पारा (12) व मा मिन दाब्बा
इस पारे में दो हिस्से है-
(2) सूरह यूसुफ़ का इब्तेदाई निस्फ़ हिस्सा
(1) सूरह (011) हूद मुकम्मल
(i) क़ुरआन करीम की अज़मत
क़ुरआन अपनी आयात, मआनी, और मज़मून के एतेबार से मुहकम (स्पष्ट) किताब है और उसमें किसी भी लिहाज़ से फ़साद और ख़लल नहीं आ (दूषित या बाधित नहीं किया जा) सकता। और न ही इसमें कोई विरोधाभास (conflict) या अन्तविरोध (Contradiction) है। मुहकम होने की बड़ी वजह यही है कि इसकी तफ़सील और तशरीह (explanation) उस ज़ात ने किया है जो हकीम भी है और ख़बीर भी। उसका हर हुक्म किसी न किसी हिकमत से इबारत है और उसे इंसान के माज़ी (past), हाल (present) मुस्तक़बिल (future). उसकी नफ़सियात (psychology), कमज़ोरी (weakness) और ज़रूरियात का इल्म है।
जो लोग यह दावा करते हैं कि इस्लाम सवा 1400 साल पहले की पैदावार है और हिंदुस्तानी इतिहास में यह पढ़ाया जाता है कि इस्लाम के संस्थापक (founder) मुहम्मद साहब (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) थे तो उन्हें यह जान लेना चाहिए कि क़ुरआन उनके नज़रियात को रद्द करते हुए ऐलान करता है कि इस्लाम तो उसी वक़्त आया था जब पहले इंसान ने दुनिया में क़दम रखा था और हज़ारों अंबिया और रसूल के बाद आख़िरी नबी मुहम्मद अरबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को रिसालत दी गई। उन लोगों का भी ज़िक्र किया गया है जो अल्लाह की आयात का इंकार करते हैं उनको जवाब दिया गया बल्कि चैलेंज किया गया कि
أَمۡ يَقُولُونَ ٱفۡتَرَىٰهُۖ قُلۡ فَأۡتُواْ بِعَشۡرِ سُوَرٖ مِّثۡلِهِۦ مُفۡتَرَيَٰتٖ وَٱدۡعُواْ مَنِ ٱسۡتَطَعۡتُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ
वह कहते हैं कि (नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने यह क़ुरआन ख़ुद घड़ लिया है तो आप उनसे कह दीजिए कि अगर वह सच्चे हैं तो उन झूठे माबूदों को भी मदद के लिए बुला लें और इस जैसी ज़रा दस सूरतें ही बना लाएं। (आयत 13)
आगे धमकी भी है,
अब अगर तुम्हारे अपने बनाये हुए माबूद तुम्हारी मदद नहीं कर सकते तो जान लो कि यह अल्लाह के इल्म से नाज़िल की गई है। और हक़ीक़त यह है कि अल्लाह के इलावा कोई माबूद नहीं है। क्या तुम अब भी न मानोगे। (आयत 14)
(ii) तौहीद और तौहीद के दलाएल
दुनिया में जितनी मख़लूक़ हैं इंसान हों या जिन्नात, चौपाए हों या परिंदे, पानी मे रहने वाली मछलियां और दूसरे जंतु हों या ज़मीन पर रेंगने वाले कीड़े मकोड़े, तमाम मख़लूक़ को रिज़्क़ दने वाला अल्लाह ही है, और तमाम मख़लूक़ात और आसमान व ज़मीन को अल्लाह ने ही पैदा किया है। (6, 7)
(iii) रिसालत और उसके सुबूत के लिए सात अंबिया के वक़िआत
(2) हूद अलैहिस्सलाम,
(3) सालेह अलैहिस्सलाम,
(4) इब्राहीम अलैहिस्सलाम,
(5) लूत अलैहिस्सलाम,
(6) शुऐब अलैहिस्सलाम,
(7) मूसा अलैहिस्सलाम
इन वक़िआत में जहां एक तरफ़ अक़्ल, समझ बूझ और सुनने देखने वालों के लिए बे पनाह इबरत और नसीहत है वहीं दूसरी तरफ़ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सच्चे पक्के मुसलमानों के लिए तसल्ली और अपने दीन पर जमे रहने की तलक़ीन भी है। इसीलिए यह वक़िआत बयान करते हुए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इस्तेक़ामत का हुक्म दिया गया है और यह हुक्म पूरी उम्मत के लिए भी है। इस्तेक़ामत कोई सस्ती और आसान चीज़ नहीँ है बल्कि बहुत ही मुश्किल काम है जो अल्लाह के मख़सूस बंदों को ही नसीब होती है। इस्तेक़ामत का मतलब है उन तालीमात के मुताबिक़ पूरी ज़िंदगी गुज़ारी जाय जिसका अल्लाह ने हुक्म दिया है। (25 97)
(iv) क़यामत का तज़किरा
क़यामत के दिन इंसान दो गिरोहों में बंटे होंगे। 1, बदबख़्त लोग जिनके लिए हौलनाक अज़ाब होगा। कुफ़्र की हालत में मरने वाले सदैव जहन्नम में जलते रहेंगे परन्तु जो मुसलमान अपने गुनाहों की वजह से जहन्नम में जाएंगे, जबतक अल्लाह की मर्ज़ी होगी वह जलेंगे फिर उन्हें जहन्नम से निकाल कर जन्नत में दाख़िल किया जाएगा। 2, खुश किस्मत लोग, यह सदैव जन्नत में रहेंगे जहां उनके लिए सभी प्रकार का रिज़्क़ होगा। (105, 109)
(v) मोमिनों को नसीहत
(1) ज़ालिमों की बातों में हरगिज़ न आएं वरना जहन्नम के मुस्तहिक़ हो जाएंगे। नेकी बुराई को दूर कर देती है। (2) दिन के दोनों किनारों और रात के हिस्सों में नमाज़ अदा करें। (3) जो परेशानियां आएं उन पर सब्र करें। (113 से 115)
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(2) सूरह (012) यूसुफ़ का इब्तेदाई निस्फ़ हिस्सा
इस सूरह में यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के वाक़ये को बड़ी तफ़सील से बयान किया गया हैं।
● "तमाम अंबिया ए कराम के वाक़िए क़ुरआन में जगह जगह बिखरे पड़े हैं मगर यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का वाक़िआ इसी सूरह में मुकम्मल बयान हुआ है। उसकी वजह यह है कि उस ज़माने में मक्के के कुछ काफ़िरों ने (यहूदियों के इशारे पर) नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की परीक्षा लेने के लिए आप से सवाल किया था कि बनी इस्राईल मिस्र कैसे पहुंचे? चूंकि अरब के लोग इस वाक़िए से नावाक़िफ़ थे, बल्कि उसका नाम व निशान तक उनके यहां नहीं पाया जाता था, ख़ुद नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़बान से भी इस से पहले कभी न सुना गया था इसलिए उन्हें उम्मीद थी कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम या तो इसका विस्तारपूर्वक जवाब न दे सकेंगे या उस वक़्त टाल मटोल करने के बाद किसी यहूदी से पूछने की कोशिश करेंगे और इस तरह आप का भ्रम खुल जायेगा। लेकिन इस परीक्षा में उन्हें उल्टी मुंह की खानी पड़ी। अल्लाह तआला ने सिर्फ़ यही नहीं किया कि फ़ौरन उसी वक़्त यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का यह पूरा वाक़िआ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़बान पर जारी कर दिया बल्कि इस क़िस्से को क़ुरैश के उस मामले पर चस्पां भी कर दिया जो वह यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाईयों की तरह आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ कर रहे थे।
"यूसुफ़ और उसके भाइयों के क़िस्से में पूछने वालों के लिए बड़ी निशानियां हैं"
हक़ीक़त यह है कि यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के क़िस्से को मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और क़ुरैश के मामले पर चस्पां कर के क़ुरआन मजीद ने गोया स्पष्ट भविष्यवाणी कर दी थी कि जिसे आने वाले 10 वर्ष के वाक़िआत ने बिल्कुल सही साबित करके दिखा दिया। इस सूरह के नाज़िल हुए अभी डेढ़ दो वर्ष भी नहीं गुज़रे थे कि क़ुरैश के लोगों ने बिरादराने यूसुफ़ की तरह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के क़त्ल की साज़िश की और आप को मजबूरन अपनी जान बचा कर मक्का से निकलना पड़ा। फिर उनकी उम्मीदों के उलट आप को भी जिला वतनी की ज़िंदगी मे भी ऐसा ही उरूज और इक़्तेदार नसीब हुआ जैसा यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को हुआ था। फिर जिस तरह यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाई मिस्र में उनके सामने सिर झुकाए शर्मिंदा, हाथ फैलाये खड़े विनती कर रहे थे:
"हमें सदक़ा दीजिए, बेशक अल्लाह सदक़ा करने वालों को बड़ा अज्र देता है।"
तो यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने क़ुदरत रखने के बावजूद उन्हें माफ़ कर दिया और कहा,
आज तुम्हारी कोई पकड़ नहीं, अल्लाह तुम्हारी मग़फ़िरत करे वही सब रहम करने वालों से बढ़ कर रहम करने वाला है।" (आयत 92)
यही हाल मक्के के लोगों का भी हुआ। मक्का फ़तह होने के बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने कुरैश शिकस्त खाये और सिर झुकाए खड़े थे और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक एक ज़ुल्म का बदला लेने पर क़ादिर थे। आपने पूछा तुम्हारा क्या ख़्याल है? तुम्हारे साथ क्या सुलूक किया जाय? उन्होंने जवाब दिया
"आप एक आली ज़र्फ़ भाई और आली ज़र्फ़ भाई के बेटे हैं।"
इस पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,
"मैं तुम्हें वही जवाब देता हूँ जो यूसुफ़ ने अपने भाइयों को दिया था आज तुम्हारी कोई पकड़ नहीं जाओ तुम सब आज़ाद हो।" (सीरत इब्ने हिशाम)
● यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का वाक़िआ
याक़ूब अलैहिस्सलाम के बारह बेटे थे यूसुफ़ अलैहिस्सलाम उनमें सूरत और सीरत दोनों लिहाज़ से बेहद हसीन थे यही वजह है कि याक़ूब अलैहिस्सलाम उनसे ज़्यादा मुहब्बत करते थे। एक बार यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने एक ख़्वाब देखा और अपने वालिद को बताया कि "ग्यारह सितारे, सूरज और चांद मुझे सज्दा कर रहे हैं" उनके वालिद ने भाइयों से ख़्वाब का ज़िक्र करने से मना किया। बाप की बेपनाह मुहब्बत की वजह से दूसरे बेटे यूसुफ़ से हसद करने लगे। उन्होंने आपस में मशविरा किया और अपने वालिद को राज़ी कर तफ़रीह का बहाना करके जंगल ले गये और वहां एक अंधे कुंएं में गिरा दिया, शाम को अपने वालिद से झूठ बोल दिया कि उसे भेड़िया खा गया। इधर यूसुफ़ कुएं में पड़े थे कि एक क़ाफ़िला गुज़रा। उन्होंने पानी निकालने के लिए कुएं में जो डोल डाला तो आप निकल आए। क़ाफ़िले वाले ख़ुश हुए और मिस्र ले जाकर अज़ीज़ ए मिस्र को बेच दिया, अज़ीज़ ए मिस्र ने अपने घर में रखा, उनका हुस्न देख कर अज़ीज़ ए मिस्र की बीवी का दिल उनपर आ गया, उसने बुराई की दावत दी जिसे आप ने ठुकरा दिया। चूंकि शहर में चर्चा होने लगा इसलिए अज़ीज़ ए मिस्र ने बदनामी के डर से आप को जेल में डलवा दिया। जेल में भी आप ने तौहीद की दावत का सिलसिला जारी रखा, यही वजह थी कि तमाम क़ैदी आप की इज़्ज़त करने लगे। उसी दौरान दो कैदियों ने ख़्वाब देखा और उनसे ताबीर पूछी आप ने अल्लाह के हुक्म से ठीक ठीक बता दिया। फिर बादशाह ने ख़्वाब देखा कि "सात मोटी गायें हैं जिन्हें सात दुबली गायें खा रही हैं और अनाज की सात बालें हरी हैं और सात सूखी" बादशाह बहुत परेशान हुआ और उसने दरबारियों को इकट्ठा कर उन से ताबीर चाही लेकिन कोई ताबीर न बता सका। इत्तेफ़ाक़ से उस वक़्त वह भी मौजूद था जिसे यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने जेल में ख़्वाब की ताबीर बताई थी, उसने यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के पास जाने की इजाज़त तलब की और उन्होंने ताबीर बताई तो बादशाह ने आश्चर्य से कहा ऐसा ज़हीन और माहिर व्यक्ति जेल में कैसे है, उसने आज़ाद कर के ख़ज़ाने, व्यापार, और राज्य का स्वतंत्र मंत्री (خود مختار وزیر) बना दिया। मिस्र और आस पास में अकाल (قحط) की वजह से आप के भाई अनाज हासिल करने के लिए मिस्र आए। आपने उन्हें पहचान लिया लेकिन वह न पहचान सके। फिर आख़िर में एक बार उनके भाई आए तो बहुत ख़स्ता हालत थी और उन्होंने सदक़े की मांग की तो यूसुफ़ को रहम आ गया। उन्होंने उनसे पूछा तुम्हें पता है कि तुमने यूसुफ़ और उसके भाई के साथ क्या किया था? अब उनके समझ में आया तो उन्होंने तअज्जुब से पूछा क्या तुम यूसुफ़ हो? जब यूसुफ़ ने कहा हां मैं यूसुफ़ हूं और यह मेरा भाई है तो सभी भाई उनके सामने नादिम व शर्मिंदा खड़े थे। फिर उन्होंने अपने वालिदैन और तमाम परिवार को मिस्र बुला लिया और इस तरह बनी इस्राईल मिस्र महुँच कर आबाद हो गए।
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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