Khulasa e Qur'an - Para 11 (yaataziroon) | Surah at tauba-yunus

Khulasa e Qur'an - Para 11 (yaataziroon) | Surah at tauba-yunus


क़ुरआन सारांश [खुलासा क़ुरआन]
ग्यारहवां पारा - यातज़िरून
[सूरह अत तौबा-यूनुस]


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
(अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है)

पारा (11) यातज़िरून


इस पारे में दो हिस्से हैं

(1) सूरह अत तौबा का बाक़ी हिस्सा
(2) सूरह यूनुस मुकम्मल


(1) सूरह (009) अत तौबा के बाक़ी हिस्सा


(i) मुनाफिक़ीन की मुज़म्मत

गज़वा ए तबूक में शरीक न होने वाले मुनाफिक़ीन के झूठे बहाने की ख़बर अल्लाह तआला ने अपने नबी को पहले ही दे दी। मुनाफिक़ीन ने मुसलमानों को तंग करने के लिए मस्जिदे ज़रार बनाई थी अल्लाह ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को उस में खड़े होने से मना फ़रमाया, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हुक्म से इस मस्जिद को जला दिया गया। क्योंकि मस्जिद की बुनियाद तक़वा पर रखी जाती है न कि कुफ़्र करने और अल्लाह के रसूल के ख़िलाफ़ साज़िश करने के लिए। (108)


(ii) मोमिनीन की 9 सिफ़ात (विशेषताएं) 

1, तौबा करने वाले
2, इबादत करने वाले 
3, हम्द (तारीफ़ बयान) करने वाले 
4, रोज़ा रखने वाले
5, रुकूअ करने वाले
6, सज्दा करने वाले
7, नेकी का हुक्म देने वाले
8, ब्रुराई से रोकने वाले
9, अल्लाह की मुक़र्रर की हुई हदों की हिफ़ाज़त करने वाले

(112)

  

(iii) किसी काफ़िर के हक़ में मग़फ़िरत की दुआ क़ुबूल नहीं होती

 مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَن يَسۡتَغۡفِرُواْ لِلۡمُشۡرِكِينَ وَلَوۡ كَانُوٓاْ أُوْلِي قُرۡبَىٰ مِنۢ بَعۡدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمۡ أَنَّهُمۡ أَصۡحَٰبُ ٱلۡجَحِيمِ 

किसी नबी या मोमिन के लिए जाएज़ नहीं कि वज़ाहत कर देने के बाद भी वह मुशरिकों के लिए मग़फ़िरत तलब करे चाहे वह उसका कितना ही क़रीबी क्यों न हो। मुशरिकों का ठिकाना जहन्नम है। (113) 


(iv) ग़ज़वा ए तबूक में शिरकत न करने वाले 3 मुख़लिस सहाबा

1. काब बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु
2.हिलाल बिन उमय्या रज़ियल्लाहु अन्हु
3. मुरारह बिन रबीअ रज़ियल्लाहु अन्हु

इन तीनों का 50 दिन तक सोशल बॉयकॉट किया गया फिर उनकी तौबा की कुबूलियत का ऐलान इस वही के ज़रिए हुआ।

 وَعَلَى ٱلثَّلَٰثَةِ ٱلَّذِينَ خُلِّفُواْ حَتَّىٰٓ إِذَا ضَاقَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلۡأَرۡضُ بِمَا رَحُبَتۡ وَضَاقَتۡ عَلَيۡهِمۡ أَنفُسُهُمۡ وَظَنُّوٓاْ أَن لَّا مَلۡجَأَ مِنَ ٱللَّهِ إِلَّآ إِلَيۡهِ ثُمَّ تَابَ عَلَيۡهِمۡ لِيَتُوبُوٓاْۚ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ 

और उन तीनों पर जो (जिहाद से) पीछे रह गए थे जब ज़मीन अपनी वुसअत (फैलाव) के बावजुद उन पर तंग हो गई और उनकी जानें (तक) उन पर बोझ मालूम होने लगीं और उन लोगों ने समझ लिया कि अल्लाह के सिवा और कहीं पनाह की जगह नहीं। फिर अल्लाह ने उनको तौबा की तौफ़ीक़ दी ताकि वह (अल्लाह की तरफ़) रूजू करें, बेशक अल्लाह बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान है। (118, सही बुखारी 4418)

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(2) सूरह (010) यूनुस मुकम्मल


(i) तौहीद 

राज़िक़, मालिक, हाकिम, ख़ालिक़ और हर क़िस्म की तदबीर करने वाला अल्लाह ही है। यही वजह है कि जब इंसान पर कोई बला आती है तो वह अपने तमाम बनाये हुए देवी देवताओं को छोड़ कर लेटे, बैठे और खड़े होकर अल्लाह को ही पुकारता है। (2 से 12)


(ii) रिसालत

इस हवाले से नूह, मूसा, हारून और यूनुस अलैहिमुस्सलाम के वाक़िआत बयान हुए हैं। क़ौमे यूनुस एकलौती ऐसी क़ौम थी जिस पर अज़ाब आकर टल गया था। (90)


(iii) क़यामत

उस दिन तमाम इंसानों को जमा किया जायेगा, कुफ़्फ़ार भले ही इसका यक़ीन न करें। और किसी पर ज़र्रा बराबर भी ज़ुल्म न होगा बल्कि सबको न्याय मिलेगा।


(iv) क़ुरआन की अज़मत और तख़लीक़ ए कायनात (universe)

सूरज, चांद, उनकी सीमाएं, साल और महीनों का हिसाब, रात और दिन का उलटफेर, आसमान और ज़मीन और उनसे रिज़्क़ का हासिल होना, जल और थल, सुनने और देखने की सलाहियत अता करना, मौत और ज़िंदगी, रात को सुकून और दिन को रौशन बनाना आदि। (5, 31)


(v) अंबिया की दावत में तीन ख़ास बातें

◆ शिर्क से बचने की नसीहत, 
◆ मैं तुमसे दावत का कोई बदला नहीं माँगता मेरा अज्र तो अल्लाह के ज़िम्मे है, 
◆ मुझे मुसलमान रहने का हुक्म दिया गया है। 

(72)


(vi) काफ़िरों के इंकार के मुख़्तलिफ़ पहलू

(1) आख़िरत का इंकार, (2) उन्होंने अल्लाह को छोड़ कर इसलिए देवी देवता बना रखा है कि वह अल्लाह के सिफ़ारिशी हैं। (3) नबूवत का इंकार। (4) क़ुरआन नबी ख़ुद घड़ लाए हैं। (5) यह दीन बाप दादा के दीन के ख़िलाफ़ है। 


(vii) काफ़िरों को क़ायल करने के लिए मुख़्तलिफ़ दलाएल 

◆ निशानियां याद दिला कर 
 ◆ चैलेंज के ज़रिए 
◆ आख़िरत के अंजाम की सूचना के ज़रिए, 
◆ बलाओं और मुसीबत के वक़्त देवी देवता क्यों नहीं याद आते?


(viii) अंबिया के वाक़िआत

(1) नूह अलैहिस्सलाम का वाक़िआ

नूह अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को अपने रब की तरफ़ बुलाया, लेकिन केवल कुछ लोगों को छोड़ कर किसी ने उन की बात नही मानी। अल्लाह तआला ने मानने वालों को कश्ती में सवार करके बचा लिया और बाक़ी सभी नाफ़रमान लोगों को डुबो दिया। उन नाफ़रमानों में नूह अलैहिस्सलाम का एक बेटा भी था। (71 से 73)

(2) मूसा व हारून अलैहिमुस्सलाम का वाक़िआ

अल्लाह ने मूसा व हारून अलैहिमुस्सलाम को फ़िरऔन की तरफ़ भेजा कि वह उसे अल्लाह के रास्ते की तरफ़ बुलाएं लेकिन फ़िरऔन और उसके दरबारियो ने बात न मानी बल्कि फ़िरऔन ने उल्टा ख़ुदाई का दावा कर दिया, मूसा अलैहिस्सलाम को जादूगर बताया और उनके मुक़ाबले में मुल्क के जादूगरों को बुला लिया। जादूगर मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान लाए। फ़िरऔन जब इंकार पर डटा रहा तो अल्लाह ने उसे समुद्र में डुबो दिया फिर अल्लाह ने मूसा और हारून अलैहिमस्सलाम को हुक्म दिया कि अपनी क़ौम के लिए घर और मस्जिद बनाएं और मस्जिदों में सब नमाज़ अदा करें। (75 से 92)


(3) यूनुस अलैहिस्सलाम का वाक़िआ 

इस सूरह का नाम उनके नाम पर "सूरह यूनुस" रखा गया है। यूनुस अलैहिस्सलाम का नाम कुरआन में चार बार सूरह (अन निसा, अल अनआम, यूनुस और अस साफ्फ़ात) में आया है, और दो जगहों पर जुन नून ذو النون अल अंबिया में और साहेबुल हूत صاحب الحوت (यानी मछली वाले) सूरह अल क़लम में आया है।

यूनुस अलैहिस्सलाम के वाक़िए के दो पहलू हैं।

1, मछली के पेट मे जाना इसका तफ़सीली बयान सूरह 37 अस साफ्फ़ात में है।
2, उनकी ग़ैर मौजूदगी में क़ौम का इस्तेग़फ़ार करना इस सूरह में इसकी तरफ़ इशारा है।

दरअस्ल यूनुस अलैहिस्सलाम अपनी क़ौम के ईमान न लाने के कारण निराश हो कर और अल्लाह के अज़ाब को यक़ीनी (सुनिश्चित) देख कर "नैनवा" की ज़मीन छोड़कर चले गए। आगे जाने के लिए जब वह कश्ती में सवार हुए तो समुद्र में तूफ़ान आगया और कश्ती डूबने लगी। तो लोगों में चर्चा होने लगी कि ज़रूर कोई गुनहगार आदमी है, यूनुस अलैहिस्सलाम को उसी वक़्त अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उन्होंने समुद्र में छलांग लगा दी ताकि कश्ती के और मुसाफ़िर महफूज़ रहें। जैसे ही उन्होंने छलांग लगाई एक बड़ी मछली ने निगल लिया। अल्लाह ने उन्हें मछली के पेट मे भी सही सालिम रखा। मछली के पेट में ही उन्होंने दुआ की जिसका ज़िक्र सूरह अल अंबिया में है।

 لَّا إِلَـٰهَ إِلَّا أَنتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنتُ مِنَ الظَّالِمِينَ

"तेरे इलावा कोई माबूद नहीं, पाक है तेरी ज़ात बेशक मैं ही ज़ालिम था" (सूरह 21 अल अंबिया 87)

अल्लाह ने उनकी दुआ क़ुबूल कर ली और कुछ दिन बाद मछली ने उन्हें साहिल पर उगल दिया। उधर यह हुआ कि यूनुस अलैहिस्सलाम की क़ौम के मर्द, औरतें, बच्चे और बूढ़े सभी सहरा (रेगिस्तान) में निकल गए और रोना धोना और इस्तेग़फ़ार करना शुरू कर दिया और सच्चे दिल से ईमान लाए जिसकी वजह से अल्लाह का अज़ाब उन से टल गया। (98)


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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