इल्म की अहमियत
A. इल्म से रोकने के बहाने
1. "बहुत ज़्यादा इल्म अच्छा नहीं"
अगर ज़्यादा इल्म अच्छा नहीं है तो अल्लाह ने हमें इल्म में इज़ाफ़े के लिए क्यों कहा?
अल्लाह तआला ने फ़रमाया,
وَقُلْ رَّبِّ زِدْنِي عِلْمًا
"और कहो, ऐ मेरे रब! मेरे इल्म में इज़ाफ़ा कर।" [सूरह ताहा 20:114]
2. "हम जाहिल ही बेहतर हैं"
अल्लाह तआला ने फ़रमाया,
وَإِذْ قَالَ مُوسَى لِقَوْمِهِ إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَنْ تَذْبَحُوا بَقَرَةً قَالُوا أَتَتَّخِذُنَا هُزُواً قَالَ أَعُوْذُ بِاللَّهِ أَنْ أَكُونَ مِنَ الْجَاهِلِينَ
"और जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा: बेशक अल्लाह आपसे एक गाय ज़बह करने का हुक्म देता है, तो उन्होंने कहा: क्या आप हमसे मज़ाक़ करते हैं? (मूसा) ने कहा: मैं अल्लाह की पनाह चाहता हूँ इससे कि मैं जाहिलों में से बनूँ।" [सूरह अल बक़रह 02:67]
فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْجَاهِلِينَ
अल्लाह ने क़ुरआन में फ़रमाया, "आप जाहिलों में से हरगिज़ न होना।" [सूरह अल अनआम 6:35]
अल्लाह ने जाहिलियत की मज़म्मत की है।
क्या हम दुनिया के बारे में भी यही कहते हैं?3. "इल्म से भागना जवाबदेही से नहीं बचाता।"
अगर हम इल्म हासिल करेंगे तो इसका जवाब देना पड़ेगा, लेकिन अगर जाहिल रहेंगे तो हम कह सकते हैं कि हमें इसके बारे में मालूम नहीं था और महफ़ूज़ हो जाएंगे।
अल्लाह ने क़ुरआन में फ़रमाया,
وَقَالُوْا لَوْ كُنَّا نَسْمَعُ أَوْ نَعْقِلُ مَا كُنَّا فِي أَصْحَابِ السَّعِيرِ
"और कहेंगे कि काश हम सुनते या समझते तो दोज़ख़ियों में (शरीक) न होते!" [सूरह अल मुल्क 67:10]
वो जहन्नम की आग में होंगे और ख़्वाहिश करेंगे कि काश वो सुनते और अक़्ल के इस्तेमाल करने से न रुके होते यानी इल्म के हासिल करने से तो हम ऐसी बातें कहकर अल्लाह को धोखा नहीं दे सकते। अल्लाह जानता है कि ऐसा शख़्स ख़ुद जाहिल होने का इंतिख़ाब कर रहा है। मिसाल के तौर पर एक शख़्स सो नहीं रहा है बल्कि सिर्फ़ सोने की एक्टिंग कर रहा है या ऐसा शख़्स जो अज़ान सुनता है और कानों में उँगलियाँ डालता है, क्योंकि अगर वो अज़ान सुनता है तो उसे नमाज़ पढ़ने जाना पड़ेगा। क्या ऐसी चीज़ से वो अल्लाह को धोखा दे सकता है?
4. "हमें सिर्फ़ दुनियावी इल्म सीखना चाहिए।"
रसूलुल्लाह ﷺ का फ़रमान है:
سَلُوا اللَّهَ عِلْمًا نَافِعًا وَتَعَوَّذُوْا بِاللَّهِ مِنْ عِلْمٍ لَا يَنْفَعُ
"अल्लाह से मुफ़ीद इल्म माँगो और बेफ़ायदा इल्म से अल्लाह की पनाह माँगो"
रावी: जाबिर رضي الله عنه
[इब्न माजा: 3843, सहीह अल जामिअ: 3635, हसन]
हर फ़ायदेमंद इल्म हमारा इल्म है, और फ़ायदेमंद इल्म आदमी को उसकी ज़िंदगी के मक़सद और ख़ालिक़ को समझने में मदद करता है और यक़ीनन इस्लाम के नज़रिये से वो आदमी जाहिल है जो दुनिया की हर चीज़ जानता हो लेकिन ये न जानता हो कि उसका ख़ालिक़ कौन है और वो क्या कर सकता है।
B. इल्म की अहमियत
1. पहली वह़ी इल्म के ताल्लुक़ से थी।
अल्लाह तआला का इरशाद है,
اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ ، خَلَقَ الْإِنْسَانَ مِنْ عَلَقٍ . اقْرَأْ وَرَبُّكَ الْأَكْرَمُ . الَّذِي عَلَّمَ بِالْقَلَمِ .
عَلَّمَ الْإِنْسَانَ مَا لَمْ يَعْلَمْ
"पढ़ अपने रब के नाम से, जिसने इंसान को ख़ून के लोथड़े से पैदा किया, पढ़ तेरा रब बड़ा ही बुज़ुर्ग है, जिसने क़लम से इंसान को वो सिखाया जो वो नहीं जानता था।" [क़ुरआन, सूरह अल अलक़ 96:1 5]
2. इल्म दुनिया में नेकी का बदला है।
रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं:
مَنْ يُرِدِ اللَّهُ بِهِ خَيْرًا يُفَقِّهْهُ فِي الدِّينِ
"जिसके साथ अल्लाह भलाई का इरादा करता है उसको दीन की समझ अता करता है।"
रावी: मुआवियह رضي الله عنه
[सहीह बुख़ारी 71, किताब अल इल्म]
3. इल्म हासिल करना फ़र्ज़ है।
रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं:
طَلَبُ العِلْمِ فَرِيْضَةٌ عَلَى كُلِّ مُسْلِمٍ وَ إِنَّ طَالِبَ العِلْمِ يَسْتَغْفِرُ لَهُ كُلُّ شَيْءٍ حَتَّى الحِيتَانُ فِي البَحْرِ
"इल्म हासिल करना हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है और यक़ीनन तालिब ए इल्म के लिए सारी मख़लूक़ मग़फ़िरत की दुआ करती है, यहाँ तक कि समंदर में मछली भी।"
रावी: अनस رضي الله عنه
[जामे बयान अल आलिम, सहीह अल जामिअ: 3914, सहीह]
4. इबादत पर इल्म की फ़ज़ीलत
रसूलुल्लाह ﷺ का फ़रमान है:
فَضْلُ العِلمِ أَحَبُّ إِلَيَّ مِنْ فَضْلِ العِبَادَةِ وَخَيْرُ دِينِكُمُ الوَرَعُ
"इल्म में इज़ाफ़ा मुझे (नफ़्ली) इबादत में इज़ाफ़े से ज़्यादा पसंद है। और तुम्हारे दीन की सबसे बेहतरीन चीज़ तक़वा है।"
रावी: हुज़ैफ़ह رضي الله عنه
[मुस्नद अत तयालिसी, सअद رضي الله عنه, हाकिम 314, सहीह अल जामिअ 4214, सहीहा]
C. इल्म हासिल करने की फ़ज़ीलत
1. इल्म हासिल करने वाले के लिए जन्नत का रास्ता आसान कर दिया जाता है।
रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं:
مَنْ سَلَكَ طَرِيقًا يَلْتَمِسُ فِيْهِ عِلْمًا سَهَّلَ اللَّهُ لَهُ بِهِ طَرِيقًا إِلَى الْجَنَّةِ
"जो इल्म की तलाश में निकलेगा अल्लाह उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान कर देगा।"
रावी: अबू हुरैरह رضي الله عنه
[मुस्नद अहमद, मुस्लिम: 6518, तिर्मिज़ी 2646, सहीह अल जामिअ: 6577]
2. फ़रिश्ते उसकी इज़्ज़त करते हैं जो तलब ए इल्म के लिए चले
रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं:
مَا مِنْ خَارِجِ يَخْرُجُ مِنْ بَيْتٍ فِي طَلَبِ الْعِلْمِ إِلَّا وَضَعَتْ لَهُ الْمَلَائِكَةُ أَجْنِحَتَهَا رِضًا بِمَا يَصْنَعُ
"जो अपने घर से इल्म की तलब के लिए निकलता है फ़रिश्ते उसके अमल से ख़ुश होकर अपने परों को बिछा देते हैं।"
रावी: सफ़वान बिन अस्साल رضي الله عنه
[मुस्नद अहमद, इब्न हिब्बान, इब्न माजा 226, बैहक़ी, सहीह अल जामिअ 5702]
3. इल्मी मजलिसों की फ़ज़ीलत
रसूलुल्लाह ﷺ का फ़रमान है:
وَمَا اجْتَمَعَ قَوْمٌ فِي بَيْتٍ مِنْ بُيُوتِ اللَّهِ يَتْلُونَ كِتَابَ اللَّهِ وَيَتَدَارَسُوْنَهُ بَيْنَهُمْ إِلا نَزَلَتْ عَلَيْهِمُ السَّكِينَةُ وَغَشِيَتْهُمُ الرَّحْمَةُ وَحَفَّتْهُمُ الْمَلَائِكَةُ وَذَكَرَهُمُ اللَّهُ فِيمَنْ عِنْدَهُ
"और जब भी अल्लाह के किसी घर में कुछ लोग जमा होकर क़ुरआन ए करीम पढ़ते हैं या एक दूसरे को पढ़ाते हैं, तो:
1. उन पर सकीनत (इत्मीनान) नाज़िल होती है।2. उन्हें रहमत ढाँप लेती है।
3. फ़रिश्ते उन्हें घेर लेते हैं।
रावी: अबू हुरैरह رضي الله عنه
[सहीह मुस्लिम: 6518, मुस्नद अहमद, अबू दाऊद, तिर्मिज़ी, इब्न माजा, सहीह अल जामिअ 6577, सहीह]
4. हदीस याद करने की फ़ज़ीलत
रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं:
نَضَّرَ اللَّهُ امْرَأَ سَمِعَ مِنَّا حَدِيثًا فَحَفِظَهُ حَتَّى يُبَلِّغَهُ غَيْرَهُ فَرُبَّ حَامِل فِقْهِ إِلَى مَنْ هُوَ أَفْقَهُ مِنْهُ وَرُبَّ حَامِلٍ فِقْهِ لَيْسَ بِفَقِيْهِ
"अल्लाह उस शख़्स को ख़ुश रखे जिसने मुझसे कोई बात सुनी, फिर उसने उसको जैसा कुछ भी मुझसे सुना था दूसरों तक पहुँचा दिया। क्योंकि बहुत से लोग जिन्हें बात पहुँचाई जाती है, पहुँचाने वाले से कई ज़्यादा बात को तवज्जोह से सुनने और महफ़ूज़ करने वाले होते हैं।"
रावी: ज़ैद बिन साबित رضي الله عنه
[तिर्मिज़ी 2656, सहीह अल जामिअ 6763, सहीह]
D. अहल ए इल्म की फ़ज़ीलत
1. इल्म वाले और बे इल्म बराबर नहीं हो सकते
قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُوْنَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُوْنَ
"बताओ तो, इल्म वाले और बे इल्म क्या बराबर हैं?" [क़ुरआन, सूरह अज़ ज़ुमर 39:9]
2. इल्म वालों के दर्जात बुलंद होते हैं
يَرْفَعِ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوْا مِنْكُمْ وَالَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ دَرَجَاتٍ
"अल्लाह तआला ईमान वालों का दर्जा बुलंद करता है और इल्म वालों के कई दर्जात हैं।" [क़ुरआन, सूरह अल मुजादिलह 58:11]
3. इल्म में मशग़ूल रहना लानत से बचने का ज़रिया है
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
أَلَا إِنَّ الدُّنْيَا مَلْعُوْنَةٌ مَلْعُوْنَ مَا فِيهَا
إِلَّا ذِكْرُ اللَّهِ وَمَا وَالَاهُ وَعَالِمٌ أَوْ مُتَعَلَّمٌ
"ख़बरदार! बेशक दुनिया और जो कुछ इसमें है सब मलऊन है, सिवाए अल्लाह के ज़िक्र और उससे जुड़ी हुई चीज़ों, और आलिम या मुतअल्लिम (तालिब ए इल्म) के।"
अबू हुरैरह رضي الله عنه
[तिर्मिज़ी 2322, इब्न माजा, सहीह अल जामिअ 1609, हसन]
4. कुछ बातें उलमा ही समझ पाते हैं
وَتِلْكَ الْأَمْثَالُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ وَمَا يَعْقِلُهَا إِلَّا الْعَالِمُوْنَ
"हम इन मिसालों को लोगों के लिए बयान फ़रमा रहे हैं, इन्हें सिर्फ़ इल्म वाले ही समझते हैं।" [क़ुरआन, सूरह अल अनकबूत 29:43]
आख़िरी बात
रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं:
إِنَّمَا الْعِلْمُ بِالتَّعَلُّمِ
"बेशक इल्म सिर्फ़ सीखने से हासिल होता है।" [सहीह बुख़ारी तालीक़न 68, सहीह अल जामिअ: हदीस नं. 2328]
By Team Islamic Theology

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