नमाज़-ए-जनाज़ा में सूरह फातिहा
नमाज़-ए-जनाज़ा में सूरह फातिहा की किरात (पढ़ना) वाजिब है। यह नबवी सुन्नत है।
सैय्यदना अबू उमामा बिन सहल बिन हनीफ रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं :
السُّنَّةُ فِي الصَّلَاةِ عَلَى الْجَنَازَةِ أَنْ يُكَبِّرَ ثُمَّ يَقْرَأَ بِأُمِّ الْقُرْآنِ ثُمَّ يُصَلِّيَ عَلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ثُمَّ يُخْلِصَ الدُّعَاءَ لِلْمَيِّتِ وَلَا يَقْرَأُ إِلَّا فِي التَّكْبِيرَةِ الْأُولَى ثُمَّ يُسَلِّمَ فِي نَفْسِهِ عَنْ يَمِينِهِ
नमाज़-ए-जनाज़ा में सुन्नत यह है कि आदमी तकबीर कहे, फिर सूरह फातिहा पढ़े, फिर नबी करीम ﷺ पर दरूद पढ़े, फिर मैय्यत के लिए इखलास के साथ दुआ करे, पहली तकबीर के अलावा किरात न करे, फिर अपने दिल में दाईं तरफ सलाम फेर दे। [अल-मुंतका लबनी अल-जारूद: 540] और इसकी सनद सहीह है।
तलहा बिन अब्दुल्लाह रहिमहुल्लाह बयान करते हैं,
صَلَّيْتُ خَلْفَ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا عَلَى جَنَازَةٍ فَقَرَأَ فِيهَا بِفَاتِحَةِ الْكِتَابِ، فَأَخَذْتُ بِيَدِهِ فَقُلْتُ : تَقْرَأُ بِهَا قَالَ : إِنَّهَا سُنَّةٌ وَحَقُّ
मैंने सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा के पीछे नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी, उन्होंने इसमें सूरह फातिहा की किरात की, फारिग होने पर मैंने उनका हाथ पकड़ कर कहा: आप सूरह फातिहा (क्यों) पढ़ रहे हैं? फरमाया: यह सुन्नत और हक है। [सहीह बुखारी: 1335, अल-मुंतका लबनी अल-जारूद: 534]
सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने सूरह फातिहा की किरात ऊँची आवाज़ से की, ताकि सुनने वालों को मालूम हो जाए कि यह अमल सुन्नत है। सुन्नत से मुराद नबी करीम का तरीका है, सुन्नत वाजिब भी होती है और मुस्तहब भी। दिगर दलीलों से साबित है कि हर नमाज़ में सूरह फातिहा की किरात वाजिब है, इसके बिना नमाज़ नहीं। लिहाज़ा सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने जो सूरह फातिहा की किरात को सुन्नत कहा है, उससे मुराद वाजिब सुन्नत है। यही राजहे है, वल्लाहु आलम!
हनफी नमाज़-ए-जनाज़ा:
अहनाफ (हनफियों) की नमाज़-ए-जनाज़ा का मुकम्मल तरीका साबित नहीं।
1. तकबीर के वक्त हाथ कानों को छूते हैं, यह बिल्कुल साबित नहीं।
2. ज़ेर-ए-नाफ हाथ बांधते हैं, यह तरीका भी किसी मरफू या मौकूफ साबित रिवायत में मनकूल नहीं।
3. सना पढ़ते हैं, सना के कलमात में "व जल्ला सना-उ-क" के अल्फाज़ का इज़ाफ़ा करते हैं, जो कुतुब-ए-हदीस में कहीं मज़कूर नहीं।
4. दूसरी तकबीर में दरूद पढ़ते हैं, दरूद के जो सीगे पढ़े जाते हैं, वह साबित नहीं।
5. आखरी तकबीर में "अल्लाहुम्मा-ग़फ़िर लि-हय्यिना..." दुआ पर इक्तिफ़ा (बस) करते हैं, जबकि यह दुआ साबित नहीं। [सुनन अबी दाऊद: 3201]
यह अबू सलमा रहिमहुल्लाह की मुरसल (ज़ईफ़/कमज़ोर) है, इसमें अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु या अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अन्हु का ज़िक्र खता (गलती) है, जैसा कि इमाम अबू हातिम राजी और इमाम दारकुतनी रहिमहुल्लाह ने फ़रमाया है। [इलाल इब्न अबी हातिम: 1047, 1058, इलाल अल-दारकुतनी: 1794]
तम्बीह:
उलेमा-ए-अहनाफ़ ने लिखा है:
إِذَا سَاقَ الدَّابَّةَ بِقَوْلِهِ : «هِرْ» أَوْ سَاقَ الْكَلْبَ بِقَوْلِهِ : «جِرْ» يَقْطَعُ، وَإِنْ سَاقَهَا بِمَا لَيْسَ لَهُ حُرُوفٌ مُهَجَّاةٌ لَا يَقْطَعُ الصَّلَاةَ، وَكَذَا إِذَا دَعَا الْهِرَّةَ بِمَا لَهُ حُرُوفٌ مُهَجَّاةٌ يَقْطَعُ الصَّلَاةَ، وَإِذَا دَعَاهَا بِمَا لَيْسَ لَهُ حُرُوفٌ مُهَجَّاةٌ لَا يَقْطَعُ الصَّلَاةَ، وَكَذَا إِذَا نَفَرَهَا بِمَا لَهُ حُرُوفٌ مُهَجَّاةٌ قَطَعَ ، هَكَذَا فِي الذَّخِيرَةِ
जब कोई शख्स जानवर को हांके, मसलन ”पुर“ कह कर (बिल्ली को या ”जर“ कह कर कुत्ते को), तो नमाज़ टूट जाती है। अगर वह उसे ऐसी आवाज़ से हांके, जिसमें हुरूफ न हों, तो नमाज़ नहीं टूटती। इसी तरह अगर वह बिल्ली को ऐसे अल्फाज़ के साथ बुलाए, जिनमें हुरूफे हिज्जा हों, तो नमाज़ टूट जाएगी और अगर ऐसी आवाज़ से बुलाए, जिसमें हुरूफ न हों, तो नमाज़ नहीं टूटती। इसी तरह अगर वह उसे ऐसे अल्फाज़ के साथ भगाए, जिनमें हुरूफ हों, तो नमाज़ टूट जाएगी। इसी तरह ”अल्-ज़खीरा“ में मज़कूर है। [फ़तावा आलमगीरी: 1/101]
Team Islamic Theology

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