क़ुर्बानी के अहकाम व मसाइल
4. क़ुरबानी मशरूअ है
अहले-सुन्नत वल-जमाअत के यहाँ क़ुरबानी मशरूअ है। क़ुरबानी में मख़सूस दिन को मख़सूस उम्र के जानवरों का खून बहाया जाता है। यह मुसलमानों का मुतवारिस (पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा) अमल है और इस पर उम्मत का तआमुल रहा है। नबी करीम ﷺ ने खुद क़ुरबानी की, सहाबा, ताबेईन, तब-ए-ताबेईन और अइम्मा-ए-दीन क़ुरबानी करते रहे। नीज़ क़ुरबानी के इस्तेहबाब व मशरूइयत पर किताब-ओ-सुन्नत और उम्मत का इजमा दलील है। यह इस्लाम का शआर और अल्लाह करीम के शुक्र का निराला अंदाज़ भी है। क़ुरबानी अल्लाह का हक़ है और उसके कु़र्ब का बेहतरीन ज़रिया है।
सैय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
مَا يَزَالُ عَبْدِي يَتَقَرَّبُ إِلَيَّ بِالنَّوَافِلِ حَتَّى أُحِبَّهُ، فَإِذَا أَحْبَبْتُهُ، كُنْتُ سَمْعَهُ الَّذِي يَسْمَعُ بِهِ، وَبَصَرَهُ الَّذِي يُبْصِرُ بِهِ، وَيَدَهُ الَّتِي يَبْطِشُ بِهَا، وَرِجْلَهُ الَّتِي يَمْشِي بِهَا، وَإِنْ سَأَلَنِي، لَأُعْطِيَنَّهُ، وَلَئِنِ اسْتَعَاذَنِي لَأُعِيذَنَّهُ
अल्लाह तआला फ़रमाते हैं: 'मेरा कु़र्ब हासिल करने के लिए मेरा बंदा नवाफ़िल का इस कदर एहतिमाम करता है कि मैं उससे मोहब्बत करने लगता हूँ। जब मैं उससे मोहब्बत करता हूँ, तो मैं उसका कान बन जाता हूँ, जिससे वह सुनता है, उसकी आँख बन जाता हूँ, जिससे वह देखता है, उसका हाथ बन जाता हूँ, जिससे वह पकड़ता है, उसका पाँव बन जाता हूँ, जिससे वह चलता है। मुझसे माँगे, तो उसे अता करता हूँ और अगर मेरी पनाह तलब करे, तो उसे पनाह देता हूँ। [सहीह बुखारी: 6502]
साबित हुआ कि नवाफ़िल कु़र्ब-ए-इलाही का ज़रिया हैं, क़ुरबानी भी नफ़्ली इबादत है, लिहाज़ा यह हदीस क़ुरबानी को भी शामिल है।
जो लोग क़ुरबानी की अहानत (अपमान) करते हुए उसको तर्क कर देते हैं, वे गुनहगार हैं।
अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:
وَلِكُلِّ أُمَّةٍ جَعَلْنَا مَنْسَكًا لِيَذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَى مَا رَزَقَهُمْ مِنْ بَهِيمَةِ الْأَنْعَامِ ﴾ (الحج : ٣٤)
हमने हर उम्मत के लिए क़ुरबानी मुक़र्रर की है, ताकि वो उन पर (अल्लाह की) अता की हुई चौपायों पर अल्लाह का नाम ज़िक्र करें।
सैय्यदना अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं:
ضَحَى النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بِكَبْشَيْنِ أَمْلَحَيْنِ، فَرَأَيْتُهُ وَاضِعًا قَدَمَهُ عَلَى صِفَاحِهِمَا ، يُسَمِّي وَيُكَبِّرُ ، فَذَبَحَهُمَا بِيَدِهِ
रसूल अल्लाह ﷺ ने दो सफेद और काले रंग के मेंढे कुर्बान किए, मैंने देखा कि आपने अपना कदम मुबारक उनकी गर्दनों पर रखा, अल्लाह का नाम लिया, तकबीर कही और उनको अपने हाथों से जि़बह कर दिया। [सहीह बुखारी: 5558, सहीह मुस्लिम: 1966]
हाफिज़ बग़वी रहमतुल्लाहि अलैहि फरमाते हैं:
هذَا حَدِيثُ مُتَّفَقٌ عَلَى صِحَّتِهِ
इस हदीस के सही होने पर इत्तिफ़ाक़ है। [शर्ह अस-सुन्नाह: 4/334]
इमाम इब्न मुन्ज़िर रहमतुल्लाहि अलैहि (319 हिजरी) फ़रमाते हैं:
أَجْمَعُوا عَلَى أَنَّ الضَّحَايَا لَا يَجُوزُ ذِبْحُهَا قَبْلَ طُلُوعِ الْفَجْرِ مِنْ يَوْمِ النَّحْرِ
"इज्माअ़ है कि दस ज़ुल-हिज्जा के तुलू-ए-फ़ज्र से पहले क़ुरबानियाँ ज़िबह करना जायज़ नहीं।" [अल-इजमा: 78]
हाफ़िज़ इब्न अब्दुल बर्र रहमतुल्लाहि अलैहि (463 हिजरी) फ़रमाते हैं:
الَّذِي يُضَحَى بِهِ بِإِجْمَاعٍ مِّنَ الْمُسْلِمِينَ الْأَزْوَاجُ الثَّمَانِيَةُ وَهِيَ الضَّأْنُ وَالْمَعِزُ وَالْإِبِلُ وَالْبَقَرُ
मुसलमानों का इजमा है कि चार किस्म के जोड़ों की क़ुरबानी होगी: भेड़, बकरी, ऊँट और गाय। [मुवत्ता मिन अल-मआनी वल-असानीद: 23/188]
अल्लामा ग़ज़ाली रहमतुल्लाहि अलैहि (505 हिजरी) फ़रमाते हैं:
الضَّحَايَا مِنَ الشَّعَائِرِ وَالسُّنَنِ الْمُؤَكَّدَةِ
क़ुरबानी इस्लाम के शआर में से है और सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। [अल-वसीत: 7/131]
हाफ़िज़ नववी रहमतुल्लाहि अलैहि (676 हिजरी) फ़रमाते हैं:
التَّضْحِيَةُ سُنَّةٌ مُؤَكَّدَةٌ، وَشِعَارٌ ظَاهِرٌ، يَنْبَغِي لِمَنْ قَدِرَ أَنْ يُحَافِظُ عَلَيْهَا
क़ुरबानी सुन्नत-ए-मुअक्कदा और दीन का वाज़ेह शआर है, जो इस्तताअत रखता हो, उसे चाहिए कि इस पर मुहाफ़ज़त (पाबंदी) करे। [रौज़तुल तालिबीन: 3/192]
अल्लामा इब्न क़ुदामा रहमतुल्लाहि अलैहि (682 हिजरी) फ़रमाते हैं:
أَجْمَعَ الْمُسْلِمُونَ عَلَى مَشْرُوعِيَّةِ الْأُضْحِيَّةِ
क़ुरबानी की मशरूइयत पर मुसलमानों का इजमा है। [अश-शर्ह अल-कबीर: 3/530]
हाफ़िज़ इब्न दक़ीक़ अल-ईद रहमतुल्लाहि अलैहि (702 हिजरी) फ़रमाते हैं:
لَا خِلَافَ أَنَّ الْأُضْحِيَّةَ مِنْ شَعَائِرِ الدِّينِ
"कु़रबानी दीन के शआर में से है, इसमें कोई इख़्तिलाफ़ नहीं है।" [एहकामुल एहकाम शर्ह उम्दतुल एहकाम: 2/291]
शेख़ुल इस्लाम इब्न तैमिया रहमतुल्लाहि अलैहि (728 हिजरी) फ़रमाते हैं:
إِنَّهَا مِنْ أَعْظَمِ شَعَائِرِ الْإِسْلَامِ
क़ुरबानी इस्लाम के अज़ीम शआर में से है। [मजमूअ अल-फ़तावा: 23/162]
हाफ़िज़ इब्न हजर रहमतुल्लाहि अलैहि (852 हिजरी) फ़रमाते हैं:
لَا خِلَافَ فِي كَوْنِهَا مِنْ شَرَائِعِ الدِّينِ
इसमें कोई इख़्तिलाफ़ नहीं कि क़ुरबानी मशरूअ है। [फ़तह अल-बारी: 10/3
अल्लामा इब्न मुफ़लिह रहमतुल्लाहि अलैहि (884 हिजरी) फ़रमाते हैं:
قَدْ أَجْمَعَ الْمُسْلِمُونَ عَلَى مَشْرُوعِيَّتِهَا
बिला शुबा क़ुरबानी की मशरूइयत पर मुसलमानों का इजमा है। [अल-मुबदी: 3/3]
अल्लामा इब्न हजर हैतमी रहमतुल्लाहि अलैहि (974 हिजरी) फ़रमाते हैं:
الْأَصْلُ فِي مَشْرُوعِيَّتِهَا الْكِتَابُ وَالسُّنَّةُ وَإِجْمَاعُ الْأُمَّةِ
क़ुरबानी की मशरूइयत पर दलील किताब-ओ-सुन्नत और इजमा-ए-उम्मत है। [तुहफ़तुल मुहताज: 9/343]
अल्लामा शौक़ानी रहमतुल्लाहि अलैहि (1250 हिजरी) फ़रमाते हैं:
لَا خِلَافَ فِي مَشْرُوعِيَّةِ الْأُضْحِيَّةِ وَأَنَّهَا قُرْبَةٌ عَظِيمَةٌ وَسُنَّةٌ مُؤَكَّدَةٌ
इसमें कोई इख़्तिलाफ़ नहीं कि क़ुरबानी मशरूअ है, यह अज़ीम इबादत है और सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। [अस-सैलुल जर्रार: 4/73]
अल्लामा इब्न आबिदीन शामी हनफी रहमतुल्लाहि अलैहि (1252 हिजरी) फ़रमाते हैं:
إِذَا أَنْكَرَ أَصْلَ مَشْرُوعِيَّتِهِ الْمُجْمَعِ عَلَيْهَا بَيْنَ الْأُمَّةِ فَإِنَّهُ يَكْفُرُ
जिस अमल की मशरूइयत पर उम्मत का इजमा हो, अगर कोई उसका सिरे से इनकार कर दे, तो वह काफ़िर हो जाएगा। [फतवा अल-शमी: 6/314]
हनफी उलेमा-ए-अहनाफ ने लिखा है:
لَوْ أَنْكَرَ أَصْلَ الْوِتْرِ وَأَصْلَ الْأُضْحِيَّةِ كَفَرَ
अगर कोई शख़्स वित्र और क़ुरबानी की मशरूइयत का इनकार करे, वह काफ़िर हो जाएगा। [अल-बहर अल-राइक़ लिल-इब्न नुजैम: 2/51, शर्ह अल-शिफ़ा लिल-मुल्ला अली अल-क़ारी: 2/426]
क़ुरबानी की क़ीमत:
क़ुरबानी क़ुर्ब-ए-इलाही का बेहतरीन ज़रिया है, वह खून बहा कर ही मुमकिन है। क़ुरबानी इस्लाम का शआर है, इसे क़ायम-ओ-दायम रखना मुसलमानों पर ज़रूरी है। इसकी क़ीमत देना जायज़ नहीं, बहर-सूरत जानवर ही ज़िबह किया जाएगा, खु़सूसन उन हालात में जब पूरी दुनिया आलमी मुसीबत की लपेट में है, इसमें क़ुरबानी जैसा अमल बाइस-ए- ख़ैर बन सकता है।
बाज़ लोग इस वक्त सरगर्दां हैं, कमज़ोर ईमान वालों को अपने जाल में फँसा रहे हैं कि आप क़ुरबानी की रक़म किसी मरीज़ और ज़रूरत मंद को दे दें। यह नज़रिया इस्लाम और अहल-ए-इस्लाम के मुफ़ाद में नहीं है। मुसलमानों को चाहिए कि क़ुरबानी की सुन्नत को ज़िंदा रखें।
उलेमा-ए-अहनाफ़ ने लिखा है:
إِنَّ الْأُمَّةَ أَجْمَعَتْ عَلَى أَنَّهُ لَوْ أَدَّى الْقِيمَةَ مَكَانَ الشَّاةِ فِي الضَّحَايَا وَالْهَدَايَا لَا يَكُونُ كَافِيًا۔
उम्मत का इजमा है कि अगर कोई शख़्स क़ुरबानी या हदी में बकरी की जगह उसकी क़ीमत अदा कर दे, तो यह किफ़ायत नहीं करेगा। [अल-बिनाया लिल-ऐनी: 3/350, फ़तावा शामी: 2/286]
दस ज़ुल-हिज्जा का सूरज पैग़ाम-ए-मुसर्रत लेकर मुस्कुराहटों की किरणें बिखेरता हुआ तुलू हुआ, दो रकात नमाज़ की अदायगी और खु़त्बा-ए-ईद सुनने के बाद फ़रज़ंदान-ए-तौहीद घरों को पहुँचे, जानवर की लगाम थामी, आज़ज़ी-ओ-फ़ुरूतनी और इताअत-ओ-फ़रमाँबरदारी के जज़्बात से सरशार होकर بِسْمِ اللهِ وَاللَّهُ أَكْبَرُ का नारा लगाया और गर्दन पर छुरी चला के सुन्नत को दवाम बख़्शा; इस अमल की बुनियाद खु़र्द-ओ-नोश और रियाकारी नहीं, बल्कि शआर-ए-इस्लाम के साथ लगाव और गहरी मोहब्बत का नतीजा है।
अहकाम-ओ-मसाइल
जानवर की उम्र:
क़ुरबानी के जानवर का दौंदा होना शर्त है, यह कम से कम उम्र है, वरना इससे ज़ायद उम्र के जानवर की क़ुरबानी भी जायज़ है।
सैय्यदना जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
لَا تَذْبَحُوا إِلَّا مُسِنَّةٌ إِلَّا أَنْ يُعْسَرَ عَلَيْكُمْ فَتَذْبَحُوا جَذَعَةً مِّنَ الضَّأْنِ
"दौंदा जानवर ही ज़िबह करें, तंगी की सूरत में भेड़ की नस्ल से जज़आ ज़िबह कर लें।" [सहीह मुस्लिम: 1963]
हाफ़िज़ नववी रहमतुल्लाहि अलैहि (676 हिजरी) फ़रमाते हैं:
قَالَ الْعُلَمَاءُ: الْمُسِنَّةُ هِيَ الثَّنِيَّةُ مِنْ كُلِّ شَيْءٍ مِنَ الْإِبِلِ وَالْبَقَرِ وَالْغَنَمِ فَمَا فَوْقَهَا، وَهَذَا تَصْرِيحٌ بِأَنَّهُ لَا يَجُوزُ الْجَذَعُ مِنْ غَيْرِ الضَّأْنِ فِي حَالٍ مِنَ الْأَحْوَالِ، وَهَذَا مُجْمَعٌ عَلَيْهِ عَلَى مَا نَقَلَهُ الْقَاضِي عِيَاضٌ۔
अहले-इल्म कहते हैं : "मिस्र्न्नह ऊंट, गाय और बकरी में दौंदे या इससे बड़ी उम्र के जानवर को कहते हैं, इसमें वाज़ेह सराहत है कि भेड़ के अलावा किसी जिंस का खीरा जानवर की किसी सूरत क़ुरबानी जायज़ नहीं, इस पर इजमा है जैसा कि क़ाज़ी अयाज़ रहमतुल्लाहि अलैहि ने नक़ल किया है।" [शर्ह मुस्लिम : 13/11]
सैय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं:
ثَنِيًّا فَصَاعِدًا وَاسْتَسْمِنْ فَإِنْ أَكَلْتَ أَكَلْتَ طَيِّبًا وَإِنْ أَطْعَمْتَ أَطْعَمْتَ طَيِّبًا
"क़ुरबानी का जानवर दौंदा या इससे बड़ा हो, इसे खूब फ़र्बा (मोटा-ताज़ा) कीजिए, जब खिलाएँ, तो अच्छा खिलाएँ।" [अल्-सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 9/273,] और इसकी सनद सही है।
तमाम अहल-ए-लुग़त के नज़दीक मिसिन्नह का मानी दौंदा है। बाज़ अहल-ए-इल्म ने सहूलियत के पेश-ए-नज़र जानवर की उम्र बयान कर दी है। अगर (जानवर) इस उम्र को पहुँच जाता है, मगर दौंदा नहीं होता, तो क़ुरबानी जायज़ नहीं। इसलिए क़ुरबानी में शर्त जानवर के दौंदा होने की है, न कि उम्र की।
सैय्यदना अबू बुर्दा बिन दीनार अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु ने नमाज़-ए-ईद से पहले ही क़ुरबानी कर ली, तो नबी करीम ﷺ ने दोबारा क़ुरबानी करने का हुक्म फ़रमाया। अर्ज़ किया: अल्लाह के रसूल! मेरे पास खीरा बकरा है, जो दौंदा से बेहतर है। फ़रमाया:
اذْبَحْهَا ، وَلَنْ تَجْزِيَ جَذَعَةٌ عَنْ أَحَدٍ بَعْدَكَ
"आप इसी की क़ुरबानी कर सकते हैं, लेकिन किसी और के लिए खीरा बकरा किफ़ायत नहीं करेगा।" [सहीह बुखारी: 968, सहीह मुस्लिम: 196]
इमाम तिर्मिज़ी रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:
قَدْ أَجْمَعَ أَهْلُ العِلْمِ أَنْ لَا يُجْزِءَ الْجَزَعُ مِنَ الْمَعْزِ، وَقَالُوا : إِنَّمَا يُجْزِءُ الْجَزَعُ مِنَ الضَّأْنِ
"अहले-इल्म का इजमा है कि बकरी की जिंस का जज़आ क़ुरबानी में किफ़ायत नहीं करता, जबकि भेड़ की जिंस का जज़आ किफ़ायत करता है।" [सुनन तिरमिज़ी: 1508] के तहत
हाफ़िज़ इब्न अब्दुल बर्र रहमतुल्लाहि अलैहि (463 हिजरी) फ़रमाते हैं:
لَا أَعْلَمُ خِلَافًا أَنَّ الْجَزَعَ مِنَ الْمَعِزِ وَمِنْ كُلِّ شَيْءٍ يُضَحَى بِهِ غَيْرَ الضَّأْنِ لَا يَجُوزُ وَإِنَّمَا يَجُوزُ مِنْ ذَلِكَ كُلِّهِ الثَّنِيُّ فَصَاعِدًا
"इस बारे में मुझे किसी इख़्तिलाफ़ का इल्म नहीं कि छत्रे (भेड़) के अलावा बकरे और दीगर जिन जानवरों की क़ुरबानी की जाती है, उनमें खीरे जानवर की क़ुरबानी जायज़ नहीं, इन सब में दौंदे या इससे बड़ी उम्र का जानवर जायज़ है।" [अत-तमहीद: 23/188]
क़ाज़ी अयाज़ रहमतुल्लाहि अलैहि (544 हिजरी) फ़रमाते हैं:
قَدْ أَجْمَعَ الْعُلَمَاءُ عَلَى الْأَخْذِ بِحَدِيثِ أَبِي بُرْدَةَ، وَأَنَّهُ لَا يُجْزِئُ الْجَدَعُ مِنَ الْمَعْزِ
"हदीस-ए-अबू बुर्दा रज़ियल्लाहु अन्हु पर अमल करने पर अहले-इल्म का इजमा है, नीज़ इजमा है कि बकरी की जिंस में 'जज़आ' की क़ुरबानी जायज़ नहीं।" [इकमालुल मुअल्लिम : 6/410]
अल्लामा इब्न-ए-तीन रहमतुल्लाहि अलैहि (611 हिजरी) फ़रमाते हैं:
الْإِجْمَاعُ عَلَى أَنَّ الْجَزَعَ مِنَ الْمَعْزِ لَا يُجْزِئُ
"इस पर इजमा है कि बकरी की जिंस में 'जज़आ' की क़ुरबानी जायज़ नहीं।" [अत-तौज़ीह लिल-इब्नुल मुलाक़्क़िन: 26/604]
जज़आ की उम्र में इख़्तिलाफ़ है, जमहूर एक साल के क़ायल हैं और एहतियात का तक़ाज़ा भी यही है।
हाफ़िज़ नववी रहमतुल्लाहि अलैहि (676 हिजरी) फ़रमाते हैं:
الْجَزَعُ مِنَ الضَّأْنِ مَا لَهُ سَنَةٌ تَامَّةٌ، هَذَا هُوَ الْأَصَحُ عِنْدَ أَصْحَابِنَا ، وَهُوَ الْأَشْهَرُ عِنْدَ أَهْلِ اللُّغَةِ وَغَيْرِهِمْ
"भेड़ की जिंस का जज़आ मुकम्मल एक साल का होता है, यही हमारे असहाब के नज़दीक सही-तरीन है और अहल-ए-लुग़त के यहाँ मशहूर है।" [शर्ह सहीह मुस्लिम : 13/118]
इस हदीस में मज़कूरा हुक्म आम है और हर जानवर को शामिल है, वह बकरी की जिंस हो या भेड़ की, गाय की जिंस हो या ऊँट की, सब का दौंदा होना ज़रूरी है। वह सही अहादीस जिनमें भेड़ के जज़आ की क़ुरबानी का जवाज़ है, वह तंगी पर महमूल हैं, यानी दौंदा जानवर न मिले, तो एक साल का दुंबा या भेड़ ज़िबह की जा सकती है, इस तरह तमाम अहादीस पर अमल हो जाएगा। तंगी की दो सूरतें हो सकती हैं:
- 1. दौंदा जानवर दस्तयाब न होना।
- 2. कुव्वत-ए-ख़रीद से बाहर होना।
क़ुरबानी में कम से कम दौंदा जानवर ज़िबह किया जाएगा, इससे बड़ी उम्र का जानवर भी ज़िबह किया जा सकता है।
सैय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं:
ثَنِيًّا فَصَاعِدًا وَاسْتَسْمِنْ فَإِنْ أَكَلْتَ أَكَلْتَ طَيِّبًا وَإِنْ أَطْعَمْتَ أَطْعَمْتَ طَيِّبًا
सैय्यदना अब्दुल्ला बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु कुरबानी के जानवर को मोटा-ताज़ा करने और उसे अच्छी खुराक देने पर ज़ोर देते थे। [सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 9/273] और इसकी सनद सही है
सैय्यदना अब्दुल्ला बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा फ़रमाया करते थे:
فِي الضَّحَايَا وَالْبُدْنِ النَّنِيُّ فَمَا فَوْقَهُ
"क़ुरबानी और हदी में दौंदा या इससे बड़ी उम्र का जानवर ज़िबह किया जाएगा।" [मुवत्ता इमाम मालिक: 3556, सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 5/229] और इसकी सनद सही है)
हाफ़िज़ इब्न अब्दुल बर्र रहमतुल्लाहि अलैहि (463 हिजरी) फ़रमाते हैं:
أَجْمَعُوا أَنَّ الثَّنِيَّ فَمَا فَوْقَهُ يُجْزِئُ مِنْهَا كُلِّهَا
"इजमा है कि दौंदा या इससे बड़ी उम्र के जानवर क़ुरबानी वग़ैरह में किफ़ायत करते हैं।" [अल-इस्तिज़कार: 4/250, अल-मसालिक शर्ह मुवत्ता इमाम मालिक लिल-इब्नुल अरबी: 4/427, बिदायातुल मुजतहिद लिल-इब्न रुश्द: 2/138]
तम्बीह:
बाज़ ना-आक़िबत जानवर दौंदा बावर करवाने (दिखाने) के लिए सामने वाले दाँत तोड़ देते हैं, यह महज़ धोखा और फ़रेब है, ऐसे जानवर की क़ुरबानी दुरुस्त नहीं।
क़ुरबानी में शराकत:
बकरा, बकरी, दुंबा और भेड़ सिर्फ़ एक आदमी को किफ़ायत करते हैं।
हाफ़िज़ नववी रहमतुल्लाहि अलैहि (676 हिजरी) फ़रमाते हैं:
أَجْمَعُوا عَلَى أَنَّ الشَّاةَ لَا يَجُوزُ الْاشْتِرَاكُ فِيهَا
"अहले-इल्म का इजमा है कि बकरी में शराकत जायज़ नहीं।" [शर्ह मुस्लिम: 9/67]
अलबत्ता एक बकरा या दुंबा तमाम अहल-ए-ख़ाना के लिए काफ़ी है,
दलाईल मुलाहिज़ा हों:
नबी करीम ﷺ ने दुंबे की क़ुरबानी की और फ़रमाया:
بِسْمِ اللهِ ، اللَّهُمَّ تَقَبَّلْ مِنْ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَمِنْ أُمَّةِ مُحَمَّدٍ
"अल्लाह के नाम के साथ (ज़िबह करता हूँ), ऐ अल्लाह! (यह क़ुरबानी) मुहम्मद (ﷺ), आले-मुहम्मद और उम्मते-मुहम्मद की तरफ़ से क़बूल फ़रमा।" [सहीह मुस्लिम : 1967]
हदीस-ए-मुबारका से साबित हुआ कि एक दुंबा या बकरा तमाम अहल-ए-ख़ाना की तरफ़ से ज़िबह किया जा सकता है, सब की तरफ़ से क़ुरबानी अदा हो जाएगी।
हाफ़िज़ नववी रहमतुल्लाहि अलैहि (676 हिजरी) फ़रमाते हैं:
قَالَ جَمَاعَةٌ مِّنْ أَصْحَابِنَا بَلْ كُلُّهُمْ : الْأُضْحِيَّةُ سُنَّةٌ عَلَى الْكِفَايَةِ فِي حَقِّ كُلّ أَهْلِ بَيْتٍ، فَإِذَا ضَحَى وَاحِدٌ مِّنْهُمْ حَصَلَ الشِّعَارُ وَالسُّنَّةُ لِجَمِيعِهِمْ
"हमारे शवाफ़े असहाब की एक जमात बल्कि तमाम शवाफ़े कहते हैं कि (बकरा या दुंबा की) क़ुरबानी तमाम अहल-ए-ख़ाना के लिए सुन्नत-ए-किफ़ाया है, जब घर का एक फ़र्द क़ुरबानी कर दे, तो तमाम घर वालों को क़ुरबानी का शआर और सुन्नत हासिल हो जाती है।" [अल-अज़कार: 246]
अल्लामा इब्न अबी अल-इज़ हनफ़ी रहमतुल्लाहि अलैहि (792 हिजरी) फ़रमाते हैं:
الْأَحَادِيثُ الْمُتَقَدِّمَةُ فِي جَوَازِ الْأُضْحِيَّةِ الْوَاحِدَةِ عَنْ أَهْلِ الْبَيْتِ
"मज़कूरा अहादीस से साबित होता है कि एक बकरी तमाम घर वालों की तरफ़ से क़ुरबानी में किफ़ायत करती है।" [अत-तन्बीह अला मुश्किलात अल-हिदाया : 5/767]
फ़ायदा:
उम्मत की तरफ़ से क़ुरबानी करना नबी करीम ﷺ का ख़ासा है।
सैय्यदना अबू अय्यूब अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु से सवाल किया गया:
كَيْفَ كَانَتِ الضَّحَايَا فِيكُمْ عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ؟
"रसूल अल्लाह ﷺ के ज़माना-ए-अक़्दस में क़ुरबानी कैसी थी? फ़रमाया:"
كَانَ الرَّجُلُ فِي عَهْدِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُضَحِي بِالشَّاةِ عَنْهُ وَعَنْ أَهْلِ بَيْتِهِ فَيَأْكُلُونَ وَيُطْعِمُونَ، ثُمَّ تَبَاهَى النَّاسُ فَصَارَ كَمَا تَرى
"अहद-ए-नबवी में एक बकरी की क़ुरबानी तमाम अहल-ए-ख़ाना की तरफ़ से की जाती थी, वह खुद भी गोश्त खाते और दूसरों को भी खिलाते, बाद अज़ां (बाद में) लोग (क़ुरबानी करने में) बाहम फ़ख़्र-ओ-मुबाहात करने लगे, हालत आपके सामने है।" [मुवत्ता इमाम मालिक: 3433, सुनन तिरमिज़ी: 1505, सुनन इब्न माजह: 3147,अल्फ़ाज़ इसी के हैं, अल-सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 9/268,] और इसकी सनद सही है।
इमाम तिरमिज़ी रहमतुल्लाहि अलैहि ने इसे हसन सही कहा है।
सैय्यदना अब्दुल्ला बिन हिशाम रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं:
كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُضَحِي بِالشَّاةِ الْوَاحِدَةِ عَنْ جَمِيعِ أَهْلِهِ
"रसूल अल्लाह ﷺ तमाम अहल-ए-ख़ाना की तरफ़ से एक बकरी क़ुरबानी करते थे।" [अल-आहाद वल-मथानी लिल-इब्न अबी आसिम: 679, अल-मुस्तदरक लिल-हाकिम: 3/456, 4/229] ,अल्फ़ाज़ इसी के हैं, [अल-सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 9/268] और इसकी सनद सही है
इमाम हाकिम रहमतुल्लाहि अलैहि ने इस हदीस को सही कहा है, हाफ़िज़ ज़हबी रहमतुल्लाहि अलैहि ने मुवाफ़िक़त की है। यह रिवायत [सहीह बुखारी 7210] में 'मौक़ूफ़न' भी मरवी है।
ऊँट और गाय में शराकत:
ऊँट में दस हिस्सेदार शरीक हो सकते हैं।
सैय्यदना अब्दुल्ला बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं:
كُنَّا مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي سَفَرٍ، فَحَضَرَ الْأَضْحَى، فَاشْتَرَكْنَا فِي الْبَقَرَةِ سَبْعَةٌ، وَفِي الْجَزُورِ عَشَرَةً
"हम नबी करीम ﷺ के साथ सफ़र में ईदुल अज़हा के मौके पर ऊँट में दस और गाय में सात आदमी शरीक हुए।" [मुसनद इमाम अहमद: 1/275, अल-सुनन अल-कुब्रा लिल-नसाई: 4123, 4392, 4482, सुनन तिरमिज़ी: 905, सुनन इब्न माजह: 3131, अल-मुस्तदरक लिल-हाकिम: 4/230] और इसकी सनद हसन है।
इस हदीस को इमाम तिरमिज़ी रहमतुल्लाहि अलैहि ने "हसन ग़रीब", इमाम इब्न खुज़ैमा रहमतुल्लाहि अलैहि) 2908), इमाम इब्न हिब्बान रहमतुल्लाहि अलैहि 4007 ने सही और इमाम हाकिम रहमतुल्लाहि अलैहि ने इमाम बुखारी रहमतुल्लाहि अलैहि की शर्त पर सही कहा है, हाफ़िज़ ज़हबी रहमतुल्लाहि अलैहि ने उनकी मुवाफ़िक़त की है। इस सही हदीस से साबित हुआ कि ऊँट में दस अफ़राद शरीक हो सकते हैं।
सैय्यदना जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं:
نَحَرْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَامَ الْحُدَيْبِيَةِ الْبَدَنَةَ عَنْ سَبْعَةٍ ، وَالْبَقَرَةَ عَنْ سَبْعَةٍ
"हमने हुदैबिया वाले साल नबी करीम ﷺ के साथ क़ुरबानी की, एक ऊँट और गाय को सात-सात आदमियों की तरफ़ से ज़िबह किया गया।" [सहीह मुस्लिम : 1318]
इस हदीस को हदी (मनी के अलावा) पर महमूल करें, तो तआरुज़ खत्म हो जाता है; मनी के अलावा एक ऊँट की दस क़ुरबानियाँ हो सकती हैं।
तम्बीह:
ज़्यादा से ज़्यादा गाय में सात अफ़राद शरीक हो सकते हैं, कम से कम की कोई क़ैद नहीं। जब एक आदमी एक गाय या उससे ज़्यादा गायें ज़िबह कर सकता है, तो एक गाय में दो या तीन हिस्सा-दार बिल-औला (और ज़्यादा हक के साथ) शरीक हो सकते हैं।
इमाम तहावी हनफ़ी रहमतुल्लाहि अलैहि (321 हिजरी) फ़रमाते हैं:
قَدْ أَجْمَعُوا أَنَّ الْبَقَرَةَ لَا تُجْزِئُ فِي الْأُضْحِيَّةِ عَنْ أَكْثَرَ مِنْ سَبْعَةٍ وَهِيَ مِنَ الْبُدُنِ بِاتِّفَاقِهِمْ
"अहले-इल्म का इजमा है कि गाय की क़ुरबानी में सात अफ़राद से ज़्यादा शरीक नहीं हो सकते, हदी में भी बिल-इत्तिफ़ाक़ सात अफ़राद ही शरीक हो सकते हैं।" [शर्ह मानी अल-आसार: 4/175]
भैंस की क़ुरबानी: भैंस को फ़ारसी में 'गाओमीश' कहा जाता है, इसका मुअर्रब (अरबी रूप) 'जामूस' है। यह सूडान और मिस्र में पाई जाती थी। अहल-ए-लुग़त का इत्तिफ़ाक़ है कि भैंस गाय की जिंस है, भैंस की क़ुरबानी पर इजमा है।
इमाम अहमद बिन हंबल रहमतुल्लाहि अलैहि से पूछा गया कि क्या भैंस की सात क़ुरबानियाँ हो सकती हैं? फ़रमाया:
لَا أَعْرِفُ خِلَافَ هَذَا
"मुझे इस मसले में इख़्तिलाफ़ मालूम नहीं।" [मसाइल अल-इमाम अहमद व इसहाक़ बिन राहविया बिरिवायत अल-कौसज: 2/369]
इमाम इब्न मुन्ज़िर रहमतुल्लाहि अलैहि (319 हिजरी) फ़रमाते हैं:
أَجْمَعُوا عَلَى أَنَّ حُكْمَ الْجَوَامِيسِ حُكْمُ الْبَقَرِ
"अहले-इल्म का इजमा है कि भैंसों का हुक्म गायों वाला है।" [अल-इजमा: 45]
अल्लामा इब्न क़ुदामा रहमतुल्लाहि अलैहि (620 हिजरी) फ़रमाते हैं:
لَا خِلَافَ فِي هَذَا نَعْلَمُهُ
"हम इसमें कुछ इख़्तिलाफ़ नहीं जानते।" [अल-मुग़नी: 2/444]
हाफ़िज़ इब्न अल-क़त्तान फ़ासी रहमतुल्लाहि अलैहि (628 हिजरी) फ़रमाते हैं:
أَجْمَعُوا أَنَّ الْجَوَامِيسَ بِمَنْزِلَةِ الْبَقَرِ ، وَأَنَّ اسْمَ الْبَقَرِ وَاقِعُ عَلَيْهَا
"अहले-इल्म का इजमा है कि भैंसें हुक्म में गाय की तरह हैं, इन पर गाय का नाम सादिक़ आता है।भैंस भी गाय की जिंस है।" [अल-इक्ना फ़ी मसाइल अल-इजमा: 1/205]
शेख़ुल इस्लाम इब्न तैमिया रहमतुल्लाहि अलैहि (728 हिजरी) फ़रमाते हैं:
الْجَوَامِيسُ بِمَنْزِلَةِ الْبَقَرِ حَكَى ابْنُ الْمُنْذِرِ فِيهِ الْإِجْمَاعَ
"भैंसें गाय की तरह हैं, इब्न-ए-मुन्ज़िर रहमतुल्लाहि अलैहि ने इस पर इजमा नक़ल किया है।" [मजमूअ अल-फ़तावा: 25/37]
फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी की मोतबर-तरीन किताब में है:
الْبَقَرُ وَالْجَوَامِيسُ جِنْسٌ وَاحِدٌ .
"गाय और भैंस एक ही जिंस से हैं।" [फ़तावा आलमगीरी: 3/120]
नीज़ लिखा है:
لَا يَقَعُ اسْمُ الْبَقَرِ عَلَى الْجَامُوسِ، وَإِنْ كَانَ مِنْ جِنْسِ الْبَقَرِ هُكَذَا فِي الْبَدَائِعِ
"भैंस पर 'बक़र' का लफ्ज़ नहीं बोला जाता है, अगरचे भैंस भी बक़र की जिंस में से है, बदाइअुस-सनाइअु में इसी तरह दर्ज है।" [फ़तावा आलमगीरी: 3/577]
अल्लामा इब्न बज़्ज़ाज़ करदरी हनफ़ी रहमतुल्लाहि अलैहि (827 हिजरी) फ़रमाते हैं:
الْجَامُوسُ يَجُوزُ فِيهَا
"भैंस की क़ुरबानी जायज़ है।" [अल-फ़तावा अल-बज़्ज़ाज़िया: 6/289]
मशहूर लुग़वी अल्लामा अज़हरी रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:
أَجْنَاسُ الْبَقَرِ مِنْهَا الْجَوَامِيسُ
"गाय की मुख़्तलिफ़ अजनास (नस्लें) हैं, एक उनमें से भैंस भी है।" [अज़-ज़ाहिर फ़ी ग़रीब अल्फ़ाज़ अल-शाफ़ई;101]
अल्लामा वहबा ज़ुहैली रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:
لَا خِلَافَ فِي أَنَّ الْجَوَامِيسَ وَالْبَقَرَ سَوَاءٌ لِاتِّحَادِ الْجِنْسِ، إِذْ هِيَ نَوْعٌ مِنْهُ۔
इसमें कोई इख़्तिलाफ़ नहीं कि गाएँ और भैंसें (हुक्म में) बराबर हैं,
क्योंकि उनकी जिंस एक है, भैंस गाय की एक किस्म है। [अल-फ़िक़्ह अल-इस्लामी: 3/1926]
लुग़वी इमाम, अल्लामा अबू नस्र जौहरी रहमतुल्लाहि अलैहि (393 हिजरी) फ़रमाते हैं:
الْجِنْسُ الضَّرْبُ مِنَ الشَّيْءِ، وَهُوَ أَعَمُّ مِنَ النَّوْعِ
"जिंस किसी चीज़ की क़िस्म को कहते हैं, इसमें 'नौअ' की ब-निस्बत उमूम पाया जाता है।" [अस-सिहाह ताजुल लुग़ह: 3/915]
अल्लामा ऐनी हनफ़ी रहमतुल्लाहि अलैहि (855 हिजरी) नक़ल करते हैं:
الْبَقَرُ جِنْسُ، وَأَنْوَاعُهُ : الْجَامُوسُ
"जिंस है और इसकी अनवाअ में एक भैंस भी है।" [अल-बिनाया शर्ह अल-हिदाया: 3/324]
भैंस की हिल्लत (हलाल होना):
भैंस हलाल है, तमाम अहल-ए-लुग़त के यहाँ भैंस गाय की जिंस है। गाय की हिल्लत क़ुरआन-ओ-हदीस में साबित है, जो भैंस को भी शामिल है। नीज़ इसके हलाल होने पर इजमा है।
इमाम इब्न मुन्ज़िर रहमतुल्लाहि अलैहि (319 हिजरी) फ़रमाते हैं:
أَجْمَعُوا عَلَى أَنَّ حُكْمَ الْجَوَامِيسِ حُكْمُ الْبَقَرِ
"अहले-इल्म का इजमा है कि भैंस गाय के हुक्म में है।" [अल-इजमा : 47]
इरशाद-ए-बारी तआला है:
أُحِلَّتْ لَكُمْ بَهِيمَةُ الْأَنْعَامِ ﴾ (المائدة : ١)
"तुम्हारे लिए मवेशी चौपाये हलाल किए गए हैं।" इस आयत में तमाम मवेशी चौपाये शामिल हैं; जो हराम हैं, उनको मुस्तस्ना (अलग) कर दिया गया।
इस आयते-करीमा की तफ़्सीर में मुफ्ती मुहम्मद शफी देवबंदी रहमतुल्लाहि अलैहि लिखते हैं: "और लफ़्ज़ 'अनआम' नअम की जमा है; पालतू जानवर, जैसे ऊँट, गाय, भैंस, बकरी वगैरह, जिनकी आठ किस्में सूरह अनआम में बयान फ़रमाई गई हैं, उनको अनआम कहा जाता है। 'बह़ीमा' का लफ्ज़ आम था, अनआम के लफ्ज़ ने इसको खास कर दिया। मुराद आयत की यह हो गई कि घरेलू जानवरों की आठ किस्में तुम्हारे लिए हलाल कर दी गई हैं। लफ़्ज़ 'उक़ूद' के तहत अभी आप पढ़ चुके हैं कि तमाम मुआहदात दाखिल हैं उनमें से एक मुआहदा वह भी है जो अल्लाह तआ़ला ने अपने बंदों से हलाल-ओ-हराम की पाबंदी के मुताल्लिक लिया है। इस जुमले में इस खास मुआहदे का बयान आया है कि अल्लाह तआ़ला ने तुम्हारे लिए ऊँट, बकरी, गाय, भैंस वगैरह को हलाल कर दिया है, इनको शरई कायदे के मुवाफिक ज़िब़ह कर के खा सकते हैं।" [मआरिफुल कुरआन: 3/13]
अल्लामा सादी हनफी (461 हिजरी) फ़रमाते हैं:
"भैंस के हलाल होने में कोई इख़्तिलाफ़ नहीं।" [अन-नुतफ़ फिल फतावा:1/230]
जानवर में दर्ज-ज़ैल उयूब-ओ-नकाइस न हों:
सैय्यदना बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
أَرْبَعٌ لَا تَجُوزُ فِي الْأَضَاحِيِّ الْعَوْرَاءُ بَيِّنُ عَوَرُهَا، وَالْمَرِيضَةُ بَيِّنٌ مَرَضُهَا ، وَالْعَرْجَاءُ بَيِّنٌ طَلْعُهَا ، وَالْكَسِيرُ الَّتِي لَا تُنْقِي
"चार किस्म के जानवरों की क़ुरबानी जायज़ नहीं:
(1) काना
(2) वाज़ेह बीमार
(3) वाज़ेह लंगड़ा
(4) शिकस्ता-ओ-लाग़री कमज़ोर जिसकी हड्डियों में गूदा न रहा हो)।
[मुसनद इमाम अहमद: 4/84, सुनन अबू दाऊद: 2802, सुनन नसाई: 4374, सुनन तिरमिज़ी: 1497, सुनन इब्न माजह: 3144] और इसकी सनद सही मुत्तसिल है
इस हदीस को [इमाम तिरमिज़ी:1497, इमाम इब्न खुज़ैमा: 2912, इमाम इब्न हिब्बान: 5919, 5922, और इमाम हाकिम:1/467-468] ने "सही" कहा है,
हाफ़िज़ इब्न अब्दुल बर्र रहमतुल्लाहि अलैहि (463 हिजरी) फ़रमाते हैं:
أَمَّا الْعُيُوبُ الْأَرْبَعَةُ الْمَذْكُورَةُ فِي هَذَا الْحَدِيثِ فَمُجْتَمَعُ عَلَيْهَا لَا أَعْلَمُ خِلَافًا بَيْنَ الْعُلَمَاءِ فِيهَا
"इस हदीस में मज़कूरा चार उयूब (कमियों) पर इजमा है, उनके बारे में मुझे उलेमा के माबैन किसी इख़्तिलाफ़ का इल्म नहीं।" [अल-इस्तिज़कार: 5/215]
अल्लामा हलीमी रहमतुल्लाहि अलैहि (403 हिजरी) फ़रमाते हैं:
أَجْمَعَ الْعُلَمَاءُ عَلَى أَنَّ العَمْيَاءَ لَا تَجْرِي، وَالْجَرْبَاءَ لَا تَجْرِي
"उलेमा का इजमा है कि अंधे और खारिश-ज़दा (खुजली वाले) जानवर की क़ुरबानी दुरुस्त नहीं।" [अल-मिन्हाज फ़ी शुअब अल-ईमान: 3/140]
ख़रीदारी के बाद ऐब पैदा हो जाए, तो कोई हर्ज नहीं।
सैय्यदना अब्दुल्ला बिन ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं:
إِنْ كَانَ أَصَابَهَا بَعْدَ مَا اشْتَرَيْتُمُوهَا فَأَمْضُوهَا، وَإِنْ كَانَ أَصَابَهَا قَبْلَ أَنْ تَشْتَرُوهَا فَأَبْدِلُوهَا
"खरीदारी के बाद ऐब पैदा हो जाए, तो क़ुरबानी कर लें; ऐब पहले से मौजूद हो, तो जानवर बदल लें।" [सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 9/289] और इसकी सनद सही है।
इमाम ज़ुहरी रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:
إِذَا اشْتَرَى الرَّجُلُ أُضْحِيَتَهُ فَمَرِضَتْ عِنْدَهُ، أَوْ عَرَضَ لَهَا مَرَضٌ فَهِيَ جَائِزَةٌ
"जानवर खरीदने के बाद बीमार हो जाए, तो कुर्बानी जायज है।" [मुसन्निफ़ अब्दुल रज्ज़ाक़: 4/386, हदीस: 8161] और इसकी सनद सही है।
सैय्यदना अली रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूल करीम ﷺ ने (कुर्बानी के) जानवर की आँखें और कान ब-ग़ौर देखने का हुक्म फ़रमाया। [सुनन नसाई: 4381, सुनन तिरमिज़ी: 1503, सुनन इब्न माजह: 3143] और इसकी सनद हसन है इस हदीस को इमाम तिरमिज़ी ने "हसन सही" [इमाम इब्न खुज़ैमा: 2914] और इमाम हाकिम ने "सही" कहा है। हाफ़िज़ इब़्ने अब्दुल बर्र रहमतुल्लाहि अलैहि ने इस हदीस को "हसनुल इस्नाद" करार दिया है। [अत-तमहीद: 20/167]
सैय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में है:
سَأَلَهُ رَجُلٌ، فَقَالَ : يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ، الْبَقَرَةُ؟ قَالَ : عَنْ سَبْعَةٍ ، قُلْتُ : الْقَرْنُ؟ قَالَ : لَا يَضُرُّكَ ، قَالَ : قُلْتُ : الْعَرَجُ ؟ قَالَ : إِذَا بَلَغَتِ الْمَنْسَكَ، ثُمَّ قَالَ : أَمَرَنَا رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنْ نَسْتَشْرِفَ الْعَيْنَ وَالْأُذُنَ
एक शख़्स ने आपसे पूछा: अमीर-उल-मोमिनीन! गाय में कितने हिस्से हो फ़रमाया: सात, पूछा: सींग (टूटे जानवर का क्या हुक्म है)? फ़रमाया: कोई हर्ज नहीं। अर्ज़ किया: (मामूली) लंगड़ापन हो, तो? फ़रमाया: अगर कुर्बानगाह तक चल कर जा सके, तो कोई हर्ज नहीं। फिर फ़रमाया: हमें रसूल अल्लाह ﷺ ने (जानवर के) आँख और कान ब-ग़ौर (ध्यान से) देखने का हुक्म फ़रमाया।
[सुनन दारमी: 1994] और इसकी सनद हसन है, जानवर की आँखें और कान ब-ग़ौर देखने का हुक्म वुजूबी नहीं, बल्कि इस्तेहबाब (पसंदीदा) पर महमूल है, अलबत्ता वाज़ेह काने जानवर की क़ुरबानी जायज़ नहीं, जैसा कि हदीस-ए-बराह बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु में साबित है।
सैय्यदना अली रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं:
إِنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ نَهَى أَنْ يُضَحَى بِعَضْبَاءِ الْأُذُنِ وَالْقَرْنِ .
"नबी करीम ﷺ ने कान कटे और टूटे सींग वाले जानवर की क़ुरबानी से मना फ़रमाया है।"
[सुनन अबू दाऊद : 2805, सुनन नसाई : 4382, सुनन तिरमिज़ी : 1503, सुनन इब्ने माजा: 3145] सनद सही
इस हदीस को इमाम तिरमिज़ी रहमतुल्लाहि अलैहि ने 'हसन सही' कहा है।
सैय्यदना अली रज़ियल्लाहु अन्हु से क़ुरबानी के जानवर के मुताल्लिक़ पूछा गया, तो फ़रमाया:
لَا مُدَابَرَةَ وَلَا مُقَابَلَةَ وَلَا شَرْقَاءَ سَلِيمَةُ الْعَيْنِ وَالْأُذُنِ
"जिस जानवर का कान पीछे या आगे से काट कर लटका दिया जाए या दरमियान से चीर दिया जाए, उसकी क़ुरबानी न की जाए, बल्कि वह जानवर ज़िबह किया जाए, जिसकी आँखें और कान सही सलामत हों।" [इल्लुल दारकु़तनी: 3/239] और इसकी सनद सही है, कान चीरा हुआ हो या कटा हुआ हो या कान में सूराख़ हो, इसी तरह सींग टूटा हुआ हो या उसका खोल उतर गया हो, इन सूरतों में क़ुरबानी जायज़ है, यह क़ुरबानी में माने-उयूब नहीं, अलबत्ता इन उयूब का न होना बेहतर है। इनके मुताल्लिक़ नहीं-ए-तन्ज़ीही है, जमहूर अहल-ए-इल्म की यही राय है।
तम्बीह:
बाज़ जानवरों के पैदाइशी तौर पर ख़सियतैन नहीं होते, ऐसे जानवरों की क़ुरबानी दुरुस्त है। पैदाइशी तौर पर सींगों का न होना क़ुरबानी से माने नहीं।
हाफ़िज़ इब्नुल मुलाक्किन रहमतुल्लाहि अलैहि (804 हिजरी) फ़रमाते हैं:
قَامَ الْإِجْمَاعُ عَلَى جَوَازِهَا بِالْأَجَمِ الَّذِي لَمْ يُخْلَقْ لَهُ قَرْنَانِ
"इस पर इजमा क़ायम है कि जिस जानवर के सींग पैदाइशी तौर पर ही न हों, उस जानवर की क़ुरबानी जायज़ है।" [अल-इलाम: 10/183]
अल्लामा फ़ख़रुल हसन बिन अब्दुल रहमान गंगोही हनफ़ी रहमतुल्लाहि अलैहि (1315 हिजरी) फ़रमाते हैं:
أَجْمَعَ الْعُلَمَاءُ عَلَى جَوَازِ التَّضْحِيَةِ بِالْأَجَمِّ الَّذِي لَمْ يُخْلَقْ لَهُ قَرْنُ
"अहले-इल्म का इजमा है कि जिस जानवर के पैदाइशी तौर परपर सींग न उगे हों, उसकी क़ुरबानी जायज़ है।" [मा यलीक़ु मिन हल्लिल लुगात व शरहिल मुश्किलात: 226] हामिला जानवर की क़ुरबानी जायज़ है, इजतिनाब बेहतर है।
रसूल अल्लाह ﷺ की तरफ़ से क़ुरबानी:
नबी करीम ﷺ की तरफ़ से क़ुरबानी करना साबित नहीं। इस बारे में दो रिवायतों की तहक़ीक़ मुलाहिज़ा हो।
हनश बिन मोतमर रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है:
رَأَيْتُ عَلِيًّا يُضَحِّي بِكَبْشَيْنِ فَقُلْتُ لَهُ : مَا هَذَا؟ فَقَالَ : إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَوْصَانِي أَنْ أُضَحِّيَ عَنْهُ فَأَنَا أُضَلِّي عَنْهُ
"मैंने सैय्यदना अली रज़ियल्लाहु अन्हु को देखा, आपने दो दुम्बे ज़िबह किए, मैंने पूछा: यह क्या? फ़रमाया: मुझे रसूल अल्लाह ﷺ ने वसियत की थी कि मैं आपकी तरफ़ से क़ुरबानी करूँ, यह मैं आपकी तरफ़ से क़ुरबानी कर रहा हूँ।" [सुनन अबू दाऊद: 2790] सनद ज़ईफ़ (कमज़ोर) है।
- 1. शरीक बिन अब्दुल्लाह क़ाज़ी सय्युल-हिफ़्ज और मुदल्लिस हैं।
- 2. अबुल-हसना मजहूल है।
- 3. हुकम बिन उत़्यबा मुदल्लिस है।
- 4. अबू बक्र बिन रजा ज़ुबैदी की तौसीक़ साबित नहीं।
सैय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु ने ईदुल-अज़हा वाले दिन एक मेंढा मंगवाया और उसे ज़िबह करते वक्त यह अल्फ़ाज़ कहे:
بِسْمِ اللهِ ، اللَّهُمَّ مِنْكَ وَلَكَ وَمِنْ مُحَمَّدٍ لَكَ
बिस्मिल्लाह, ऐ अल्लाह! यह कु़रबानी तेरी अता है और तेरी रज़ा के लिए है, मुहम्मद करीम ﷺ की तरफ़ से खालिसतन तेरे लिए कु़रबान की जा रही है।" [सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 19187] सनद ज़ईफ़ है।
आसिम बिन शरीब मजहूल है, इसे इमाम अबू हातिम रहमतुल्लाहि अलैहि [अल-जरह वत-तादील: 6/487] और हाफ़िज़ ज़हबी रहमतुल्लाहि अलैहि [मीज़ानुल एतदाल: 2/352] ने "मजहूल" कहा है। इमाम इब्न हिब्बान रहमतुल्लाहि अलैहि ने [अत-तिका़त:5/239] में ज़िक्र किया है।
अबू बक्र बिन रजा ज़ुबैदी की तौसीक़ साबित नहीं।
- 3. अबुल-फ़ज़्ल, सुफ़ियान बिन मुहम्मद बिन महमूद जौहरी की तौसीक़ नहीं मिली।
- 4. अबू नस्र अहमद बिन अम्र बिन मुहम्मद इराक़ी की तौसीक़ नहीं मिल सकी।
किसी सहाबी, ताबई और तब-ए-ताबई से नबी करीम ﷺ की तरफ़ से कु़रबानी करना साबित नहीं।
Team Islamic Theology

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