पारा (16) क़ाल अलम
इस पारे में तीन हिस्से हैं
(2) सूरह (019) मरयम मुकम्मल
(3) सूरह (020) ताहा मुकम्मल
(1) सूरह (018) अल कहफ़ का बाक़ी हिस्सा
(2) ख़िज़र के क़िस्से की हक़ीक़त क्या है?
(यह वाक़िआ पंद्रहवीं पारे के आख़िर से शुरू हो कर सोलहवीं पारे के पहले पेज तक है)
दरअस्ल हुआ यूं कि एक दिन मूसा अलैहिस्सलाम ने ख़ुत्बा दिया, उसी दौरान आप से पूछा गया लोगों में सबसे ज़्यादा इल्म वाला कौन है? आप ने फ़रमाया "मैं"यह बात अल्लाह को नागवार गुज़री और उनकी तरफ़ अल्लाह ने वही وحی भेजी कि मेरे बंदों में से एक बंदा दरियाओं के संगम (जहां फ़ारस ईरान और रूम के समुद्र मिलते हैं) पर मिलेगा वह तुझसे बड़ा आलिम है। मूसा अलैहिस्सलाम ने पूछा मेरे रब उन से मेरी मुलाक़ात कैसे होगी? हुक्म हुआ एक मछ्ली ज़नबील में रख लो, जहां यह मछली ज़िंदा होकर निकल भागे वह बंदा तुम्हें वहीँ मिलेगा। मूसा अलैहिस्सलाम ने यूशा बिन नून को साथ लिया, एक मछली ज़नबील में रखी और तलाश में निकल पड़े। जब वह एक चट्टान के पास आराम के लिए रुके और मूसा अलैहिस्सलाम को नींद आ गयी वह मछ्ली ज़िंदा होकर समुद्र में निकल भागी। फिर वह वहां से उठ कर चल दिए, रात भर चलते रहे। जब सुबह हुई तो मूसा अलैहिस्सलाम ने साथी से कहा नाश्ता लाओ, तभी उनके साथी ने कहा कि "जब हम चट्टान के पास ठहरे थे तो मछली ज़िंदा होकर पानी मे चली गयी थी लेकिन शैतान ने मुझे भुला दिया कि मैं आप से इसका तज़किरा करता, यह सुन कर मूसा अलैहिस्सलाम बोले " हमें उसी जगह की तो तलाश थी " चुनाँचे वह वापस हुए। जब उस चट्टान के क़रीब पहुंचे तो एक शख़्स को कपड़ा ओढ़े हुए मौजूद पाया। मूसा अलैहिस्सलाम ने उन्हें सलाम किया और कहा मैं मूसा हूं। क्या मैं आप के साथ चल सकता हूं? ताकि आप मुझे वह बातें सिखाएं जो अल्लाह ने ख़ास तौर पर आप को सिखाई हैं। ख़िज़र अलैहिस्सलाम बोले तुम मेरे साथ सब्र नहीं कर सकोगे। ऐ मूसा मुझे अल्लाह ने वह इल्म दिया है जो तुम नहीं जानते और तुमको जो इल्म दिया है उसे मैं नहीं जानता। मूसा ने कहा इन शा अल्लाह आप मुझे सब्र करने वाला पाएंगे और किसी भी मामले में आप की नाफ़रमानी नहीं करूंगा। ख़िज़र अलैहिस्सलाम ने वादा लिया कि जबतक मैं ख़ुद ज़िक्र न करूं आप मुझसे कोई सवाल नहीं करेंगे फिर दोनों समुद्र के किनारे किनारे पैदल चले, रास्ते में एक कश्ती मिली उन्होंने ख़िज़र अलैहिस्सलाम को पहचान कर दोनों को बेग़ैर किराया के बिठा लिया। इतने में एक चिड़िया आई और कश्ती के किनारे पर बैठ गई। फिर समुद्र में उसने एक या दो चोंचें मारी। उसे देखकर ख़िज़र अलैहिस्सलाम बोले "ऐ मूसा मे्रे और तुम्हारे इल्म ने अल्लाह के इल्म से इतना भी कम न किया होगा जितना इस चिड़िया ने समुद्र से। फिर ख़िज़र अलैहिस्सलाम ने कश्ती से उतरते ही उसमें सूराख़ कर दिया। मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़ौरन पूछा "इन लोगों ने हमें किराया लिए बेग़ैर सवार किया और आपने सूराख़ कर दिया कि यह डूब ही जाएं। ख़िज़र अलैहिस्सलाम ने याद दिलाया कि मैंने तुमसे नहीं कहा था कि तुम मेरे साथ सब्र नहीं कर सकोगे? मूसा ने कहा आप मेरी भूल पर न पकड़ें। दोनों आगे बढ़े देखा एक लड़का बच्चों के साथ खेल रहा है। ख़िज़र अलैहिस्सलाम ने उसे क़त्ल कर दिया। मूसा अलैहिस्सलाम से बर्दाश्त नहीं हुआ, बोल पड़े, आप ने एक बे गुनाह बच्चे को नाहक़ मार डाला। ख़िज़र अलैहिस्सलाम ने फिर याद दिलाया कि मैंने तुमसे नहीं कहा था कि तुम मेरे साथ सब्र नहीं कर सकोगे। मूसा ने कहा, अब अगर इसके बाद कोई सवाल करूं तो अपने साथ मुझे न रखें। फिर दोनों आगे बढ़े यहां तक कि एक बस्ती से गुज़र हुआ। उनसे अपना मेहमान बनाने की दरख़ास्त की लेकिन बस्ती वालों ने मेहमान बनाने से इंकार कर दिया। वहां उन्हें एक दीवार मिली जी बिल्कुल गिरने के क़रीब थी ख़िज़र अलैहिस्सलाम ने अपने हाथ के इशारे से उसे सीधा कर दिया। मूसा अलैहिस्सलाम से फिर बर्दाश्त नहीं हुआ और बोल पड़े कि "अगर आप चाहते तो इसकी उजरत ले सकते थे"। ख़िज़र अलैहिस्सलाम ने कहा अब हमारे दरमियान जुदाई का वक़्त आगया है। (अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: "अल्लाह मूसा पर रहम करे कुछ देर और सब्र करते तो कुछ और वाक़िआत (More events) हमारे सामने आते" सही बुख़ारी हदीस 122/ किताबुल इल्म के तहत भी देखा जा सकता है) उसके बाद ख़िज़र अलैहिस्सलाम ने तीनों सवालों के जवाब दिए:
वह कश्ती (जिसमें मैंने सूराख़ कर दिया था) चन्द ग़रीबों की थी जो दरिया में मेहनत मज़दूरी कर के गुज़ारा करते थे मैंने उसे ऐबदार बना दिया क्योंकि उनके पीछे एक ज़ालिम बादशाह था जो तमाम कश्तियां ज़बरदस्ती बेगार में पकड़ लेता था। वह लड़का जिसको मैंने क़त्ल कर दिया था उसके माँ बाप दोनों मोमिन और नेक हैं तो मुझे ये अन्देशा हुआ कि यह कहीं उनको अपने सरकशी और कुफ़्र में फँसा न दे। हमारी ख़्वाहिश है कि उनका परवरदिगार इसके बदले में ऐसी औलाद अता फ़रमाए जो उससे पाक नफ़सी और पाक क़राबत में बेहतर हो। और वह दीवार (जिसे मैंने खड़ा कर दिया) शहर के दो यतीम लड़कों की थी और उसके नीचे ख़ज़ाना दफ़न था। उन लड़कों का बाप एक नेक आदमी था तो तुम्हारे परवरदिगार ने चाहा कि दोनों लड़के अपनी जवानी को पहुँचे तो तुम्हारे परवरदिगार की मेहरबानी से अपना ख़ज़ाना निकाल लें और मैंने कुछ भी अपनी मर्ज़ी से नहीं किया। यह हक़ीक़त है उन वाक़िआत की जिन पर आप सब्र न कर सके। (60 से 82)
(3) ज़ुल-क़रनैन का क्या वाक़िआ है?
ज़ुल-क़रनैन बड़ा ज़बरदस्त, इंसाफ़ पसंद, और नेक बादशाह था जिसकी सल्तनत पूरब से पशिम तक और उत्तर से दक्षिण तक फैली हुई थी। वह एक के बाद दूसरा मुल्क अपनी सल्तनत में शामिल करता गया यहां तक कि उसका गुज़र एक ऐसी क़ौम पर हुआ जो एक वहशी क़ौम याजूज माजूज के अत्याचार से पीड़ित थी। ज़ुल-क़रनैन ने याजूज माजूज पर लोहे की सिलों वाली एक बहुत ही मज़बूत दीवार तामीर करा दी। अब वह क़यामत के क़रीब ही दीवार से बाहर निकल सकेंगे। याजूज माजूज का बाहर निकलना क़यामत की दस बड़ी निशानियों में से एक है। (83 से 98)
(iii) कुछ अहम बातें
● किसी के मुसलमान होने के लिए सिर्फ़ ईमान ही काफ़ी नहीं बल्कि नेक अमल होना भी ज़रूरी है। (30)
● ऐ नबी! कह दीजिए कि अगर समुद्र मेरे रब की बातें लिखने के लिए रौशनाई बन जाए तो वह ख़त्म हो जाए, मगर मेरे रब की बातें ख़त्म न हों, बल्कि अगर उतनी ही रौशनाई हम और ले आएँ तो वह भी काफ़ी न हो। (आयत 109)
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(2) सूरह (019) मरयम मुकम्मल
(i) अंबिया का ज़िक्र
(1) सूरह मरयम में कुल बारह अंबिया ए कराम का तज़किरा आया है।
(2) नूह
(3) इदरीस
(4) इब्राहीम
(5) इस्माईल
(6) इस्हाक़
(7) याक़ूब
(8) मूसा
(9) हारून
(10) ज़करिया
(11) यहया
(12) ईसा अलैहुमुस्सलाम
इनमें से तीन का ज़िक्र ज़रा तफ़सील से बयान हुआ है।
(1) यहया अलैहिस्सलाम का जन्म
ज़करिया अलैहिस्सलाम और उनकी बीवी के यहां बुढ़ापे में औलाद हुई और नाम यहया भी वही وحي के ज़रिए ही decide किया गया। यहया अलैहिस्सलाम नबी बनाये गए। इस वाक़िआ से यह सबक़ मिलता है कि इंसान को कभी मायूस नहीं होना चाहिए। अपने रब से हमेशा दुआ करते रहना चाहिए। (2 से 15)
(2) ईसा अलैहिस्सलाम का जन्म
अल्लाह ने ईसा को बेग़ैर बाप के पैदा किया, क़ौम ने इल्ज़ाम लगाया तो मां की गोद से ही ईसा का बात करना दूसरे मोअजिज़े (miracle) के तौर पर ज़ाहिर हुआ। वह बोल पड़े कि "मैं अल्लाह का बंदा हूं। अल्लाह ने मुझे किताब दी और नबी बनाया है, मुझे जीते जी नमाज़ और ज़कात अदा करने का आदेश दिया है और मुझे अपनी माता का फ़रमाबरदार भी बनाया है। (16 से 33)
(3) इब्राहीम अलैहिस्सलाम की अपने वालिद को दावत
ऐ मेरे प्यारे अब्बा जान, आप ऐसी चीज़ों को क्यों पूजते हैं जो न सुनते हैं, न देखते हैं, न कोई फ़ायदा पहुंचाते हैं। मेरे पास अल्लाह का दिया हुआ इल्म है जो आपके पास नहीं है इसलिए आप मेरी बात मान लें। शैतान के पीछे न चलें क्योंकि शैतान तो अपने रब का नाशुकरा है। मुझे इस बात का डर है कि कहीं आप पर अल्लाह का अज़ाब न आ जाय। इब्राहीम के बाप ने न सिर्फ़ यह कि उनकी बात न मानी बल्कि पत्थर मारने और देश निकाला देने की धमकी भी दी लेकिन इब्राहीम अलैहिस्सलाम इलाही मिशन पर जमे रहे और घर बार और वतन सब कुछ छोड़ना मंज़ूर कर लिया। (41 से 50)
(ii) मौत के बाद ज़िंदगी
जो लोग कहते हैं कि जब वह मर खप जाएंगे तो भला दोबारा कैसे ज़िंदा होंगे। अल्लाह तआला ने उसका जवाब देते हुए कहा है कि इंसान जब कुछ भी न था तब उसे पैदा कर दिया तो दोबारा पैदा करना कौन सी बड़ी और अनोखी बात है। हम ज़रूर इकट्ठा करेंगे और शैतान को भी हाज़िर करेंगे और बताएंगे कि जहन्नम का ज़्यादा मुस्तहिक़ कौन है। (66 से 74)
(iii) किसी को अल्लाह का बेटा कहना भयानक जुर्म है
लोग कहते हैं कि रहमान ने बेटा बनाया है उन्होंने ऐसा झूठ घड़ लिया है, क़रीब है कि आसमान गिर पड़े, ज़मीन फट जाए और पहाड़ टुकड़े टुकड़े होकर गिर पड़ें। (88 से 94)
(iv) कुछ अहम बातें
● मायूसी कुफ़्र है, औलाद और तमाम आवश्यकताओं के लिए केवल अल्लाह की तरफ़ पलटना चाहिए। (4)
● दावत का काम किसी भी समय रुकना नहीं चाहिए चाहे कितनी ही परेशानियों का सामना क्यों न करना पड़े।
● ईसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के बंदे और रसूल हैं उनको अल्लाह ने बगैर बाप के पैदा किया। (30)
● इस समय दुनिया में जितने भी इंसान हैं सभी उनकी औलाद हैं जो नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती (मनु की नौका) में सवार थे। (58)
● अक्सर ऐसा हुआ है कि नेके लोगों के बाद कुछ ऐसे अधम (नाहंजार) उठे जिन्होंने नमाज़ को छोड़ दिया और अपनी मनमानी की और गुमराही के दलदल में फंसते चले गए। (59)
● मौत के बाद जिंदगी अनिवार्य है जैसे अल्लाह ने इंसान को पहली बार पैदा किया है ऐसे ही मौत के बाद भी ला खड़ा करेगा। शिर्क करने और आख़िरत के इंकार के कारण ही बहुत सी प्रसिद्ध क़ौमें दुनिया से यूं मिट गई जैसे उनका कभी नामोनिशान ही न था। (67)
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(3) सूरह (020) ताहा मुकम्मल
(ii) आदम अलैहिस्सलाम का वाक़िआ
(iii) रसुल को तसल्ली
(i) मूसा अलैहिस्सलाम का वाक़िआ
मूसा अलैहिस्सलाम का वाक़िआ इस सूरह में काफ़ी तफ़सील से बयान हुआ है, मूसा अलैहिस्सलाम का समुद्र में डाला जाना, ताबूत का फ़िरऔन के पास पहुंचना, इज़्ज़त व एहरतेराम के साथ अपनी मां की तरफ़ लौटाया जाना, फ़िरऔन के घर में पालन पोषण, एक क़िबती का आप के हाथों क़त्ल होना, आप को क़िसास से निजात मिलना, मदयन में पनाह लेना और वहाँ क़ई वर्ष रहना, मदयन से लौटते हुए आग की तलाश में निकलना, रौशनी देख कर वहां जाना और अल्लाह तआला के साथ बातचीत, नबी बनाया जाना, फिर आपके भाई हारून का नबी बनाया जाना, फ़िरऔन के पास जाने का हुक्म, फ़िरऔन के साथ नरमी और उमदह नसीहतों के उसूल के तहत मुबाहिसा, जादूगरों से मुक़ाबला, जादूगरों का ईमान लाना, ईमान लाने पर फ़िरऔन की धमकी लेकिन उनकी साबित क़दमी, रातों रात बनी इस्राईल का मिस्र से निकलना, फ़िरऔन का अपने लश्कर के साथ पीछा करना और समुद्र में डूब जाना, अल्लाह की नेअमतों के मुक़ाबले में बनी इस्राईल का नाशुकरापन, सामिरी का बछड़ा बनाना और बनी इस्राईल की गुमराही, तौरात ले कर मूसा अलैहिस्सलाम की कोहे तूर से वापसी और अपने भाई पर ग़ुस्से का इज़हार, हारून अलैहिस्सलाम की वज़ाहत, वगैरह। (9 से 86)
(ii) सामिरी और उसका अंजाम?
सामिरी की निस्बत सामरा की तरफ़ है। यह बनी इस्राईल का एक बुद्धिजीवी व्यक्ति था जिसने मूसा अलैहिस्सलाम के पीछे ज़ेवरों से (जिन्हें बनी इस्राईल ने बोझ के कारण फेंक दिया था) एक बछड़ा बनाया जिस से बैल की आवाज़ निकलती थी। और कहा यह तुम्हारा और मूसा का माबूद है। इसके इस अमल से इमाम बग़वी के अनुसार 6 लाख में से केवल 12 हज़ार लोगों को छोड़ कर सब शिर्क में मुब्तिला हो गए थे। जब मूसा अलैहिस्सलाम ने सामिरी से पूछा तो उसने जवाब दिया मैंने ने वह देखा जो कोई न देख सका, मैंने एक मुट्ठी मिट्टी रसूल के क़दम के निशान से उठा कर उसमें डाल दिया था। उसकी सज़ा सामिरी को यह दी गई कि उसे दुनिया में ही अछूत बना दिया गया और वह ख़ुद कहता फिरता था لَا مِسَاسَۖ मुझे छूना नहीं। (87 से 97)
(iii) आदम अलैहिस्सलाम का वाक़िआ
अल्लाह तआला ने आदम अलैहिस्सलाम को पैदा कर के फ़रिश्तों को सज्दा करने का आदेश दिया, चुनांचे सभी फ़रिश्तों ने सज्दा किया मगर इब्लीस ने घमण्ड के कारण इंकार कर दिया। अल्लाह ने आदम से फ़रमाया अब यह (शैतान) तुम्हारा और तुम्हारी बीवी का दुश्मन है, कहीं ऐसा न हो कि यह तुम दोनों को जन्नत से निकलवा दे। तुम जन्नत में रहो न तुम यहाँ भूखे रहोगे न नंगे और न प्यासे रहोगे और न धूप लगेगी। लेकिन फ़ुलां दरख़्त के पास जाने की भी मत सोचना मगर शैतान ने वसवसा पैदा किया और आदम व हव्वा ने उस दरख़्त से कुछ खा लिया जिसके कारण वह एक दूसरे को नंगे नज़र आने लगे। आदम बहुत पछताए, उन्होंने माफ़ी मांगी तो अल्लाह ने उन्हें माफ़ कर दिया और ज़मीन पर ख़लीफ़ा बना दिया। (115 से 123)
(iv) रसूल को तसल्ली और पांच नमाज़ों का हुक्म
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मक्का के काफ़िरों की तरफ़ से सख़्त रंज का सामना करना पड़ता था, उनकी बदज़ुबानी, मज़ाक़ उड़ाना और इस्लाम के ख़िलाफ़ दौड़ भाग से आप कुढ़ते थे, उन्हें क़ुरआन सुनाना चाहते तो वह सुनने को तैयार न होते। इसके लिए अल्लाह ने अपने रसूल को तसल्ली दी है कि "उनकी बातों पर आप सब्र करें, सूरज निकलने से पहले (फ़ज्र की नमाज़), डूबने से पहले (अस्र की नमाज़), रात में (ईशा की नमाज़, और नफ़्ली तहज्जुद भी) और दिन के दोनों किनारों में (फ़ज्र, ज़ुहर, और मग़रिब की नमाज़) अल्लाह की तारीफ़ और तस्बीह करते रहें, घर वालो को नमाज़ का हुक्म दें अपने काम पर साबित क़दम रहें और दुनिया का ख़्याल बिल्कुल दिल में न लाएं। (130 से 132)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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