पारा (14) रुबमा
इस पारे में दो हिस्से है-
(2) सूरह अन नहल मुकम्मल
(1) सूरह (015) अल हिज्र मुकम्मल
(i) कुफ़्फ़ार की ख़्वाहिश
आख़िरत में जब कुफ़्फ़ार मुसलमानों को मज़े व ऐश में और ख़ुद को अज़ाब में देखेंगे तो यह ख़्वाहिश करेंगे कि काश वह भी दुनिया में मुसलमान हो गए होते। (2)
(ii) क़ुरआन की हिफ़ाज़त
अल्लाह तआला ने क़यामत तक के लिए क़ुरआन की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी ली है।
إِنَّا نَحۡنُ نَزَّلۡنَا ٱلذِّكۡرَوَإِنَّا لَهُۥ لَحَٰفِظُونَ
"हमने ही क़ुरआन को नाज़िल किया है और हम ही इसकी हिफ़ाज़त करने वाले हैं" (आयत 09)
(iii) इंसान और जिन्नात की तख़लीक़
وَلَقَدۡ خَلَقۡنَا ٱلۡإِنسَٰنَ مِن صَلۡصَٰلٖ مِّنۡ حَمَإٖ مَّسۡنُونٖ وَٱلۡجَآنَّ خَلَقۡنَٰهُ مِن قَبۡلُ مِن نَّارِ ٱلسَّمُومِ
अल्लाह तआला ने इंसान को खनखनाती हुई मिट्टी से और जिन्नात को भड़कती हुई आग से पैदा किया। फ़रिश्तों ने आदम को सज्दा किया। शैतान सज्दा न करने की वजह से मरदूद हो (धुत्कार दिया) गया। उसने क़यामत तक की ज़िंदगी की मुहलत मांगी और इंसानों को गुमराह करने की क़सम खाली। (26, 39)
(iv) तीन वाक़िआत
(1) इब्राहीम अलैहिस्सलाम को फ़रिश्तों ने आकर बेटे (इस्हाक़) की ख़ुशख़बरी सुनाई। उस वक़्त उनकी पत्नी बहुत बूढ़ी थीं, वास्तव में यह pregnancy की उम्र न थी इसलिए आप को बेटे की ख़ुशख़बरी सुन कर ख़ुशी भी हुई और तअज्जुब भी और उनसे भी ज़्यादा तअज्जुब तो उनकी बीवी (सारा) को हुआ उनका तज़किरा सूरह 51 अज़ ज़ारियात आयत 29 में आया है
فَأَقۡبَلَتِ ٱمۡرَأَتُهُۥ فِي صَرَّةٖ فَصَكَّتۡ وَجۡهَهَاوَقَالَتۡ عَجُوزٌ عَقِيمٞ
तो (यह सुनते ही) इब्राहीम की बीवी (सारा) चिल्लाती हुई उनके सामने आयी और अपना मुँह पीट लिया। कहने लगीं (ऐ है) एक तो (मैं) बुढ़िया (उस पर) बांझ। फ़रिश्तों ने कहा हम आप को सच्ची ख़ुशख़बरी सुना रहे हैं। आप मायूस न हों तो इब्राहीम ने कहा
وَمَن يَقۡنَطُ مِن رَّحۡمَةِ رَبِّهِۦٓ إِلَّا ٱلضَّآلُّونَ
मायूस होना तो बस गुमराहों का काम हैं (51 से 56)
(2) फ़रिश्ते इब्राहीम अलैहिस्सलाम को ख़ुशख़बरी सुना कर लूत अलैहिस्सलाम के पास पहुंचे और उनसे दरख़ास्त की कि रातों रात अपने घर वालों (बीवी को छोड़ कर) और तमाम अहले ईमान को साथ लेकर इस बस्ती से निकल जाएं क्योंकि आपकी बस्ती के लोग सरकशी में हद से आगे बढ़ गए हैं इसलिए अल्लाह तआला ने उनके नापाक वजूद से ज़मीन को पाक करने का फ़ैसला कर लिया है, सुबह होते होते उनकी जड़ काट दी जाएगी। क़ौमे लूत का एक भयानक जुर्म यह था कि वह औरतों को छोड़ कर मर्दो से अपनी ख़ाहिशात पूरी करते थे यानी Homosexual समलैंगिक जैसी गंदगी के शिकार थे इसलिए जब अल्लाह तआला ने फ़रिश्तों को ख़ूबसूरत और हसीन नौजवानों की शक्ल में भेजा तो वह उनके साथ ज़्यादती करने की कोशिश करने लगे। लूत अलैहिस्सलाम डरे लेकिन फ़रिश्तों ने उनसे कहा, यह हम तक पहुंच ही नहीं सकेंगे। उसके बाद फ़रिश्ते चले गए और लूत अलैहिस्सलाम अहले ईमान के साथ बस्ती से निकल गए। और काफ़िरों पर नामनेट पत्थर बरसाए गए और इस क़ौम को अल्लाह ने लोगों के लिए निशाने इबरत बना दिया। मृत सागर (dead sea) वही है जिसमें आज भी कोई जीव जंतु नहीं पाए जाते। (57 से 75)
(3) इस सूरह का नाम अल हिज्र है। हिज्र वालों से मुराद क़ौमे समूद ही हैं। यह लोग ज़ुल्म व ज़्यादती के रास्ते पर चल पड़े थे और बार बार समझाने के बावजूद बुत परस्ती को छोड़ने के लिए किसी क़ीमत पर तैयार न थे, उन्हें मुख़्तलिफ़ मोअजिज़ात दिखाए गए। ख़ास तौर से चट्टान से ऊंटनी के जन्म लेने का वाक़िआ में ही क़ई मोअजिज़े शामिल थे। ऊंटनी का चट्टान से निकलना, निकलते ही गर्भवती (pregnant) होना, उसके आकार की असाधारण वृद्धि, बहुत ज़्यादा दूध देने वाली होना। लेकिन उनकी क़ौम बड़ी बदबख़्त निकली। मोअजिज़े की क़द्र करने के बजाय उल्टे ऊंटनी की दुश्मन हो गई। सालेह अलैहिस्सलाम के समझाने और मना करने के बावजूद एक दिन मौक़ा मिलते ही ऊंटनी को मार डाला। फिर क्या था यह भी अज़ाब की लपेट में आ गए। (80 से 84)
(v) मक्का के मुशरिकीन और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को तसल्ली दी गई है कि आप मुशरेकीन की बातों से परेशान न हों बल्कि अपने रब की हम्द व तस्बीह बयान करते रहें, सज्दा करने वालों में शामिल हो जाएं और ज़िंदगी की आख़िरी सांस तक अपने रब की इबादत करते रहें। (94 से 99)
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(2) सूरह (016) अन नहल मुकम्मल
(i) तौहीद
अल्लाह ने ज़मीन को फ़र्श और आसमान को छत बनाया, इंसान को नुत्फ़े से पैदा किया, चौपाए पैदा किए जिन के मुख़्तलिफ़ फ़ायदे हैं जिस से तुम गर्म कपड़े, गोबर और ख़ून के बीच से शुद्ध और पौष्टिक दूध और गोश्त हासिल करते हो, उसी ने घोड़े, ख़च्चर और गधे पैदा किए जो बोझ ढोने और सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के काम आते हैं, अल्लाह बारिश बरसाता है फिर उस बारिश से ज़ैतून, खुजूर, अंगूर और दूसरे बहूत से स्वादिष्ट फल, मेवे और अनाज वही पैदा करता है, रात और दिन, सूरज और चांद, और सितारों को उसी ने इंसान की ख़िदमत के लिए मुक़र्रर का रखा है। नदियों से ताज़ा गोश्त और ज़ेवर प्रदान (provide) करता है। ज़मीन को मौत के बाद ज़िन्दगी, समुद्र में कश्तियाँ और जहाज़ उसी के हुक्म से चलते हैं। इंसान की ज़िंदगी और मौत उसी के क़ब्ज़े में है। वही बेटे और पोतों के ज़रिए इंसानी नस्ल को आगे बढ़ाता है। बच्चे का मां के पेट से निकलना, उसकी आंख, नाक, कान और दीगर चीज़ें, परिंदों का आसमान में उड़ना, घर को सुकून, जंग के मैदान में जानवरों की खालों का घर, तमाम मख़लूक़ का साया (shadow), पहाड़ों की गुफायें, गर्मी ठण्ड और जंगों से महफूज़ रखने वाला लिबास यह सब अल्लाह की ही कारीगरी है। इसलिए अगर अल्लाह की नेअमतों को गिनना (counting) चाहो तो गिन नहीं सकते मगर इंसान बेशुमार इनआमात और एहसानात का शुक्र अदा करने के बजाय अल्लाह के मुक़ाबले में खड़ा होना चाहता है। (3 से 19, 65 से 67,72, 78 से 81)
(ii) रिसालत
रसूल हमेशा इंसान ही आते हैं अगर यक़ीन नहीं आता तो इंकार करने वाले ज़रा अपने उलेमा से पूछ लें कि पहले जो रसूल आये थे क्या वह इंसान नहीं थे। फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को तसल्ली दी गई कि आप सब्र कीजिए, कुफ़्फ़ार की चालों से ग़मगीन न हों, और दिलों में तंगी महसूस न करें। बेशक अल्लाह तक़वा इख़्तियार करने वालों और भलाई करने वालों के साथ है। (43, 127, 128)
(iii) शहद की मक्खी
अरबी में शहद की मक्खी को "नहल" कहते हैं इसी कारण सूरह का नाम "नहल" रखा गया है। शहद की मक्खी का system बड़ा अजीब व ग़रीब होता है। यह अल्लाह के हुक्म से पहाड़ों, दरख़्तों में अपना छत्ता बनाती है। यह मुख़्तलिफ़ क़िस्म के फलों और फूलों का रस चूसती है फिर पेट से शहद निकालती है जिसके रंग मुख़्तलिफ़ होते हैं और इसमें अल्लाह ने इंसानों की बीमारियों की शिफ़ा रखी है। (67, 68)
(iv) इब्राहीम अलैहिस्सलाम की तारीफ़ (प्रशंसा)
इब्राहीम अलैहिस्सलाम पूरी ज़िंदगी तौहीद पर जमे रहे। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इब्राहीम अलैहिस्सलाम की मिल्लत की पैरवी करने का हुक्म दिया गया है क्योंकि इब्राहीम अलैहिस्सलाम यहुदी या ईसाई न थे, मुशरिक न थे, बल्कि सच्चे और पक्के मुसलमान थे। अल्लाह के ख़ालिस बंदे थे, अल्लाह की नेअमतों पर शुक्र अदा करने वाले थे, उन्हें अल्लाह ने चुन लिया था, वह सिराते मुस्तक़ीम पर चलने और उसी की दावत देने वाले थे। (120, 123)
(v) दावत का तरीक़ा
दावत देते हुए मुख़्तलिफ़ दुशवार गुज़ार मराहिल से गुज़रना पड़ता है कभी कभी ग़ुस्सा और झुंझलाहट भी होती है इसलिए क़ुरआन में बताया गया है
ٱدۡعُ إِلَىٰ سَبِيلِ رَبِّكَ بِٱلۡحِكۡمَةِ وَٱلۡمَوۡعِظَةِ ٱلۡحَسَنَةِۖ وَجَٰدِلۡهُم بِٱلَّتِي هِيَ أَحۡسَنُۚ
दावत दो अपने रब के रास्ते की तरफ़ हिकमत और उमदः नसीहत के साथ और बहस में वह अंदाज़ इख़्तियार करो जो सबसे बेहतर हो। (125)
(vi) कुछ अहम बातें
◆अगर अल्लाह लोगों को उनकी ज़्यादती पर फ़ौरन ही पकड़ना शुरू कर दे तो इस ज़मीन पर कोई जानदार बाक़ी न रहे। लेकिन वह एक तयशुदा वक़्त तक मोहलत देता है, फिर जब वह वक़्त आ जाता है तो उससे कोई एक घड़ी भर भी आगे-पीछे नहीं हो सकता। (आयत 61)
◆ إِنَّ ٱللَّهَ يَأۡمُرُ بِٱلۡعَدۡلِ وَٱلۡإِحۡسَٰنِ وَإِيتَآيِٕ ذِي ٱلۡقُرۡبَىٰ وَيَنۡهَىٰ عَنِ ٱلۡفَحۡشَآءِ وَٱلۡمُنكَرِ وَٱلۡبَغۡيِۚ يَعِظُكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَذَكَّرُونَ
बेशक अल्लाह इन्साफ़ और भलाई करने और क़रीबी लोगों को (कुछ) देने का हुक्म देता है और बदकारी और बेहयाई की हरकतों और सरकशी करने से मना करता है (और) तुम्हें नसीहत करता है ताकि तुम नसीहत हासिल करो। (आयत 90)
यह आयत जुमा के दूसरे ख़ुत्बे में बिल्कुल आख़िर में अक्सर पढ़ी जाती है। इसे उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने शुरू किया था।
◆ मर्द हो या औरत, जो भी ईमान वाला अच्छा काम करेगा उसे हम दुनिया में पाकीज़ा ज़िन्दगी बसर कराएँगे और (आख़िरत में) ऐसे लोगों को बदला उनके बेहतरीन आमाल के मुताबिक़ देंगे। (आयत 97)
◆ فَإِذَا قَرَأۡتَ ٱلۡقُرۡءَانَ فَٱسۡتَعِذۡ بِٱللَّهِ مِنَ ٱلشَّيۡطَٰنِ ٱلرَّجِيمِ
जब क़ुरआन पढ़ो तो "औज़ुबिल्लाहि मिनस शैतानिर रजीम" (मैं शैतान मरदूद से अल्लाह की पनाह मांगता हूं) पढ़ो। (आयत 98)
◆ إِنَّمَا حَرَّمَ عَلَيْكُمُ الْمَيْتَةَ وَالدَّمَ وَلَحْمَ الْخِنزِيرِ وَمَا أُهِلَّ لِغَيْرِ اللَّهِ بِهِ ۖ فَمَنِ اضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍ وَلَا عَادٍ فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
तुम पर मुरदार, ख़ून, सूअर का गोश्त और वह जिस पर अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया जाए हराम किया है फिर जो शख़्स (भूख के कारण) मजबूर हो ख़ुदा से सरतापी (नाफरमानी) करने वाला न हो और न (हद से) बढ़ने वाला हो और (हराम खाए) तो बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है। (आयत 115)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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