क़ुरआन हिफ़्ज़ करने का दिमाग़ पर असर: साइंस क्या कहती है?
क्या क़ुरआन हिफ़्ज़ करना सिर्फ़ एक रूहानी इबादत है, या इसका असर हमारे दिमाग़ पर भी पड़ता है?
क़ुरआन मजीद अल्लाह तआला का कलाम है। एक मुसलमान के लिए क़ुरआन पढ़ना, उसे समझना, उस पर अमल करना और उसे अपने सीने में महफ़ूज़ करना बहुत बड़ी नेमत और इबादत है।
लेकिन आज साइंस और न्यूरोसाइंस के ज़रिए एक दिलचस्प सवाल पर भी ग़ौर किया जा रहा है:
क़ुरआन को याद करने, बार-बार दोहराने और बिना देखे पढ़ने का इंसानी दिमाग़ पर क्या असर पड़ता है?
हाल ही में हुई एक रिसर्च ने इसी सवाल के एक पहलू को समझने की कोशिश की। इस रिसर्च में क़ुरआन हिफ़्ज़ करने की मात्रा और दिमाग़ से जुड़े एक अहम प्रोटीन BDNF के बीच ताल्लुक़ का जायज़ा लिया गया।
BDNF क्या है और यह इतना अहम क्यों है?
BDNF का पूरा नाम Brain-Derived Neurotrophic Factor है।
यह एक ऐसा प्रोटीन है जो दिमाग़ के न्यूरॉन्स और उनके आपसी कनेक्शन्स को सहारा देने में अहम किरदार अदा करता है। यह सीखने और याद रखने यानी learning और memory से जुड़े दिमाग़ी अमल में भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
BDNF ख़ास तौर पर दिमाग़ के hippocampus जैसे हिस्सों में पाया जाता है, जो याददाश्त और सीखने के लिए बहुत अहम हैं।
आसान अल्फ़ाज़ में कहें तो BDNF उन जैविक कारकों में से एक है जो दिमाग़ में सीखने और याददाश्त से जुड़े न्यूरॉन्स और उनके कनेक्शन्स को सहारा देते हैं।
क़ुरआन हिफ़्ज़ करने में दिमाग़ क्या करता है?
क़ुरआन हिफ़्ज़ करना सिर्फ़ एक बार पढ़ लेने का नाम नहीं है।
एक हाफ़िज़ को आयत पढ़नी होती है, उसे सुनना होता है, बार-बार दोहराना होता है, फिर बिना देखे पढ़ना होता है और लगातार अपने पुराने सबक़ को दोहराते रहना होता है ताकि वह भूल न जाए।
यानी हिफ़्ज़ के दौरान दिमाग़ को लगातार तीन अहम काम करने पड़ते हैं:
याद करना → महफ़ूज़ रखना → फिर याद करके सुनाना
साइंस की ज़बान में इन्हें Encoding, Storage और Recall कहा जाता है।
रिसर्च में भी बताया गया है कि memorization के दौरान memory के ये बुनियादी processes काम करते हैं। क़ुरआन हिफ़्ज़ करने में आयतों को याद करने के साथ-साथ सही क़िराअत और लगातार दोहराव के ज़रिए हिफ़्ज़ को बरक़रार रखना शामिल है।
रिसर्च कैसे की गई?
इस रिसर्च में 88 बालिग़ लोगों को शामिल किया गया। सभी की उम्र 18 साल या उससे ज़्यादा थी।
इन लोगों को इस बुनियाद पर तीन ग्रुपों में बाँटा गया कि उन्होंने क़ुरआन के कितने जुज़ हिफ़्ज़ किए थे:
- पहला ग्रुप: 10 जुज़ से कम
- दूसरा ग्रुप: 11 से 20 जुज़
- तीसरा ग्रुप: 21 से 30 जुज़
इसके बाद शोधकर्ताओं ने दो चीज़ों को मापा:
1. BDNF का सीरम लेवल: यानी ख़ून में BDNF प्रोटीन की मात्रा।
2. MOCA-INA स्कोर: यह एक cognitive test है जिसके ज़रिए memory, attention, language, executive functions और दूसरी दिमाग़ी क्षमताओं का जायज़ा लिया जाता है।
रिसर्च का सबसे दिलचस्प नतीजा
रिसर्च में एक बहुत दिलचस्प बात सामने आई।
जिन लोगों ने ज़्यादा क़ुरआन हिफ़्ज़ किया था, उनमें BDNF का औसत लेवल भी ज़्यादा पाया गया।
10 जुज़ से कम हिफ़्ज़ करने वाले : 37,414.88 pg/mL11–20 जुज़ हिफ़्ज़ करने वाले : 45,540.25 pg/mL
21–30 जुज़ हिफ़्ज़ करने वाले : 46,005.60 pg/mL
इस नतीजे का statistical analysis p = 0.002 था, जो statistically significant माना जाता है।
यानी इस रिसर्च में क़ुरआन हिफ़्ज़ करने की मात्रा और BDNF के ज़्यादा लेवल के बीच एक महत्वपूर्ण ताल्लुक़ पाया गया।
लेकिन क्या इससे यह साबित हो गया कि हिफ़्ज़ से Intelligence बढ़ती है?
यहाँ थोड़ी एहतियात ज़रूरी है।
नहीं। इस एक रिसर्च की बुनियाद पर ऐसा दावा करना सही नहीं होगा।
शोधकर्ताओं ने MOCA-INA test के ज़रिए cognitive function को भी जाँचा था। तीनों ग्रुपों के बीच इस test के scores में statistically significant फ़र्क़ नहीं मिला।
इसका p-value 0.696 था।
इसलिए इस रिसर्च का सबसे मज़बूत नतीजा यह है कि:
ज़्यादा क़ुरआन हिफ़्ज़ करने वाले लोगों में BDNF का लेवल ज़्यादा पाया गया।
लेकिन यह रिसर्च यह साबित नहीं करती कि ज़्यादा जुज़ हिफ़्ज़ करने से इंसान की intelligence या overall cognitive ability ज़रूर बढ़ जाती है।
यह फ़र्क़ समझना बहुत ज़रूरी है।
किसी दो चीज़ों के बीच ताल्लुक़ मिलना और यह साबित होना कि एक चीज़ दूसरी की सीधी वजह है, दोनों अलग बातें हैं।
BDNF और दिमाग़ की Neuroplasticity
BDNF का एक अहम ताल्लुक़ neuroplasticity से भी बताया जाता है।
Neuroplasticity से मुराद दिमाग़ की वह सलाहियत है जिसके ज़रिए learning और experience के मुताबिक़ neurons और उनके connections में बदलाव और adaptation हो सकता है।
रिसर्च के discussion में BDNF को cognitive function और memory से relate किया गया है। इसमें पहले की एक study का भी ज़िक्र है जिसमें क़ुरआन के हाफ़िज़ लोगों में administrative workers के मुक़ाबले BDNF serum level ज़्यादा पाया गया था।
शोधकर्ताओं ने यह संभावना ज़ाहिर की कि क़ुरआन हिफ़्ज़ करने जैसी धार्मिक सरगर्मियाँ दिमाग़ की neuroplasticity को support कर सकती हैं।
यहाँ एक दिलचस्प पहलू सामने आता है।
एक हाफ़िज़ जब रोज़ अपने सबक़ को दोहराता है, पुराने सबक़ की मुराजअत करता है, मिलती-जुलती आयतों को अलग-अलग पहचानता है और बिना देखे आयात पढ़ता है, तो उसका दिमाग़ लगातार information को process और recall कर रहा होता है।
सिर्फ़ हिफ़्ज़ ही नहीं, तिलावत और सुनने पर भी रिसर्च
इस आर्टिकल में क़ुरआन सुनने और पढ़ने से जुड़ी कुछ दूसरी studies का भी ज़िक्र किया गया है।
एक स्टडी में क़ुरआन सुनने वाले ट्रीटमेंट ग्रुप (treatment group) में याददाश्त में में बेहतरी देखी गई।
एक दूसरी स्टडी के हवाले से बताया गया कि बुज़ुर्ग लोगों में क़ुरआन पढ़ना कॉग्निटिव डिक्लाइन (cognitive decline) को कम करने से जुड़ा हो सकता है। आर्टिकल में यह भी बताया गया कि क़ुरआन पढ़ना और सुनना सुकून, तक़वा और जज़्बात (emotions) को कंट्रोल करने में मदद कर सकता है।
लेकिन इन नतीजों को भी सही अंदाज़ में समझना चाहिए।
ये स्टडीज़ संभावित फ़ायदों और ताल्लुक़ात की तरफ़ इशारा करती हैं। इन्हें हर इंसान और हर परिस्थिति पर लागू होने वाला अंतिम साइंटिफिक सबूत (scientific proof) कहना सही नहीं होगा।
क़ुरआन हिफ़्ज़: सिर्फ़ दिमाग़ की मश्क़ (Exercise) नहीं
यहाँ एक बहुत अहम बात समझने की ज़रूरत है।
साइंस क़ुरआन हिफ़्ज़ करने के दिमाग़ी (cognitive) और जिस्मानी असरात (biological aspects) को माप (measure) कर सकती है, लेकिन क़ुरआन हिफ़्ज़ करने की रूहानी बरकत को किसी blood test या brain scan से measure नहीं किया जा सकता।
एक मुसलमान क़ुरआन इसलिए हिफ़्ज़ नहीं करता कि उसकी याददाश्त बेहतर हो जाए या उसका memory test अच्छा आ जाए।
वह इसलिए हिफ़्ज़ करता है क्योंकि यह अल्लाह के कलाम को अपने सीने में महफ़ूज़ करने की इबादत है।
अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:
وَلَقَدْ يَسَّرْنَا الْقُرْآنَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ
“और यक़ीनन हमने क़ुरआन को नसीहत हासिल करने के लिए आसान कर दिया है, तो क्या कोई है जो नसीहत हासिल करे?” [सूरह अल-क़मर 54:17]
और नबी ﷺ ने फ़रमाया: “तुम में सबसे बेहतर वह है जो क़ुरआन सीखे और सिखाए।” [सहीह अल-बुख़ारी]
इसलिए क़ुरआन हिफ़्ज़ का असल मक़सद सिर्फ़ memory को मज़बूत करना नहीं, बल्कि अल्लाह के कलाम को सीखना, उसे समझना, उस पर अमल करना और अपनी ज़िंदगी को उसके मुताबिक़ ढालना है।
तो फिर साइंस हमें क्या बताती है?
इस रिसर्च से हमें एक दिलचस्प साइंटिफिक ऑब्ज़र्वेशन (scientific observation) मिलता है:
क़ुरआन के ज़्यादा जुज़ हिफ़्ज़ करने वाले participants में BDNF का serum level ज़्यादा पाया गया।
यह एक ऐसा बायोलॉजिकल फ़ैक्टर (biological factor) है जो learning, memory और brain plasticity से जुड़ा हुआ है।
लेकिन दूसरी तरफ़ cognitive screening test यानी MOCA-INA में तीनों groups के बीच significant difference नहीं मिला।
इसलिए balanced scientific conclusion यही होगा कि:
क़ुरआन हिफ़्ज़ करने और BDNF के लेवल के बीच इस study में एक महत्वपूर्ण ताल्लुक़ पाया गया, लेकिन इस study से यह साबित नहीं होता कि क़ुरआन हिफ़्ज़ करना सीधे तौर पर intelligence या overall cognitive ability को बढ़ाता है। इस ताल्लुक़ को बेहतर ढंग से समझने के लिए mazeed और बड़ी तथा लंबे समय तक चलने वाली studies की ज़रूरत है।
क़ुरआन को याद करने से बढ़कर है क़ुरआन को ज़िंदगी में उतारना
क़ुरआन का हिफ़्ज़ एक बहुत बड़ी नेमत है। लेकिन क़ुरआन सिर्फ़ ज़बान पर रहने के लिए नहीं उतारा गया।
वह दिल को बदलने के लिए आया है।
- दिमाग़ आयतों को याद करता है।
- ज़बान उन्हें दोहराती है।
- कान उन्हें सुनते हैं।
- दिल उन्हें महसूस करता है।
और जब क़ुरआन ज़िंदगी में उतरता है, तो इंसान के अख़लाक़, किरदार और आमाल उसकी गवाही देने लगते हैं।
इसलिए अगर कोई बच्चा या बड़ा क़ुरआन हिफ़्ज़ कर रहा है, तो हमें उसके इस सफ़र को सिर्फ़ एक academic achievement की तरह नहीं देखना चाहिए।
यह उसके और उसके रब के बीच एक रिश्ता बनाने का सफ़र है।
और अगर science हमें यह बताती है कि इस process में memory और brain से जुड़े कुछ दिलचस्प biological changes भी देखे जा सकते हैं, तो यह इस महान इबादत के cognitive पहलू को समझने का एक अतिरिक्त ज़रिया है।
क़ुरआन को हिफ़्ज़ करना सिर्फ़ क़ुरआन को याद रखना नहीं...
क़ुरआन को अपने सीने में जगह देना है।
और असल काम तब शुरू होता है जब जो कलाम सीने में महफ़ूज़ हुआ है,
वह हमारे किरदार में भी नज़र आने लगे।
By Islamic Theology

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