पारा (15) सुब्हानल लज़ी
इस पारे में दो हिस्से हैं
(2) सूरह अल कहफ़ का ज़्यादा तर हिस्सा
(1) सूरह (017) बनी इस्राइल मुकम्मल
(i) मेराज कब हुई?
इस के बारे में विभिन्न राय पाई जाती है:
(1) जिस वर्ष आप नबी बनाये गए उसी वर्ष मेराज भी हुई। (इब्ने जरीर तबरी)
(2) नबूवत के पांचवें वर्ष मेराज हुई। (इमाम नववी और इमाम क़ुरतबी)
(3) नबूवत के दसवें वर्ष 27 रजब को हुई। (क़ाज़ी सुलैमान मंसूरपुरी, रहमतुल लिल आआलमीन पेज 106 कुतुब ख़ाना एज़ाज़िया देवबंद 2017)
(4) हिजरत से 16 महीने पहले यानी नबूवत के बारहवें वर्ष रमज़ान के महीने में हुई।
(5) हिजरत से एक साल दो माह पहले यानी नबूवत के तेरहवीं साल मुहर्रम में हुई।
(6) हिजरत से एक साल पहले यानी नबूवत के तेरहवीं साल रबीउल अव्वल के महीने में हुई।
(ii) मेराज का वाक़िआ ख़्वाब (सपने) में पेश आया या बेदारी (जागने) में?
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम यहां से गये या अपनी जगह बैठे बैठे केवल रूहानी तौर पर ही आप को यह observation कराया गया?
इन सवालों का जवाब क़ुरआन मजीद के अल्फ़ाज़ ख़ुद दे रहे हैं। سُبْحٰنَ الّذِیْ اَسْریٰ से सूरह का आरंभ करना ख़ुद इस बात का सुबूत है कि यह कोई बहुत बड़ा ख़ारिके आदत वाक़िआ (चमत्कार) था जो अल्लाह तआला की ग़ैर महदूद क़ुदरत से ज़ाहिर हुआ यहां ग़ौर करने की बात यह है कि ख़्वाब में किसी शख़्स का इस तरह की चीज़ें देख लेना, या कश्फ़ के तौर पर देखना यह महत्त्व नहीं रखता कि उसे बयान करने के लिए इस प्रस्तावना (preface) की ज़रूरत हो
"तमाम कमियों और ऐब से पाक है वह ज़ात जिसने अपने बन्दे को एक रात मस्जिदे हराम (ख़ान ए काबा) से मस्जिदे अक़सा (आसमानी मस्जिद) तक की सैर कराई" (1) जिस्मानी सफ़र माने बग़ैर कोई चारा नहीं। यह केवल एक रूहानी तजुर्बा ही नहीं था बल्कि एक जिस्मानी सफ़र और आंखों देखा मुशाहिदा था जो अल्लाह तआला ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को कराया।
मस्जिद हराम से मस्जिदे अक़सा की दूरी 3983 किलोमीटर है अब अगर एक रात में हवाई जहाज़ के बग़ैर मस्जिदे हराम से मस्जिदे अक़्सा जाना और आना संभव था तो उन दूसरी तफ़सीलात ही को नामुमकिन कह कर क्यों रद्द (reject) कर दिया जाय जो हदीस में बयान हुई हैं? मुमकिन और नामुमकिन की बहस तो उस सूरत में पैदा होती है जब किसी मख़लूक़ का अपनी मर्ज़ी से किसी काम के करने का मामला हो लेकिन जब यह बयान हो कि अल्लाह ने फ़ुलां काम किया तो फिर इम्कान का सवाल वही शख़्स उठा सकता है जिसे अल्लाह की क़ुदरत का यक़ीन न हो।
(iii) बनी इस्राईल का फ़ितना व फ़साद
बनी इस्राईल को पहले से बता दिया गया था कि तुम ज़मीन में दो बार फ़ितना व फ़साद करोगे। चुनाँचे पहली बार 586 ईसा पूर्व में बुख़्ते नसर को उनपर मुसल्लत कर दिया गया, उसने सल्तनत की ईंट से ईंट बजा दी, फिर अल्लाह ने बनी इस्राईल को सल्तनत दी लेकिन यह नहीं सुधरे और ज़करिया और यहया अलैहिमुस्सलाम को शहीद कर दिया और ईसा अलैहिमस्सलाम को क़त्ल करने की नापाक साज़िश की तो दूसरी बार 70 ई० में टाइटस (Titus) को मुसल्लत कर दिया जिसने तलवार के ज़ोर से यरूशलम को जीत लिया और ख़ूब तबाही मचाई। इस मौक़े पर क़त्ले-आम में 133000 लोग मारे गए, 67000 ग़ुलाम बनाए गए। उस वक़्त से यह मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में बिखरे हुए थे कि 1948 में ब्रिटेन ने अरबों में इख़्तेलाफ़ पैदा कर के यहूदियों को यरूशलम में आबाद कर दिया।
(iv) इस्लामी अख़लाक़ व आदाब
◆ शिर्क से बचो,अल्लाह के इलावा किसी की इबादत न करो।
◆ माता पिता के साथ अच्छा बर्ताव, उन्हें उफ़ तक मत कहो, झिड़को भी मत, मिलो तो झुक कर मिलो, नरमी से गुफ़्तगू करो, उनके लिए अल्लाह से दुआ करते रहो رَّبِّ ارْحَمْهُمَا كَمَا رَبَّيَانِي صَغِيرًا "ऐ मेरे रब तू उन दोनों पर रहम कर क्योंकि उन्होंने मुझे बचपन में बड़े प्यार से पाला है"
◆ रिश्तेदार, मिस्कीन, मुसाफ़िर और ग़रीबों को उनका हक़ दो उनके साथ नरमी से पेश आओ।
◆ फ़िज़ूल खर्ची न करो फ़िज़ूलख़र्च शैतान के भाई हैं।
◆ न हाथ इतना फैलाकर दो कि बाद में पछताना पड़े और न इतनी कंजूसी करो हाथ को अपनी गर्दन से ही बांध लो।
◆ अपनी औलाद को मुफ़लिसी (ग़ुरबत) के डर से क़त्ल मत करो क्योंकि रोज़ी देने वाला अल्लाह है।
◆ ज़िना के क़रीब भी मत जाओ।
◆ किसी का नाहक़ क़त्ल न करो।
◆ यतीम का माल हराम तरीक़े से न खाओ।
◆ जो वादा भी करो उसे पूरा करो।
◆ नाप-तौल में कमी ज़्यादती न करो।
◆ जिस चीज़ के बारे में इल्म न हो उसके पीछे न पड़ो क्योंकि कान आंख, और दिल सभी से क़यामत के दिन सवाल किया जाएगा।
◆ ज़मीन पर अकड़ कर न चलो।
(22 से 38)
(v) कुछ अहम बातें
◆ शैतान इंसान का खुला दुश्मन है, उसका काम तो बस ज़मीन में बिगाड़ और फ़साद फैलाना है। (53)
◆ इंसान इस दुनिया की सबसे अफ़ज़ल मख़लूक़ है। (70)
◆ सात आसमान और ज़मीन और जितनी भी चीज़ें हैं सब अल्लाह की प्रशंसा में लगी हुई हैं।
◆ इंसान की हड्डियां कितनी पुरानी और चूर चूर ही क्यों न हो जायें बल्कि वह पत्थर, लोहा, या ऐसी ही कोई और चीज़ क्यों न हो जाएं जैसा कि इंसान के दिमाग में तस्वीर उभरती हैं तो भी उन्हें क़यामत के दिन ज़रूर उठा खड़ा किया जाएगा। (49 से 51)
◆ क़ुरआन लोगों के लिए हिदायत भी है और शिफ़ा भी है। (82)
◆ तमाम इंसानों की गर्दन में उनका आमाल नामा लटका हुआ है जो क़यामत के दिन खुला हुआ मिलेगा और यही अपने अंजाम के फ़ैसले के लिए काफ़ी होगा। (13, 14)
◆ रूह क्या है? इसका इल्म सिर्फ़ अल्लाह को है। (85)
◆ क़ुरआन की अज़मत, उसके नुज़ूल के मक़ासिद, उसका मोअजिज़ा होना, क़ुरआन के थोड़ा थोड़ा नाज़िल होने की हिकमत,
◆ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को तहज्जुद का हुक्म, मूसा अलैहिस्सलाम और फ़िरऔन का क़िस्सा, अल्लाह तआला के अस्मा ए हुस्ना (अच्छे नाम) वग़ैरह
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(2) सूरह (018) अल कहफ़
(i) सूरह के नाज़िल होने का कारण
यह सूरह मक्का के मुशरिकों के तीन सवालों के जवाब में उतरी है जो उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से किये थे
(2) ख़िज़र के क़िस्से की हक़ीक़त क्या है?
(3) ज़ुल-क़रनैन का क्या क़िस्सा है?
(1) असहाबे-कह्फ़ (गुफावाले) कौन थे?
यह कुछ मोमिन नौजवान थे जिन्हें उस वक़्त का बादशाह दक़यानूस बुत परस्ती पर मजबूर करता था। वह हर उस व्यक्ति को क़त्ल कर देता था जो उसकी शिरकिया दावत को मानने से इंकार कर देता था। इन नौजवानों को एक तरफ़ माल व दौलत के ढेर, ऊंचे ओहदों का लालच, और जीवन स्तर (standard of life) को बेहतर बनाने की पेशकश की गई। तो दूसरी तरफ़ डराया धमकाया गया और जान से मारने की धमकी दी गई लेकिन उन नौजवानों ने हर पेशकश को ठुकरा दिया और ईमान की हिफ़ाज़त की ख़ातिर शहर से बहुत दूर निकल गये और एक पहाड़ की गुफा तक पहुंच गए। रास्ते में एक कुत्ता भी उनके साथ शामिल हो गया। उन्होंने उस गुफा में पनाह लेने का इरादा किया। जब वह गुफा में दाख़िल हो गए तो अल्लाह तआला ने उन्हें गहरी नींद सुला दिया। यहां तक कि वह तीन सौ साल से ज़्यादा सोते रहे। जब नींद खुली तो खाने की फ़िक्र हुई। एक को खाना लेने के लिए बाज़ार भेजा। खाना लेकर जब उसने सिक्का दिया तो दुकानदार ने सिक्का लेने से इंकार कर दिया और इल्ज़ाम लगाया कि सिक्का खोटा है। उस शख़्स ने कहा अभी कल ही तो हम यहां से गये थे एक दिन में यह क्या हो गया? उसने जब बादशाह का नाम लिया तो सब हैरत में पड़ गए और मामला उस समय के बादशाह थ्यूडोर्स (Theodosius) के सामने पेश हुआ। जब उस शख़्स ने तमाम तफ़सीलात से आगाह किया तो उसे पहचान लिया गया। अब हालात बदल चुके थे। अहले तौहीद हुक्मरां थे, मुशरिकों की हुकूमत ख़त्म हुए भी काफ़ी वक़्त हो गया था। इसलिए यह नौजवान बस्ती वालों की नज़र में हीरो बन गए। उस समय के बादशाह Theodosius ने गुफ़ा में पनाह लेने वाले उन ततमाम लोगों से मुलाक़ात की और उनसे बस्ती में आ कर रहने की गुज़ारिश की लेकिन उन लोगों ने कहा हमें नींद आ रही है और वह दोबारा हमेशा के लिए सो गए। (9 से 28)
(2) ख़िज़र के क़िस्से की हक़ीक़त क्या है?
(3) ज़ुल-क़रनैन का क्या क़िस्सा है?
मूसा और ख़िज़र अलैहिमस्सलाम का वाक़िआ और ज़ुल क़रनैनन का वाक़िआ पारा 16 के तहत होगा।
(ii) शिर्क और घमंड का अंजाम
दो व्यक्ति थे जिनमें से एक के पास खुजूर और अंगूर के बहुत से बाग़ थे और उनके बीच खेती होती थी, ख़ूब फल आते। बाग़ के बीच एक नहर भी जारी थी। एक दिन घमंड में बाग़ के मालिक ने पड़ोसी से कहा मुझे तो यह नहीं लगता कि यह बाग़ कभी नष्ट होगा और कभी क़यामत आएगी? और अगर अपने रब के पास ले जाया भी गया तो इससे शानदार जगह मुझे मिलकर रहेगी। उसके साथी ने कहा क्या तुम उस ज़ात का इंकार कर रहे हो जिसने तुझे मिट्टी से फिर नुत्फ़े से पैदा किया फिर अच्छा ख़ासा इंसान बना कर खड़ा कर दिया। मेरा रब तो अल्लाह ही है और मैं अपने रब के साथ कभी किसी को शरीक नहीं करूंगा। जब तुम खेत में दाख़िल हुए तो "माशाल्लाह और लाहौल वला क़ुव्वत इल्ला बिल्लाह" क्यों न कहा? अगर मेरे पास तुमसे कम माल व औलाद है तो क्या ख़बर अल्लाह तुम्हारे बाग़ से बेहतर मुझे बाग़ अता कर दें और तेरे बाग़ पर कोई आसमानी बला आ जाय और यह समतल मैदान बन जाय या उसका पानी तह में चला जाए (तो तुम उसको निकाल नहीं सकोगे) अंततः वही हुआ जब वह अपने बाग़ में पहुंचा तो देखा उसका बाग़ ऊंधें मुंह उल्टा पड़ा था। वह अपनी लगाई हुई लागत पर हाथ मलता रह गया और पुकार उठा: يَٰلَيۡتَنِي لَمۡ أُشۡرِكۡ بِرَبِّيٓ أَحَدٗا "काश मैंने अपने रब के साथ किसी को शरीक नहीं किया होता" (32 से 42)
(iii) कुछ अहम बातें
◆ किसी काम को करने पर इंशा अल्लाह ان شاء اللہ और काम होने पर माशाअल्लाह ماشآء اللہ ज़रूर कहा जाय क्योंकि कि किसी काम को पूरा करना अल्लाह की तौफ़ीक़ के बग़ैर संभव नहीं। (24)
◆ दुनया की ज़िंदगी की मिसाल ऐसी है जैसे आसमान से पानी बरसा ज़मीन हरी भरी हो गई। कुछ वक़्त के बाद सब कुछ सूख कर चूरा चूरा हो गया। (45)
◆ माल व औलाद दुनियावी ज़िंदगी का सामान हैं। आख़िरत में तो नेक अमल ही काम आएगा (46)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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