पारा (10) वाअलमू
इस पारे में 2 हिस्से हैं:
(2) सूरह अत तौबा का इब्तेदाई हिस्सा
(1) सूरह (008) अल अनफ़ाल का बाक़ी हिस्सा
(i) माले ग़नीमत का हुक्म
माले ग़नीमत का 5वां (1/5) हिस्सा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, आप के क़रीबी, यतीमों, मिस्कीनों और मुसाफ़िरों के लिए है (यह हिस्सा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाद बैतुल माल में जाता था और उन लोगों में तक़सीम होता था) बाक़ी 4 हिस्से मुजाहिदीन के लिये है। (41)
(ii) ग़ज़वा ए बद्र में किए गए एहसानात
◆ कुफ़्फ़ार को मुसलमान और मुसलमानों को काफ़िर तादाद में कम दिखाए गए। (43, 44)
◆ शैतान मुशरिकीन के सामने उनके आमाल को सजा संवार कर पेश करता रहा। दूसरी तरफ़ मुसलमानों की मदद के लिए आसमान से फ़रिश्ते नाज़िल हुए। (48)
◆ ग़ज़वा ए बद्र में क़ुरैश ज़लील व रुसवा हुए। (50)
(iii) अल्लाह तआला की नुसरत (मदद) के 6 असबाब (कारण)
◆ ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह का ज़िक्र।
◆ अल्लाह और रसूल की इताअत
◆ आपसी इख़्तेलाफ़ और लड़ाई से बच कर रहना।
◆ मुक़ाबले में ना मुवाफ़िक़ हालात पर सब्र।
◆ दिखावा और घमंड से दूर रहना
(45 से 47)
(iv) जंग के मुतअल्लिक़ हिदायात
◆ अगर काफ़िर सुलह (समझौता) के लिए हाथ बढ़ाएं तो सुलह कर ली जाय।
◆ भरोसा सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह पर हो
(60, 61)
(v) मोमेनीन की तीन अक़्साम
मुहाजिरीन= ईमान, हिजरत, जान व माल की क़ुर्बानी
अंसार= ईमान, मुहाजिरीन को पनाह दी, क्षमता से ज़्यादा मदद की
पीछे रह जाने वाले= ईमान लाए लेकिन हिजरत नहीं की। (72)
(vi) कुछ अहम बातें
◆ अल्लाह किसी को नेअमत दे कर उसे तब्दील नहीं करता जबतक कि क़ौम ख़ुद न तब्दील कर दे। (53)
◆ अगर अहले ईमान बीस हों तो वह अपने दो गुने दुश्मन पर भारी होंगे। (66)
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(2) सूरह (009) अत तौबा के इब्तेदाई हिस्सा
(i) मुशरिकीन और अहले किताब के साथ जिहाद
उन मुशरिकीन से बरअत का एलान है जिन्होंने हज्जे बैतुल्लाह से मना कर दिया। अहले किताब के साथ जंग की इजाज़त दी गई। अलबत्ता उनके साथ मुआहिदे को पूरा करने का आदेश दिया गया जिन्होंने ख़िलाफ़ वर्ज़ी नहीं की। (4 से 6)
(ii) मुसलमान और मुनाफिक़ीन के दरमियान फ़र्क़
मुसलमान और मुनाफिक़ीन में फ़र्क़ करने वाली बुनियादी चीज़, ग़ज़वा ए तबूक बना। रूमियों के साथ मुक़ाबला जो उस समय सुपर पॉवर थे। सख़्त गर्मी, ग़रीबी और भूखमरी के मौक़ा पर जबकि फ़सल भी बिल्कुल तैयार थी। कुछ मुसलमानों को छोड़कर तमाम मुसलमान चले गए, जबकि मुनाफिक़ीन ने बहाने तराशने शुरू कर दिए। पारे के अंत तक मुनाफिक़ीन की मुज़म्मत है। क़ुदरत के बावजूद मैदाने जंग से भागे और झूठे बहाने तराशे, वह मुसलमानों से दिल में बुग़ज़ व जलन रखते, मुसलमानों की ख़ुशी व क़ामयाबी पर ग़मगीन और मुसलमानों के नुक़सान पर ख़ुश होते। दूसरी तरफ़ क़समें खा खा कर मुसलमानों को यक़ीन दिलाते, हमेशा दौलत के लालच में रहते, कंजूसी उनकी घुटटी में पड़ी थी। हमेशा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए अपशब्द बकते रहते, उनके लिए फ़रमाया गया कि
اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِن تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً فَلَن يَغْفِرَ اللَّهُ لَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ۗ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ
"(ऐ रसूल) ख्वाह तुम उन (मुनाफिक़ों) के लिए मग़फिरत की दुआ मॉगों या न मॉगों (उनके लिए बराबर है) तुम उनके लिए सत्तर बार भी बख्शिस की दुआ मांगोगे तो भी अल्लाह उनको हरगिज़ न बख़्शेगा। यह (सज़ा) इस वजह से है कि उन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और अल्लाह बदकार लोगों को हिदायत नहीं दिया करता" (आयत 80)
और
وَلَا تُصَلِّ عَلَىٰ أَحَدٍ مِّنْهُم مَّاتَ أَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلَىٰ قَبْرِهِ ۖ إِنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَمَاتُوا وَهُمْ فَاسِقُونَ
"और (ऐ रसूल) उन मुनाफिक़ीन में से जो मर जाए तो कभी न किसी पर नमाज़े ज़नाज़ा पढ़ना और न उसकी क़ब्र पर (जाकर) खड़े होना इन लोगों ने यक़ीनन अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और बदकारी की हालत में मर (भी) गए। (आयत 84)
(iii) पीछे रह जाने वालों के तीन गिरोह
(2) मुख़्लिस मगर मजबूर लोग जिनके पास सवारियां और रास्ते का ख़र्च न था। उनके दिल न जाने से बहुत दुखी थे।
(3) मुख़्लिस और मोमिन तो थे लेकिन केवल अपनी सुस्ती की वजह से पीछे रह गए थे।
(iv) सदक़ा व ज़कात के हक़दार
◆ मिस्कीन,
◆ ज़कात वसूल करने वाले,
◆ किसी के दिल को नरम करने के लिए,
◆ क़ैदी को छुड़ाने के लिए,
◆ कर्ज़दार जिन में क़र्ज़ अदा करने की वास्तव में सकत न हो,
◆ अल्लाह के रास्ते में,
◆ मुसाफ़िर
(60)
(v) उलेमा को ख़ुदा की जगह न दी जाय
जिस तरह यहूदियों और ईसाइयों ने अपने उलेमा को ख़ुदा का दर्जा दे दिया था, वह अल्लाह की किताब को छोड़ कर अंधाधुंध उनकी बात मानते और अमल करते थे और उन उलेमा ने अवाम का तअल्लुक़ अल्लाह की किताब से तोड़ कर रख दिया बल्कि किताबों को बदल कर रख दिया था। लोगों के माल को हराम तरीक़े से खाते थे और सोना चांदी जमा कर के रखते थे, और अल्लाह के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बन गए थे। (31, 34)
उलेमा की बात उसी वक़्त तक तस्लीम की जाय जब तक उसका तअल्लुक़ अल्लाह की किताब और रसूल की सुन्नत के मुताबिक़ हो।
(vi) अल्लाह और उसके रसूल से ज़्यादा कोई चीज़ महबूब नहीं
ऐ नबी ! कह दो कि अगर तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे तुम्हारे भाई, तुम्हारी बीवियाँ, तुम्हारे रिश्ते-नातेदार, तुम्हारे वह माल जो तुमने कमाए हैं, तुम्हारे वह कारोबार जिनके ठंडे पड़ जाने का तुमको डर है और तुम्हारे वह घर जो तुमको बहुत पसन्द हैं, तुमको अल्लाह और उसके रसूल और उसकी राह में संघर्ष से ज़्यादा प्यारे हैं तो इन्तेज़ार करो, यहां तक कि अल्लाह अपना फ़ैसला तुम्हारे सामने ले आए। (आयत 24)
(vii) माल जमा कर के रखने और ख़र्च न करने वालों का अंजाम
जो लोग सोना चांदी जमा करके रखते हैं और उसमें से अल्लाह के रास्ते में ख़र्च नहीं करते क़्यामत के दिन उसी सोने-चाँदी पर जहन्नम की आग दहकाई जाएगी और फिर इसी से उन लोगों की पेशानियों, बग़ल और पीठ को दाग़ा जाएगा (यह कहते हुए कि) यही है वह ख़ज़ाना जो तुमने अपने लिए जमा किया था, लो अब अपनी समेटी हुई दौलत का मज़ा चखो। (आयत 34, 35)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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