क़ुर्बानी के अहकाम व मसाइल
3. क़ुरबानी का हुक्म
अय्याम-ए-क़ुरबानी में अल्लाह की रज़ा के लिए मख़सूस शर्तों वाले जानवरों का खून बहाना इस्लामी शआर और अज़ीम इबादत है, जिसे क़ुरबानी कहा जाता है, यह सुन्नत है।
सैय्यदना अब्दुल्ला बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं:
سُنَّةٌ وَمَعْرُوفٌ
क़ुरबानी सुन्नत और कार-ए-खैर (भलाई का काम) है। सहीह बुखारी: 2/832, तालीक़न; तग़लीक़ अत-तालीक़ इब्ने ह़जर: 5/3, और इसकी सनद सही है। हाफ़िज़ इब्न हजर रहमतुल्लाहि अलैहि ने इसकी सनद को "जिय्यद" सही करार दिया है।
सैय्यदना अब्दुल्ला बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में है,
كَانَ إِذَا حَضَرَ الْأَضْحَى أَعْطَى مَوْلًى لَّهُ دِرْهَمَيْنِ فَقَالَ : اشْتَرِ بِهِمَا لَحْمًا وَأَخْبِرِ النَّاسَ أَنَّهُ أَضْحَى ابْنِ عَبَّاسٍ .
जब ईदुल अज़हा का दिन आता, तो आप (अब्दुल्ला बिन अब्बास) अपने गुलाम को दो दिरहम देते और फ़रमाते: इनका गोश्त खरीद लाएँ और लोगों को बताएँ कि यह अब्दुल्ला बिन अब्बास की क़ुरबानी है।" [ सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 9/265] और इसकी सनद सही है
साबित हुआ कि सैय्यदना अब्दुल्ला बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) क़ुरबानी तर्क (छोड़) भी कर देते थे और इसकी खबर लोगों को देते, ताकि लोग क़ुरबानी को वाजिब न समझ लें।
सैय्यदना बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं:
مَا كُنْتُ أُبَالِي لَوْ ضَلَّيْتُ بِدِيكِ، وَلَأَنْ أَخُذَ ثَمَنَ الْأُضْحِيَّةِ فَأَتَصَدَّقَ بِهِ عَلَى مِسْكِينٍ مُقْتِرٍ فَهُوَ أَحَبُّ إِلَيَّ مِنْ أَنْ أُضَحِّي
"मुझे कोई परवाह नहीं कि मैं एक मुर्गे की क़ुरबानी करूँ। मैं क़ुरबानी की क़ीमत किसी ज़रूरतमंद मिस्कीन पर सदक़ा कर दूँ, यह मुझे क़ुरबानी करने से ज़्यादा महबूब है।" [अल-मुहल्ला लिल-इब्न हज़म: 9/6] और इसकी सनद सही है
इससे क़तई यह साबित नहीं होता कि सैय्यदना बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) मुर्गे की क़ुरबानी के क़ायल थे या क़ुरबानी करने के बजाय उसकी क़ीमत सदक़ा करने को अफ़ज़ल समझते थे। दरअसल आपने यह दोनों बातें एक ख़ास रुझान के रद्द में फ़रमाई हैं। मतलब यह कि अगर लोग देखा-देखी और नुमाइश के लिए जानवर क़ुरबान करें, तो उससे कहीं बेहतर होगा कि मैं बड़े-बड़े जानवर क़ुरबान करने के बजाय छोटा सा मुर्गा ही अल्लाह की रज़ा के लिए ज़िबह कर दूँ या देखा-देखी में क़ुरबानी का जानवर ज़िबह करने के बजाय उस जानवर की क़ीमत किसी मोहताज ग़रीब को दे दूं।
अहले-इल्म ने इस असर से क़ुरबानी का 'अदम-ए-वुजूब' (वाजिब न होना) साबित किया है।
अल्लामा इब्न हज़म रहमतुल्लाहि अलैहि (456 हिजरी) फ़रमाते हैं:
لَا يَصِحُ عَنْ أَحَدٍ مِّنَ الصَّحَابَةِ أَنَّ الْأَضْحِيَّةَ وَاجِبَةٌ
"किसी सहाबी से क़ुरबानी को वाजिब कहना साबित नहीं।" अल-मुहल्ला बिल-आसार: 6/10
अल्लामा शातबी रहमतुल्लाहि अलैहि (790 हिजरी) फ़रमाते हैं:
كَانَ الصَّحَابَةُ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ لَا يُضَلُّونَ يَعْنِي أَنَّهُمْ لَا يَلْتَزِمُونَ الْأُضْحِيَّةَ
"सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) क़ुरबानी करना ज़रूरी नहीं समझते थे।"
(सन्दर्भ: अल-एतसाम: 2/602
इमाम बुखारी (रहमतुल्लाहि अलैहि) और मुहद्दिसीन के नज़दीक भी क़ुरबानी सुन्नत है।
तम्बीह
सैय्यदना अबू सरीहा हुज़ैफ़ा बिन असैद रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है:
أَدْرَكْتُ أَبَا بَكْرٍ وَعُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا وَكَانَا لِي جَارَيْنِ، وَكَانَا لَا يُضَرِّيَانِ
"सैय्यदना अबू बक्र और सैय्यदना उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) ही मेरे पड़ोसी थे, मैंने आप दोनों को देखा, आप क़ुरबानी नहीं करते थे।" अल-खिलाफ़ियात लिल-बैहक़ी: 7/335)
इसकी सनद ज़ईफ़ (कमज़ोर) है। आमिर शेअबी का सैय्यदना अबू सरीहा रज़ियल्लाहु अन्हु से समाअ (सुनना/मिलना) मालूम नहीं हो सका है।
फ़ायदा:
सैय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
مَنْ كَانَ لَهُ سَعَةٌ فَلَمْ يُضَحٍ فَلَا يَقْرَبَنَّ مُصَلَّانَا
"इस्तताअत व कुदरत होने के बावजूद जो क़ुरबानी न करे, वह हमारी ईदगाहों के पास भी न फटके।" मुसनद अहमद: 4266, सुनन इब्न माजह: 3123, अल-मुस्तदरक लिल-हाकिम: 2369
यह रिवायत 'मर्फ़ूअन' ज़ईफ़ (कमज़ोर) और मुनकर है।
अब्दुल्ला बिन अय्याश कु़तबानी ज़ईफ़ है। इमाम अबू हातिम राज़ी रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:
لَيْسَ بِالْمَتِينِ
यह पुख्ता-कार (मजबूत) रावी नहीं है, (मुनकर रिवायतें बयान कर देता है। अल-जरह वत-तादील लिल-इब्न अबी हातिम: 5/126
इमाम इब्न यूनुस रहमतुल्लाहि अलैहि ने इसे 'मुनकरुल हदीस' कहा है। अल-इकमल लिल-इब्न माकूला: 6/72, तहज़ीब अत-तहज़ीब: 5/351
अल्लामा इब्न हज़म रहमतुल्लाहि अलैहि फरमाते हैं:
لَيْسَ مَعْرُوفًا بِالثَّقَةِ
यह सिक़ा (भरोसेमंद) नहीं है।"अल-मुहल्ला बिल-आसार: 6/8)
इस रिवायत को इमाम अहमद बिन हंबल रहमतुल्लाहि अलैहि ने "मुनकर" कहा है। अल-फ़ुरुसिया लिल-इब्न अल-क़य्यिम: 200; किताब अल-फ़ु़रू लिल-इब्न मुफ़लिह: 2/309
अल्लामा इब्न हज़म रहमतुल्लाहि अलैहि ने इस रिवायत पर जरह की है। अल-मुहल्ला बिल-आसार: 6/7
हाफ़िज़ इब्ने ह़जर रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:
اخْتُلِفَ فِي رَفْعِهِ وَوَقْفِهِ وَالْمَوْقُوفُ أَشْبَهُ بِالصَّوَابِ قَالَهُ الطَّحَاوِيُّ وَغَيْرُهُ وَمَعَ ذَلِكَ فَلَيْسَ صَرِيحًا فِي الْإِيجَابِ
इस हदीस के मर्फ़ू और मौक़ूफ़ होने में इख़्तिलाफ़ है, इसका मौक़ूफ़ होना राज़िह है, जैसा कि इमाम तहावी वग़ैरह रहमतुल्लाहि अलैहि ने बयान किया है। इसके साथ-साथ यह क़ुरबानी के वुजूब पर सराहत नहीं करती। फ़तह अल-बारी: 10/3
इमाम दारकु़तनी रहमतुल्लाहि अलैहि ने इस रिवायत का मौक़ूफ़ होना ही सही करार दिया है। इल्लुल दारकु़तनी: 2023
हाफ़िज़ इब्न अब्दुल बर्र रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:
الْأَغْلَبُ عِنْدِي فِي هَذَا الْحَدِيثِ أَنَّهُ مَوْقُوفٌ عَلَى أَبِي هُرَيْرَةَ
"मेरे नज़दीक सही बात यही है कि यह सैय्यदना अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) की मौक़ूफ़ रिवायत है।" अत-तमहीद लिमा फ़िल मुवत्ता मिन अल-मआनी वल-असानीद: 23/191)
मगर इससे क़ुरबानी का वाजिब होना साबित नहीं होता।
तन्बीह
अल्लामा इब्नुल अरबी रहमतुल्लाहि अलैहि (543 हिजरी) फ़रमाते हैं:
لَيْسَ فِي فَضْلِ الْأُضْحِيَّةِ حَدِيثُ صَحِيحٌ يُعَوَّلُ عَلَيْهِ، وَقَدْ رَوَى النَّاسُ فِيهَا عَجَائِبُ لَمْ يَصِحٌ مِنْهَا شَيْءٌ
"क़ुरबानी की फ़ज़ीलत पर कोई भरोसेमंद सही हदीस नहीं है, लोगों ने इस बारे में अजीब-ओ-ग़रीब रिवायतें बयान कर रखी हैं, उनमें से कोई भी रिवायत साबित नहीं है।"
आरिज़तुल अहवज़ी: 6/288, अल-मसालिक: 5/145
Team Islamic Theology

0 टिप्पणियाँ
कृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।