पसीना सूखने से पहले मज़दूरी?
सवाल: दर्ज-ज़ैल रिवायत बिलिहाज़-ए-सनद (सनद के लिहाज़ से) कैसी है?
सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है कि रसूल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
أَعْطُوا الْأَجِيرَ أَجْرَهُ قَبْلَ أَنْ يَجِفَّ عَرَقُهُ
मज़दूर को उसकी मज़दूरी पसीना सूखने से पहले-पहले दे दें। [ सुनन इब्ने माजह: 2443] सनद सख़्त ज़ईफ़।
अब्दुर रहमान बिन ज़ैद बिन अस्लम ज़ईफ़ और मतरूक रावी है।
अल्लामा ज़ैलाई हनफ़ी रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं:
هُوَ مَعْلُولٌ
यह रिवायत मअलूल (ज़ईफ़) है। [नसबुर राया: 4/129]
हाफ़िज़ बुसैरी रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं:
هُذَا إِسْنَادٌ ضَعِيفٌ
यह सनद ज़ईफ़ (कमज़ोर) है। [मिसबाहुज़ ज़ुजाजह: 3/75]
सैय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
أَعْطُوا الْأَجِيرَ أَجْرَهُ قَبْلَ أَنْ يَجِفَّ عَرَقْهُ
मज़दूर को उसकी मज़दूरी पसीना सूखने से पहले-पहले दे दें। [अल-कामिल लि-इब्ने अदी: 7/465, अस-सुननुल कुब्रा लिल-बैहक़ी: 6/121]
जवाब: सनद ज़ईफ़ है। सुवैद बिन सईद हदासी ब-कसरत क़बूल करता था, जिस वजह से उसे ज़ईफ़ क़रार दिया गया।
हाफ़िज़ इब्ने हजर रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं:
صَدُوقٌ فِي نَفْسِهِ؛ إِلَّا أَنَّهُ عَمِيَ ، فَصَارَ يَتَلَقَّنُ مَا لَيْسَ مِنْ حَدِيثِهِ
यह सदूक़ (सच्चा) था, नाबीना (अंधा) होने के बाद तलक़ीन क़बूल कर लेता था। [तक़रीबुत तहज़ीब : 2690]
शराह मुश्किल अल-आसार लित-तहावी:5997 ही की एक दूसरी रिवायत में भी सुवैद बिन सईद की तसह़ीफ़ (लिखने की गलती) सईद बिन मंसूर से हुई है, क्योंकि दिगर किताबों में सालेह बिन मूसा त़लह़ी से नक़्ल करने वाले सुवैद बिन सईद हैं, न कि सईद बिन मंसूर।
इसकी दूसरी सनद भी है।
[मुसनद अबी याला: 6682, फ़वाइद-ए-तमाम: 44, अल-कामिल लि-इब्ने अदी: 5/294, अस-सुननुल कुब्रा लिल-बैहक़ी: 6/62] सनद ज़ईफ़ है।
अब्दुल्लाह बिन जाफ़र बिन बीह ज़ईफ़ है।
अब्दुल्लाह बिन जाफ़र की मुताबाबत सुफ़ियान सौरी रहिमहुल्लाह ने की है।[फ़वाइद-ए-तमाम: 1412, हिल्यतुल औलिया लि-अबी नुऐम: 7/142] यह सनद बातिल है।
अब्दुल अज़ीज़ बिन अबान 'मतरूक' है।
सुफ़ियान सौरी का 'अन-अना' है। ।लिहाज़ा यह मुताबाबत मुफीद (फायदेमंद) नहीं है।
इसकी तीसरी सनद भी है।[अस-सुननुल कुब्रा लिल-बैहक़ी: 6/199] सनद सख़्त ज़ईफ़ है।
मुहम्मद बिन यज़ीद बिन रिफ़ाआ ज़ईफ़ है।
हफ़्स बिन ग़ियास का 'अन-अना' है।
इमाम बैहक़ी रहिमहुल्लाह ने इस हदीस की सनद को "ज़ईफ़" क़रार दिया है।[अस-सुननुल सग़ीर: 2161]
सैय्यदना उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
أَعْطُوا الْأَجِيرَ أَجْرَهُ مَا دَامَ فِي رَشْحِهِ
मज़दूर को उसकी मज़दूरी उस वक्त दे दें, जब वह अभी पसीने में हो (और उसका पसीना सूखा न हो)। सनद झूठी है। [अल-अहादीसुल मुख़्तारा लिज़-ज़िया: 1/183]
हामिद बिन आज़म मरवज़ी 'कज़्ज़ाब' (महाझूठा) और 'वज़्ज़ा' (हदीस गढ़ने वाला) है।
अहमद बिन अब्बाद बिन तमीम के हालात-ए-ज़िंदगी नहीं मिले।
अबुल हसन मुहम्मद बिन मुहम्मद बिन इब्राहीम बिन अबी खुरासान का 'तरजुमा' (बायोडाटा) नहीं मिला।
सैय्यदना जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
أَعْطُوا الْأَجِيرَ أَجْرَهُ قَبْلَ أَنْ يَجِفَّ عَرَقُهُ
मज़दूर को उसकी मज़दूरी पसीना सूखने से पहले-पहले दे दें। [नसबुर राया लिज़-ज़ैलाई: 4/130] झूठी रिवायत है।
बिश्र बिन हुसैन हिलाली 'मतरूक' और 'कज़्ज़ाब' है।
अबू अब्दुल्लाह तिरमिज़ी हकीम ग़ैर-मुअतबर है।
मुहम्मद बिन ज़ियाद बिन ज़बाद कल्बी ज़ईफ़ है।
मूसा बिन अब्दुल्लाह बिन सईद अज़दी के हालात-ए-ज़िंदगी नहीं मिले।
हाफ़िज़ इब्ने हजर रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं:
إِسْنَادُهُ ضَعِيفٌ جِدًّا
यह सनद सख़्त तरीन ज़ईफ़ है। [अद-दराया: 2/186] इस हदीस की सारी की सारी सनदें ज़ईफ़ और ग़ैर-साबित हैं।
हाफ़िज़ इब्ने मुलक्क़िन रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं:
هُذَا الْحَدِيثُ مَرْوِيٌّ مِنْ طُرُقٍ كُلُّهَا ضَعِيفَةٌ
यह हदीस कई सनदों से मरवी है, वह सारी की सारी ज़ईफ़ (कमज़ोर) हैं। [अल-बद्रुल मुनीर: 7/37]
हाफ़िज़ इब्ने हजर रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं:
كُلُّهَا ضِعَافٌ
यह तमाम सनदें ज़ईफ़ (कमज़ोर) हैं। [बुलुग़ुल मराम: 913]
फ़ायदा:
सैय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
قَالَ رَبُّكُمْ : ثَلاثَةٌ أَنَا خَصْمُهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَمَنْ كُنْتُ خَصْمَهُ خَصَمْتُهُ : رَجُلٌ أَعْطَى بِي ثُمَّ غَدَرَ وَرَجُلٌ بَاعَ حُرًّا فَأَكَلَ ثَمَنَهُ وَرَجُلٌ اسْتَأْجَرَ أَجِيرًا فَاسْتَوْفَى مِنْهُ وَلَمْ يُوَفِّهِ أَجْرَهُ
तुम्हारा रब कहता है: क़यामत वाले दिन मैं तीन आदमियों के मुक़ाबले (मद-ए-मुक़ाबिल) हूँगा और मैं जिसके मुक़ाबले हूँगा उससे झगड़ूँगा। (1) वह आदमी जिसने मेरे नाम पर (अहद/वादा) देकर धोखा किया। (2) वह आदमी जिसने किसी आज़ाद आदमी को बेचकर उसकी क़ीमत खाई। (3) वह आदमी जिसने किसी को मज़दूरी पर लगाया, उससे काम तो पूरा लिया लेकिन उजरत (मज़दूरी) पूरी न दी।
[सहीह बुखारी: 2227, अल-मुन्तक़ा लि-इब्ने जारूद: 579]
Team Islamic Theology

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