पारा (09) व क़ालल मलऊ
इस पारे में दो हिस्से हैं-
(2) सूरह अल अनफ़ाल का इब्तेदाई हिस्सा
(1) सूरह (007) अल आराफ़ का बाक़ी हिस्सा
(i) मूसा अलैहिस्सलाम का तफ़सीली बयान
(103 से 171)
(ii) अल्लाह की बंदगी का तमाम इंसानी रूहों ने इक़रार किया था
ऐ रसूल ! लोगों को याद दिलाओ वह वक़्त जबकि तुम्हारे परवरदिगार ने बनी-आदम की पीठों से उनकी नस्ल को निकाला था और उन्हें ख़ुद उनके ऊपर गवाह बनाते हुए पूछा था, “क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ?” सभी ने इक़रार किया था, “ज़रूर आप ही हमारे रब हैं, हम इस पर गवाही देते हैं।” यह हमने इसलिये किया कि कहीं तुम क़यामत के दिन यह न कह दो कि “हम तो इस बात से बेख़बर थे। (172)
(iii) बलअम बिन बाऊरा का वाक़िआ
وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ الَّذِي آتَيْنَاهُ آيَاتِنَا فَانسَلَخَ مِنْهَا فَأَتْبَعَهُ الشَّيْطَانُ فَكَانَ مِنَ الْغَاوِينَ
और (ऐ रसूल) तुम उन लोगों को उस शख़्स का हाल पढ़ कर सुना दो जिसे हमने अपनी आयतें अता की थी फिर वह उनसे निकल भागा तो शैतान ने उसका पीछा पकड़ा और आख़िरकार वह गुमराह हो गया।
"कहा जाता है कि बलअम बिन बाऊरा बनी इस्राईल का एक बड़ा आलिम था जिसकी दुआएं क़ुबूल होती थीं उसे अल्लाह तआला की किसी किताब (तौरात) का इल्म मिला फिर उसने उनका इंकार कर दिया और उन आयात को पीठ पीछे फेंक दिया, फिर शैतान उसके पीछे लग गया और वह गुमराह हो गया और बनी इस्राईल को छोड़ कर क़ौमे जब्बारीन से जा मिला। फ़िरऔन के डूबने के बाद जब मूसा अलैहिस्सलाम (कुछ लोगों के मुताबिक़ यूशा बिन नून) बनी इस्राईल का लश्कर लेकर फ़लीस्तीन पर हमला करने के लिए निकले तो वहां के बादशाह ने बलअम से उनके ख़िलाफ़ हिलाकत की बददुआ करने को कहा, बलअम ने बददुआ करने से इंकार कर दिया मगर जब बादशाह ने रिश्वत पेश की तो वह बददुआ पर राज़ी हो गया लेकिन जब बददुआ करनी शुरू की तो बददुआ के बजाय मूसा अलैहिस्सलाम के हक़ में दुआ के अल्फ़ाज़ निकलने लगे। जब बार बार बददुआ करने पर ऐसा ही हुआ तो उसने बादशाह के लोगों को मशविरा दिया कि वह अपनी हसीन और ख़ूबसूरत लड़कियों को तैयार करें और बनी इस्राईल के ख़ेमों में भेज दें ताकि वह बदकारी में मुब्तिला हो जाएं। बदकारी की विशेषता यह है कि वह अल्लाह के क़हर और अज़ाब की वजह बनती है इसलिए बनी इस्राईल अपनी बदकारी के कारण अल्लाह की मदद से महरूम हो जाएंगे। चुनाँचे ऐसा ही हुआ। बनी इस्राईल फ़ितने में पड़ गए जिसकी वजह से उनमें अज़ाब के तौर पर ताऊन (Plague) की बीमारी फूट पड़ी। यह वाक़िआ बाईबल में अध्याय 22 से 25 में बयान हुआ है" अल्लाह तआला ने बलअम बिन बाऊरा की मिसाल कुत्ते से दी है"
وَلَوْ شِئْنَا لَرَفَعْنَاهُ بِهَا وَلَـٰكِنَّهُ أَخْلَدَ إِلَى الْأَرْضِ وَاتَّبَعَ هَوَاهُ ۚ فَمَثَلُهُ كَمَثَلِ الْكَلْبِ إِن تَحْمِلْ عَلَيْهِ يَلْهَثْ أَوْ تَتْرُكْهُ يَلْهَث ۚ ذَّٰلِكَ مَثَلُ الْقَوْمِ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا ۚ فَاقْصُصِ الْقَصَصَ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ
और अगर हम चाहते तो हम उसे उन्हीं आयतों की बदौलत बुलन्द मरतबा कर देते मगर वह तो ख़ुद ही पस्ती (नीचे) की तरफ़ झुक पड़ा और अपनी नफ़सानी ख़्वाहिश का ग़ुलाम बन बैठा तो उसकी मिसाल उस कुत्ते की सी है कि अगर उसको धुत्कार दो तो भी ज़बान निकाले रहे और उसको छोड़ दो तो भी ज़बान निकाले रहे ये मिसाल उन लोगों की है जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया (ऐ रसूल) ये क़िस्से उन लोगों से बयान कर दो ताकि ये लोग ख़ुद भी ग़ौर करें। (175, 176)
(iv) बनी इस्राईल की सरकशी
एक बुत बनाने मुतालिबा, बछड़े को माबूद बनाना, सब्त के क़ानून की अवहेलना (नाफ़रमानी) (138, 148, 163)
(v) बनी इस्राईल पर एहसानात
फ़िरऔन की ग़ुलामी से निकालना, पानी के बारह चश्मे जारी करना, बादल का साया, मन व सलवा, उन्हीं में से एक रसूल। (141, 160)
(vi) बनी इस्राईल के तीन गिरोह
बनी इस्राईल तीन गिरोह में तक़सीम हो गए थे। (1) जो अल्लाह के हुक्म की खुल्लमखुल्ला ख़िलाफ़ वर्ज़ी करते थे। (2) जो अल्लाह के हुक्म को मानते थे लेकिन पहले गिरोह को समझाते नहीं थे बल्कि ख़ामोशी से तमाशा देखते थे और तीसरे गिरोह से कहते थे कि इन्हें क्यों नसीहत करते हो जिन्हें अल्लाह अज़ाब देने वाला है (3) जो अल्लाह के आदेश का पालन करते थे और पहले गिरोह के सुधार के लिए मुमकिन कोशिश करते थे। यही तीसरा गिरोह महफूज़ रहा बाक़ी दो अज़ाब का शिकार हो गए। (164 से 166)
(vii) जानवरों से गए गुज़रे लोग
"जो लोग आंख, कान और दिल रखने के बावजूद हिदायत क़ुबूल नहीं करते वह चौपाए से भी बदतर हैं"। (आयत 179)
(viii) क़यामत का इल्म किसी को नहीं
(ऐ रसूल) तुमसे लोग क़यामत के बारे में पूछा करते हैं कि कहीं उसका कोई वक़्त भी तय है तुम कह दो कि उसका इल्म तो केवल पररवदिगार ही को है वही उसके निर्धारित समय पर उसे ज़ाहिर कर देगा। वह आसमान व ज़मीन में एक कठिन वक्त होगा वह तुम्हारे पास अचानक आ जाएगी तुमसे लोग इस तरह पूछते हैं गोया तुम उनसे ब ख़ूबी वाक़िफ़ हो तुम (साफ़) कह दो कि उसका इल्म केवल अल्लाह ही को है मगर ज़्यादातर लोग नहीं जानते। (आयत 187)
(ix) क़ुरआन की अज़मत
إِذَا قُرِئَ ٱلۡقُرۡءَانُ فَٱسۡتَمِعُواْ لَهُۥ وَأَنصِتُواْ لَعَلَّكُمۡ تُرۡحَمُونَ
जब क़ुरआन पढ़ा जाय तो इन्तेहाई खमोशी (pin drop silent) से सुनो। (204)
(x) कुछ अहम बातें
◆ अल्लाह के अच्छे नाम हैं उन नामों से पुकारा जाय। (180)
◆ जब दिल में कोई शैतानी वस वसा आये तो फ़ौरन अउज़ुबिल्लाहि मिनश शैतानिर रजीम ज़रूर पढ़ा जाय। (200)
◆ अपने रब का ज़िक्र आजिज़ी के साथ सुबह - शाम, खुले छुपे, सोते बैठते यानी हर हालत में किया जाय। (59)
◆ माफ़ी का तरीक़ा अपनाया जाय, भलाई का हुक्म दिया जाय और बुराई से रोका जाय। (199)
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(2) सूरह (008) अल अनफ़ाल का इब्तेदाई हिस्सा
(i) माले ग़नीमत का हुक्म
गज़वा ए बद्र में जो माले ग़नीमत हाथ आया था उसकी तक़सीम को लेकर मुसलमानों में कुछ इख़्तेलाफ़ हो गया था चुनाँचे उसके बारे में फ़रमाया गया
قُلِ ٱلۡأَنفَالُ لِلَّهِ وَٱلرَّسُولِۖ فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَأَصۡلِحُواْذَاتَ بَيۡنِكُمۡۖ وَأَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ
कह दो माले ग़नीमत अल्लाह और उसके रसूल का हक़ है अल्लाह से डरो, और अपने आपसी तअल्लुक़ात की इस्लाह (सुधार) करो और अल्लाह और उसके रसुल की इताअत करो। (1)
(ii) मोमिन की पांच सिफ़ात (ख़ूबियाँ)
2, क़ुरआन की तिलावत (समझ कर पढ़ने) से उनका ईमान बढ़ता है।.
3, तवक्कुल (अल्लाह पर ही भरोसा).
4, नमाज़ क़ायम करना.
5, सख़ावत (जिसमें दिखावा न हो)
(2, 3)
(iii) ग़ज़वा ए बदर में अल्लाह की मदद
हज़ार फ़रिश्तों से, मोमिनीन के दिल से एक ऊंघ के जरिए ख़ौफ़ निकाल दिया गया, बारिश से मुसलमानों को फ़ायदा हुआ और काफ़िरों को नुक़सान, काफ़िरों के दिलों में ख़ौफ़ डाल दिया गया। (9 से 12)
(iv) मोमेनीन को छह नसीहतें
2, मैदाने जंग में पीठ न दिखाना.
3, जब अल्लाह और रसूल किसी काम के लिए बुलाएं तो ख़ुशी ख़ुशी दौड़ पड़ो.
4, अल्लाह और रसूल से ख़यानत न करो उन्हें अपनी अमानत समझो.
5, अल्लाह से ही डरो, अल्लाह तुम्हें मुमताज़ कर देगा और तुम्हारे गुनाहों को बख़्श देगा.
6, जब अल्लाह के दुश्मनों से मुकाबला हो तो साबित क़दम (जमे) रहो।
(20, 24, 27, 30)
(v) कुछ अहम बातें
◆ ईमान लाने से पिछले तमाम गुनाह माफ़ हो जाते हैं। (29)
◆ माल और औलाद इंसान के लिए एक इम्तेहान हैं उनके आराम और ख़ुशहाली के लिए अपनी आख़िरत हरगिज़ ख़राब न करे। (28)
◆ अल्लाह और उसके रसूल की बात न सुनने वाले अल्लाह के नज़दीक बदतरीन जानवर हैं। (23)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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