Bachchon Mein Virtual Autism

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बच्चों में वर्चुअल ऑटिज़्म

आज हमारे घरों में एक ख़ामोश ज़हर फैल चुका है, जिसे मेडिकल साइंस 'वर्चुअल ऑटिज्म' (Virtual Autism) कह रही है। वालिदैन अपने आराम के लिए या बच्चे को चुप कराने के लिए उसके नन्हे हाथों में मोबाइल थमा देते हैं या टीवी चला देते हैं।

​ज़रा अपने दिल पर हाथ रखकर देखिए, क्या आपके छोटे बच्चे में ये अलामात (लक्षण) दिखने लगे हैं?

  • ​क्या उम्र होने के बाद भी उसने बोलना शुरू नहीं किया?
  • ​क्या आपको देखकर मुस्कुराता नहीं और आँखों में आँखें (Eye Contact) नहीं डालता?
  • ​नाम पुकारने पर भी मुड़कर नहीं देखता, जैसे सुन ही न रहा हो?
  • ​सलाम, बाय-बाय या कोई सामाजिक इशारा (Social Interaction) नहीं करता?
  • ​अपने में ही गुम रहता है, बिना किसी दोस्त या माँ-बाप के घंटों एक ही खिलौने से खेलता रहता है?
  • ​इंसानों की बातें बोलने के बजाय सिर्फ़ कार्टून की 'Rhymes' या अजीब आवाज़ें दोहराता रहता है?
  • ​और सबसे बड़ा सवाल - क्या वह रोज़ाना 2 से 4 घंटे टीवी, यूट्यूब या मोबाइल स्क्रीन देखता है?

​अगर हाँ, तो संभल जाइए! आपने अनजाने में अपने बच्चे के नाज़ुक दिमाग़ को स्क्रीन की तेज़ रोशनी, अंधी रफ़्तार और तेज़ म्यूज़िक के ओवर-स्टिम्युलेशन (Over-stimulation) में झोंक दिया है, जिससे उसके दिमाग़ का क़ुदरती विकास रुक चुका है!

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वालिदैन की ज़िम्मेदारी और अल्लाह का ख़ौफ़:

​यह कोई पैदाइशी बीमारी नहीं, बल्कि स्क्रीन की लत का नतीजा है। बहुत से लोग इसके बारे में जानते ही नहीं और जब तक पता चलता है, पानी सर से गुज़र चुका होता है।

​याद रखिए, क़ियामत के दिन इस लापरवाही का पहला हिसाब आपसे होगा।

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "तुम में से हर शख़्स अपने मातहतों का हाकिम (निगहबान) है, और हर एक से उसकी रियाया (औलाद/ज़िम्मेदारी) के बारे में सवाल किया जाएगा।" (सहीह बुख़ारी: 2409, सहीह मुस्लिम: 1829)

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अब फ़ौरन क्या करना है? (5 ज़रूरी क़दम):

1. ​स्क्रीन टाइम फ़ौरन 'ज़ीरो' (0) कर दें: टीवी, मोबाइल, टैबलेट पूरी तरह बंद! बच्चा रोएगा, ज़िद करेगा, चिड़चिड़ा होगा, लेकिन उसके ज़िद के आगे झुकना उसकी अक़्ल का सौदा करना है।

2. ​बच्चे से लगातार बातें करें: हर चीज़ का नाम बताएं, छोटे-छोटे जुमले (Sentences) उसके सामने बार-बार दोहराएं ताकि उसके कानों में इंसानी आवाज़ पड़े।

3. ​तस्वीरों वाली किताबें और आउटडोर वक़्त: उसे रोज़ बाहर ले जाएं। बड़ी-बड़ी तस्वीरों वाली बुक्स खोलकर अपनी ज़बान में कहानियां सुनाएं ताकि वह नई ज़बान सीखे।

4. ​क़ुदरती चीज़ों से खेलने दें: प्लास्टिक और स्क्रीन छोड़िए - उसे पानी, मिट्टी, घर के बर्तनों, सब्ज़ियों और फलों को छूने और महसूस करने दें।

5. ​घर के हर काम में शामिल करें: झाड़ू, कपड़े समेटना या खाना पकाना -आसान अलफ़ाज़ में उससे बात करते हुए उसे साथ रखें।

6. उसे क़ुरआन की तिलावत करके सुनायें, और कसरत से अस्तग़फार करें और अल्लाह से उसके सेहत के लिए कसरत से दुआ करें!

शुरू के 2-3 हफ़्ते बहुत तकलीफ़देह होंगे, बच्चा परेशान करेगा। लेकिन अगर आज आपने अपना सुकून देखा और उसे फिर स्क्रीन के हवाले कर दिया, तो 2 साल तो आपका बड़ा आराम से कट जाएगा। लेकिन उसके बाद जब यह दिमागी नुक़सान 'नाक़ाबिल-ए-तलाफ़ी' (Irreversible) हो जाएगा, तब ज़िंदगी भर सिर्फ़ पछतावा और रोना रह जाएगा!

​वक़्त के साथ बच्चे का जिस्म तो बढ़ जाएगा, लेकिन उसका दिमाग़ वहीं ठहर जाएगा। क्या आप चंद मिनटों के आराम के लिए अपने बच्चे के मुस्तक़बिल और अक़्ल की क़ुरबानी दे रहे हैं?

​आज ही स्क्रीन छीनिए, अपने बच्चे को अपना वक़्त दीजिए, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए!

​इस बेहद ज़रूरी और आँखें खोल देने वाले पैग़ाम को हर वालिदैन तक शेयर करें, अपने स्टेटस पर लगाएं।


By Team islamic Theology

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