नमाज़ में नमाज़ियों की ख़ताएँ!!
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है। सब तारीफ़े अल्लाह तआला के लिए हैं जो सारे जहान का पालनहार है। हम उसी से मदद व माफ़ी चाहते हैं। अल्लाह की लातादाद सलामती, रहमतें व बरकतें नाज़िल हों मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर आप की आल व औलाद और असहाब रज़ियल्लाहु अन्हुम पर! व बअद!
नमाज़ दीन ए इस्लाम के पाँच बुनियादी अरकान में से एक है। यह इबादत में सबसे अहम इबादत है। शायद यही वजह रही कि तमाम इबादत की फ़र्ज़ीयत अल्लाह ने ज़मीन पर नाज़िल की मगर नमाज़ को फ़र्ज़ किया अपने हबीब मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपने पास आसमानों से ऊपर बुलाकर।
नमाज़ की अहमियत के बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“क़यामत के दिन बन्दे से सबसे पहले नमाज़ का हिसाब लिया जाएगा और अगर वह ठीक तरह से अदा की गई होगी तो वह कामयाब हो जाएगा और अगर वह ठीक न निकली तो बन्दा ज़लील व नुक़सान उठाने वाला होगा।” (नसाई 46, तिर्मिज़ी 413 सहीह)
“क़यामत के दिन बन्दे से सबसे पहले नमाज़ का हिसाब लिया जाएगा। अगर नमाज़ सही तौर पर अदा की गई होगी तो बाक़ी सारे आमाल भी सही मान लिये जाएंगे और अगर नमाज़ ख़राब निकली तो बाक़ी के आमाल भी ख़राब माने जाएंगे।” (तबरानी, सिलसिला अहादीस सहीहा 1358)
नमाज़ सही तभी होगी जब हम उसे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बताए सिखलाए तरीक़े के मुताबिक़ पढ़ेंगे इसलिए कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
“तुम्हारे लिए रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम में बेहतरीन नमूना मौजूद है, हर उस शख़्स के लिए जो अल्लाह से मिलने की और क़यामत की उम्मीद रखता हो।” (अहज़ाब आयत 21)
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह भी फ़रमाया:
“तुम नमाज़ उस तरह पढ़ना, जिस तरह नमाज़ पढ़ते तुमने मुझे देखा है।” (मुस्लिम 885, बुख़ारी 757, अबुदाऊद 856, नसाई 883)
और यह कि:
“बन्दा नमाज़ पढ़ता है मगर कभी सवाब के दसवें हिस्से का हक़दार होता है, कभी नवें का, कभी आठवें का, कभी सातवें, कभी छठे हिस्से का, कभी पाँचवें का तो कभी चौथे का, कभी तीसरे का तो कभी आधे सवाब का।” (सहीह अबुदाऊद 761, नसाई सहीह)
ज़ाहिर है नमाज़ के सवाब में कमी की वजह सिर्फ़ यह है कि हम से नमाज़ में कुछ कमी या ग़लती हो जाती है जो अक्सर भूल या कम इल्मी की बिना पर होती है। मगर नुक़सान तो हो ही जाता है। इस फ़ोल्डर में नमाज़ में नमाज़ियों की कुछ ऐसी ही ख़ताएँ ज़िक्र की जा रही हैं जो नज़र आती हैं और मक़सद सिर्फ़ यह है कि हम उन से बचें और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत के मुताबिक़ अपनी नमाज़ें अदा करें। ताकि क़यामत के दिन वह क़ुबूल कर ली जाएँ और हमारा नुक़सान न हो। अल्लाह हमें इसकी तौफ़ीक़ दे।
I. लिबास में ख़ताएँ
(1) तंग लिबास में नमाज़ पढ़ना
कुछ लोग बेहद तंग कपड़ों में नमाज़ पढ़ते हैं، जिसकी वजह से उनके लिए सज्दा करना भी मुश्किल हो जाता है। कुछ लोग पेन्ट पर शर्ट इतनी छोटी पहनते हैं कि दौरान नमाज़ जब वह रुकूअ या सज्दा करते हैं तो शर्ट इतनी ऊपर सरक जाती है कि सतर का कुछ हिस्सा नंगा हो जाता है जबकि सतर का ढका होना नमाज़ के सही होने की शर्तों में से एक ज़रूरी शर्त है।
(2) बारीक व पतले कपड़ों में नमाज़ पढ़ना
कुछ लोग बहुत पतले व बारीक कपड़ों में नमाज़ पढ़ते हैं, ख़ासकर गर्मियों में, जबकि नमाज़ के सही होने की शर्तों में फ़ुक़हा के नज़दीक यह भी है कि लिबास ऐसा हो जिससे जिल्द का रंग और जिस्म की बनावट मालूम न हो।
(दीन अलख़ालिस जिल्द 2 सफ़ा 101)
इस बारे में औरतों का मामला ज़्यादा संगीन है क्योंकि उनके लिए तो आम हालात में भी यह जाइज़ नहीं कि उनके लिबास में से उनके जिस्म के ख़ास हिस्से नज़र आएँ।
(3) कंधे खुले रख कर नमाज़ पढ़ना
कुछ हज़रात बिना आस्तीन के बनियान ही में नमाज़ अदा कर लेते हैं जबकि नमाज़ में कंधों का ढका होना ज़रूरी है जैसा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“तुम में से कोई शख़्स एक ही कपड़ा लपेट कर इस तरह नमाज़ न पढ़े कि उसके कंधे खुले हों।”
(बुख़ारी 359, मुस्लिम 1151, अबुदाऊद 626, नसाई 768)
(4) कपड़ा टख़नों से नीचे लटकाना
लुंगी हो या शलवार, पेन्ट हो या पायजामा या फिर लम्बा जुब्बा चाहे जो हो।
“अल्लाह उस शख़्स की तरफ़ नहीं देखता जो अपने तहबन्द को तकब्बुर की वजह से घसीटता हो।” (सहीह इब्ने ख़ुजैमा जिल्द सफ़ा 382)
और “जो शख़्स अपनी नमाज़ में तकब्बुर की वजह से टख़नों से नीचे कपड़ा लटकाए तो वह अल्लाह तआला से बेतअल्लुक़ हो गया।” (अबु दाऊद 637 सहीह)
इसका एक नुक़सान यह भी है कि “अल्लाह उस आदमी की नमाज़ क़ुबूल नहीं करता जिसने अपने इज़ार पायजामा, पेन्ट या लुंगी को टख़नों से नीचे लटकाया हुआ हो।” (अबुदाऊद 638 सहीह)
II. नमाज़ियों की जायनमाज़ में ग़लतियाँ
जायनमाज़ से मुराद वह जगह है जहाँ कोई नमाज़ पढ़ता है।
(1) ऐसी जगह नमाज़ पढ़ना जहाँ तस्वीरें हों
तस्वीरें नमाज़ी की तवज्जोह अपनी तरफ़ माइल करती हैं और नमाज़ी का ध्यान नमाज़ से हटाती हैं। इसलिए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऐसे पर्दे को हटाने का हुक्म दिया जिसमें जानदार की तस्वीरें थीं।
“आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह भी फ़रमाया कि फ़रिश्ते उस घर में दाख़िल नहीं होते, जहाँ तस्वीरें हों।” (मुस्लिम 2106, नसाई 764, बुख़ारी 5960)
(2) क़ब्र पर या क़ब्र की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ना
कुछ लोग क़ब्रों के सामने खड़े होकर नमाज़ अदा करते हैं तो कुछ क़ब्रों को ही सज्दागाह बना लेते हैं। या फिर जिस मस्जिद में क़ब्र हो वहाँ नमाज़ पढ़ना ज़्यादा बेहतर समझते हैं। जबकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“ख़बरदार! तुम से पहले लोग अपने नबियों की क़ब्रों को मस्जिद बना लेते थे। तुम क़ब्रों को सज्दागाह न बनाना।” (मुस्लिम 1188)
यह भी कि “तुम क़ब्रों पर मत बैठना और न उसकी तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ना।” (मुस्लिम 2250, अबुदाऊद 3229, नसाई 763)
(3) मस्जिद में किसी जगह को अपने लिए ख़ास कर लेना
यह भी एक ख़ता है इसलिए कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने “कव्वे के चोंच मारने की तरह जल्दी जल्दी सज्दा करने से, दरिन्दों की तरह अपने बाज़ू ज़मीन पर बिछाने से और मस्जिद में किसी जगह को अपने लिए ख़ास कर लेने से मना फ़रमाया है। जैसा कि ऊँट एक जगह को अपने लिए ख़ास कर लेता है।” (अबुदाऊद 862, नसाई 1115, इब्ने माजा 1426 सहीह)
(4) बग़ैर सुतरह के नमाज़ पढ़ना
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“तुम सुतरह की तरफ़ ही नमाज़ पढ़ा करो और किसी को अपने सामने से गुज़रने मत दो। अगर कोई जबरदस्ती गुज़रना चाहे तो उसे रोको (उससे झगड़ा करो) क्योंकि उसके साथ शैतान है।” (मुस्लिम 1128, नसाई 756, इब्ने माजा 954, अबु दाऊद 697)
और यह कि:
“जब तुम में से कोई शख़्स अपने सामने पालान की पिछली लकड़ी के बराबर कोई चीज़ रख ले तो वह नमाज़ पढ़ ले। फिर उसके पीछे से कोई भी गुज़रे, वह उसकी परवाह न करे।” (मुस्लिम 1111, अबुदाऊद 685, इब्ने माजा 940)
इमाम का सुतराह नमाज़ियों का सुतराह होता है। लिहाज़ा अगर कोई शख़्स दौरान जमाअत सफ़ों के बीच से गुज़रे तो उसमें कोई हरज नहीं। (बुख़ारी 376, मुस्लिम 405)
III. नमाज़ में नमाज़ियों की ख़ताएँ
(1) नीयत के अल्फ़ाज़ ज़बान से अदा करना
नीयत दिल के इरादे का नाम है। अगर नीयत ज़बान के साथ करना ज़रूरी होता तो उसके अल्फ़ाज़ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने असहाब को ज़रूर सिखलाते और वह अरबी ज़बान में होते। लेकिन किसी भी सही हदीस में तो क्या किसी ज़ईफ़ रिवायत में भी इस मुरव्वजा ज़बानी नीयत का सबूत नहीं मिलता। इसलिए बहुत से अहले इल्म ने इस ज़बानी नीयत को बिदअत कहा है हत्ता कि इमाम अबि अल उज़ हनफ़ी रह. कहते हैं कि “चारों इमामों में से किसी ने भी ज़बान से नीयत करने के लिए नहीं कहा। बल्कि उन सब का इत्तेफ़ाक़ है कि नीयत की जगह दिल है।” (अल इत्तेबाअ सफ़ा 62)
और इमाम इब्ने क़य्यिम रह. कहते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब नमाज़ को खड़े होते तो तकबीर अल्लाहु अकबर कह कर नमाज़ शुरू करते। ऐसा कभी नहीं हुआ कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़बान से नीयत की हो और न ही आपने कभी यूँ कहा कि मैं नमाज़ पढ़ता हूँ अल्लाह के लिए फ़ला नमाज़ मुँह तरफ़ काबे के चार या दो रकआत इमाम या मुक़्तदी, अदा या क़ज़ा, फ़र्ज़ या नफ़िल। ये दस बिदआत हैं जिनका एक लफ़्ज़ भी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से साबित नहीं है। न किसी सहाबी से मरवी है और न किसी ताबई या इमाम से। अगर कुछ मिलता है तो यह कि “आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नमाज़ की शुरुआत अल्लाहु अकबर से करते थे।” (मुस्लिम 868, बुख़ारी 789, नसाई 1149)
(2) नीयत करते वक़्त हाथों से कानों को छूना
हाथों से कानों को छूने का ज़िक्र किसी सही हदीस में तो क्या किसी ज़ईफ़ या मौज़ूअ मनगढ़त रिवायत में भी नहीं है। सही हदीस में तो यह है कि “आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब नमाज़ शुरू करते तो अपने दोनों हाथों को उठाते हत्ता कि आप के कंधों के बराबर आ जाते।” (बुख़ारी 735, अबु दाऊद 721, मुस्लिम 861, नसाई 881)
या यह कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमाज़ शुरू करते वक़्त “अल्लाहु अकबर” कहा और अपने हाथ अपने कानों तक उठाए।n(अबुदाऊद 726, नसाई 882, इब्ने माजा 867, मुस्लिम 896)
(3) नमाज़ में आसमान की तरफ़ नज़र उठाना
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“लोग आसमान की तरफ़ (नमाज़ में) नज़र उठाने से बाज़ आ जाएँ। वरना उन की नज़रें उचक ली जाएँगी।” (बुख़ारी 750, मुस्लिम 966, अबुदाऊद 912)
(4) ग़ैर ज़रूरी हरकतें करना
कुछ लोग नमाज़ के दौरान जिस्म के बअज़ हिस्सों को खुजाते हैं तो कभी दाढ़ी में हाथ फेरने लगते हैं कोई घड़ी देखने लगता है तो कोई उंगलियाँ चटखाता है तो कोई अपने कपड़े सँवारते नज़र आता है, ये सब बातें ख़ुशूअ व ख़ुज़ूअ के ख़िलाफ़ हैं। नमाज़ इन्किसारी व यकसूई के साथ अदा करना चाहिये। (मुस्लिम 968, अबुदाऊद 889, इब्ने माजा 967)
(5) अरकाने नमाज़ जल्दी जल्दी अदा करना
कुछ लोग रुकूअ में जाते हैं तो पीठ व सर को बराबर किये बिना ही जल्दी से खड़े हो जाते हैं और कभी रुकूअ से उठ कर सीधे खड़े भी नहीं हो पाते कि सज्दे में चले जाते हैं। दोनों सज्दों में भी जल्दी करते हैं। दो सज्दों के बीच दुआ पढ़ना तो दूर इत्मीनान से बैठते भी नहीं, फिर दूसरा सज्दा करने के बाद बिना जलसा ए इस्तिराहत किये सीधे खड़े हो जाते हैं। यह जल्दबाज़ी नमाज़ की रूह के ख़िलाफ़ है।
ऐसी नमाज़ के बारे में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“किसी आदमी की नमाज़ किफ़ायत नहीं करती यहाँ तक कि वह रुकूअ व सज्दों में अपनी पीठ को सीधा करे।” (अबुदाऊद 855, इब्ने माजा 870, नसाई 1028 सहीह)
और फ़रमाया:
“जो शख़्स नमाज़ में अपने रुकूअ व सज्दों को मुकम्मल नहीं करता या रुकूअ व सज्दों में अपनी पीठ को सीधा नहीं करता वह बदतरीन चोर है।” (अहमद 22695 सहीह)
एक शख़्स जिसने जल्दी जल्दी नमाज़ पढ़ी थी से आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“वापिस जाओ, नमाज़ पढ़ो क्योंकि तुमने नमाज़ नहीं पढ़ी।” और उसे तीन बार लौटाया। (बुख़ारी 793)
(6) सात अअज़ा पर सज्दा न करना
कुछ लोग सज्दे में अपनी नाक ज़मीन पर नहीं टिकाते तो कुछ अपने पैर या पैरों की उंगलियाँ ज़मीन से ऊपर उठा लेते हैं जो ग़लत है इसलिए कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“मुझे हुक्म दिया गया है कि सात 7 हड्डियों पर सज्दा करूँ। पेशानी व नाक, दो हाथों, दोनों घुटनों और दोनों पैरों की उंगलियों पर।” (बुख़ारी 812, मुस्लिम 1097) (नसाई 1095, इब्ने माजा 884)
(7) सज्दे में अपने बाज़ुओं को ज़मीन पर बिछाना
यह इसलिए ग़लत है क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“तुममें से कोई शख़्स अपने बाज़ुओं को इस तरह न बिछाए जैसे कुत्ता बिछाता है।” (बुख़ारी 822, मुस्लिम 1102, अबुदाऊद 897, नसाई 1109)
(8) तशह्हुद में कलमा ए शहादत पर उंगली उठाना
तशह्हुद पढ़ते हुए ‘अशहदु’ पर उंगली उठाना व ‘इल्लल्लाह’ पर गिरा देना। यह न आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का हुक्म है और न अमल। बल्कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पूरे तशह्हुद में शहादत की उंगली को उठाये रखते थे। (अहमद 6153, इब्ने खुज़ैमा 717 सहीह, मुस्लिम 1309, इब्ने माजा 913)
और “उसे हरकत देते हुए उसके साथ दुआ करते थे।” (अहमद 6000, नसाई 1164, अबुदाऊद 988 सहीह)
(9) सही हदीस पर अमल न करना
कुछ लोग सही हदीस का इल्म हो जाने के बाद भी अपने अमल में बदलाव नहीं लाते। वह जो करते आए हैं उसी पर जमे रहते हैं। जबकि इर्शादे बारी तआला है:
“अल्लाह की इताअत करो और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पैरवी करो और इनके मुक़ाबले में किसी और की पैरवी करके अपने आमाल को ज़ाया न करो।” (सूरह मुहम्मद आयत 33)
और यह कि “रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत, अल्लाह ही की इताअत है।” (निसा आयत 80)
IV. बा जमाअत नमाज़ में ग़लतियाँ
(1) जमाअत के साथ मिलने के लिए दौड़ते हुए आना
इस अमल के ग़लत होने की दलील आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यह फ़रमान है:
“जब तुम अक़ामत की आवाज़ सुन लो तो नमाज़ की तरफ़ पुरसुकून व बावक़ार अन्दाज़ में चल कर आओ और जल्दी न करो। फिर तुम जो नमाज़ (इमाम के साथ) पाओ वह पढ़ लो और जो नमाज़ तुम से छूट जाए उसे (इमाम के सलाम फेर लेने के बाद) पूरा कर लो।” (मुस्लिम 1359, बुख़ारी 635, नसाई 864, अबुदाऊद 672)
(2) सफ़ों को सीधा न करना या मिल कर खड़ा न होना
यह इसलिए ग़लत है क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान है:
“तुम सफ़ें बराबर करो क्योंकि सफ़ें बराबर करना नमाज़ को क़ायम करना है।” (बुख़ारी 723)
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सफ़ों को इस तरह सीधा करते थे जैसे आप उनके साथ तीर की लकड़ी को सीधा कर रहे हों। (मुस्लिम 979)
सफ़ों को सीधा करते हुए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते:
“तुम बराबर हो जाओ और आगे पीछे न हटो। वरना तुम्हारे दिलों में फूट पड़ जाएगी।” (मुस्लिम 972, नसाई 806)
“तुम सफ़ें सीधी करो, कंधों को बराबर करो और ख़ाली जगह को पूरा करो। अपने भाइयों को सफ़ में मिलने का मौक़ा दो और शैतान के लिए ख़ाली जगहें न छोड़ो।” (अबुदाऊद 666, नसाई 820, इब्ने खुज़ैमा 1549)
“जो शख़्स ख़ाली जगह को भरता है तो अल्लाह इस अमल की वजह से उसका एक दर्जा बुलन्द कर देता है और उसके लिए जन्नत में एक घर बनाता है।” (तबरानी सहीह)
(3) दौरान अक़ामत ‘मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह’ सुनकर अंगूठे चूमना या सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कहना
इसलिए कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“जब मुअज़्ज़िन (अज़ान हो या अक़ामत) अश्हदु अन्ना मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह कहे तो सुनने वाला भी इन्हीं कलिमात को दोहराए।” (मुस्लिम 850, अबुदाऊद 527)
(4) अक़ामत होने के बाद सुन्नतें शुरू करना या जारी रखना
यह अमल इसलिए ख़ता है क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“जब नमाज़ की अक़ामत कह दी जाए तो फिर कोई नमाज़ नहीं होती, सिवाए फ़र्ज़ नमाज़ के।” (मुस्लिम 1646, अबुदाऊद 1266, नसाई 864, अहमद 9874, इब्ने माजा 1151)
रही फ़ज्र की सुन्नतें तो अगर वह फ़र्ज़ नमाज़ से पहले न पढ़ी जा सकें तो उन्हें नमाज़ के फ़ौरन बाद भी पढ़ा जा सकता है। (तिर्मिज़ी 422 सहीह, इब्ने माजा 1154, अबुदाऊद 1267, अहमद 24161)
(5) इमाम से पहले आमाले नमाज़ अदा करना
यह भी एक ख़ता है इसलिए कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“ऐ लोगो! मैं तुम्हारा इमाम हूँ। लिहाज़ा तुम मुझसे पहल न करो। रुकूअ में न सज्दे में और न क़ौमा क़याम में न सलाम फेरने में।” (मुस्लिम 961, नसाई 1362)
और “जो शख़्स इमाम से पहले अपना सर उठाता है वह इस बात से डरे कि कहीं उसके सर को अल्लाह गधे के सर में न बदल दे।” (बुख़ारी 691, मुस्लिम 964, नसाई 827)
(6) प्याज़, लहसन खाकर मस्जिद में आना
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि:
“जो शख़्स कच्चा लहसन, या प्याज़ खाए तो वह हम से दूर रहे यानी मस्जिद में न आए।” (बुख़ारी 855, मुस्लिम 1253, अबुदाऊद 3822)
इसी ज़मन में बीड़ी व सिगरेट भी आते हैं तो जो इनका सेवन करे, उसे चाहिये कि मस्जिद जाने से पहले मुँह की बदबू को ज़ायल करे (ब्रश या मिस्वाक के ज़रिये) ताकि नमाज़ियों व फ़रिश्तों को परेशानी न हो। या फिर इस बुरी लत को छोड़ दें। नमाज़ियों व फ़रिश्तों की परेशानी का सबब न बनें।
(7) दौरान नमाज़ ऊँची आवाज़ से अज़कार व दुआएँ पढ़ना
दलील: “ख़बरदार! तुम में से हर एक अपने रब से सरगोशी करता है लिहाज़ा कोई किसी को तकलीफ़ न दे और न कोई किसी पर क़िराअत के साथ आवाज़ को बुलन्द करे।” (अबुदाऊद सहीह)
(8) मोबाइल फ़ोन को खुला छोड़ देना
यह भी एक ख़ता है जो साथी नमाज़ियों की परेशानी का सबब बनती है। अगर दौरान नमाज़ कोई फ़ोन आ जाए तो इससे नमाज़ में जो ख़लल पैदा होता है और नमाज़ियों को जो परेशानी महसूस होती है, उसे हर कोई जानता समझता है।
(9) सलाम फेरते ही अपनी जगह छोड़ देना
कुछ लोग इमाम के सलाम फेरते ही अपनी जगह छोड़ कर चले जाते हैं। जिस की वजह से एक फ़ज़ीलत पाने से महरूम हो जाते हैं। जैसा कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“तुम में से कोई जब तक अपनी नमाज़ की जगह पर बैठा रहता है, फ़रिश्ते उसके लिए दुआ करते रहते हैं। वह कहते हैं ‘ऐ अल्लाह! इस पर रहम फ़रमा! ऐ अल्लाह! इसकी मग़फ़िरत फ़रमा और ऐ अल्लाह! इसकी तौबा क़ुबूल कर।’ फ़रिश्ते इसी तरह दुआ करते रहते हैं जब तक वह किसी को तकलीफ़ न दे उसी जगह बैठा रहे या उसका वुज़ू न टूट जाए।” (बुख़ारी 2116, अबुदाऊद 469)
अल्लाह हम सभी को नमाज़ी बनाए और हमें अपने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बतलाए सिखलाए तरीक़े के मुताबिक़ नमाज़ पढ़ने की तौफ़ीक़ दे ताकि हमें हमारी नमाज़ों का पूरा पूरा अज्र व सवाब मिल सके।
अहले इल्म हज़रात अगर कहीं ग़लती पाएँ तो ज़रूर हमारी इस्लाह करें...
جَزَاكَ اللهُ خَيْــرًا
Team Islamic Theology

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