पारा (23) व माली
इस पारे में चार हिस्से है-
(2) सूरह अस साफफ़ात मकम्मल
(3) सूरह साद मकम्मल
(4) सूरह अज़ ज़ुमर इब्तेदाई हिस्सा
(1) सूरह (036) यासीन
(i) हबीब नज्जार का वाक़िआ
एक बस्ती वालों ने अपने तीन रसूलों को झुठलाया और क़त्ल के दरपे हुए तो उनकी क़ौम के एक शख़्स हबीब नज्जार ने उन्हें समझाने की कोशिश की और दो बातें रखीं "इन रसूलों की पैरवी कर लो जो तुमसे बदले में कुछ नहीं मांगते" और "हिदायत पर भी हैं" लेकिन क़ौम ने समझने के बजाय उस शख़्स को ही शहीद कर डाला। जन्नत में भी जाकर भी उसकी तमन्ना यही थी कि يَٰلَيۡتَ قَوۡمِي يَعۡلَمُونَ "काश मेरी क़ौम जानती" कि मुझे कैसी कैसी नेअमतें अता की गई हैं। (20 से 27)
(ii) अल्लाह की क़ुदरत के दलाएल
● मुर्दा ज़मीन का बारिश से ज़िंदा हो कर पौधे और दाने निकालना, दुनिया में हर चीज़ का जोड़े जोड़े होना। (33 से 36)
● दिन के उजाले को रात के अंधेरे में तब्दील कर देना, सूरज का अपनी axis पर घूमना और चांद की एक हद (limit) मुक़र्रर करना कि वह अपनी मंज़िल (limit) पर पहुंच कर पुरानी चाल पर लौट आए। फ़लक में हर चीज़ का गरदिश करना और कश्ती का समुद्र में चलना। (37 से 43)
● बड़े बड़े जानवरों को इंसान के कंट्रोल में देना, कुछ पर सवारी तो कुछ को ख़ोराक के लिए मख़सूस करना वगैरह। (71, 72)
(iii) आख़िरत
हश्र के दिन की हौलनाकियां, सूर फूंके जाने का आदेश, नेक व बद को अलग अलग करने का आदेश, मोमिनों के लिए जन्नत और उसकी नेअमतों की ख़ुशख़बरी, मुजरिमों के मुंह पर मुहर लगा कर उनके के हाथ पैर और मुख़्तलिफ़ अंगों की गवाही और उनका इबरत्नाक अंजाम। आयत 51 से 67 तक आख़िरत का ऐसा मंज़र खींचा गया है कि पढ़ते हुए अपनी आंख के सामने सीन चलता हुआ महसूस होता है।
(iv) अल्लाह की शान (कुन फ़ यक़ून)
इंसान को इस बात पर तअज्जुब क्यों है कि उसके मरने के बाद पुरानी हड्डियों में पुनः जान कैसे डाली जाएगी? वह ख़ालिक़ के लिए तो मिसालें बयान करता है और अपनी पैदाइश के मरहले को भूल जाता है, वह आसमान और ज़मीन की तख़लीक़ पर ग़ौर क्यों नहीं करता? क्या उसे नहीं पता कि हरे भरे दरख़्तों से आग कैसे पैदा होती है जिसे वह अपने घर में जलाता है। अल्लाह तो ज़बरदस्त ख़ालिक़ है उसके लिए कोई काम सिरे से मुश्किल ही नहीं है। बल्कि अल्लाह की शान तो यह है कि जब किसी चीज़ को पैदा करना चाहता है तो वह कह देता है कि ''हो जा'' तो (फ़ौरन) हो जाती है। (77 से 82)
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(2) सूरह (037) अस साफ़्फ़ात मुकम्मल
(i) तौहीद और अल्लाह की क़ुदरत
तुम्हारा रब एक है, ज़मीन, आसमान, और उन दोनों के दरमियान जो कुछ भी है सब का रब भी एक ही है, उसी ने दुनिया के आसमान को तारों से सजाया है और इंसान को चिपचिपाती मिट्टी से पैदा किया (04 से 06)
(ii) शैतान ग़ैब का हाल नहीं जानते
जब कोई शैतान शुन गन लेने के लिए आसमान की तरफ़ जाना चाहता है तो शहाबे साक़िब (burning flame) उसका पीछा करता है। (07 से 10)
(iii) नौ अंबिया के वाक़ये
नूह, इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़, मूसा, हारून, लूत, इलियास, यूनुस अलैहिमुस्सलाम, इलियास अलैहिस्सलाम को (शाम की तरफ़ एक ऐसी क़ौम के पास नबी बना कर भेजा गया था जो बअल (بعل) नाम के बुत की पूजा करती थी), (123 से 130) यूनुस अलैहिस्सलाम के मछली के पेट में जाने का वाक़िआ भी तफ़सील से बयान किया गया है। वह लाखों लोगों की तरफ़ रसूल बना कर भेजे गए थे (139 से 148)
(iv) इब्राहीम अलैहिस्सलाम का वाक़िआ
इब्राहीम अलैहिस्सलाम का वाक़िआ दो हिस्सों में है:
1, तौहीद की दावत
उन्होंने अपनी क़ौम को समझाने की संभवतः कोशिश की। अंत में एक दिन मौक़ा पाकर छोटी छोटी मूर्तियां तोड़कर कुल्हाड़ी बड़ी वाली मूर्ति के गले में लटका दी लेकिन क़ौम किसी तरह भी मानने को राज़ी नहीं हुई बल्कि उल्टे उनकी दुश्मन हो गई और उन्हें वतन छोड़ने पर विवश होना पड़ा। (83 से 99)
2, बेटे की क़ुरबानी
यह उस अज़ीम तारीख़ की बुनियाद है जिसके हवाले से हर साल ईदुल अज़हा में क़ुरबानी की जाती है। इब्राहीम अलैहिस्सलाम के यहां एक लंबी मुद्दत के बाद इस्माईल अलैहिस्सलाम की शक्ल में औलाद हुई। जब वह दौड़ने लगे तो इब्राहीम को ख़्वाब में दिखाया गया कि वह अपने बेटे को ज़बह करें। इब्राहीम ने अपना ख़्वाब इस्माईल से बयान किया और जब इस्माईल को राज़ी पाया तो माथे के बल लिटा दिया और छुरी चला दी लेकिन अल्लाह ने एक दुंबा भेज कर इस्माईल के बदले में क़ुरबानी का हुक्म दिया और इब्राहीम अलैहिस्सलाम की इस क़ुरबानी को रहती दुनिया तक के लिए यादगार बना दिया। (100 से113)
(v) जहन्नमियों का एक दुसरे पर लान तान और जन्नतियों की ख़ुशगवार बातचीत
(vi) ज़क़क़ूम का पेड़
जक़्क़ूम का वृक्ष नरक के तल से निकलता है। उसका फल ऐसा है जैसे शैतान का सिर। यह अत्याचारियों (जहन्नमियों) का खाना होगा और उसी से वह पेट भरेंगे (62 से 66)
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(3) सूरह (038) "साद" मुकम्मल
(i) तौहीद
तमाम इंसान व जिन्नात और ज़िंदगी व मौत के पूरे निज़ाम के लिए बस एक ही अल्लाह काफ़ी है।
(ii) रिसालत
इसके तहत नौ नबियों और पांच क़ौमों का ज़िक्र किया है।
इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़, याक़ूब, अय्यूब, दाऊद, सुलैमान, अल यसअ, जुल किफ़ल कुछ लोगों का अनुमान है कि कपिल को अरबी में किफ़ल कर दिया गया है इसलिए ज़ुल किफ़ल का मतलब हुआ किफ़ल वाला यानी कपिल वाला यानी गौतम बुद्ध हैं जिनका जन्म कपिलवस्तु में हुआ था उनके मानने वालों ने किताबों में तहरीफ़ करके उनकी तालीमात को बिल्कुल ही बदल डाला क्योंकि आज के बौद्ध धर्म में ख़ुदा का कोई तस्व्वुर ही नहीं है।
क़ौमे नूह, क़ौमे आद, क़ौमे समूद, क़ौमे लूत असहाबुल ऐका
नबियों (ख़ास तौर पर दाऊद व सुलैमान अलैहिमस्सलाम की शुक्र गुज़ारी और अय्यूब अलैहिस्सलाम के सब्र) का ज़िक्र कर के जहां एक तरफ़ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को तसल्ली दी गई है तो दूसरी तरफ़ क़ौमों के वाक़िआत बयान कर के कुफ़्फ़ार क़ुरैश को भयानक अंजाम से डराया गया है।)
(iii) आज़माइश किसी भी इंसान की हो सकती है
आज़माइश के दौर से किसी को भी गुज़रना पड़ सकता है बल्कि जो नेक बंदे होते हैं उनकी आज़माइश ज़्यादा सख़्त होती है। जैसे कि दाऊद अलैहिस्सलाम का 1 और 99 भेड़ों के मुक़्क़द्दमे के ज़रिए, सुलैमान अलैहिस्सलाम का कुर्सी पर एक अधूरा जिस्म डाल कर और अय्यूब अलैहिस्सलाम का भयानक बीमारी में मुब्तिला कर के आज़माइश की गई हालांकि उन्हें अल्लाह ने बड़ी नेअमतों और मुअजि
ज़ात से नवाज़ा था लेकिन तीनों सब्र व शुक्र में पूरे उतरे। (17 से 26, 30 से 40, 41 से 44)
(iv) आदम व इब्लीस का वाक़िआ
इंसान की तख़लीक़ के समय रब ने तमाम फ़रिश्तों से कहा मैं मिट्टी से एक इंसान बनाने वाला हूं, जब मैं उसे ठीक कर लूं और उसमें रूह फूंक दूं तो उसके लिए सज्दे में गिर जाना। तमाम फ़रिश्तों ने सज्दा किया मगर इब्लीस ने यह कहकर इंकार कर दिया कि मैं उस मिट्टी के बने हुए इंसान से बेहतर हूं, उस दिन से वह लानती ठहरा। फिर उसने क़यामत के दिन तक मोहलत मांगी जो उसे दी गई, फिर उसने कहा तेरी इज़्ज़त की क़सम कुछ मुख़्लिस इंसानों को छोड़कर सभी को बहका दूंगा, रब ने फ़रमाया सच्ची बात तो यह है कि फिर मैं जहन्नम को तुझसे और तेरे मानने वालों से भर दूंगा। (71 से 85)
(v) कुछ अहम बातें
◆ हुकूमत का काम अल्लाह के क़ानून को लागू करना और ज़मीन पर न्याय करना है। (26)
◆ ज़मीन, आसमान और दुनिया की तमाम चीज़ें बेमक़सद नहीं बनाई गई हैं। (27)
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(4) सूरह (039) अज़ ज़ुमर (इब्तेदाई हिस्सा)
(i) क़ुरआन की अज़मत
यह एक बेहतरीन कलाम है। इसके तमाम हिस्से आपस में मिलते जुलते हैं, बार बार बातें दुहराई गई हैं। इसमें कोई विरोधाभास या अंतर नहीं है। पूरी किताब, आरम्भ से अंत तक, एक ही विषय, एक ही अक़ीदा, एक ही विचार और कर्म की प्रणाली को प्रस्तुत करती है। उसका प्रत्येक भाग दूसरे भाग और हर मज़मून दूसरे मज़मून की पुष्टि और व्याख्या करता है। इसे सुनकर लोगों के रोंगटें खड़े हो जाते हैं लेकिन मोमिनों के दिल नरम होकर अल्लाह के ज़िक्र में मशग़ूल हो जाते हैं। इसमें कोई ऐसी जटिल बात नहीं है कि आम आदमी को समझने में कोई मुश्किल पेश आए बल्कि साफ़ साफ़ और सरल बात कही गयी है जिसे प्रत्येक व्यक्ति समझ सकता है कि यह किताब किस चीज़ को ग़लत कहती है और क्यों, किस चीज़ को सही कहती तो किस वजह से, क्या स्वीकार कराना चाहती है और किस चीज़ का इंकार, किन कामों का आदेश देती है और किन कामों से रोकती है। (आयत 01 से 03 और 23, 28)
(ii) तौहीद
1, इंसान केवल और केवल अल्लाह की इबादत करे और किसी दुसरे को साझी ठहरा कर तौहीद को गंदा न करे।
2, अल्लाह के इलावा किसी को कारसाज़ (काम बनाने वाला) न बनाये वह हरगिज़ अल्लाह से क़रीब नहीं कर सकते।
3, अल्लाह तआला ने इंसान को मां के पेट मे तीन अंधेरों के अंदर पैदा किया।
4, मुशरिक की मिसाल उस ग़ुलाम की तरह है जिसके कई मालिक हों और तौहीद के मानने वाली की मिसाल उस ग़ुलाम की तरह है जिसका एक ही मालिक हो। (आयत 02, 06, 29)
(iii) रब के सिवा कौन कर सकता है
अल्लाह एक है जो सबको कंट्रोल किए हुए हैं ज़मीन और आसमान की तख़लीक़, दिन और रात को एक दूसरे पर लपेटना, सूरज और चांद पर कंट्रोल, प्रत्येक चीज़ का नियमित समय तक चलते रहना, तमाम इंसानों को एक जान से पैदा करना और उसी से जोड़ा बनाना, जानवरों के आठ जोड़ें, मां के पेट में 3 अंधेरे परदों के अंदर एक के बाद एक शक्ल देना। यह सब एक रब के सिवा कौन कर सकता है। (06)
(iv) इंसान का कुफ़्र
इंसान को जब कोई तकलीफ़ पहुंचती है तो अपने रब को पुकारता है फिर जब अल्लाह अपनी नेअमत अता कर देता है तो उसे भूल जाता है और शरीक मुक़र्रर करने लगता है। या यह कहता है कि यह चीज़ें तो मेरे इल्म की बुनियाद पर मुझे दी गई हैं यह नहीं समझता कि यह तो एक आज़माईश है। (आयत 8, 49)
(v) अल्लाह की ज़मीन बहुत बड़ी है
अगर अल्लाह की बंदगी के लिए एक जगह तंग हो तो उसकी ज़मीन बहुत लंबी चौड़ी है अपना दीन बचाने के लिए किसी और तरफ़ निकल खड़े हों। (10)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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1 टिप्पणियाँ
As salam alaikum bahut acha kam kar rahe hai aap Allah aapko iska azar khair se nawazega inshaallah...
जवाब देंहटाएंकृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।