ग्यारहवीं शरीफ़ शरीअत की नज़र में
अल-हम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस्सलातो वस्सलामु अला रसूलिहिल करीम व अला आलिही व अस्हाबिही अजमईन, अम्मा बाद:
माहे रबी-उल-आख़िर को दौर-ए-जाहिलियत में "बसान", "वबसान", और "मुलज़ेम" भी कहा जाता था। आज कल हमारे हाँ बाज़ मुब्तदईन ने उसका नाम "रबी-उल-ग़ौस" भी रखा हुआ है। क्योंकि वो इस महीने में शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहिमहुल्लाह के नाम की "ग्यारहवीं" खाते हैं इसलिए इसे "रबी-उल-ग़ौस" यानी ग़ौस की बहार कहते हैं हालांकि असल मौज मेलाह तो ग्यारहवीं खोरों का होता है लेकिन नाम शैख़ मुसोफ़ का इस्तेमाल करते हैं। अल्लाह इन सब को हिदायत दे आमीन
माहे रबी-उल-आख़िर और ग्यारहवीं शरीफ़:
ग्यारहवीं एक तारीख़ का नाम है, जो ग्यारहवाँ तानीथ है, दसवीं के बाद आने वाली तारीख़ को ग्यारहवीं कहते हैं। हमारे हाँ उर्फ़ में ग्यारहवीं शैख़ अब्दुल क़ादिर रहिमहुल्लाह की उस नियाज़ को कहा जाता है जो रबी-उस्सानी की ग्यारह तारीख़ को दी जाती है। इस सालाना ग्यारहवीं को "बड़ी ग्यारहवीं" भी कहा जाता है और बाज़ लोग हर क़मरी महीने की ग्यारह तारीख़ को जो ग्यारहवीं देते हैं उसे "छोटी ग्यारहवीं" कहते हैं।
ग्यारहवीं खोर अमूमन ये कहते हैं के ग्यारहवीं दर-हक़ीक़त हज़रत सरकार महबूबे सुभानी, क़ुतबे रब्बानी, ग़ौसे आज़म जिलानी की रूह-पुर'फ़ुतूह की ईसाले सवाब करना है। (ग़ौस-उस-सक़लैन, पेज 218)
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी और मौजूदह मुसलमान:
इसे कहते हैं हाथी के दाँत दिखाने के और होते हैं खाने के और। ईसाले सवाब तो किसी भी वक़्त किया जा सकता है, इसके लिए शरीअत ने कोई दिन या वक़्त मुक़र्रर नहीं फ़रमाया लेकिन ग्यारहवीं खाने और खिलाने वालों ने ग्यारहवीं तारीख़ का इल्तिज़ाम ऐसा लाज़िम किया हुआ है गोया ख़ुदाई शरीअत है। अगर आप ग्यारहवीं के बजाय किसी और तारीख़ का कहें तो ये हज़रत कभी भी राज़ी न होंगे। लिहाज़ा उनके इस तर्ज़े अमल से वाज़ेह होता है के ग्यारहवीं का मक़सद ईसाले सवाब नहीं कुछ और भी है।
अगर कोई कहे के हमारे नज़दीक ग्यारह तारीख़ का इल्तिज़ाम ज़रूरी नहीं बल्कि ग्यारहवीं किसी भी तारीख़ को दिलाई जा सकती है तो सूए मंतिक़ की वज़ाहत करनी चाहिए के दूसरी तारीख़ें (मसलन बारहवीं, तेरहवीं या इक्कीसवीं, बाईसवीं) ग्यारहवीं कैसे बन गईं? मिसाल के तौर पर जुमेरात तो जुमेरात ही है, और जुमा'अ, जुमा'अ है, ऐसे ही बारहवीं बारहवीं है और तेरहवीं तेरहवीं है। आसान सी बात है के जैसे आप जुमेरात को हफ़्ता नहीं कह सकते, इतवार को बुध नहीं कह सकते, इसी तरह इक्कीसवीं को ग्यारहवीं या बारहवीं को तेरहवीं नहीं कह सकते, ग़ौर करें।
ग्यारहवीं में खीर और दीगर खानों का ख़ुसूसियत से एहतिमाम किया जाता है, हालाँकि अगर सिर्फ़ ईसाले सवाब ही मक़सूद होता तो इसके और भी कई तरीक़े थे मसलन आप ये रक़म या इतनी ही मालियत की कोई दूसरी चीज़ किसी ज़रूरतमंद ग़रीब ओ मिस्कीन को भी दे सकते थे। सिर्फ़ खीर ओ हलवे मांडने ही को ईसाले सवाब के लिए ज़रूरी समझना ये किस शरीअत में है?
ग्यारहवीं का मक़सद समझने के लिए एक और बात बड़ी क़ाबिले ग़ौर है के इसका एहतिमाम ओ इल्तिज़ाम अक्सर अवामुन्नास ही की तरफ़ से देखने में आया है। मौलवियों की तरफ़ से क्यों नहीं? बिल-अल्फ़ाज़ दीगर इस क़िस्म का एहतिमाम ओ इल्तिज़ाम इन मौलवियों की तरफ़ से क्यों नहीं?
۞ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِنَّ كَثِيرًا مِّنَ ٱلْأَحْبَارِ وَٱلرُّهْبَانِ لَيَأْكُلُونَ أَمْوَٰلَ ٱلنَّاسِ بِٱلْبَـٰطِلِ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ ۗ
या अय्युहल्लज़ीना आमानू इन्न कसीरन मिनल अहबारी वर्रुहबानी लयअकूलूना अम्वालंनासि बिलबातिली व यसुलूना अन सबीलिल्लाह
"ऐ ईमान वालो! बेशक बहुत सारे उलमा और दरवेश लोगों का माल नाजायज़ तरीक़े से खाते हैं और वो अल्लाह की राह से भी (लोगों को) रोकते हैं।" (सूरह अल-तौबह:34)
कहीं क़ुरआन मजीद की मज़कूरह आयत में इस क़िस्म के मौलवियों की तरफ़ तो इशारा नहीं? यहाँ एक सवाल ये भी पैदा होता है के क्या पूरी उम्मत में सिर्फ़ शैख़ अब्दुल क़ादिर रहिमहुल्लाह ही ईसाले सवाब के मुहताज और ऐसे वलीउल्लाह हैं जिन्हें बज़रिये ग्यारहवीं ईसाले सवाब करना चाहिए। हालाँकि ग्यारहवीं देने वालों के नज़दीक शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी "ग़ौसे आज़म" हैं और वो ऐसी चीज़ों से बरी हैं। या कोई और भी? मसलन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाद सबसे बड़े औलिया-अल्लाह सहाबा किराम हैं, फिर ताबईन, ताबे ताबईन, मुहद्दिसीन वग़ैरह। अगर ये सवाब सिर्फ़ शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहिमहुल्लाह ही को पहुँचाना चाहें तो इस तख़्सीस (ख़ुसूसियत) की क्या दलील है? और अगर दीगर औलिया-अल्लाह का भी हक़ बनता है तो नाम निहाद अहले सुन्नत इन की ग्यारहवीं क्यों नहीं दिलाते? क्या उनसे मोहब्बत नहीं?
ग्यारहवीं का राज़:
बहुत से लोग ग्यारहवीं न देने से जानी ओ माली नुक़सान होने का अंदेशा ज़ाहिर करते हैं के माल बर्बाद हो जाता है, गायें, भैंसें दूध नहीं देतीं, थनों से दूध के बजाय ख़ून आना शुरू हो जाता है। इसी तरह माल से बरकत उठ जाती है। गोया नमाज़, रोज़ा हज, ज़कात जैसे क़तई फ़रायज़ में कोताही से कुछ नहीं बिगड़ता, मगर ग्यारहवीं में ज़रा सी कोताही से जान ओ माल के लाले पड़ जाते हैं। आख़िर सोचने की बात है के शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमहुल्लाह की ग्यारहवीं न देने ही से क्यों जानी ओ माली ख़तरात नज़र आने शुरू हो जाते हैं?
इसके पीछे असल में वो बातिल और मुश्रिकाना अक़ायद ओ नज़रियात हैं जो लोगों ने हज़रत शैख़ रहिमहुल्लाह के मुताल्लिक़ गढ़ रखे हैं के आप ग़ौसे आज़म (सब से बड़ा फ़रियाद सुनने वाला) हैं।
अल्लाह तआला ने आप को हर तरह के इख़्तियारात सौंप रखे हैं। यहाँ तक के कायनात की तक़दीर भी आप ही के हाथ में थमा रखी है और आप को "कुन फ़यकून" की क़ुदरत से नवाज़ रखी है। लिहाज़ा जिस तरह सदक़ा ओ ख़ैरात के ज़रिये अल्लाह तआला का क़ुर्ब हासिल किया जाता है, इसी तरह ग्यारहवीं के ज़रिये ये लोग आप का तक़र्रुब हासिल करना चाहते हैं, ताके कहीं आप नाराज़ होकर हमें नुक़सान न पहुँचाएँ। यही वो राज़ बल्कि बुज़दिली है जिसे लोग ग्यारहवीं न देने को जान ओ माल में ख़सारे का बाइस समझते हैं।
आप के मुताल्लिक़ उन मकरूह नज़रियात के पीछे भी वो मनगढ़त झूठे क़िस्से कहानियाँ हैं जिन्हें लोगों ने आप के मुताल्लिक़ गढ़ रखे हैं। बतौरे मिसाल चंद एक मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:
शैख़ अब्दुल क़ादिर रहिमहुल्लाह की तरफ़ मंसूब बाज़ झूठी करामात:
(1) शैख़ शुहाबुद्दीन सह़रवर्दी जो सिलसिला सह़रवर्दियह के इमाम हैं, आप की वालिदा माजिदा हुज़ूर ग़ौस-उस-सक़लैन के वालिद माजिद की ख़िदमत में हाज़िर होती हैं और अर्ज़ करती हैं के हुज़ूर दुआ फ़रमाइए के मेरे हाँ लड़का पैदा हो। आप ने लौहे महफ़ूज़ में देखा, उस में लड़की मरक़ूम (लिखी हुई) थी, आप ने फ़रमाया के तेरी तक़दीर में लड़की लिखी हुई है, वो बीबी ये सुनकर वापस हुई, रास्ते में हुज़ूर ग़ौसे आज़म मिले, आप के पूछने पर उन्होंने सारा माजरा बयान किया तो हुज़ूर ने इरशाद फ़रमाया: जा तेरे हाँ लड़का पैदा होगा, मगर वज़ा हमल के वक़्त लड़की पैदा हुई। वो बीबी बारगाहे ग़ौसियत में इस मौलूद को लेकर आई और कहने लगी: हुज़ूर लड़का माँगा और लड़की मिली। फ़रमाया: यहाँ तो लाओ और कपड़ा हटा कर देखो ये लड़का है या लड़की? देखा तो लड़का था और यही शैख़ शुहाबुद्दीन सह़रवर्दी थे, आप के हुल्यह में है के आप की पस्तान मिसाल औरतों की थीं। (बाग़-ए-फ़िरदौस अलमारूफ़ गुलज़ार-ए-मुहम्मदी, पेज:28)
(2) हुज़ूर ग़ौसे पाक की मजलिस वअज़ में एक मर्तबा तेज़ हवा चल रही थी, इसी वक़्त एक चील ऊपर से चिल्लाती हुई गुज़री, जिस से अहले मजलिस की निगाहें मुंतशिर हुईं। नज़र उठाकर देखा फ़ौरन वो चील मरकर गिर गई, सर अलहैदा धड़ अलहैदा। बाद ख़त्मे वअज़ आप तशरीफ़ ले चले, वो चील बदस्तूर मरी पड़ी थी, आप ने एक हाथ में उसका सर उठाया और दूसरी हाथ में जिस्म और दोनों को बिस्मिल्लाह कह कर मिला दिया वो फ़ौरन उड़ती हुई चली गई। (बाग़-ए-फ़िरदौस अलमारूफ़ गुलज़ार-ए-मुहम्मदी, पेज:28)
(3) शैख़ अबुल हसन क़ारी रिवायत करते हैं के हज़रत महबूब-ए-सुभानी, क़ुतब-ए-रब्बानी के एक मुरीद ने क़ज़ाए इलाही से इंतिक़ाल किया और हज़रत इज़राईल अलैहिस्सलाम उनकी रूह क़ब्ज़ करके ले चले, उस मुरीद का चंद सालह लड़का था, कहीं जो उसको ख़बर हुई उसने रोते रोते अपना लहू पानी एक कर लिया, उसकी इस हालत-ए-ज़ार को देखकर सब छोटे बड़े रोते थे, इसी अस्ना में एक शख़्स ने आकर कहा: तो जो यहाँ रोता है तेरे इस रोने से क्या होता है, तो अगर हज़रत पीर दस्तगीर के पास जाकर अर्ज़ करे तो ज़रूर कामयाबी होगी, पस वो लड़का ये सुनते ही हज़रत महबूब-ए-सुभानी की ख़िदमत में दौड़ा हुआ आया और अपना हाल सुनाकर कहने लगा:
ख़ुदा के वास्ते बाबा को अब मेरे मिला दीजिए के तुम महबूबे यज़दान होकर उम्मत को कुछ दिखा दीजिए कहा लड़के ने ये रोकर तो दिल भर आया हज़रत का लगे कहने ठहर जा तो तमाशा देख क़ुदरत का
ये कह कर आप ने आसमान की जानिब देखा, हज़रत इज़राईल अलैहिस्सलाम अपनी ज़नबील में बहुत सी रूहें लिए जाते हैं, आप ने उनको बुलाकर कहा के उसमें से मेरे मुरीद की रूह छोड़ दीजिए। उन्होंने कहा के मैंने हुक्मे ख़ुदा से रूहें निकाली हैं मैं नहीं छोड़ सकता, ये सुनकर महबूब-ए-रब्बानी को जलाल आ गया। ज़नबील छीनकर सब रूहें छोड़ दीं वो सब रूहें अपने अपने क़ालिबों (दिलों) में पहुँच गईं और उस दिन के तमाम मुर्दे ज़िंदा ओ सलामत हो गए और आप का मुरीद भी जी उठा। (गौहर ग़ौसियह अल-मारूफ़ बहार-ए-बग़दाद, पेज:23-24)
इस तरह की और भी कई मनगढ़त कहानियाँ हैं जो आप की तरफ़ मंसूब की गई हैं। जिन का हक़ीक़त में कोई वजूद नहीं। जाहिल लोग ग़ुलू करते हुए इन्हें आप की करामात बाव़र कराते हैं हालाँकि ये सब झूठ का पलंदा हैं।
इमाम ज़हबी रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं:
लैसा फ़ी किबारिल मशायिखि मं लहू अहवालुन व करामातुन अक्सरु मिनश-शैख अब्दुल कादिर जीलानी, लाकिना कसीरन् मिन्हा ला यिह़िह़्तु, व फ़ी बा'ज़ि ज़ालिका अशयाउ मुस्तहीलातन
"किबार मशायेख में कोई ऐसा नहीं गुज़रा जिस की शैख़ अब्दुल क़ादिर रहिमहुल्लाह से ज़ियादा करामात मारूफ़ हों लेकिन आप की तरफ़ जो करामातें मंसूब हैं उनमें से अक्सर दुरुस्त नहीं। बाज़ तो वैसे ही ना-मुमकिनात में से हैं।"(सियर आज़लाम अन-नुबला:12/606)
इमाम इब्न कसीर रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं:
वयहरूना अन्हु अक्वालन् व अफआलन व मुकाशफ़ातन अक्सरुहा मुगालातुन
"लोग आप के अक़वाल ओ अफ़आल और मुकाशिफ़ात को बयान करते हैं जिन में ज़्यादातर ग़ुलू ही पाया जाता है।" (अल बिदाया वन-निहाया:14/181)
ग्यारहवीं के दलाइल:
ग्यारहवीं के जवाज़ पर अमूमन चार क़िस्म के दलाइल पेश किए जाते हैं, जो दर्जे ज़ैल हैं:
पहले क़िसम: क़ुरआन मजीद की वो आयात जिन में किसी भी लिहाज़ से दस या ग्यारह का लफ़्ज़ आया है जैसे क़ुरआन मजीद की सूरह यूसुफ़ में ग्यारह का ज़िक्र इस तरह आया है:
इन्नि रअतु अहदा अशरा कवकबन
"तहक़ीक़ मैंने ग्यारह सितारे देखे हैं।" (सूरह यूसुफ़:4)
सलासतु अय्यामिन फिल हज्जी व सबअतिन इजा रजाअ तुम तिल्लिका अशरतुल कामिलतु
"तीन दिन हज के और सात दिन जब तुम वापस लोगो ये पूरे दस दिन हुए।" (सूरह अल-बक़रह:196)
चूँके दसवें दिन के बाद रात को ग्यारह कहते हैं लिहाज़ा दस दिनों का तज़किरह साबित होने के बाद दिन दसवाँ और रात ग्यारहवीं साबित हुई।
यताखाफतूना बैनहुम इन लबिसतुम इल्ला अशरन
"आहिस्ता कहते होंगे दरमियान अपने नहीं रहेंगे मगर दस दिन।" (सूरह ताहा:103)
एक ग्यारह खोर लिखता है: मुनकिरीन अब क्या कहेंगे, अब तो क़ुरआन मजीद से मुताल्लिक़ दस दिनों का तज़किरह भी साबित हो गया। दस दिनों के बाद रात यक़ीनन ग्यारह होगी, लिहाज़ा दिन दसवाँ और रात ग्यारहवीं साबित हो गई अब क्या एतराज़ बाक़ी है?व वाअदना मूसा सलासीना लैलतन व अत्ममनाहा बिअशरिन्
"और वादा दिया हम ने मूसा को तीस रात का और पूरा किया इस को दस के।" (सूरह अल-आ'राफ़:142)
वल फज्री (1) व लयालिन अशरिन् (2)
"क़सम है फ़जर की और दस रातों की।" (सूरह अल-फ़ज्र:1-2)
इस आयत में अल्लाह तआला ने एक सुबह और दस रातों की क़सम खायी है, जिस से ग्यारहवीं शरीफ़ की अज़मत मालूम हुई। (ग्यारहवीं शरीफ़, पेज:321-322)
ये हैं क़ुरआन मजीद से ग्यारहवीं के जवाज़ पर दलाइल जिन पर ग्यारहवीं खोर बड़ा नाज़ करते हैं और बढ़कें मारते हैं के देखा क़ुरआन मजीद से ग्यारहवीं साबित हुई?
हालाँके इनको बढ़कें मारते हुए ये बात ज़ेहन नशीन रखनी चाहिए के क़ुरआन मजीद के अल्फ़ाज़ जिस तरह अल्लाह तआला ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सिखलाये हैं इसी तरह अल्लाह तआला ने इन अल्फ़ाज़ का बयान यानी माना ओ मफ़हूम भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सिखलाया है जैसे क़ुरआन मजीद के अल्फ़ाज़ में क़यामत तक कोई तग़य्योर ओ तबद्दुल नहीं हो सकता, इसी तरह इस के माना ओ मफ़हूम में भी क़यामत तक कोई तब्दीली नहीं हो सकती और यही वो बुनियादी नुक़्तह है जिस को क़ायम रखते हुए अइम्मा-ए-दीन ने बड़ी बड़ी सऊबतें और तकलीफ़ें बर्दाश्त कीं, लेकिन क़ुरआन मजीद में मानवी तहरीफ़ करने की हर मज़मूम कोशिश को नाकाम बना दिया।
अब हम अपने भाइयों से सवाल करते हैं क्या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इन आयात से ग्यारहवीं करना हमें बतलाया है? इसी तरह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाद क़ुरआन मजीद और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फ़रमाने को सहाबा किराम, उनके बाद ताबईन, ताबा ताबईन और तमाम अइम्मा किराम जो हर एक से ज़ियादह समझने वाले और अमल पैरा होने वाले थे, क्या उनमें से किसी ने इन आयात से कोई ऐसी चीज़ मुराद ली है? अगर ली है तो इसको वाज़ेह तौर पर बयान किया जाए।
बहैसियते मुसलमान हम इस पर अमल पैरा होने के लिये तैयार हैं, अगर ये बात नहीं तो फिर ये क़ुरआन मजीद की मानवी तहरीफ़ है जो कम अज़ कम किसी मुसलमान का तर्ज़े अमल नहीं होना चाहिए।
“हातू बुरहानकुम इन कुन्तुम सादिक़ीना”
ग्यारहवीं खोर अच्छी तरह जानते हैं के इन आयात के नुज़ूल के वक़्त न तो शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी पैदा हुए थे और न ही ग्यारहवीं का कोई वजूद था। यक़ीनन हमारी इस बात से ग्यारहवीं खोर भी इत्तेफ़ाक़ करेंगे के इन आयात का मुरव्वजह ग्यारहवीं से दूर का भी ताल्लुक़ नहीं।
इसी लिये तो एक ग्यारहवीं खोर ने लिखा है: अगर मुनकिरीन का क़ुरआन मजीद से ग्यारहवीं शरीफ़ का सुबूत माँगना मबनी बर जहालत है। ताहम हमने निहायत संजीदगी से क़ुरआन मजीद की पाँच मुख़्तलिफ़ आयात से जैसा भी बन पड़ा जवाब पेश कर दिया। बहरहाल इन जवाबात को जैसे को तैसा की मिसाल पर महमूल करना चाहिए। (ग्यारहवीं शरीफ़, पेज:322)
क़ुरआन मजीद से ग्यारहवीं का सुबूत माँगना जहालत नहीं बल्कि सुबूत पेश करने की नाकाम कोशिश मबनी बर जहालत है, क्योंकि अगर क़ुरआन मजीद में इस का कहीं अदना सा भी इशारा होता या मज़कूरह बाला आयात का वो मफ़हूम होता जो ग्यारहवीं खोर बयान करते हैं तो सबसे पहले ख़ुद साहिबुल कु़रआन जनाब मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस पर अमल करते और अपने सहाबा से भी अमल करवाते।
दूसरी क़िसम: वो रिवायात जिन में ईसाले सवाब के लिये सदक़ह ओ ख़ैरात करने का ज़िक्र है। वो पेश करके ग्यारहवीं का जवाब निकाला जाता है। जैसा के सय्यिदिना सअद बिन उबादा रज़ियल्लाहु-अनहू ने एक बाग़ अपनी वालिदा की तरफ़ से सदक़ह किया था जो उनकी अदम मौजूदगी में फ़ौत हो गयी थीं। (सहीह बुख़ारी:2756, 2762)
ग्यारहवीं खोर इस क़िस्म की रिवायात को दलील बनाकर कहते हैं के हम भी उम्मत के एक बेहतरीन शख़्स शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहिमहुल्लाह की रूह-पुर'फ़ुतूह को ईसाले सवाब पहुँचाने की ग़रज़ से ग्यारहवीं दिलाते हैं। ग्यारहवीं खोरों की इस दलील का जवाब गुज़िश्ता सुतूर में बयान हो चुका है के ईसाले सवाब के लिये शरीअत ने कोई दिन या वक़्त मुक़र्रर नहीं किया और न ही इस बात का पाबन्द बनाया है के सिर्फ़ खीर या हलवे मांडने ही के ज़रिये ईसाले सवाब किया जाए नीज़ मय्यित के वुरसा के अलावा दीगर अफ़राद का इस की जानिब से सदक़ह करना भी महल-ए-नज़र और मुहताज-ए-दलील है।
तीसरी क़िसम: जब एड़ी चोटी का ज़ोर लगाने के बाद क़ुरआन ओ हदीस से ग्यारहवीं का कोई सुबूत नहीं मिलता तो फिर मनगढ़त अजीब ओ ग़रीब क़िस्म की गर्दानें सुनाना शुरू कर देते हैं के जब फ़ुलाँ पैदा हुआ तो दिन दसवाँ और रात ग्यारहवीं थी, गर्दान मुलाहिज़ा फ़रमायें:
दिन दसवाँ और रात ग्यारहवीं:
क़लम क़ुदरत को पैदा फ़रमाने का दिन दिन दसवाँ और रात ग्यारहवीं
लोह-ए-महफ़ूज़ पैदा फ़रमाने का दिन दिन दसवाँ और रात ग्यारहवीं
क़लम का लोह-ए-महफ़ूज़ पर तक़दीर-ए-आलम लिखने का दिन
दिन दसवाँ और रात ग्यारहवीं
हज़रत आदम की तौबा क़ुबूल फ़रमाने का दिन दिन दसवाँ और रात ग्यारहवीं
हज़रत इदरीस को मकान बुलंद मिलने का दिन दिन दसवाँ और रात ग्यारहवीं
इस लंबी चौड़ी (यहाँ पर मुख़्तसर बयान की) गर्दान को ज़िक्र करने के बाद एक ग्यारहवीं खोर ने लिखा:
इसी तरह और भी बहुत सारी फ़ज़ीलतें हैं, दसवीं और ग्यारहवीं रात की फ़ज़ीलतों और ख़ुसूसियात का अगर पूरी तफ़सील से ज़िक्र किया जाए तो हज़ारों सफ़हात में भी नहीं समा सकता।
मुख़्तसर तौर पर ख़ाक़ा पेश कर देने पर ही इक्तिफ़ा किया जाता है। (ग्यारहवीं शरीफ़, पेज:310-312)
अक्सर क़व्वालियों में भी इस गर्दान का बड़ा विर्द किया जाता है हालाँके तक़रीबन निन्यानवे फ़ीसद ये गर्दान बनावटी और मनगढ़त है। क़ुरआन ओ हदीस से इस का कोई सुबूत नहीं मिलता। अगर बिलफ़र्ज़ ये सारी बातें साबित भी हो जाएँ तो भी इन का मुरव्वजह ग्यारहवीं से कोई जोड़ नहीं बनता और न ही उनसे ग्यारहवीं साबित हो सकती है। क्योंकि अगर इन से ग्यारहवीं साबित होती तो जनाब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अस्हाब ने इस पर क्यों न अमल किया? ताबईन, ताबा ताबईन और दीगर सलफ़ सालेहीन ने उसे क्यों न मामूल बनाया जबकि वो ख़ैर के कामों में सबक़त ले जाने वाले थे।
चौथी क़िसम: ग्यारहवीं खोर जब हर तरफ़ से लाजवाब हो जाते हैं तो बजाए इस के के हक़ तस्लीम करके ग्यारहवीं खोरी छोड़ दें। उल्टा अवाम कल-अनआम को बेवक़ूफ़ बनाना और अटकल पच्चो मारना शुरू कर देते हैं के जी देखो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और अशराए मुबश्शिरह के दस सहाबा को मिला कर ग्यारहवीं साबित हो जाती है। इसी तरह एक ग्यारहवीं खोर ने बड़ी वज़नी दलील पेश करते हुए अपनी बारात से ग्यारहवीं साबित करने की कोशिश की। कहने लगा: लोगो! मैं ग्यारहवीं का एक और सुबूत पेश करने लगा हूँ, ग़ौर से सुनो, कान खोल कर बैठो, फिर न कहना के हमें किसी ने ग्यारहवीं के मुताल्लिक़ कुछ बताया नहीं था।
लो सुनो! ग्यारहवीं शरीफ़ मेरी बारात से साबित है क्योंकि मेरी बारात में एक मेरे वालिद साहब थे और एक चचा साहब और दो मेरे भाई थे जबकि छः दूसरे रिश्तेदार ये कुल दस अफ़राद हुए और ग्यारहवाँ मैं ख़ुद, मैं ख़ुद... मैं ख़ुद। (बिदअत और बिदअती, पेज:303)
इसी क़िस्म का एक और वाक़िया जनाब प्रो. इकराम नसीम ने भी "तफ़हीम तौहीद" पेज:146-147 पर बयान किया है के मौलवी इनायतुल्लाह सांगलवी ने एक मर्तबा राता झटों ज़िला सियालकोट में एक जलसह गाह में बढ़कें लगाते हुए ग्यारहवीं का अजीब ही सुबूत पेश किया, कहने लगा के ग्यारहवीं शरीफ़ का सुबूत तो घर घर में मौजूद है लेकिन अंधे वहाबियों को नज़र नहीं आता। सामेईन ने हैरत से कान खड़े कर लिये के देखें भला ग्यारहवीं का कौन सा ऐसा सबूत है जो हर घर में मौजूद है। फ़रमाने लगे: क्या हर घर में चारपाई नहीं होती? जी होती है, जवाब आया। कहने लगा: गिनती करो, दो दराज़ और दो बाज़ू, कितने हुए? जी चार, और चार पाए भी शामिल कर लो, अब कितने हुए? जी आठ। एक पायेंती और एक तंदी, कितने हो गए? जी दस (ज़ोर से आवाज़ आई) और एक चारपाई के ऊपर सोने वाला बताओ, अब कितने हुए? जी ग्यारह और इस के साथ ही नारा हैदरी और नारा ग़ौसिया जैसे मुश्रिकाना नारे गूँजने लगे।
अब जहाँ ऐसी हरज़ह सराई करने वाला वाइज़ और सुनने वाले ऐसे जाहिल हों, तो वहाँ दीन-ए-हक़ की वही हालत होगी जो इन लोगों ने बना रखी है।
बहरहाल ग्यारहवीं का किताब ओ सुन्नत में न कोई ज़िक्र है न सुबूत। ये सब यार लोगों ने खाने पीने के ढंग रचा रखे हैं जिन से बचना अज़ हद ज़रूरी है।
मौलाना सनाउल्लाह अमृतसरी रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं: ख़त्म ग्यारहवीं का रिवाज न ज़माना-ए-रिसालत में था, न अहद-ए-ख़िलाफ़त में। इस लिये ये बिदअत है। हदीस में है:
“कुल्लु अमालिन लैसे अलैहि अमरूना फ़हुवा रद्दुन्”
"यानी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: जो काम हम ने न बताया हो या न किया हो वो मरदूद है।"
इस लिये ऐसी बिदअत की मजलिस में शरीक होना या इस चीज़ का खाना गुनाह है। ख़ुदा के वास्ते देना मना नहीं है लेकिन ग्यारहवीं के नाम से करना शिर्क या कम से कम बिदअत है। ऐसे अफ़आल से ख़ुद हज़रत पीर साहब रहिमहुल्लाह ने मना फ़रमाया है, "फ़ुतूहुल ग़ैब" मुलाहिज़ा हो। (फ़तावा सनाइय्या:1/356)
माहे रबी-उल-आख़िर की जाली और बनावटी नमाज़:
इस माह की पहले शब नमाज़ मुग़रिब की अदायगी के बाद ईशा की नमाज़ में सूरह फातिहा के बाद तीन बार सूरह अल-कौसर, दूसरी रकअत में सूरह फातिहा के बाद तीन मर्तबा सूरह काफिरून. इस के बाद बाक़ी तमाम रकअतों में सूरह फातिहा के बाद हर रकअत में तीन तीन मर्तबा सूरह इखलास पढ़े। इस नमाज़ को पढ़ने से अल्लाह तआला हर तरह की परेशानी ओ मुश्किल से ख़लासी अता फ़रमाता है।
जायज़ह: जनाब नबी-ए-मुकर्रम रसूल-ए-मुअज्जम फ़िदाह अभी ओ अम्मी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जिन पर क़ुरआन मजीद नाज़िल किया गया और जिन्हें रोशन दीन अता फ़रमाया गया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा किराम रज़ियल्लाहु-अन्हुम अजमईन. जो हर ख़ैर के काम में आगे बढ़ने वाले, सबक़त ले जाने वाले थे। उन पर न जाने कितने ही रबी-उल-आख़िर के महीने गुज़रे लेकिन उनमें से किसी एक ने भी न ख़ुद ये जाली और बनावटी नमाज़ें अदा की और न ही बाद में आने वालों को उन मख़सूस नमाज़ों का हुक्म दिया जिन का ज़िक्र "बारह महीनों की नफ़ली इबादात" के मुअल्लिफ़ ने अपनी मज़कूरह किताब में किया है। लिहाज़ा ये सब नमाज़ें बनावटी और जाली हैं इसी लिये हम ने उनवान ही में इस बात का इशारा कर दिया है के उन मख़सूस नमाज़ों का शरीअत-ए-मुहम्मदी से कोई ताल्लुक़ नहीं। उन पर अल्लाह तआला और उस के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मुहर नहीं। लिहाज़ा ये बनावटी हैं और इन्हें पढ़ना बिदअत है।
Team Islamic Theology

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