Khulasa e Qur'an - Para 18 (qadd aflahaa)

Khulasa e Qur'an - Para 18 (qala alam), surah al mominoon, noor, furqan


क़ुरआन सारांश [खुलासा क़ुरआन]
अट्ठारहवां पारा - क़ाल अलम
[सूरह अल मुमेनून-अन नूर-अल फ़ुरक़ान]


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
(अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है)


पारा (18) क़द अफलहा


इस पारे में तीन हिस्से हैं-

(1) सूरह अल मुमेनून मुकम्मल
(2) सूरह अन नूर मुकम्मल
(3) सूरह अल फ़ुरक़ान इब्तेदाई हिस्सा


(1) सूरह (023) अल मुमेनून मुकम्मल 


(i) जन्नतुल फ़िरदौस के वारिस

1, ईमान लाने वाले. 
2, नमाज़ में खुशुअ इख़्तियार करने (झुकने) वाले. 
3, फ़िज़ूल बातों से परहेज़ करने वाले. 
4, ज़कात अदा काने वाले. 
5, शर्मगाह की हिफ़ाज़त करने वाले. 
6, अमानत को हिफ़ाज़त के साथ लौटाने वाले. 
7, वादा को पूरा करने वाले. 
8, नमाज़ों की हिफ़ाज़त करने वाले। 

(1 से 11)


(ii) इंसान की तख़लीक़ के नौ मराहिल

1, मिट्टी का निचोड़
2, मनी (वीर्य)
3, जमा हुआ ख़ून (भ्रूण)
4, मांस का लोथड़ा
5, हड्डी
6, गोश्त का लिबास
7, सर्वश्रेष्ठ मख़लूक़ (इंसान)
8, मौत
9, दोबारा ज़िंदगी 

(12 से 16)


(iii) तौहीद के दलाएल

एक के बाद एक सात आसमान की तख़लीक़, एक नियमित रूप से बारिश, बाग़ात, मेवे और ग़ल्ला, चौपाए और उनके अनेक फ़ायदे, कश्ती (17 से 22)


(iv) अंबिया के वाक़िआत 

● नूह अलैहिस्सलाम, उनकी कश्ती और इंकार करने वालों पर पानी का अज़ाब। (23 से 27)

● हूद अलैहिस्सलाम की दावत और क़ौमे आद पर तेज़ हवा का अज़ाब। (आयत 33)

● मूसा और् हारून अलैहिमस्सलाम का बयान। 

● ईसा अलैहिस्सलाम और उनकी वालिदह मरयम का ज़िक्र (45 से 49)

तमाम रसूलों की एक ही दावत कि अल्लाह की बंदगी करो क्योंकि वही तुम्हारा माबूद है लेकिन तमाम क़ौमों ने एक जैसा ही काम किया कि दीन को टुकड़े टुकड़े करके फ़िरक़ों में बंट गए। और हर फ़िरके के पास जो कुछ है उसी में मगन है। (52, 53)


(v) नेक लोगों की पांच सिफ़ात

● अल्लाह पर ईमान रखते हैं 
● अल्लाह से डरते हैं 
● शिर्क और दिखावे से बचते हैं 
● नेकी की वजह से दिल ही दिल में अल्लाह से डरते हैं कि उन्हें अल्लाह के पास जाना है,
● भलाई के कामों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। 

(57 से 61)


(vi) दावत के इंकार की असल वजह

कुफ़्फ़ार के इंकार करने और झुठलाने की वजह न तो यह है कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पिछले अंबिया से अलग कोई नई बात लेकर आए हैं न आप के बुलंद अख़लाक़ उन लोगों से छुपे हुए हैं, और न सच मुच आप को (मुआज़ अल्लाह) मजनुं समझते हैं और न इंकार की वजह यह है कि आप उनसे कोई बदला चाह रहे हैं। बल्की असल वजह तो यह है कि जो दीन आप लेकर आए हैं वह उनकी ख़्वाहिशात के ख़िलाफ़ है। इसलिए झुठलाने के मुख़्तलिफ़ बहाने बना रहे हैं। (68 से 74)


(vii) अल्लाह को संसार का ख़ालिक़ तो मानते हैं मगर तस्दीक़ नहीं करते

कुफ़्फ़ार से अगर पूछा जाय कि ज़मीन और ज़मीन में जो कुछ है वह किसका है? सात आसमानों, और अर्शे अज़ीम (महा सिंहासन) का स्वामी कौन है? तमाम चीज़ों का अधिकार किसके हाथ में है और कौन है जो शरण देता है और उसके मुक़ाबले में कोई शरण नहीं दे सकता, तो उनका जवाब यही होगा कि "वह तो अल्लाह ही है" (84 से 89)


(viii) अंबिया पर तमाम क़ौमों के एक ही जैसे इल्ज़ाम

● इंसान नबी नहीं हो सकता, 
● वह भी तुम्हारे जैसा खाता पीता है, 
● थोड़ा पाग़लपन का शिकार है, 
● अल्लाह के नाम पर झूठ बोल रहा है, 
● इसकी बातें तो पिछलों की मनघड़ंत कहानियां हैं। 
● क्या हम मर कर मिट्टी और हड्डी रह जाएंगे तो दोबारा उठाये जाएंगे। 

(33 से 38, 45)


(ix) क़यामत का तज़किरा

क़यामत के दिन इंसान के आमाल वज़न किये जायेंगे, जिसके आमाल का पलड़ा वज़नी होगा वही कामयाब है और जिसके आमाल का पलड़ा हल्का होगा वह फ़ेल होगा। (102 से 105)

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(2) सूरह (024) अन नूर मुकम्मल


(i) अहकाम व आदाब

(1) अहकाम

● ज़ानी और ज़ानिया की सज़ा 

ज़ानी और ज़ानिया की सज़ा सौ कोड़े है (यह ग़ैर शादी शुदा के लिए है) सज़ा देने के मामले कोई नरमी न बरती जाय और एक समूह के बीच (public place) पर सज़ा दी जाय ताकि उसे देखकर दूसरे ज़िना के मुतअल्लिक़ दिल मे ख़्याल भी न लाएं। (1 से 3)

शादीशुदा के लिए रजम (पत्थर मारने की जब तक कि मृत्यु न हो जाए) सज़ा है जैसा कि बहुत सी अहादीस से साबित है।

"अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया " किसी मुसलमान का ख़ून सिर्फ़ तीन सूरतों में हलाल है। एक "शादीशुदा ज़ानी उसे रजम किया जाएगा" दूसरे "किसी को जान बूझ कर क़त्ल किया हो उसे क़त्ल किया जाएगा" तीसरे "जो मुर्तद हो (इस्लाम से फिर) जाए और अल्लाह और उसके रसुल से लड़े उसे क़त्ल कर दिया जाय या सूली दी जाय या जिलावतन कर (देश से निकाल) दिया जायेगा" (सुनन निसाई हदीस नंबर 4053/ तहरीमुद दम, सही बुख़ारी 6878/ किताबद दियात)


● ज़िना का इल्ज़ाम लगाने पर चार गवाह पेश करना ज़रूरी

किसी पर ज़िना का इल्ज़ाम लगाने पर चार गवाह पेश करना ज़रूरी है जिनके बयान में आपस में कोई तज़ाद (विरोधाभास) न हो वरना झूठे गवाहों को 80 कोड़े लगाए जाएंगे। (4)


● लेआन

अगर बीवी को बदकारी करते शौहर देख ले तो वह किसी सूरत में चार गवाह नहीं ला सकता। ऐसी स्थिति में दोनों के लिए "लेआन" (لعان) का हुक्म है यानी शौहर और बीवी दोनों चार बार अल्लाह की क़सम खा कर सफ़ाई दें और पांचवी बार यह कहते हुए क़सम खाएं कि अगर वह झूठे हों तो उनपर अल्लाह की लानत हो। (6 से 9)


● उम्मुल मोमेनीन आयशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु अन्हा की पाकदामनी की गवाही

जब उम्मुल मोमेनीन आयशा सिद्दिक़ा रज़ियल्लाहु अन्हा पर मुनाफ़ेक़ीन ने तोहमत लगाई, उसमें तीन मुख़्लिस मुसलमान (मिस्तह बिन उसासा, हस्सान बिन साबित और हमना बिन्ते जहश) भी शरीक हो गए थे तो क़ुरआन में उम्मुल मोमेनीन की पकदामनी पर 10 आयतें (11 से 20 तक) नाज़िल हुईं जिनमें मुनाफ़ेक़ीन की मुज़म्मत (निंदा) और मुसलमानों को तंबीह (चेतावनी) दी गई है कि कभी इस क़िस्म के बुहतान तराशी (आरोप लगाने) में हिस्सेदार न बनें बल्कि उन्हें तो पहले ही यह कह कर रदद् कर देना चाहिए था अल्लाह की पनाह, यह बहुत ही झूठा आरोप है। (11 से 20)


● इस्लाम में न तो बदकारी की इजाज़त है और न उसे फैलाने की

जो लोग बदकारी (अश्लीलता) फैलाने में किसी प्रकार का सहयोग करते हैं उनके लिए दुनिया और आख़िरत (परलोक) दोनों में दर्दनाक अज़ाब की धमकी दी गई है। इसी लिए यह भी कहा गया है कि

"बदकार मर्द बदकार औरतों के लिए और बदकार औरतें बदकार मर्दों के लिए और पाकदामन मर्द पाकदामन औरतों के लिए और पाकदामन औरतें पाकदामन मर्दों के लिए हैं। (26)


● भोली भाली और पाकदामन औरत पर तोहमत

भोली भाली और पाकदामन औरत पर तोहमत लगाने वाले दुनिया और आख़िरत दोनों में लानत के मुस्तहिक़ हैं। (23)


● मर्द व औरत का पर्दा

मोमिन मर्द अपनी निगाहों को नीची रखें और अपनी शर्मगाहों (गुप्तांग) की हिफ़ाज़त करें जबकि औरतें निगाह को नीची रखें, शर्मगाह की हिफ़ाज़त करें, अपने सीनों को ओढ़नी से छुपा कर रखें। किसी के सामने ज़ीनत (सौन्दर्य) का प्रदर्शन न करें, ज़मीन पर पांव मार कर न चलें कि किसी क़िस्म की आवाज़ आये। (30, 31)


● औरत किसके सामने ज़ीनत ज़ाहिर कर सकती है:

पति, पिता, पति का पिता (ससुर), अपने पुत्र , पति के (दूसरी पत्नी से) पुत्र, भाई, भतीजे, भांजे, मेल जोल की औरतें, दास और और उनके अधीन पुरुष जो कुछ इच्छा नहीं रखते, ऐसे लड़के जो महिलाओं के परदे की बातों से अभी वाक़िफ़ न हुए हों। (31)


(2) आदाब

● किसी के घर में बिला इजाज़त दाखिल न हों, इजाज़त से पहले सलाम ज़रूर करें। (61) (यदि अनुमति देने के बजाय लौटने के लिए कहा जाय तो ख़ुशी ख़ुशी लौट जाएं)  

● जो लोग निकाह के क़ाबिल हैं वह जल्द निकाह करें और जिनको मौक़ा न मिल पा रहा हो वह सोसाइटी को गंदा न करें बल्कि पाकीज़गी इख़्तियार करें और जब अल्लाह अपने फ़ज़ल से नवाज़ दे तो शादी कर लें। (32, 33)

● जो ग़ुलाम या बांदी (दासी) मुकातिबत (कुछ रक़म के बदले आज़ादी हासिल) करना चाहते हों उनके साथ मुआहिदा (अनुबंध) किया जाय। (33)

● बांदियों (दासियों) को उजरत के बदले बदकारी पर मजबूर न किया जाय। (33)

● जब किसी अहम मामले में बैठक हो तो इजाज़त के बेग़ैर इज्तेमाई मजलिस से उठना मुनासिब नहीं। (62)

● अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ऐसे न पुकारें जैसे आपस में एक दूसरे को पुकारते हैं। (63)


(3) घर के आदाब

● घर मे दाख़िल हों तो घर वालों को सलाम करें इसमें अल्लाह की तरफ़ से ख़ैर और बरकत है। (61)

● तीन औकात (फ़जर की नमाज़ से पहले, दोपहर में क़ैलूले के वक़्त, ईशा की नमाज़ के बाद) छोटे बड़े बच्चे, बालिग़ और घर मे रहने वाले ग़ुलाम और बांदियां इजाज़त ले कर कमरे में दाख़िल हों। (58, 59)

● वह औरतें जो बहुत बूढ़ी हों जाएं और निकाह की उम्र से गुज़र जाएं और बनाव सिंगार ज़ाहिर करने वाली न हों अगर वह पर्दे के ज़ाहिरी कपड़े उतार दें तो कोई हर्ज नहीं लेकिन अगर वह न उतारें तो बेहतर है। (60)

● इस्लाम में संयुक्त परिवार (joint family) का कोई तस्व्वुर नहीं क्योंकि एक तो पर्दा नहीं हो सकता दूसरे आयत 61 أَن تَأْكُلُوا مِن بُيُوتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ آبَائِكُمْ "अपने बाप दादा के घरों से खाओ" से भी यही बात साबित होती है।


(ii) अल्लाह के नूर के तलबगार कौन हैं?

अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखते और इताअत करते हैं, ● तिजारत अल्लाह के ज़िक्र से ग़ाफ़िल नहीं करती, ● नमाज़ कायम करते हैं, ● ज़कात अदा करते हैं, ● क़यामत के दिन से डरते हैं जिस दिन आंखें फटी की फटी रह जाएंगी। (36, 37)


(iii) अहले हक़ और अहले बातिल की तीन मिसालें

मिसाल [1] 

اللَّهُ نُورُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ مَثَلُ نُورِهِ كَمِشْكَاةٍ فِيهَا مِصْبَاحٌ ۖ الْمِصْبَاحُ فِي زُجَاجَةٍ ۖ الزُّجَاجَةُ كَأَنَّهَا كَوْكَبٌ دُرِّيٌّ يُوقَدُ مِن شَجَرَةٍ مُّبَارَكَةٍ زَيْتُونَةٍ لَّا شَرْقِيَّةٍ وَلَا غَرْبِيَّةٍ يَكَادُ زَيْتُهَا يُضِيءُ وَلَوْ لَمْ تَمْسَسْهُ نَارٌ ۚ نُّورٌ عَلَىٰ نُورٍ ۗ يَهْدِي اللَّهُ لِنُورِهِ مَن يَشَاءُ ۚ وَيَضْرِبُ اللَّهُ الْأَمْثَالَ لِلنَّاسِ ۗ وَاللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ

अल्लाह तो आसमान और ज़मीन का नूर है उसके नूर की मिसल ऐसी है जैसे एक ताक़ हो जिसमे एक रौशन चिराग़ हो और चिराग़ एक शीशे की क़न्दील (दिल) में हो और क़न्दील (अपनी तड़प में) गोया एक जगमगाता हुआ रौशन सितारा (वह चिराग़) ज़ैतून के मुबारक दरख़्त (के तेल) से रौशन किया जाए जो न पूरब की तरफ़ हो और न पश्चिम की तरफ़। उसका तेल (ऐसा) शफ़्फ़ाफ़ हो कि अगरचे आग उसे छुए भी नहीं फिर भी ऐसा मालूम हो कि आप ही आप रौशन हो जाएगा (ग़रज़ एक नूर नहीं बल्कि) नूर आला नूर (नूर की नूर पर जोत पड़ रही है) अल्लाह अपने नूर से जिसे चाहता है हिदायत देता है और अल्लाह तो हर चीज़ से खूब वाक़िफ़ है। (आयत 35)


मिसाल [2]  

وَالَّذِينَ كَفَرُوا أَعْمَالُهُمْ كَسَرَابٍ بِقِيعَةٍ يَحْسَبُهُ الظَّمْآنُ مَاءً حَتَّىٰ إِذَا جَاءَهُ لَمْ يَجِدْهُ شَيْئًا وَوَجَدَ اللَّهَ عِندَهُ فَوَفَّاهُ حِسَابَهُ ۗ وَاللَّهُ سَرِيعُ الْحِسَابِ

और जिन लोगों ने कुफ़्र इख़्तियार किया उनकी कारस्तानियाँ (ऐसी है) जैसे एक चटियल मैदान की चमकती हुई रेत हो कि प्यासा उस को दूर से देखे तो पानी ख़्याल करता है यहाँ तक कि जब उसके पास पहुंचता है तो उसको कुछ भी नहीं मिलता (और प्यास से तड़प कर मर जाता है) और अल्लाह को अपने पास मौजूद पाया तो उसने उसका हिसाब (किताब) पूरा पूरा चुका दिया और अल्लाह तो बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है। (आयत 39)


मिसाल [3]

كَظُلُمَاتٍ فِي بَحْرٍ لُّجِّيٍّ يَغْشَاهُ مَوْجٌ مِّن فَوْقِهِ مَوْجٌ مِّن فَوْقِهِ سَحَابٌ ۚ ظُلُمَاتٌ بَعْضُهَا فَوْقَ بَعْضٍ إِذَا أَخْرَجَ يَدَهُ لَمْ يَكَدْ يَرَاهَا ۗ وَمَن لَّمْ يَجْعَلِ اللَّهُ لَهُ نُورًا فَمَا لَهُ مِن نُّورٍ

(काफ़िरों के आमाल की मिसाल) उस बड़े गहरे दरिया की अंधेरे की सी है जैसे एक लहर उसके ऊपर दूसरी लहर उसके ऊपर अब्र (तह ब तह) ढॉके हुए हो (ग़रज़) अंधेरा है कि एक के ऊपर एक (उमड़ा) चला आता हैं (इसी तरह से) कि अगर कोइ शख़्स अपना हाथ निकाले तो (घनघोर अंधेरे के कारण) उसे देख न सके और जिसे अल्लाह ही ने (हिदायत की) रौशनी न दी हो तो उसके लिए कहीं कोई रौशनी नहीं। (आयत 40)


(iv) मोमिन और मुनाफ़िक़ में फ़र्क़

जब अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ बुलाया जाता है कि रसूल फ़ैसला करे तो मुनाफ़िक़ मुंह मोड़ लेते हैं लेकिन जब यह एहसास होता है कि फ़ैसला उनके हक़ में होगा तो दौड़े चले आते हैं जबकि मोमिन अपने तमाम मामलात में अल्लाह और रसूल को ही हकम मानते हैं। (47 से 52)


(v) घरों में इकट्ठे या अलग-अलग खाने की इजाज़त

अपने बाप दादा, माँ-नानी, भाई, बहन, चाचा, फूफी, मामू, ख़ाला, दोस्त, वह घर जिनकी कुंजियाँ तुम्हारे हवाले हों। (61)

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(3) सूरह (025) अल फ़ुरक़ान इब्तेदाई हिस्सा


(i) तौहीद

ज़मीन व आसमान का मालिक अल्लाह ही है। उसका न कोई बेटा है न कोई साझी, उसने हर चीज़ को पैदा करके उसे एक नपा तुला अंदाज़ अता किया है जबकि अल्लाह के इलावा जिन माबूदों को घड़ लिया गया है उनका हाल तो यह कि वह ख़ुद बनाये गए हैं, अपने लिए लाभ हानि का कोई इख़्तियार नहीं रखते। भला वह दूसरे की ज़िंदगी, मौत और फिर दोबारा ज़िन्दगी के मालिक कैसे हो सकते हैं। (1 से 3)


(ii) क़ुरआन की हक़्क़ानियत

क़ुरआन के सिलसिले में कुफ़्फ़ार दो तरह के इल्ज़ाम लगाते थे: 1, यह मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का अपना घड़ा हुआ कलाम है जिसमें कुछ लोगों ने उनकी मदद की है। 2, यह पिछ्ली क़ौमों के क़िस्से कहानियां हैं जो सुबह शाम लिखवाता है। (4 से 5)


(iii) रिसालत

कुफ़्फ़ार कहते थे भला यह कैसा इंसान है जो खाता पीता और बाजारों में चलता फिरता है। क्यों न कोई फ़रिश्ता नाज़िल किया गया और अगर इंसान को ही रसुल बनाया जाना था तो क्या इस ग़रीब और यतीम के बजाए दुनयावी लिहाज़ से खुशहाल लोग मौजूद न थे। कुफ़्फ़ार के इस बातिल नज़रियात को वाज़ेह दलाएल से रद्द किया गया है। (7 से 9)


(iv) क़यामत

क़यामत के दिन के काफ़िरों के झूठे माबूदों से अल्लाह सवाल करेगा कि "क्या तुम ने मेरे बन्दों को बहकाया था या यह ख़ुद भटक गए थे? तो वह अपने पुजारियों को झूठा साबित कर देंगे और अर्ज़ करेंगें, सुबहान अल्लाह (हम तो ख़ुद तेरे बन्दे थे) हमारे लिए किसी तरह भी तरह मुनासिब न था कि हम तुझे छोड़कर दूसरे को अपना सरपरस्त बनाते। मगर इन्होंने तुझे भुला दिया। हक़ीक़त में ये ख़ुद बर्बाद होने वाले लोग थे। फिर काफ़िरों को जहन्नम में झोंक दिया जाएगा। (17 से 19


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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