पारा (19) व क़ालल लज़ीन
इस पारे में तीन हिस्से हैं-
(2) सूरह अश शुअरा मुकम्मल
(3) सूरह अन नमल का इब्तेदाई हिस्सा
(1) सूरह (025) अल फ़ुरक़ान का बाक़ी हिस्सा
(i) क़यामत
क़यामत के दिन ज़ालिम सिवाए अफ़सोस कुछ न कर सकेंगें वह ग़ुस्से में अपने हाथों को काटेंगे और कहेंगे काश हमने रसुल की बात मान ली होती, फ़ुलां और फ़ुलां को दोस्त न बनाते, नसीहत आ जाने के बाद भी हमें शैतान ने बहका कर अपमानित कर दिया। (26 से 29)
(ii) रसुल की गवाही
जिन लोगों ने क़ुरआन को पढ़ना, समझना, उसपर अमल करना और उसे लोगों तक पहुंचाने का दायित्व छोड़ रखा है उनके ख़िलाफ़ रसुल ख़ुद गवाही देंगे
وَقَالَ ٱلرَّسُولُ يَـٰرَبِّ إِنَّ قَوۡمِى ٱتَّخَذُواْ هَـٰذَا ٱلۡقُرۡءَانَ مَهۡجُورًا
और रसूल (अल्लाह के दरबार में) अर्ज़ करेगें कि "ऐ मेरे परवरदिगार मेरी क़ौम ने तो इस क़ुरआन को छोड़ ही दिया था। (30)
(आज उम्मत क़ुरआन से कितना दूरी इख़्तियार कर चुकी है। इस हवाले से ख़ुद को तब्दील करने की ज़रूरत है)
(iii) अल्लाह की क़ुदरत के दलाएल
छाया (shadow) का फैलना और सिमटना, सूरज का निकलना, ऊंचा होना, और डूबना, रात को लिबास, नींद को सुकून, दिन में फिर ज़िंदा करके उठाना, हवा का चलना, बादल का आना, आसमान से साफ़ पानी बरसना, बारिश से मुर्दा पड़ी ज़मीन का ज़िंदा होना, इंसानों और जानवरों के पीने का इंतेज़ाम, दो समुन्द्रों का आपस में मिलने के बावजूद एक रुकावट होना और एक तरफ़ पानी का मीठा व स्वादिष्ट तथा दूसरी तरफ़ का कड़वा तथा खारा होना, पानी से इंसान की तख़लीक़ और नसब व ससुराल दो अलग अलग सिलसिले, आसमान, ज़मीन और उन दोनों के दरमियान तमाम चीज़ों की छह दिनों में तख़लीक़, आसमान के बुरुज, और एक चिराग़ (सूरज) और चमकता चांद, और दिन रात का एक दूसरे के पीछे आना। (45 से 49, 53, 54, 59 से 61)
(iv) अल्लाह के नेक बंदों की पहचान
1, ज़मीन पर नरम चाल चलते हैं।
2, जाहिलों से बहस करने के बजाए सलाम करके गुज़र जाते हैं।
3, रातों को तन्हाई में सज्दा और क़याम करते हैं।
4, यह दुआ करते हैं कि
رَبَّنَا ٱصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَ ۖ إِنَّ عَذَابَهَا كَانَ غَرَامًا
(ऐ हमारे रब हमसे जहन्नम के अज़ाब को दूर रख क्योंकि जहन्नम का अज़ाब तो चिमट जाने वाली चीज़ है) 5, न तो कंजूसी करते है और न फ़िज़ूल ख़र्ची बल्कि बीच का रास्ता इख़्तियार करते हैं। 6, शिर्क के क़रीब भी नहीं फटकते। 7, किसी को नाहक़ क़त्ल नहीं करते। 8, ज़िना नहीं करते। 9, झूठी गवाही नहीं देते।10, बेहूदा बात नहीं करते। 11, जब अल्लाह की आयात सुनाई जाती हैं तो अंधे बहरे बनकर नहीं गिर पड़ते बल्कि क़ुरआन का असर क़ुबूल करते हैं और अक़्ले सलीम के साथ उसकी पैरवी करते हैं 12, और यह दुआ करते हैं
رَبَّنَا هَبْ لَنَا مِنْ أَزْوَاجِنَا وَذُرِّيَّاتِنَا قُرَّةَ أَعْيُنٍ وَاجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا
(हमारे रब हमारी बीबियों और औलादों को हमारी ऑंखों की ठन्डक बना दे और हमको परहेज़गारों का इमाम बना) (63 से 74)
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(2) सूरह (026) अश शुअरा मुकम्मल
(i) आठ नबियों के वाक़िआत
मूसा और हारुन अलैहिमस्सलाम का आयत 10 से 67 तक, इब्राहिम अलैहिस्सलाम का 69 से 86 तक, नूह अलैहिस्सलाम का 105 से 121 तक, हूद अलैहिस्सलाम का 124 से 139 तक, सालेह अलैहिस्सलाम का 141 से 158 तक, लूत अलैहिस्सलाम का 160 से174 तक, शुऐब अलैहिस्सलाम का 176 से 190 तक,
(ii) मुख़्तलिफ़ क़ौमों की ख़ास ख़ास बुराईयां
शिर्क, आख़िरत का इंकार, ज़मीन में फ़साद फैलाना, कुकर्म (लूत अलैहिस्सलाम की क़ौम की ख़ास बुराई), नाप तौल में कमी, अमानत में ख़यानत, (क़ौमे शुऐब की ख़ास बुराई)
(iii) अंबिया की दावत में कुछ ख़ास बातें
● मैं तुम्हारी तरफ़ अल्लाह का रसूल बन कर आया हूं।
● अल्लाह से डरो और मेरी दावत क़ुबूल कर लो।
● आख़िरत को याद रखो।
● मैं इस दावत के बदले कुछ नहीं मांगता।
وَمَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ الْعَالَمِينَ
"मेरी उजरत तो अल्लाह के पास है जो सारे संसार का पालनहार है" (107 से 109)
(iv) इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुंदर अंदाज़ में दावत
मेरा रब तो वह है :
● जिसने मुझे पैदा किया और हिदायत दी।
● जो मुझे खिलाता और पिलाता है।
● जब मैं बीमार हो जाता हूं तो मुझे शिफ़ा देता है।
● जो मुझे मौत देगा फिर एक दिन ज़िंदा करेगा।
● जिस से मुझे उम्मीद है कि आख़िरत के दिन मेरे गुनाहों को बख़्श देगा।
(78 से 82)
(v) क़ुरआन की हक़्क़ानियत
1, यह क़ुरआन रब्बुल आलमीन का नाज़िल किया हुआ है जिसको रूहुल अमीन (जिब्रील अलैहिस्सलाम) के ज़रिए नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के क़ल्ब (दिल) पर उतारा जाता है।
2, यह स्पष्ट अरबी भाषा में है।
3, लोगों को डराने और चेतावनी देने के लिए।
4, इसका तज़किरा पिछली किताबों में भी है।
5, यह बात तो बनी इस्राईल के (यहूदी) उलेमा भी भली भांति जानते हैं।
6, शैतान का इस से कोई संबंध नहीं है, यह उनके बस की बात नहीं है, वह तो इसको सुनने से भी दूर रखे गए हैं। शैतान तो झूठे होते हैं, वह सुनी सुनाई बातें कानों में फूंकते हैं और मक्कार व बदकार पर उतरते हैं।
(192 से 213)
(vi) नबी के लिए आदेश
(एक दावत देने वाले के अंदर इन सिफ़ात का होना ज़रूरी है)
● क़रीबी रिश्तेदारों को डराए।
● ईमान लाने वालों के साथ आजिज़ी और नरमी से पेश आए।
● अगर कोई नाफ़रमानी (अवहेलना) करे तो साफ़ कह दें कि तुम्हारे इस बुरे अमल से मेरा कोई संबंध नहीं।
● अल्लाह पर ही भरोसा रखें जो उन्हें उठते बैठते और सज्दा करते देख रहा है। (214 से 220)
(vii) शायरों की मुज़म्मत (निंदा)
शायरों के पीछे तो बस भटके हुए लोग ही चलते हैं। यह मुख़्तलिफ़ ख़्याली वादियों में भटकते रहते हैं। ऐसी बातें कहते हैं जो करते नहीं हैं। अलबत्ता वह अलग हैं जो ईमान लाएं, नेक अमल करें और अल्लाह को कसरत से याद करने वाले हों। (224 से 226)
(viii) कुछ अहम बातें
● समलैंगिकता एक भयानक जुर्म है जो शरीर व समाज के लिए नासूर भी है और अल्लाह को नाराज़ करने कारण भी। लूत अलैहिस्सलाम की क़ौम से पहले यह बुराई मौजूद नहीं थी। (165, 166)
● नाप तौल में कमी बेईमानी की निशानी और अल्लाह को नाराज़ करने वाला अमल है। (181 से 183)
● कोई बस्ती उस वक़्त तक तबाह नहीं की जाती जबतक कि उसमें डराने वाले न भेजे गए हों। (208)
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(3) सूरह (027) अन नमल का इब्तेदाई हिस्सा
(i) क़ुरआन हिदायत व बशारत है
● जो मोमिन हों
● नमाज़ क़ायम करते हैं
● ज़कात अदा करते हैं
● आख़िरत (परलोक) में विश्वास रखते हैं।
क़ुरआन अल्लाह की जानिब से नाज़िल की गई खुली और वाज़ेह किताब है। (आयत 1 से 3)
(ii) पांच अंबिया का ज़िक्र
मूसा अलैहिस्सलाम (आयत 7 से 14),
दाऊद अलैहिस्सलाम (15),
सुलैमान अलैहिस्सलाम (16 से 44),
सालेह अलैहिस्सलाम (45 से 53),
लूत अलैहिस्सलाम (54 से 58)
(iii) मूसा अलैहिस्सलाम को दी गई नौ निशानियां (आयत 12)
1 लाठी जो अज़दहा बन जाती थी।
2, हाथ जो बग़ल से सूरज की तरह चमकता हुआ निकलता था।
3, जादूगरों की शिकस्त (सब के सामने)।
4, मूसा अलैहिस्सलाम की भविष्यवाणी के मुताबिक़ पूरे मुल्क में अकाल (क़हत)।
5, तूफ़ान।
6, टिड्डियों का झुंड।
7, तमाम ग़ल्ले के ज़ख़ीरे में सुरसुर्रियाँ और इंसान व हैवान में जुएं।
8, मेंढकों का तूफ़ान,
9, ख़ून (तमाम नहर, कुएं, तालाब, और हौज़ का पानी ख़ून में तब्दील हो गया। मछलियां मर गईं हर जगह पानी के ज़ख़ीरों में बदबू पैदा हो गई। एक हफ़्ते तक मिस्र के लोग पानी को तरस गए)।
(iv) सुलैमान अलैहिस्सलाम का मुअजेज़ा
● परिंदों की बोलियां सिखाई गई थीं और हर चीज़ से नवाज़ा गया था।
● जिन्न और इंसानों के लश्कर उनके लिए जमा कर दिए गए थे।
● जिन्न, इंसान, परिंदे और तमाम लोग पूरी डिसिप्लिन के साथ रहते थे। (16, 17)
(v) नमल (चींटी) का वाक़िआ
एक बार सुलैमान अलैहिस्सलाम का अपनी फ़ौज के साथ (जो इंसानों, जिन्नों और परिंदों पर मुश्तमिल थी) एक घाटी से गुज़र हुआ तो चींटियों की सरदार ने कहा ऐ चींटियो! अपनी अपनी बिलों में चली जाओ ऐसा न हो कि सुलैमान का लश्कर अनजाने में तुम्हें कुचल डाले। सुलैमान अलैहिस्सलाम ने जब चींटी की यह बात सुनी तो मुस्कुराए और अपने रब का शुक्र अदा किया। (18, 19)
(vi) मलका सबा का वाक़िआ
यमन की राजधानी सनआ से 55 किलोमीटर दूर मआरिब एक मुक़ाम था जो मलका सबा की राजधानी थी, यह लोग सूरज की पूजा करते थे। एक दिन हुदहुद ने सुलैमान अलैहिस्सलाम को उसके बारे में ख़बर दी। सुलैमान अलैहिस्सलाम ने मलका सबा के नाम एक ख़त लिखा और तौहीद की दावत दी। मलका ने वह ख़त पढ़ कर सुनाया और कहा "यह पत्र सुलैमान की जानिब से है और बिस्मिल्लाहिर राहमानिर रहीम से शुरू किया गया है"। मलका सबा ने दरबारियों से मशविरा करने के बाद पहले हदया (गिफ़्ट) भेजा जिसे सुलैमान अलैहिस्सलाम ने यह कह कर वापस कर दिया कि मुझे अल्लाह ने उस से कहीं ज़्यादा अता किया है और धमकी भी दी कि " हम ऐसी फ़ौज के साथ आ रहे हैं जिसका सामना नहीं किया जा सकता और हम वहां से निकाल बाहर करेंगे" इसका नतीजा यह हुआ कि उसने पैग़ाम भेजा कि वह ख़ुद मुलाक़ात करने आ रही है। सुलैमान अलैहिस्सलाम ने दरबार में मौजूद लोगों से पूछा कौन है जो उसके आने से पहले पहले उसका तख़्त यहां ला दे। एक भारी भरकम जिन्न कहने लगा आपके इस जगह से उठने से पहले पहले। तभी एक (ग़ालिबन फ़रिश्ता) ने (जिसको अल्लाह ने किताब का इल्म दिया था) कहा आप की पलक झपकने से पहले पहले। फिर क्या था पलक झपकते ही तख़्त सुलैमान अलैहिस्सलाम के सामने मौजूद था। जब मलका सबा पहुंची तो अपने तख़्त को वहां मौजूद देख कर हैरान रह गई और फिर उसने सुलैमान अलैहिस्सलाम का महल और शान व शौकत देखी तो पुकार उठी।
رَبِّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي وَأَسْلَمْتُ مَعَ سُلَيْمَانَ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ
"मेरे रब मैने सूरज की पूजा कर के यक़ीनन अपने ऊपर ज़ुल्म किया, और अब मैं सुलेमान के साथ तमाम जहाँ के पालनहार अल्लाह पर ईमान लाती हूँ। (22 से 44)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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