विधवा का विवाह (इस्लामी इतिहास में)
मौजूदा दौर में विधवा विवाह रिवाज नहीं है बल्कि अगर शादी के कुछ ही दिनों बाद पति की मौत हो जाए, तो महिला को मनहूस, अभागिन बदकिस्मत और न जाने क्या कुछ कहा जाता है, लेकिन इस्लाम इसके सख़्त ख़िलाफ़ है, वह विधवा विवाह को बढ़ावा देता है। वास्तव में में शादी का असली मक़सद समाज को पाक-साफ़ रखना और लोगों को ग़लत यौन संबंध से बचाना है, और यह तभी मुमकिन है जब विधवा की शादी में कोई रुकावट न हो। पति की मौत के बाद सबसे बड़ी समस्या उसकी सुरक्षा और गुज़ारे की होती है। भूख इंसान की ज़िंदगी का एक कमज़ोर और बहुत नाज़ुक पहलू है। कभी-कभी महिला भूख मिटाने के लिए मजबूर हो जाती है, जबकि आर्थिक मदद के द्वारा कोई मर्द उसकी हमदर्दी हासिल कर लेता है और फिर शैतान उनके लिए बुराई का रास्ता आसान बना देता है। वे पाप को पाप नहीं समझते और समाज पवित्रता के बजाय अश्लीलता की ओर बढ़ने लगता है।
इस्लामी इतिहास के अध्ययन से यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि यहाँ विधवा ने अकेले रहकर ज़िंदगी नहीं बिताई, बल्कि इद्दत की अवधि खत्म होते ही और कभी-कभी तो इद्दत के दौरान ही शादी के पैग़ाम आने शुरू हो जाते थे, और महिला जिस रिश्ते को ठीक समझतीभी रिश्ता सही समझती उसे क़ुबूल कर लेती थी। इस्लामी इतिहास में इसके कई उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन विस्तार से बचते हुए यहाँ केवल दो सहाबियात का ज़िक्र करना ही ठीक रहेगा।
1, आतिका बिन्ते ज़ैद रज़ि अल्लाहू अन्हा
आतिका बिन्ते ज़ैद रज़ि अल्लाहू अन्हा का संबंध क़ुरैश के क़बीला बनी अदी से था उनके पिता ज़ैद बिन नुफ़ैल जाहिलियत के युग में अकेले व्यक्ति थे जो तौहीद के मानने वाले थे उन्होंने कभी शिर्क नहीं किया। उनके विषय में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया "आख़िरत के दिन ज़ैद अकेले एक उम्मत होंगे।"
आतिका बिन्ते ज़ैद रज़ि अल्लाहू अन्हा मशहूर सहाबी सईद बिन ज़ैद रज़ि अल्लाहु अन्हु की बहन थीं, सईद बिन ज़ैद रज़ि अल्लाहु अन्हु उन दस सहाबा में से एक हैं जिन्हें इस दुनिया में ही जन्नत की ख़ुशख़बरी सुना दी गई थी।
आतिका बिन्ते ज़ैद रज़ि अल्लाहू अन्हा दूसरे ख़लीफ़ा उमर फ़ारूक़ रज़ि अल्लाहु अन्हु की चचेरी बहन थीं क्योंकि इनके पिता ज़ैद बिन नुफ़ैल और उमर रज़ि अल्लाहु अन्हु के पिता ख़त्ताब बिन नुफ़ैल सगे भाई थे।
आतिका बिन्ते ज़ैद रज़ि अल्लाहू अन्हा का पहला निकाह उमर के बड़े भी ज़ैद बिन ख़त्ताब के साथ हुआ था उनके साथ ही 622 हिजरी में आतिका बिन्ते ज़ैद रज़ि अल्लाहू अन्हा ने मदीना हिजरत की लेकिन फिर दोनों में तलाक़ हो गई ज़ैद बिन ख़त्ताब जंगे यमामा में शहीद हुए। (अल इसाबा इब्ने हजर असक़लानी)
आतिका बिन्ते ज़ैद रज़ि अल्लाहू अन्हा का दूसरा निकाह अब्दुल्लाह बिन अबू बक्र रज़ि अल्लाहु अन्हु के साथ हुआ। तायफ़ की जंग के दौरान एक तीर लगा और वह शहीद हो गए।
अब्दुलाह बिन अबू बक्र रज़ि अल्लाहु अन्हुमा की मौत के बाद आतिका बिन्ते ज़ैद रज़ि अल्लाहू अन्हा ने उनका दर्दनाक मरसिया कहा, "मैं क़सम हूँ कि तुम्हारे ग़म में मेरी आँखें रोयेंगी और मेरा शरीर धूल से अटा रहेगा। उस आँख की किस्मत जिसने तुम जैसे योद्धा और अडिग नौजवान को देखा-अगर उस पर तीरों की बारिश भी होती तो वह उन तीरों की बौछार को चीरकर मौत के रास्ते पर तब तक चलता रहता जब तक खून की नदियाँ न बह जातीं। अपनी पूरी ज़िंदगी, जबतक जंगली कबूतर गुटरगूँ करेगा (मैं रोती रहूँगा) और जबतक रात सुबह में बदलती रहेगी।"
और इरादा कर लिया कि अब वह आगे निकाह नहीं करेंगी लेकिन उम्मुल मोमेनीन आयेशा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने उन्हें ऐसा करने से मना किया तो उन्होंने इरादा बदल दिया। (तबक़ात इब्ने साद, तारीख़ इब्ने जारीर तबरी)
आतिका बिन्ते ज़ैद रज़ि अल्लाहू अन्हा का तीसरा निकाह दूसरे ख़लीफ़ा उमर फ़ारूक़ रज़ि अल्लाहु अन्हु से हुआ। उनसे एक बेटा पैदा हुआ जिसका नाम अयाद रखा गया 644 ईस्वी में उमर की शहादत हुई।
(तबक़ात इब्ने साद, अल इसाबा इब्ने हजर असक़लानी)
आतिका बिन्ते ज़ैद रज़ि अल्लाहू अन्हा का चौथा निकाह ज़ुबैर बिन अव्वाम रज़ि अल्लाहु अन्हु से हुआ। निकाह के समय उनसे 3 शर्ते रखीं
1, उनके साथ मार पीट नहीं करेंगे2, मस्जिद में नमाज़ अदा करने की इजाज़त होगी3, बीवी की हैसियत से जो भी हुक़ुक़ होंगे उसमें कोई कमी नहीं होगी।
656 ईस्वी में जंगे जमल से वापसी पर इब्ने जरमूज़ ने उन्हें तीर मार कर शहीद कर दिया।
(तबक़ात इब्ने साद, अल इसाबा इब्ने हजर असक़लानी)
अब उनके बारे में यह मशहूर हो हो गया कि जिसे शहीद होना हो वह आतिका बिन्ते ज़ैद से निकाह कर ले। चुनांचे अली बिन अबु तालिब ने उन्हें निकाह का पैगाम दिया लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया।
आतिका बिन्ते ज़ैद रज़ि अल्लाहू अन्हा का पांचवां निकाह इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु से हुआ जहां 672 ईस्वी में इंतेक़ाल हुआ और 680 ईस्वी में इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु कर्बला में शहीद हुए।
2, अस्मा बिन्ते उमैस रज़ि अल्लाहु अन्हा
अस्मा बिन्ते उमैस रज़ि अल्लाहु अन्हा का जन्म मक्का में हुआ जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस्लाम की दावत देना प्रारंभ किया तभी ईमान लाईं, उनकी गिनती दारे अरक़म से पहले ईमान लाने वालों में होती है।
अस्मा बिन्ते उमैस रज़ि अल्लाहु अन्हा का पहला निकाह जाफ़र बिन अबू तालिब रज़ि अल्लाहु अन्हु से हुआ। उनके साथ उन्होंने पहले मक्का हब्शा की तरफ़ और फिर हब्शा से मदीना की तरफ़ हिजरत की। जाफ़र से उनके तीन बच्चे पैदा हुए
1, अब्दुल्लाह बिन जाफ़र2, मुहम्मद बिन जाफ़र3, औन बिन जाफ़र
629 ईसवी में ग़स्सानी राजा शरजील बिन अम्र के विरुद्ध मुता (वर्तमान समय मे जॉर्डन का एक छेत्र) के मैदान जंग हुई जिसमें जाफ़र रज़ि शहीद हो गए।
जाफ़र बिन अबू तालिब रज़ि की शहादत के बाद अस्मा बिन्ते उमैस रज़ि अल्लाहु अन्हा का दूसरा निकाह अबू बक्र रज़ि से हुआ उनसे हज्जतुल वदाअ के मौक़े पे मुहम्मद बिन अबू बक्र पैदा हुए ।
अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ि अल्लाहु अन्हु के इंतेक़ाल के बाद अस्मा बिन्ते उमैस रज़ि अल्लाहु अन्हा का तीसरा निकाह अली बिन अबू तालिब रज़ि अल्लाहु अन्हु से हुआ
अली बिन अबू तालिब रज़ि अल्लाहु अन्हु की शहादत के बाद अस्मा बिन्ते उमैस रज़ि अल्लाहु अन्हु अल्लाहु अन्हा के इंतेक़ाल हुआ।
अबु अदीम फ़लाही
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