लाह की बातें समाप्त न हों। निस्सन्देह अल्लाह सर्वशक्तिमान और विवेकवाला (हलीम) है। (27)
(iv) पांच चीजों का इल्म सिर्फ़ अल्लाह तआला को है
● क़यामत कब आएगी।
● बारिश कब कहाँ और कितनी होगी।
● मां के पेट में क्या (लड़की या लड़का, गोरा या काला, सही सालिम या विकलांग) परवरिश पाएगा।
● इंसान कल क्या करेगा या कल क्या कमायेगा।
● मौत कब और कहां आएगी। (34)
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(4) सूरह (032) अस सज्दा मकम्मल
(i) क़ुरआन की अज़मत
क़ुरआन तमाम दुनिया के पालनहार की जानिब से नाज़िल की गई किताब है जिसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं, और यही तेरे रब की जानिब से हक़ है। (2, 3)
(ii) तैहीद
● आसमान व ज़मीन और उसके दरमियान मौजूद तमाम चीज़ों का ख़ालिक़ अल्लाह ही है और ग़ैब व हाज़िर का मालिक भी।
● हर काम की तदबीर वही करता है।
● इंसान की तख़लीक़ पहले मिट्टी से फिर पानी के एक हक़ीर क़तरे (वीर्य) से की, उसको परवान चढ़ाया, रूह फूंकी,और कान आंख और दिल देकर उसे इन्तेहाई आकर्षक सूरत और मुनासिब क़द व क़ामत वाला बनाया। (4 से 9)
(iii) क़यामत
मुजरिम उस दिन सिर झुकाए खड़े होंगे, उनपर ज़िल्लत छाई हुई होगी। वह दुनिया में वापस आने की तमन्ना करेंगे और मोमिन जो दुनिया में अल्लाह के लिए अपने आराम को क़ुर्बान करते हैं अल्लाह के पास उनके लिए ऐसी नेअमतें हैं जिसका तस्व्वुर भी दुनिया में लोग नहीं कर सकते। (12)
(iv) मोमिन कौन?
● जब अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है तो सज्दे में गिर पड़ते हैं।
● अपने रब की हम्द व सना (तारीफ़) बयान करते हैं।
● घमंड नहीं करते
● जिनके पहलू बिस्तर से दूर रहते हैं और दुआ करते हैं और अपने रब को ख़ौफ़ व उम्मीद के दरमियान पुकारते है।
● अल्लाह ने जो माल उन्हें दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं। (15, 16)
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(5) सूरह 033 अल अहज़ाब (इब्तेदाई हिस्सा)
(i) ज़माना जाहिलियत के तीन ग़लत ख़्यालात की तरदीद
● उनका ख़्याल था कि कुछ लोगों के पास दो दिल होते हैं। यहां बताया गया कि दिल तो बस एक ही होता है उसमें या तो ईमान होगा या कुफ़्र।
● "ज़िहार" के अल्फ़ाज़ जैसे أنتِ علي كظهر أمي، أو كبطن أختي، أو كفخذ بنتي ونحو ذلك.
(तू मुझपर मेरी माँ की पीठ की तरह हराम है। या मेरी बहन के पेट की तरह हराम है। या मेरी बेटी के रान की तरह हराम है) कहने से बीवी हराम नहीं हो जाती लेकिन उसका कफ़्फ़ारा देना पड़ेगा।
● जिसको चाहते थे मुंह बोला बेटा बना लेते थे फिर उसे हक़ीक़ी बेटे के सभी हुक़ूक़ दिए जाते थे यहां बताया गया कि मुंह बोला कभी हक़ीक़ी बेटे की तरह नहीं हो सकता। उसे विरासत में हिस्सा भी नहीं मिलेगा और उससे अपना नसब जोड़ना भी हराम है। (4, 5)
(ii) ग़ज़वा खंदक़ (गज़वा अहज़ाब) का ज़िक्र
ग़ज़वा खंदक़ के मौक़ा पर मुसलमान खंदक़ के अंदर थे और बाहर दुश्मनों ने हर तरफ़ से घेर रखा था। भूखे रहने की नौबत आ गयी। यहूदी क़बीले भी मुसलमानों के दुश्मन हो गए थे। वह मक्का के काफ़िरों से भी ज़्यादा ख़तरनाक हो रहे थे ऐसे हालात का नक़्शा खींचा गया है। "जब वह ऊपर से और नीचे से तुमपर चढ़ आए। जब डर के मारे आँखें पथरा गईं, कलेजे मुँह को आने लगे और तुम लोग अल्लाह के बारे में तरह-तरह के गुमान करने लगे। उस वक़्त ईमान लाने वाले ख़ूब आज़माए गए और बुरी तरह हिला मारे गए। (10, 11)
(iii) मुनाफ़ेक़ीन की पहचान
◆ हर मौक़ा पर पीठ दिखाते हैं,
◆ जब मुसीबत और परेशानी का सामना या ख़ौफ़ का माहौल होता है उनपर मारे डर के मौत छाने लगती है। और जब शांतिपूर्ण माहौल हो जाता है तो उनकी ज़बानें कैंची से भी तेज़ चलने लगती हैं।
◆ ग़ज़वा खंदक़ में मुनाफ़ेक़ीन न केवल यह कि मैदान से भागना चाहते थे बल्कि लोगों को मशविरा भी देते फिर रहे थे। (12 से 20)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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